वैवाहिक विवादों में पॉक्सो के संभावित दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश, डोंबिवली पार्षद की जमानत पर रोक और दिल्ली-एनसीआर यौन अपराधों पर स्वतःसंज्ञान ने न्याय, सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संतुलन को बहस के केंद्र में ला दिया
गोंदिया (महाराष्ट्र)। भारत में आम नागरिक न्यायपालिका को न्याय की अंतिम आशा के रूप में देखता है। शासन-प्रशासन, किसी संस्था अथवा प्रभावशाली व्यक्ति के विरुद्ध शिकायत हो या दो सामान्य नागरिकों के बीच विवाद—संविधान के समक्ष समानता और विधि के शासन का मूल सिद्धांत यही है कि न्यायिक प्रक्रिया व्यक्ति की हैसियत नहीं, बल्कि कानून, साक्ष्य और निर्धारित प्रक्रिया को देखे।
सितंबर 2026 के अंतिम सप्ताह में सर्वोच्च न्यायालय से जुड़े तीन महत्वपूर्ण घटनाक्रमों ने न्याय, सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के इसी संतुलन को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया। 28 सितंबर को न्यायालय ने दिल्ली-एनसीआर में हाल की यौन अपराध की घटनाओं, जिनमें चलती स्लीपर बस में नाबालिग के साथ कथित सामूहिक यौन अपराध भी शामिल है, का स्वतः संज्ञान लिया। इसी दिन महाराष्ट्र के डोंबिवली स्थित शास्त्रीनगर अस्पताल में चिकित्सकों पर कथित हमले के मामले में एक पार्षद को मिली जमानत पर रोक लगाते हुए तीन दिनों में आत्मसमर्पण का निर्देश दिया गया।
इन घटनाक्रमों के साथ 24 सितंबर 2026 का ‘आर बनाम ई एवं अन्य’ फैसला भी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इस मामले में वैवाहिक और बाल-अभिरक्षा विवाद के बीच पॉक्सो कानून के संभावित दुरुपयोग को रोकने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने कई महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय निर्धारित किए।
दिल्ली-एनसीआर की घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट का स्वतःसंज्ञान
दिल्ली-एनसीआर में यौन अपराध की घटनाओं पर सर्वोच्च न्यायालय ने स्वतःसंज्ञान लेते हुए अपनी रजिस्ट्री को जनहित मामला दर्ज करने का निर्देश दिया। उपलब्ध विवरण के अनुसार, 16 वर्षीय लड़की के साथ चलती स्लीपर बस में चालक और परिचालक द्वारा कथित सामूहिक यौन अपराध का मामला सामने आया था।
न्यायालय ने सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा, प्रकाश व्यवस्था, निगरानी और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े सवालों को गंभीरता से लिया। नाबालिगों से जुड़े यौन अपराधों में पॉक्सो अधिनियम, 2012 के प्रावधान तथा मामले के तथ्यों के अनुसार भारतीय न्याय संहिता, 2023 के संबंधित प्रावधान लागू हो सकते हैं। हालांकि किसी विशेष धारा का अंतिम निर्धारण प्राथमिकी, पीड़िता के बयान, चिकित्सकीय साक्ष्य, जांच और आरोपपत्र जैसी सामग्री पर निर्भर करता है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी मामले का स्वतःसंज्ञान लिया जाना अथवा किसी व्यक्ति के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज होना अपने-आप में आरोपी की दोषसिद्धि नहीं है। अंतिम निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही निर्धारित होता है।
डोंबिवली अस्पताल प्रकरण में जमानत पर सुप्रीम कोर्ट की रोक
दूसरे मामले में डोंबिवली के शास्त्रीनगर अस्पताल में चिकित्सकों और अस्पताल कर्मचारियों से कथित मारपीट का मामला सामने आया। रमेश म्हात्रे और अन्य के विरुद्ध दर्ज प्राथमिकी में भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के साथ महाराष्ट्र में चिकित्सा सेवा कर्मियों और चिकित्सा संस्थानों में हिंसा तथा संपत्ति की क्षति रोकने संबंधी विशेष राज्य कानून के प्रावधान लगाए जाने की जानकारी सामने आई।
