पुनीत मिश्र
राज नारायण भारतीय राजनीति के उन विरले नेताओं में थे, जिनके लिए सत्ता साध्य नहीं, बल्कि जनता की सेवा का माध्यम थी। उनका जन्म 17 नवंबर 1917 को वाराणसी में हुआ और बचपन से ही वे सामाजिक अन्याय और विषमताओं के प्रति संवेदनशील थे। समाजवादी विचारधारा से प्रेरित होकर उन्होंने राजनीति को परिवर्तन का साधन बनाया। उनके लिए समाजवाद केवल नारा नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन था, जिसमें किसान, मजदूर और वंचित वर्ग केंद्र में थे। राज नारायण की सबसे बड़ी पहचान सत्ता से निर्भीक टकराव की रही। उन्होंने उस दौर में भी सत्ता को चुनौती दी, जब ऐसा करना राजनीतिक आत्महत्या माना जाता था। 1971 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ा और हार के बाद भी चुप नहीं बैठे। उन्होंने चुनाव में सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। 1975 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ। यह केवल एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं था, बल्कि सत्ता के अहंकार के खिलाफ था। इसी संघर्ष की परिणति आपातकाल और उसके बाद जनता के राजनीतिक जागरण के रूप में सामने आई। राज नारायण का यह संघर्ष यह साबित करता है कि लोकतंत्र में सबसे बड़ा पद संविधान और जनता की शक्ति का होता है। राज नारायण का जीवन सादगी और जनसरोकार का उदाहरण था। वे सत्ता में रहते हुए भी आम आदमी की तरह जीवन जीते थे। उनके भाषणों में अलंकार नहीं, बल्कि जमीन की सच्चाई बोलती थी। संसद में हों या सड़क पर, उनकी चिंता एक ही थी। जनता की आवाज़ को बुलंद करना। आज के राजनीतिक माहौल में राज नारायण का स्मरण इसलिए जरूरी है क्योंकि वे राजनीति को मूल्य और नैतिकता से जोड़ते थे। उन्होंने कभी सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। सत्ता के करीब जाकर भी वे जनता के पक्ष में और सत्ता के विरोधी बने रहे। 31 दिसंबर 1986 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनके विचार आज भी जीवित हैं। राज नारायण हमें यह सिखाते हैं कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं, बल्कि सतत संघर्ष और सजग नागरिकता से मजबूत होता है। वे केवल एक नेता नहीं थे, बल्कि लोकतंत्र के पहरेदार थे, जिन्होंने यह साबित किया कि अकेला व्यक्ति भी साहस और सत्य के साथ खड़ा होकर सत्ता की सबसे ऊंची दीवारों को हिला सकता है।
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