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देखो कितने पानी में हैं हम,
देखो कितने बिके हुये हैं हम,
इनको उनको सबको छोड़ो,
अपनी नियति तो देखें हम,
देखो कितने बिके हुए हैं हम।
प्रिंट मीडिया टेलीविज़न,
चौथा स्तंभ सबका है ग़म,
नहीं सहारा इनका माँगो,
इनमें भी अब नहीं है दम,
देखो कितने बिके हुये हैं हम।
स्वयं संघर्ष हमें करना है,
और किसी को नहीं देखना है,
किसी को कुछ भी नहीं पता है,
मध्यम वर्ग की जनता हैं हम,
देखो कितने बिके हुये हैं हम।
खबर नहीं दलालों की हैं,
खबर नहीं धनवानों की हैं,
कुत्ते और साँड़ नहीं दिखते हैं,
बेरोजगारी महँगाई का मातम,
देखो कितने बिके हुये हैं हम।
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई,
जाति-पाँति में दिखे भलाई,
नेक इरादे हैं नहीं किसी के,
आदित्य राजनीति के फूटे बम,
देखो कितने बिके हुये हैं हम।
•कर्नल आदि शंकर मिश्र आदित्य
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