सर्वोच्च न्यायालय ने 28 सितंबर को उच्च न्यायालय द्वारा दी गई जमानत पर रोक लगाते हुए आरोपी को तीन दिनों के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। सुनवाई के दौरान आरोपी के पूर्व आपराधिक मामलों से संबंधित रिकॉर्ड भी न्यायालय के समक्ष आया।
यहां भी यह ध्यान रखना जरूरी है कि मामला अभी न्यायिक प्रक्रिया में है और आरोपों को अंतिम दोषसिद्धि के समान नहीं माना जा सकता। इस घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू चिकित्सा क्षेत्र में कार्यरत चिकित्सकों और कर्मचारियों की सुरक्षा से जुड़ा है, क्योंकि अस्पतालों में हिंसा सीधे सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था और चिकित्सा सेवाओं की कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकती है।
‘आर बनाम ई एवं अन्य’ : पॉक्सो के दुरुपयोग पर न्यायिक सुरक्षा-कवच
इन तीन घटनाक्रमों में सबसे व्यापक कानूनी प्रभाव वाला निर्णय ‘आर बनाम ई एवं अन्य’ है। मामला लंबे समय से चले आ रहे वैवाहिक और बच्चे की अभिरक्षा के विवाद से जुड़ा था।
बच्चे का जन्म 2015 में हुआ था। बेंगलुरु परिवार न्यायालय ने मार्च 2022 में बच्चे की अभिरक्षा पिता को दी। जनवरी 2023 में कर्नाटक उच्च न्यायालय और उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती के बावजूद यह व्यवस्था प्रभावी रही।
इसके बाद 2024 में मां की ओर से पिता और परिवार के सदस्यों के विरुद्ध बच्चे के यौन शोषण का आरोप लगाते हुए मामला दर्ज कराया गया। इसमें पॉक्सो अधिनियम की धारा 10, किशोर न्याय अधिनियम की धारा 75 और तत्कालीन भारतीय दंड संहिता के संबंधित प्रावधान शामिल थे।
आरोपों की गंभीरता को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने अप्रैल 2026 में जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को सौंप दी। जांच में बच्चे के बयान, सीसीटीवी फुटेज, चिकित्सा एवं मनोवैज्ञानिक सामग्री तथा अन्य परिस्थितिजन्य तथ्यों की जांच की गई।
न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत सीबीआई सामग्री के आधार पर आरोप विश्वसनीय नहीं पाए गए और न्यायालय ने आपराधिक कार्यवाही को आगे जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना। इसके बाद संबंधित प्राथमिकी और कार्यवाही रद्द कर दी गई तथा बच्चे की कानूनी अभिरक्षा पिता के पास बनाए रखने का निर्देश दिया गया।
केवल पॉक्सो की प्राथमिकी आरोप को सत्य साबित नहीं करती
इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू भविष्य के मामलों के लिए निर्धारित सुरक्षा उपाय हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि बच्चे के साथ रहने वाले माता-पिता अथवा परिवार के सदस्य के विरुद्ध पॉक्सो अपराध का आरोप लगाया गया हो और साथ ही माता-पिता के बीच वैवाहिक विवाद भी चल रहा हो, तो गिरफ्तारी के प्रश्न पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 35 के मानकों का कठोरता से पालन किया जाना चाहिए।
ऐसे मामलों में बाल एवं किशोर मनोचिकित्सा अथवा नैदानिक मनोविज्ञान के विशेषज्ञ की सहायता से बच्चे का स्वतंत्र मूल्यांकन कराने की आवश्यकता पर भी न्यायालय ने जोर दिया। विशेषज्ञ की सहायता का उद्देश्य बच्चे पर किसी प्रकार के प्रभाव, उसकी परिस्थितियों और उसके कथन को पेशेवर दृष्टिकोण से समझने में जांच एजेंसी की मदद करना है।
