बिना ज्यादा खर्च के घास और पानी से बनाएं तरल खाद, इस्तेमाल से पहले रखें ये सावधानियां
उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए उपयोगी जानकारी: खेतों, बगीचों और लॉन से निकलने वाली साफ घास को फेंकने के बजाय उससे तरल जैविक घोल तैयार किया जा सकता है। इसे बनाने के लिए घास और पानी की जरूरत होती है। करीब 10 से 14 दिनों में तैयार होने वाले इस घोल का इस्तेमाल पालक, मेथी, धनिया और अन्य पौधों में सहायक पोषण के रूप में किया जा सकता है। इससे जैविक अवशेषों का बेहतर उपयोग करने और खेती में उपलब्ध संसाधनों को काम में लाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसकी पोषक क्षमता निश्चित नहीं होती, इसलिए इसे संतुलित खाद का विकल्प नहीं मानना चाहिए।
इस घोल को तैयार करने के लिए महंगी सामग्री या किसी विशेष उपकरण की आवश्यकता नहीं है। किसान घर, खेत या बगीचे में उपलब्ध चीजों से इसे बना सकते हैं।
आवश्यक सामग्री
ध्यान दें: ऐसी घास का इस्तेमाल करें जिस पर कीटनाशक, खरपतवारनाशक या अन्य हानिकारक रसायनों का छिड़काव न किया गया हो। फफूंदी लगी, सड़ी हुई या बीमारी से प्रभावित घास का इस्तेमाल करने से बचें।
खेत, बगीचे या लॉन से साफ घास इकट्ठा करें। घास में प्लास्टिक, पत्थर, मिट्टी के बड़े ढेले और अन्य कचरा नहीं होना चाहिए। घास को छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लेने से वह पानी में अच्छी तरह डूब सकती है और उसका अपघटन आसान हो सकता है।
एक साफ बाल्टी लें और उसमें लगभग आधी बाल्टी तक कटी हुई घास भर दें। घास को बहुत ज्यादा दबाकर न भरें, ताकि उसके बीच पानी आसानी से पहुंच सके। शुरुआत में कम मात्रा में घोल तैयार करना बेहतर है, जिससे उसकी गंध, गुणवत्ता और पौधों पर प्रभाव को समझा जा सके।
अब बाल्टी में इतना साफ पानी डालें कि घास पूरी तरह पानी में डूब जाए। घास का कोई बड़ा हिस्सा पानी से बाहर न रहे। इससे घास के सड़ने-सड़ाने की प्रक्रिया के दौरान सूखी घास के खुले संपर्क और फफूंदी की समस्या को कम करने में मदद मिल सकती है।
बाल्टी को ऐसी जगह रखें जहां हवा का आवागमन हो और बच्चों तथा पालतू जानवरों की पहुंच न हो। पात्र को जाली या ढक्कन से ढकें, लेकिन गैस बनने की संभावना को देखते हुए उसे पूरी तरह वायुरुद्ध न करें। इससे मक्खियों और अन्य कीटों का प्रवेश भी कम होगा।
घास और पानी के मिश्रण को लगभग 10 से 14 दिनों तक रहने दें। इस अवधि में घास धीरे-धीरे टूटने लगेगी और उसके कुछ घुलनशील पदार्थ पानी में आ सकते हैं। तापमान, घास के प्रकार और अन्य परिस्थितियों के कारण यह प्रक्रिया कम या ज्यादा समय ले सकती है।
इस दौरान घोल में तेज गंध आ सकती है। यह ध्यान रखना जरूरी है कि केवल रंग या गंध के आधार पर घोल के सुरक्षित अथवा पोषक होने की पुष्टि नहीं की जा सकती। यदि उसमें असामान्य फफूंदी, संदिग्ध रासायनिक गंध या अन्य खराब होने के संकेत दिखाई दें, तो उसे खाद्य फसलों पर इस्तेमाल न करें।
लगभग 10 से 14 दिन बाद घोल को साफ कपड़े या महीन छलनी से छान लें। इससे घास के बड़े टुकड़े अलग हो जाएंगे। बचे हुए ठोस घास के अवशेषों को उपयुक्त कम्पोस्ट प्रक्रिया में इस्तेमाल किया जा सकता है, बशर्ते घास रसायनों से दूषित न हो।
इस तरह घास से तैयार तरल घोल मिल जाएगा। ध्यान रहे कि यह एक घरेलू स्तर पर तैयार किया गया अनिश्चित पोषक संरचना वाला घोल है, प्रमाणित या मानकीकृत तरल जैविक खाद नहीं।
घास से तैयार घोल को सीधे पौधों की जड़ों या पत्तियों पर डालना उचित नहीं है। इसकी सांद्रता और पोषक तत्वों की मात्रा का पता नहीं होता। इसलिए पहले इसे पानी में मिलाकर पतला करें।
