बचपन से विकासशील विचारधारा
का पोषक होने की वजह यह रही है,
मैंने गांव व ग़रीबी सिर्फ़ करीब से
देखा ही नहीं बल्कि इसे जिया भी है।

मैंने गरीबी और भुखमरी देखी है,
गरीबों की जिन्दगी कर्ज के बोझ
तले दबी देखी है, आज भी कैसे कोई
इंसान धरती को बिछौना, आकाश को
ओढ़ना मान जिन्दगी गुजार देता है।

मैंने गरीब बेटियों की शादी ज़मीन
बेचकर सम्पन्न होते हुए भी देखी है,
गरीबों को फटी लंगोटी में तो गरीब
महिलाओं को फटे हुए कपड़ों से अंग
ढकते हुए भी बड़े करीब से देखा है।

थोड़े से अनाज को लेकर गरीब
की इज्जत को लुटते देखा है,
तो यौवन की प्रतीक्षा में किशोरियों
की इज्जत तार-तार होते भी देखा है।

भूखे बच्चों को दूध व रोटी के लिए
चीत्कार करते हुए भी देखा है,
धुंआ उगलते चूल्हे पर भोजन की
उम्मीद में गरीब बच्चों को नीन्द की
आगोश में जाते हुए भी देखा है।

भारत की आत्मा गांवों में बसती है,
यह कथन तो शत-प्रतिशत सही है,
परन्तु आत्म दर्शन इतना भयावह और
पीड़ादायक है कि मानसिक रूप से
अनुभव किया जाना जानलेवा नहीं है।

राष्ट्रकवि दिनकर जी की यह पंक्तियाँ
सहज ही इन दृश्यों का भान कराती हैं:

“श्वानों को मिलते दूध-वस्त्र
भूखे बच्चे अकुलाते हैं,
मां की हड्डी से चिपक ठिठुर
जाड़ों की रात बिताते हैं।
युवती के लज्जा वसन बेच
जब ब्याज चुकाए जाते हैं,
मालिक तब तेल फुलेलों पर
पानी सा द्रव्य बहाते हैं।”

यह दर्द भारत का भविष्य न बन जाए
इसीलिए वे यह लिखने से नहीं चूकते :

“शान्ति नहीं होगी जब-तक,
सुख-भाग न नर का सम हो,
नहीं किसी को बहुत अधिक हो,
नहीं किसी को भी कम हो।”

आजादी के सात दशक बीतने के बाद
भी यह असमानता अब तक कायम है,
तो यह हमारे लोकतंत्र की अव्यवस्था
पर क्या एक बदनुमा दाग नहीं है?

क्या इसके लिए हमारा समाज और
हमारी सरकारें जिम्मेवार नहीं हैं?
आज जब हम बीस रुपये में पानी
की एक बोतल खरीद कर पीते हैं,
शौचालय हेतु पांच रु० अदा करते हैं,
तो यह भी हमारी व्यवस्था के गाल पर
मारा हुआ एक झन्नाटेदार तमाचा है।

यह भी सरकारों पर कोई असर नहीं
छोड़ पाता है, क्योंकि सरकारें तो
अन्धी ही नहीं बहरी भी होती हैं, और
संवेदनहीन अव्वल दर्जे की होती हैं।

आदित्य को रामचरित मानस
का वह वृत्तांत याद आता है,
मंथरा ने रानी कैकेई से बड़ी
ही माकूल बात कही थी,

“कोउ नृप होई हमै का हानि,
चेरी छांड़ि कि होइब रानी ।”

कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
लखनऊ

rkpnews@somnath

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