भाजपा नेता ने प्राथमिक शिक्षा की वर्तमान चुनौतियों पर जताई चिंता
उतरौला/बलरामपुर (राष्ट्र की परम्परा)। “महात्मा गांधी ने कहा था कि जो बदलाव आप दुनिया में देखना चाहते हैं, उसकी शुरुआत खुद से करनी चाहिए।” — यह प्रेरक विचार वरिष्ठ भाजपा नेता एवं आरएसवी ग्रुप के चेयरमैन राधेश्याम वर्मा ने अपने आवास पर आयोजित एक कार्यकर्ता सभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किया। सभा में बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ता उपस्थित थे। राधेश्याम वर्मा ने वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर चिंता जताते हुए कहा कि समाज और सरकार के बीच उत्पन्न विसंगतियों की जड़ नागरिकों की सोच में निहित है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्राथमिक विद्यालयों में कम नामांकन वाले स्कूलों को मर्ज करने की योजना पर हो रहे विरोध को समझने से पहले, इसके पीछे के तथ्यों को जानना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि “आज हर कोई शिक्षक बनना चाहता है लेकिन अपने बच्चों को प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाना नहीं चाहता। जब तक हम नागरिक समाज स्वयं को सरकार का हिस्सा नहीं मानेंगे, तब तक किसी भी नीति या निर्णय की सार्थकता पर चर्चा बेमानी होगी।” प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति पर बोले खरी-खरी राधेश्याम वर्मा ने कहा कि यदि हम स्वयं अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजें और नियमित निगरानी रखें तो स्कूलों की हालत सुधर सकती है। उन्होंने सरकार पर दोषारोपण की प्रवृत्ति को गलत ठहराते हुए कहा कि “जब हम खुद जिम्मेदार नहीं बनते, तब हम सरकार की किसी भी पहल का विरोध नैतिक रूप से नहीं कर सकते।” उन्होंने कहा कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है, लेकिन इसे आत्मसात करना कठिन होता है। “सरकार के निर्णय का विरोध करने से पहले हमें यह समझना होगा कि ऐसी परिस्थितियाँ क्यों उत्पन्न हुईं कि सरकार को यह कदम उठाना पड़ा।” बाजारवाद और शिक्षा के निजीकरण पर भी की टिप्पणी उपभोक्तावादी मानसिकता पर प्रहार करते हुए राधेश्याम वर्मा ने कहा कि “आज लोगों को मुफ्त में मिलने वाली सरकारी शिक्षा में अपमान महसूस होता है जबकि वही लोग प्राइवेट स्कूलों की फीस और नियमों को गर्व से स्वीकारते हैं।” उन्होंने कहा कि “हमें यह विचार करना चाहिए कि मुफ्त में मिलने वाली चीज की उपयोगिता अधिक होती है, बशर्ते उस पर निगरानी और ध्यान दिया जाए।”
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