डाक हिमालय की बर्फीली
लेकर चलीं हवाएं,
सुबह-शाम मैदानों की
सांकल चढ़कर खटकाएं। क्रूर-निर्दयी से मर्माहत
बार-बार पिस-पिस के,
अंधियारे की बांहों में
चांदनी कसमसा सिसके,
रातों पर नागिन बयार के
जहर कंहर बरपाएं,
दिन में भी धूप को मुड़ेरों-
तक चढ़ नाच नचाएं।
बर्बर हिम की सत्ता के ध्वज
जड़ें जमाते जाते,
ठुरन के खूनी पंजे
घर-वन-बाग को रुलाते,
कुहरे की चादर ओढ़े
अंसुआई आंखों भोरें,
दावत अनुभूति को
कंपकपी-
की बांटतीं दिशाएं। पीड़ा से अलाव के बदन
दोहरे होते जाते,
तो भी पछुआ के कांटों के
मुंह न मार कुछ पाते
सहमी गंगाजल की भक्ति
घाट घेरे सन्नाटे,
अण्डज-पिण्डज सब
सूर्य से जान की खैर मनाएं।
*शिवाकांत मिश्र ‘विद्रोही’
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