Wednesday, June 10, 2026
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चाक चलाने वाले कुम्हारो के सामने रोजी-रोटी का संकट

बहराइच /(राष्ट्र की परम्मपरा) आधुनिकता चका,चौंध के चलते चाक चलाने वाले कुम्हारो के सामने रोजी-रोटी का भी संकट, प्रतिवर्ष दीपावली त्यौहार में घट रही दिया की बिक्री, फिर भी अपने हुनर की हिम्मत जुटा रहा केसमोहम्मद, जो दिया, मटका, कुझी , बनाकर पूरे नव परिवार का पेट पाल रहा है,
केस मोहम्मद पुत्र साकिर कहते हैं कि यह हुनर मेंरे स्वर्गीय पिता जाकिर निवासी इकौना बाजार से सीख ली थी जो पयागपुर के पटिहाट चौराहे पर, रहकर गरीबी की मार झेलते रहे, इसलिए विद्यालय में पढ़ने भी नहीं जा सका तो पिताजी ने जीवन जीने की कला के साथ इस हुनर को बताया था पिता के स्वर्गवास होने के बाद चाक मशीन हाथ लगी लेकिन दिनों दिन चायनीज सामानों की बाजारों में बिक्री बढने की बाद जहां प्रतिवर्ष 15 से 20000 दिया की बिक्री होती थी वह अब सिमट कर चार से 5000 हो चुकी है इससे अब इस हुनर को जानने वाले शिल्पकारों के सामने भारी समस्या सुरसा की तरह खड़ी है,
इतने में बगल खड़ी तसनुम बोली की बाबू साहब सरकार की तरफ से हम सब हुनर सीखे बैठे लोगों को किसी प्रकार की सरकारी इमदाद नहीं मिल पा रही दिनों दिन आधुनिकता मिट्टी के बर्तन बिक्री पर ग्रहण लग चुका है यहां तक करवा पर भी बने रखे रह गए मिट्टी के बर्तन बिक्री नहीं हो पाई अब लोग पुराने परंपराओं को छोड़कर दुकानों पर लोटे खरीद कर पुरानी परंपराओं से कोसों दूर हैं!
कितनी आती है लागत दिया व मिट्टी के अन्य,वर्तन पकाने में
केसमोहम्मद कहते हैं कि, मिट्टी के बर्तन पकाने के लिए गांव से कडा, तथा मिट्टी खरीदना पड़ता है फिर उसे तैयार करने में हजारों रुपए की लागत आती है, लेकिन बिक्री उस तरह से नहीं होती,

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