मंगल पांडेय के बलिदान दिवस पर विशेष

बलिया (राष्ट्र की परम्परा)। 29 मार्च 1857 को मंगल पांडेय ने अंग्रेजों के खिलाफ फूंका था बिगुल वतन के काम जो ए जवानी उसको कहते हैं इस पंक्ति को चरितार्थ करने वाले प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के शहीद मंगल पडिय ने फांसी पर चढ़कर अंग्रेजों को एहसास करा दिया कि भारत माता के लाल अब जाग चुके है अब अंग्रेजी की खैर नहीं है मंगल पांडेय की सहादत दिवस पर जनपद के विभिन्न क्षेत्रों में 8 अप्रैल मंगलवार को कार्यक्रम आयोजित थे महान क्रतिकारी मंगल पांडेय का जन्म 30 जनवरी 1931 को बलिया जनपद के नगवा गांव के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था मंगल पांडेय सेना में भर्ती हुए, उन पर सेना में धर्म के अनुसार वेशभूषा में रहने की छूट थी। सिपाहियों के लिए माथे पर तिलक लगाना और मुसलमान सियाहियों को दाड़ी रखना आम बात थी उस समय सेना में दलितों की ओर से सैनिकों को ईसाई बनाने का कुचक्र चल रहा था। पश्चिम बंगाल के बैरकपुर में एक फैक्ट्री थी, जहां कारतूस बनाए जाते थे। उस फैक्ट्री के अधिकांश कर्मचारी दलित नगवा को झेलनी पड़ी थी अंग्रेजों की प्रताड़ना मंगल पांडेय के विद्रोह के बाद अंग्रेजी फौज को प्रताड़ना नगवा गांव के लोगों को झेलनी पड़ी। नगवा गांव के बुजुर्गों एवं जानकार लोगों का कहना है की मंगल पांडेय के फांसी के बाद मंत्र के लोगो को तंग किया जाने लगा। कुछ लोग गांव छोड़कर जनपद के पटखौली, शेर, सहतवार, खानपुर, डुमरिया, गोपाल पांडेय के टोला तथा गाजीपुर के गॉड्जर आदि गांव में जा बसे। कश्यप गोत्री ब्राह्मण परिवार मंगल पांडेय के ही वशज हैं। ये लोग जहाँ भी बसे हैं आदि ब्रा बावा की पूजन-अर्चन के बदौलत अपनी पुरातन पहचान बनाए हुए हैं। एक दिन प्यास लगने पर फैल्ट्री के एक कर्मचारी ने सैनिक मंगल पांडेय से एक लोटा पानी मांगा मंगल पांडेय ने उस कर्मचारी को यह कह कर पानी देने से मना कर दिया कि वह अछूत है यह बात उस कर्मचारी की चूभगई। उसने कटाक्ष करते हुए मंगल पांडेय से कहा कि उस समय में जिसका धर्म हिन्दू कहा जाता है जब बंदूक में कारतूस डालने से पहले उसे दांत से तोड़‌ते है उस कारतूस पर गाय व सूअर की चर्बी लगी होती है वह दलित कर्मचारी मातादिन था, जिसने भारतीय सैनिकों की आंखें खोल दी। इसके बाद 29 मार्च 1857 को मंगल पांडेय ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया और परेड ग्राउंड में ही अंग्रेज अफसर बाँव और सार्जेंट मंजर ह्यूसन की मौत की घाट उतार दिया। मंगल पांडेय सभी सिपाहियो को चर्बी की बात बताते हुए अंग्रेजों से बदला लेने को बात कही तभी अंग्रेज अफसर कर्नल डीलर परेड स्थल पर पहुंचा और सिपाहियों से मंगल पांडेय को गिरफ्तार करने का आदेश दिया, लेकिन एक भी सैनिक मंगल पांडेय की गिरफ्तार करने के लिए आगे नहीं आए। यह घटना पूरे देश में तेजी से फैलने गई। सिपाहियों में अंग्रेज अफसर के विरुद्ध बगवत का विद्रोह सुलग रहा था। मंगल पांडेय को गिरफ्तार कर लिया गया। फौजी अदालत में उन पर मुक्दमा चला मंगल पांडेय ने कहा कि मैंने जो कुछ भी किया सोच समझकर राष्ट्र व धर्म के लिए, किया। इसके बाद उन्हें फांसी को सजा सुनाई गई। बैरकपुर छावनी के परेड मैदान में फांसी का मंत्र बनाया गया। 7 अप्रैल को सुबह फांसी दी जानी थी परंतु बैरकपुर के जल्लाद मगल पांडेय को फांसी देने से मना कर दिया। अंत में कोलकाता से जल्लाद बुलाए गए। अंग्रेज अफसर जनरल हियसीं ने अप्रैल को निर्देश जारी किया कि अप्रैल 1857 की सुबह 8 बजे ब्रिगेट परेड के मैदान में 24वीं पैदल सेना के 10वीं रेजीमेंट नेशि इफैक्ट्री को पांचवी कपनी के 1446 नबर के सिपाही मंगल पांडेय को फांसी दी जाएगी। 8 अप्रैल को प्रातः 5 बजे उन्हें फांसी पर झूला दिया गया।

Karan Pandey

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