दूषित जल: अनदेखी की भारी कीमत

दूषित जल आज केवल पर्यावरण या स्वास्थ्य से जुड़ा विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह देश के समग्र विकास, अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। स्वच्छ जल को जीवन का आधार कहा गया है, लेकिन वास्तविकता यह है कि देश की बड़ी आबादी आज भी असुरक्षित और दूषित पेयजल के भरोसे जीवन जीने को मजबूर है।
आंकड़े स्थिति की भयावहता को स्पष्ट करते हैं। दूषित जल के कारण देश में हर वर्ष लगभग दो लाख लोगों की मौत हो रही है और करीब साठ करोड़ लोग किसी न किसी रूप में जल संकट से प्रभावित हैं। यह विडंबना ही है कि जिस देश में नदियों, तालाबों और जलस्रोतों की समृद्ध परंपरा रही हो, वहां आज लगभग सत्तर प्रतिशत पेयजल दूषित हो चुका है। वैश्विक जल गुणवत्ता सूचकांक में भारत की स्थिति भी चिंता बढ़ाने वाली है।
दूषित जल से फैलने वाली बीमारियां डायरिया, हैजा, टाइफाइड और वायरल हेपेटाइटिस। आज भी स्वास्थ्य तंत्र पर भारी बोझ बनी हुई हैं। बीते वर्षों में जलजनित रोगों के करोड़ों मामले दर्ज होना यह दर्शाता है कि समस्या केवल ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित नहीं रही, बल्कि शहरी इलाकों में भी जल आपूर्ति व्यवस्था गंभीर खतरे में है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि भविष्य की तस्वीर और भी भयावह हो सकती है। विशेषज्ञों का आकलन है कि वर्ष 2030 तक पानी की मांग उपलब्ध आपूर्ति से दोगुनी हो सकती है, जिसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा और जीडीपी को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। यह संकट केवल प्राकृतिक नहीं, बल्कि मानव निर्मित भी है। लापरवाह व्यवस्था, कमजोर निगरानी और जिम्मेदारियों से बचने की प्रवृत्ति इसका मूल कारण है।
अब समय आ गया है कि दूषित जल को केवल आंकड़ों और रिपोर्टों का विषय मानने के बजाय इसे प्राथमिकता के साथ नीति और व्यवहार में उतारा जाए। नगर निकायों, जल आपूर्ति एजेंसियों और स्थानीय प्रशासन को जल शुद्धिकरण, टंकियों व पाइपलाइनों की नियमित जांच, और जल गुणवत्ता परीक्षण को अनिवार्य बनाना होगा। इसके साथ ही नागरिकों को भी स्वच्छ जल के प्रति जागरूक और जिम्मेदार बनना होगा।
दूषित जल से लड़ाई केवल सरकार की नहीं, बल्कि समाज की साझा जिम्मेदारी है। यदि आज ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। स्वच्छ जल ही स्वस्थ जीवन और सुरक्षित भविष्य की बुनियाद है। इस सच्चाई को नजरअंदाज करना अब संभव नहीं।

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