दर्शक हिंदी वाला, कमाई हिंदी से… फिर इंटरव्यू अंग्रेजी में क्यों?

दर्शक, कमाई और पहचान हिंदी की, सितारों की जुबान अंग्रेजी…!

हिन्दी दिवस विशेष व्यंग्य

अपनी हिंदी की तो बात ही निराली है। जिस देश में हिंदी फिल्मों के कलाकार हिंदी में अभिनय करके करोड़ों रुपये कमाते हैं, उसी देश में इंटरव्यू देने बैठते ही उनकी हिंदी अचानक छुट्टी पर चली जाती है और अंग्रेजी नौकरी पर हाजिर हो जाती है।
फिल्म हिंदी की, संवाद हिंदी के, दर्शक हिंदी वाले, तालियां हिंदी में… लेकिन जैसे ही कैमरा इंटरव्यू के लिए घूमता है—“Well… I think… basically… you know…”। दर्शक कुछ क्षण के लिए सोचने लगता है—भाई, फिल्म में तो तुम हिंदी बोल रहे थे, यहां कौन-सी फिल्म चल रही है?
कुछ सितारों को अंग्रेजी बोलते देखकर ऐसा लगता है जैसे हिंदी बोलना उनके स्टारडम के स्तर से नीचे की चीज हो। हिंदी में सवाल पूछो तो चेहरे पर ऐसी गंभीरता छा जाती है, मानो पत्रकार ने उनसे आयकर विभाग की पूरी फाइल मांग ली हो। लेकिन अंग्रेजी में सवाल आते ही चेहरे पर मुस्कान खिल उठती है—“Absolutely! I completely agree…”
और फिर शुरू होता है अंग्रेजी के शब्दों का ऐसा आतिशबाजी प्रदर्शन कि सामने बैठा दर्शक यह भूल जाता है कि सवाल आखिर पूछा क्या गया था!
मजेदार बात यह है कि जिस हिंदी फिल्म के प्रचार के लिए इंटरव्यू हो रहा है, उसी इंटरव्यू में हिंदी को किनारे करके अंग्रेजी की लाल कालीन बिछा दी जाती है। फिल्म का नाम हिंदी, पोस्टर हिंदी, गाने हिंदी, कहानी हिंदी, दर्शक हिंदी… बस कलाकार का इंटरव्यू अंग्रेजी में!
शायद कुछ सितारों को लगता है कि हिंदी में बोलेंगे तो स्टार कम और आम आदमी ज्यादा लगेंगे। उन्हें लगता है कि अंग्रेजी बोलने से उनका “स्टैंडर्ड” अपने आप ऊंचा हो जाता है। अंग्रेजी के दो-चार वाक्य बोलते ही व्यक्तित्व में ऐसी अंतरराष्ट्रीय चमक आ जाती है, जैसे अंग्रेजी बोलते ही स्टारडम का कोई नया प्रमाणपत्र मिल गया हो।
और हमारे एंकर भी कमाल करते हैं। हिंदी चैनल पर हिंदी फिल्म के कलाकार को बुलाकर पहला सवाल अंग्रेजी में पूछेंगे। कलाकार अंग्रेजी में जवाब देगा। फिर एंकर हिंदी में उसका मतलब बताएगा। दर्शक टीवी के सामने बैठकर सोचता रह जाता है—“जब दोनों को हिंदी आती है तो बीच में यह अंग्रेजी किस खुशी में टपक गई?”
यह अंग्रेजी के विरोध की बात नहीं है। अंग्रेजी सीखिए, बोलिए, दुनिया घूमिए, अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी बात रखिए—किसी को कोई आपत्ति नहीं। अंग्रेजी ज्ञान है, अवसर है और संवाद का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी है। लेकिन जिस भाषा के नाम पर पहचान, लोकप्रियता और करोड़ों की कमाई मिली हो, उसके प्रति सहजता और सम्मान भी तो दिखना चाहिए।
विडंबना यह है कि हिंदी को लेकर अक्सर वही लोग संकोच करते हैं, जिनकी लोकप्रियता का सबसे बड़ा आधार हिंदी भाषी समाज है। गांव-कस्बों से लेकर महानगरों तक करोड़ों लोग हिंदी फिल्मों के सितारों को अपना आदर्श मानते हैं। वे उनके संवाद याद करते हैं, उनके गाने गुनगुनाते हैं और उनके अभिनय पर तालियां बजाते हैं। लेकिन जब वही दर्शक अपने पसंदीदा सितारे को हिंदी में सवाल पूछे जाने पर असहज होते देखता है, तो उसके मन में एक सवाल जरूर उठता है—क्या हिंदी बोलना सचमुच कमतर समझा जाने लगा है?
हिंदी में बोलना पिछड़ापन नहीं है और अंग्रेजी बोलना कहीं से कहीं तक आधुनिकता का प्रमाण नहीं हो सकता। आधुनिकता का असली अर्थ भाषा बदलना नहीं, बल्कि सोच को व्यापक बनाना है।
असल आधुनिकता तो यह है कि आप जिस भाषा में सहज हों, उसमें बिना किसी हीन भावना के अपनी बात रख सकें। दुनिया की अनेक भाषाएं बोलना गर्व की बात है, लेकिन अपनी भाषा बोलने में शर्म महसूस करना आत्मविश्वास की कमी का संकेत हो सकता है।
हिंदी दिवस केवल सरकारी कार्यालयों में हिंदी के प्रयोग की औपचारिकता निभाने का दिन नहीं होना चाहिए। यह आत्ममंथन का अवसर भी है कि हम अपनी भाषा के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। हिंदी को सम्मान केवल भाषणों, पोस्टरों और सोशल मीडिया संदेशों में नहीं, बल्कि व्यवहार में भी मिलना चाहिए।
विशेषकर मनोरंजन जगत से जुड़े लोगों की जिम्मेदारी और भी बड़ी है। जिनकी एक फिल्म करोड़ों हिंदी भाषी दर्शकों तक पहुंचती है, जिनके संवाद बच्चे-बच्चे की जुबान पर होते हैं, उनसे कम से कम इतना तो उम्मीद की ही जा सकती है कि वे हिंदी बोलने में सहज महसूस करें।
वरना स्थिति यही रहेगी—हिंदी फिल्में बनेंगी हिंदी में, हिंदी से ही कमाई होगी, तालियां भी मिलेंगी हिंदी वालों से और इंटरव्यू होगा अंग्रेजी में!
वाह रे… हिंदी सिनेमा!
तेरी कमाई हिंदी की,
तेरी पहचान हिंदी की,
तेरे दर्शक हिंदी के—
बस इंटरव्यू आते ही तेरे सितारों की जुबान… विदेशी हो जाती है!

शायद अब समय आ गया है कि हिंदी को सिर्फ बाजार की भाषा नहीं, सम्मान और आत्मविश्वास की भाषा भी माना जाए। क्योंकि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, वह हमारी संस्कृति, संवेदना और पहचान का आईना भी होती है।
हिंदी बोलिए, हिंदी पर गर्व कीजिए और दूसरी भाषाओं का भी सम्मान कीजिए। भाषा कोई मुकाबला नहीं—संवाद का सेतु है।
— संजय एम. तराणेकर
(कवि, लेखक, समीक्षक व स्तंभकार)
इन्दौर–452011, मध्य प्रदेश

Editor CP pandey

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