सर्वोच्च न्यायालय ने यह महत्वपूर्ण सिद्धांत भी स्पष्ट किया कि केवल पॉक्सो के तहत प्राथमिकी दर्ज हो जाने से आरोप स्वतः सत्य सिद्ध नहीं हो जाता और न ही उससे किसी माता-पिता का अभिरक्षा या संरक्षकत्व का दावा अपने-आप समाप्त हो जाता है।
परिवार न्यायालय को उपलब्ध सामग्री और जांच के तथ्यों के आधार पर स्वतंत्र प्रथमदृष्टया राय बनानी होगी। इसी प्रकार पॉक्सो अधिनियम की धारा 33 के अंतर्गत विशेष न्यायालय के समक्ष सीधे निजी शिकायत आने की स्थिति में भी निर्धारित परिस्थितियों में आगे की प्रक्रिया से पहले उपलब्ध सामग्री और बच्चे के विशेषज्ञ मूल्यांकन को समग्र रूप से देखा जाना चाहिए।
कानून की कठोरता रहे कायम, लेकिन आरोप को प्रमाण न माना जाए
पॉक्सो अधिनियम की धारा 22 झूठी शिकायत या झूठी सूचना की कुछ परिस्थितियों में दंड का प्रावधान करती है। हालांकि न्यायालय का मूल उद्देश्य वास्तविक पीड़ित बच्चों की सुरक्षा को कमजोर करना नहीं है। उद्देश्य यह है कि बाल-सुरक्षा के लिए बनाए गए कठोर कानून का इस्तेमाल वैवाहिक प्रतिशोध अथवा पारिवारिक विवाद को बढ़ाने के साधन के रूप में न हो।
बाल-अधिकार न्यायशास्त्र में बच्चे का सर्वोत्तम हित महत्वपूर्ण सिद्धांत है। एक तरफ वास्तविक यौन अपराध की शिकायत को अत्यंत संवेदनशीलता और तत्परता से लेना आवश्यक है, वहीं दूसरी तरफ बच्चे को माता-पिता के संघर्ष में माध्यम अथवा हथियार बनाना उसके मानसिक और सामाजिक कल्याण के लिए गंभीर परिणाम पैदा कर सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय ने इसी जटिल संतुलन के बीच ऐसा रास्ता निर्धारित करने का प्रयास किया है, जिसमें वास्तविक पीड़ित की आवाज दबे नहीं और केवल आरोप के आधार पर किसी निर्दोष व्यक्ति को अपरिवर्तनीय सामाजिक, पारिवारिक या व्यक्तिगत क्षति न हो।
इसी संदर्भ में फैसले की प्रतियां सभी उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल तथा राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों के माध्यम से आपराधिक न्यायालयों और पुलिस तंत्र तक पहुंचाने का निर्देश भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
न्याय का अर्थ केवल सजा नहीं, निष्पक्ष प्रक्रिया भी
सितंबर 2026 के इन न्यायिक घटनाक्रमों से कानून के तीन अलग-अलग लेकिन परस्पर जुड़े आयाम सामने आते हैं—सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा, चिकित्सकों जैसे सार्वजनिक सेवा प्रदाताओं की सुरक्षा और कठोर बाल-सुरक्षा कानूनों के संभावित दुरुपयोग की स्थिति में नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा।
न्याय का वास्तविक अर्थ केवल अपराधी को दंडित करना नहीं है। वास्तविक पीड़ित को संरक्षण देना, निर्दोष व्यक्ति को अनुचित दंडात्मक प्रक्रिया से बचाना और बच्चे के सर्वोत्तम हित को हर पारिवारिक संघर्ष से ऊपर रखना भी न्याय की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
‘आर बनाम ई एवं अन्य’ का फैसला इसलिए केवल एक वैवाहिक विवाद के पटाक्षेप तक सीमित नहीं दिखाई देता, बल्कि पुलिस, विशेष पॉक्सो अदालतों और परिवार न्यायालयों के लिए एक महत्वपूर्ण न्यायिक संदेश प्रस्तुत करता है—बाल-सुरक्षा कानून की कठोरता बनी रहे, लेकिन किसी आरोप को अपने-आप अपराध का प्रमाण न मान लिया जाए।
अंततः न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता निष्पक्ष जांच, विश्वसनीय साक्ष्य, निर्धारित प्रक्रिया और सत्य के संतुलन पर ही टिकी रहती है।
लेखक: एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया, महाराष्ट्र — विशेषज्ञ स्तंभकार, साहित्यकार, अंतरराष्ट्रीय लेखक, चिंतक, कवि, संगीत माध्यमज्ञ एवं सीए (एटीसी)
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