प्रारंभिक परीक्षण के लिए उदाहरण: एक हिस्सा तैयार घोल और 10 हिस्से साफ पानी मिलाएं। यदि आपके पास 100 मिलीलीटर घोल है, तो उसमें एक लीटर साफ पानी मिलाया जा सकता है।
यह 1:10 अनुपात केवल सावधानीपूर्वक शुरुआती परीक्षण का उदाहरण है, हर प्रकार की घास और हर फसल के लिए वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित मानक नहीं। फसल की अवस्था और घोल की गुणवत्ता के अनुसार उपयुक्त मात्रा अलग हो सकती है।
उत्तर प्रदेश में पालक, मेथी और धनिया जैसी पत्तेदार सब्जियों की खेती करने वाले किसान इस घोल को सहायक पोषण के संभावित स्रोत के रूप में आजमा सकते हैं। घास में नाइट्रोजन सहित कुछ पोषक तत्व मौजूद हो सकते हैं, लेकिन पानी में वास्तव में कितने पोषक तत्व आए हैं, इसका अनुमान केवल देखकर नहीं लगाया जा सकता।
पालक: छोटी क्यारी के कुछ पौधों पर सीमित मात्रा में परीक्षण करें। पौधों की पत्तियों की स्थिति और वृद्धि को देखते हुए ही आगे इस्तेमाल का निर्णय लें।
मेथी: मेथी की क्यारी में घोल को पतला करके जड़ों के आसपास की मिट्टी में डालें। अधिक मात्रा डालने से बचें और खेत की सामान्य खाद व्यवस्था जारी रखें।
धनिया: धनिया के पौधों पर पहले छोटे हिस्से में परीक्षण करें। पत्तियों पर घोल का छिड़काव न करें, विशेषकर तब जब पौधों की कटाई निकट हो।
अन्य सब्जियां: दूसरी सब्जियों में भी इसका प्रयोग करने से पहले छोटे क्षेत्र में परीक्षण करना बेहतर है। अलग-अलग फसलों की पोषण संबंधी जरूरतें अलग होती हैं।
इन संभावित फायदों का अर्थ यह नहीं है कि घास का घोल हर फसल में पैदावार बढ़ाने या खाद की लागत घटाने की गारंटी देता है। वास्तविक परिणाम घास की गुणवत्ता, मिट्टी, मौसम और फसल की जरूरत पर निर्भर करेंगे।
नहीं। घास और पानी से तैयार घरेलू घोल की पोषक संरचना ज्ञात नहीं होती। इसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और अन्य पोषक तत्वों की मात्रा का कोई निश्चित अनुपात नहीं माना जा सकता। इसलिए इसे यूरिया, डीएपी, पोटाश, अच्छी तरह तैयार कम्पोस्ट या अन्य अनुशंसित खाद का सीधा विकल्प नहीं समझना चाहिए।
किसानों के लिए सबसे अच्छा तरीका यह है कि वे मिट्टी की जांच, फसल की किस्म, पौधों की अवस्था और कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार खाद का इस्तेमाल करें। घास से बने घोल को केवल सीमित प्रयोग और संभावित सहायक पोषण के रूप में देखें।
उत्तर प्रदेश के किसान खेत और बगीचे से निकलने वाली साफ घास का उपयोग करके छोटे स्तर पर तरल जैविक घोल तैयार कर सकते हैं। इसके लिए आधी बाल्टी घास, पर्याप्त पानी और करीब 10 से 14 दिनों का समय शुरुआती प्रयोग के लिए लिया जा सकता है। लेकिन घोल की गुणवत्ता और सुरक्षा की पुष्टि के बिना इसे बड़े खेत में इस्तेमाल करना उचित नहीं है।
यदि उद्देश्य मिट्टी की सेहत सुधारना और जैविक अवशेषों का बेहतर उपयोग करना है, तो घास को कम्पोस्ट बनाने की विधि भी अपनाई जा सकती है। अच्छी तरह तैयार कम्पोस्ट, मिट्टी की जांच और संतुलित पोषण प्रबंधन के साथ खेती की लागत और मिट्टी की गुणवत्ता पर अधिक व्यवस्थित तरीके से काम किया जा सकता है।
खेतों और बगीचों से निकलने वाली साफ कटी घास का उपयोग करके पानी में तरल जैविक घोल तैयार किया जा सकता है। इसके लिए घास को पानी में डुबोकर करीब 10 से 14 दिनों तक रखा जाता है। तैयार घोल को छानकर पतला करने के बाद छोटे क्षेत्र में परीक्षण किया जा सकता है। हालांकि, इसकी पोषक मात्रा और सुरक्षा निश्चित नहीं होती, इसलिए इसे संतुलित खाद का विकल्प नहीं मानना चाहिए। किसानों को मिट्टी की जांच और कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार पोषण प्रबंधन करना चाहिए।
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