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नेताजी के कंधे पर चढ़कर गांधी पर प्रहार और हिंदू राष्ट्र का भागवत एलान

लेखक: बादल सरोज
कोलकाता/नागपुर (राष्ट्र की परम्परा)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के अवसर पर संघ नेतृत्व द्वारा दिए जा रहे बयानों ने एक बार फिर महात्मा गांधी, स्वतंत्रता संग्राम और भारत की संवैधानिक आत्मा को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। आलोचकों का कहना है कि आरएसएस ने अपने 100 वर्ष पूरे होने के मौके पर गांधी के विचारों पर परोक्ष प्रहार और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नाम का राजनीतिक उपयोग शुरू कर दिया है।

संघ प्रमुख मोहन भागवत द्वारा हाल ही में नागपुर और कोलकाता में दिए गए भाषणों को इसी कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। कोलकाता में ‘RSS @100’ विषय पर दिए गए व्याख्यान में उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के प्रतीकों, विशेषकर गांधी के चरखे, पर टिप्पणी करते हुए कहा कि “केवल चरखा चलाने से आज़ादी नहीं मिली।” राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह टिप्पणी सीधे तौर पर गांधी और उनके नेतृत्व में चले जनआंदोलन पर सवाल खड़ा करती है।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नाम पर वैचारिक दावा

अपने वक्तव्य में भागवत ने कहा कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आरएसएस का लक्ष्य एक ही था — भारत को शक्तिशाली बनाना, भले ही रास्ते अलग रहे हों। उन्होंने नेताजी को “आधुनिक भारत के शिल्पकारों” में शामिल करते हुए उनके राष्ट्रवाद को अपनाने की अपील की।

हालांकि इतिहासकारों और विद्वानों का कहना है कि नेताजी का राष्ट्रवाद धर्मनिरपेक्ष और समावेशी था, जो हिंदू या मुस्लिम राष्ट्र की अवधारणा से कोसों दूर था। नेताजी ने 1944 में टोक्यो विश्वविद्यालय में दिए अपने प्रसिद्ध व्याख्यान “मेरे सपनों का भारत” में स्पष्ट कहा था कि स्वतंत्र भारत की सरकार सभी धर्मों के प्रति समान रूप से तटस्थ होगी।

हिंदू राष्ट्र पर खुला एलान

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कोलकाता में यह दावा भी किया कि “भारत पहले से ही हिंदू राष्ट्र है और इसके लिए संविधान की मंजूरी की आवश्यकता नहीं है।” उन्होंने संसद और संविधान को दरकिनार करते हुए इसे “सत्य” बताया। इस बयान को लेकर राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है, क्योंकि यह भारत के संवैधानिक ढांचे और धर्मनिरपेक्षता की मूल भावना से टकराता है।

इतिहास बनाम संघ का दावा

इतिहास के दस्तावेज़ बताते हैं कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस हिंदू महासभा और सांप्रदायिक राजनीति के कट्टर विरोधी थे। 1938 में कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग से जुड़े लोगों को कांग्रेस की समितियों से बाहर करने का प्रस्ताव पारित कराया था।
यह तथ्य स्वयं डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की डायरी और सरकारी अभिलेखों में दर्ज हैं।

इतना ही नहीं, आज़ाद हिंद फ़ौज के संघर्ष के दौरान हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग से जुड़े नेताओं द्वारा अंग्रेज सरकार के साथ सहयोग के प्रमाण भी राष्ट्रीय अभिलेखागार में मौजूद हैं।

गांधी, हिंदू राष्ट्र और संघ की असहजता

विश्लेषकों का कहना है कि गांधी संघ के लिए आज भी असुविधाजनक हैं, क्योंकि वे कट्टर धार्मिक आस्था के बावजूद हिंदू राष्ट्र के प्रबल विरोधी थे। गांधी का स्पष्ट मत था कि चाहे देश की पूरी आबादी एक ही धर्म की क्यों न हो, राज्य को धर्म से अलग रखा जाना चाहिए।
संघ के हालिया बयानों को कई लोग गांधी के विचारों को धीरे-धीरे हाशिए पर धकेलने की रणनीति के रूप में देख रहे हैं। मनरेगा जैसे कार्यक्रमों से गांधी नाम हटाने की बहस को भी इसी वैचारिक दिशा से जोड़कर देखा जा रहा है।

Karan Pandey

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