शिक्षक सुसाइड कांड: फर्जी नियुक्ति से बना साम्राज्य? निलंबित बाबू संजीव सिंह पर सेवा-विधि उल्लंघन के गंभीर आरोप

विशेष रिपोर्ट – गौरव कुशवाहा

देवरिया (राष्ट्र की परम्परा) | शिक्षक सुसाइड कांड ने देवरिया के बेसिक शिक्षा विभाग में हलचल मचा दी है। शिक्षक कृष्ण मोहन सिंह की मौत के बाद 16 लाख रुपये की कथित वसूली में निलंबित बाबू संजीव सिंह अब एक और बड़े विवाद के केंद्र में हैं। आरोप है कि संजीव सिंह की खुद की नियुक्ति ही मृतक आश्रित नियमावली के विरुद्ध हुई थी। यदि यह तथ्य जांच में सही पाया जाता है, तो शिक्षक सुसाइड कांड केवल वसूली का मामला नहीं रहेगा, बल्कि फर्जी नियुक्ति का गंभीर प्रकरण बन जाएगा।
मृतक आश्रित नियमावली के प्रावधान और बड़ा सवाल
उत्तर प्रदेश सेवा नियमावली के अध्याय-3 में मृतक आश्रित नियुक्ति की स्पष्ट शर्तें दी गई हैं। नियम के अनुसार, यदि मृत कर्मचारी का पति या पत्नी पहले से केंद्र या राज्य सरकार की सेवा में कार्यरत हो, तो आश्रित को अनुकंपा नियुक्ति का लाभ नहीं दिया जा सकता।
सूत्रों का दावा है कि संजीव सिंह की माता के निधन के बाद उन्हें मृतक आश्रित कोटे से नौकरी मिली, जबकि उनके पिता उस समय केंद्र सरकार के डाक विभाग में कार्यरत थे। यदि यह तथ्य सही है, तो संजीव सिंह मृतक आश्रित नियमावली के तहत अपात्र थे।
शिक्षक सुसाइड कांड के संदर्भ में यह प्रश्न और भी गंभीर हो जाता है कि क्या नियुक्ति के समय विभाग को गुमराह किया गया? क्या पिता की सरकारी सेवा की जानकारी छिपाई गई? यदि ऐसा हुआ है, तो यह सीधे-सीधे धोखाधड़ी और नियमों की अवहेलना का मामला बनता है।
CDO का बयान: साक्ष्य आएंगे तो होगी सख्त कार्रवाई
मामले पर जब देवरिया के मुख्य विकास अधिकारी राजेश कुमार सिंह से प्रतिक्रिया ली गई, तो उन्होंने साफ कहा कि शिकायतकर्ता जांच टीम के समक्ष प्रमाण प्रस्तुत करें। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्रशासन किसी भी प्रकार की अनियमितता को संरक्षण नहीं देगा।
सीडीओ के इस बयान से संकेत मिलता है कि यदि मृतक आश्रित नियमावली के उल्लंघन के प्रमाण सामने आते हैं, तो निलंबन से आगे बढ़कर बर्खास्तगी और वित्तीय रिकवरी तक की कार्रवाई संभव है। शिक्षक सुसाइड कांड की जांच अब नियुक्ति प्रक्रिया तक पहुंचती दिख रही है।
नियुक्ति देने वाले अधिकारियों की भूमिका भी सवालों में
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब संजीव सिंह को नियुक्ति दी गई, तब विभागीय अधिकारियों ने पात्रता की जांच कैसे की? क्या उस समय आवश्यक दस्तावेजों का सत्यापन नहीं हुआ?
यदि संजीव सिंह के पिता केंद्र सरकार में कार्यरत थे, तो सेवा पुस्तिका और परिवार के आय-स्रोत की जानकारी नियुक्ति प्रक्रिया में सामने आनी चाहिए थी। ऐसे में यह आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि क्या उस समय नियमों की अनदेखी जानबूझकर की गई?
शिक्षक सुसाइड कांड ने न केवल एक दुखद घटना को उजागर किया है, बल्कि विभागीय प्रक्रियाओं की पारदर्शिता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
वसूली तंत्र और कथित ‘नेक्सस’ की परतें
विभागीय सूत्रों का कहना है कि संजीव सिंह पर लंबे समय से वसूली तंत्र संचालित करने के आरोप लगते रहे हैं। आरोप है कि उन्होंने अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए एक संगठित नेटवर्क तैयार किया।
यदि नियुक्ति ही नियमों के विरुद्ध हुई थी, तो यह संभावना बलवती होती है कि अपनी कुर्सी बचाने के लिए प्रभाव और दबाव का उपयोग किया गया हो। शिक्षक सुसाइड कांड के बाद से विभाग में पुराने फाइलों की समीक्षा की चर्चा तेज हो गई है।
कानूनी पहलू: क्या हो सकती है कार्रवाई?
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि जांच में फर्जी नियुक्ति प्रमाणित होती है, तो निम्न कार्रवाई संभव है:
सेवा से बर्खास्तगी,वेतन व अन्य लाभों की रिकवरी,नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई,धोखाधड़ी की धाराओं में आपराधिक मुकदमा,मृतक आश्रित नियमावली का उद्देश्य परिवार को संकट से उबारना है, न कि नियमों को दरकिनार कर निजी लाभ उठाना। शिक्षक सुसाइड कांड ने इस नियम की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
आगे क्या?
अब सबकी निगाहें जांच टीम पर टिकी हैं। यदि शिकायतकर्ता साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं और दस्तावेज़ों में पिता की सरकारी सेवा का उल्लेख मिलता है, तो यह मामला प्रदेश स्तर तक जा सकता है।
शिक्षक सुसाइड कांड ने देवरिया के प्रशासनिक ढांचे को झकझोर दिया है। पारदर्शिता और जवाबदेही की कसौटी पर अब न केवल संजीव सिंह, बल्कि पूरी नियुक्ति प्रक्रिया खड़ी है।

Editor CP pandey

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