आज का भारत प्रगति के पथ पर है, लेकिन भ्रष्टाचार अब भी समाज और व्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। चाहे सरकारी दफ्तर हों, छोटे-मोटे काम या फिर बड़े प्रोजेक्ट – रिश्वत, सिफारिश और कमीशन की जड़ें गहरी बैठ चुकी हैं। समय आ गया है कि हम इस सोच को बदलें। अब भ्रष्टाचार को “समस्या” मानकर टालना नहीं, बल्कि “जिम्मेदारी” मानकर मिटाना होगा। यही बदलती सोच भारत को नई दिशा और नई ऊँचाई दे सकती है।
कहानी
गाँव के एक छोटे से स्कूल में पढ़ने वाला नन्हा अर्जुन हर दिन अपने पिता को परेशान देखता था। उसके पिता, रामकिशन, एक मेहनती किसान थे। फसल बेचने के बाद जब वह सरकारी कार्यालय में अनुदान लेने जाते, तो उनसे हमेशा कोई न कोई अधिकारी “फाइल आगे बढ़ाने” के नाम पर पैसे मांग लेता।
रामकिशन मजबूर होकर कभी पाँच सौ, कभी हज़ार रुपये देकर घर लौटते। अर्जुन यह सब देखता और सोचता—”पिताजी ईमानदार हैं, फिर भी क्यों बार-बार इन्हें लूट लिया जाता है?”
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एक दिन स्कूल में शिक्षक ने बच्चों से पूछा—“अगर देश को बदलना है तो सबसे पहले क्या करना होगा?”
सभी बच्चे अलग-अलग जवाब देने लगे—”सड़कें बनानी होंगी”, “अस्पताल अच्छे करने होंगे”, “नौकरी बढ़ानी होगी”।
लेकिन अर्जुन खड़ा होकर बोला—“गुरुजी! अगर भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा, तो सड़कें भी खुद बनेंगी, अस्पताल भी अच्छे होंगे और नौकरियाँ भी मिलेंगी।”कक्षा में सन्नाटा छा गया। शिक्षक ने उसकी बात की पुष्टि करते हुए कहा—“सही कहा अर्जुन। असली आज़ादी तभी मिलेगी, जब हम भ्रष्टाचार से आज़ाद होंगे।”
पीढ़ी की बदलती सोच
आज की युवा पीढ़ी भ्रष्टाचार को जीवन का “अनिवार्य हिस्सा” नहीं मानती। पहले लोग सोचते थे—“थोड़ा बहुत चलता है।” लेकिन अब सोच बदल रही है—“एक रुपया भी गलत नहीं चलेगा।”
सरकारी योजनाओं का डिजिटलाइजेशन, ऑनलाइन भुगतान, आधार और यूपीआई जैसी तकनीकों ने भी इस सोच को नया बल दिया है। लेकिन असली बदलाव तब होगा, जब आम आदमी रिश्वत को “जिम्मेदारी से मना करने का साहस” दिखाएगा।
समाज का संकल्प
कल्पना कीजिए, यदि हर नागरिक यह ठान ले कि वह न रिश्वत देगा, न लेगा, तो स्थिति कितनी बदलेगी। छोटे-से-छोटे कदम से बड़ा आंदोलन खड़ा किया जा सकता है। जैसे—शिकायत को दबाने के बजाय सार्वजनिक मंच पर लाना।अपने बच्चों को ईमानदारी का मूल्य सिखाना।छोटे लाभ के लिए गलत समझौता न करना।
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भ्रष्टाचार सिर्फ राजनीति या सरकारी दफ्तर तक सीमित नहीं है। यह हमारे रोज़मर्रा के जीवन में भी दिखता है—परीक्षाओं में नकल से लेकर सड़क पर ट्रैफिक नियम तोड़ने तक। बदलाव वहीं से शुरू होगा जहाँ से हम इसे पहचानेंगे।
अर्जुन की तरह हर बच्चा और हर नागरिक यदि यह सोच ले कि “अब भ्रष्टाचार से समझौता नहीं होगा,” तो वह दिन दूर नहीं जब भारत एक सशक्त, पारदर्शी और ईमानदार राष्ट्र बनेगा। यह सोच सिर्फ आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को नहीं, बल्कि पूरे देश के भाग्य को बदल देगी।
