पुनीत मिश्र
भारतीय टेलीविजन के इतिहास में रामानंद सागर का नाम उस सृजनात्मक क्रांति का प्रतीक है, जिसने छोटे परदे को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना का सशक्त मंच बना दिया। दूरदर्शन के माध्यम से दुनिया को भारतीय परंपरा, मर्यादा और जीवन-मूल्यों से परिचित कराने वाले रामानंद सागर ने अपने धारावाहिकों के जरिए करोड़ों दर्शकों के मन में स्थायी स्थान बनाया।
रामानंद सागर मूलतः एक कुशल लेखक थे। साहित्यिक पृष्ठभूमि से आने के कारण उनकी रचनाओं में भाषा की गरिमा, कथानक की गंभीरता और भावनात्मक गहराई सहज रूप से दिखाई देती है। जब उन्होंने टेलीविजन को माध्यम बनाया, तब भी उन्होंने भारतीय सभ्यता की आत्मा से कोई समझौता नहीं किया। यही कारण है कि रामायण जैसे धारावाहिक ने प्रसारण के समय पूरे देश को एक सूत्र में बांध दिया। रविवार की सुबह सड़कों का सूना हो जाना, घरों में दीप-धूप जलाकर टीवी के सामने बैठना—यह सब एक धारावाहिक का नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक युग का निर्माण था।
रामायण के माध्यम से रामानंद सागर ने मर्यादा, कर्तव्य, त्याग और आदर्श जीवन की अवधारणा को जन-जन तक पहुंचाया। यह केवल रामकथा का चित्रण नहीं था, बल्कि भारतीय समाज के नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना थी। इसी तरह कृष्णा धारावाहिक में उन्होंने श्रीकृष्ण के जीवन दर्शन, कर्मयोग और मानवता के संदेश को अत्यंत सरल और प्रभावी रूप में प्रस्तुत किया।
जय गंगा मैया जैसे धारावाहिकों में भारतीय आस्था और प्रकृति के प्रति श्रद्धा को कथा के माध्यम से उकेरा गया, वहीं विक्रम बेताल में लोककथाओं, नैतिक प्रश्नों और बौद्धिक विमर्श को रोचक शैली में प्रस्तुत किया गया। यह उनकी सृजनात्मक बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण है कि वे पौराणिक, आध्यात्मिक और लोककथात्मक, तीनों ही क्षेत्रों में समान दक्षता रखते थे।
रामानंद सागर का योगदान केवल धारावाहिक निर्माण तक सीमित नहीं था। उन्होंने यह सिद्ध किया कि भारतीय कथाएं वैश्विक मंच पर भी अपनी पहचान बना सकती हैं, बशर्ते उन्हें ईमानदारी, शोध और संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया जाए। उनके कार्यों ने आने वाली पीढ़ियों के निर्माता-निर्देशकों को यह राह दिखाई कि लोकप्रियता और मूल्यबोध एक साथ चल सकते हैं।
पद्मश्री सम्मान से अलंकृत रामानंद सागर आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके धारावाहिक आज भी स्मृतियों में जीवित हैं। उनकी जयंती पर यह कहना अनुचित नहीं होगा कि उन्होंने भारतीय टेलीविजन को केवल देखा नहीं जाने वाला माध्यम बनाया, बल्कि उसे जिया जाने वाला अनुभव बना दिया। उनकी रचनाएं आने वाली पीढ़ियों को भी भारतीय संस्कृति, जीवन दर्शन और नैतिकता की प्रेरणा देती रहेंगी।
