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फिर आएगा गौरी इतिहास के पन्नों से वर्तमान तक का सबक

क्या पाकिस्तान के साथ भी हम वही भूल दोहरा रहे हैं?

आज़ादी के बाद भारत ने पाकिस्तान के साथ कई बार समझौते और संघर्षविराम की कोशिशें की हैं, लेकिन पाकिस्तान की नीतियाँ और उसके आक्रमणों का कोई अंत नहीं आया। यह वही गलती है, जो पृथ्वीराज चौहान ने की थी। पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को एक बार पराजित किया और उसे जीवनदान दिया, जो बाद में उनके साम्राज्य के पतन का कारण बना। यह उदाहरण हमें यह सिखाता है कि शत्रु के प्रति दया और माफ़ी की आदत दीर्घकालिक रूप से हानिकारक हो सकती है।
इतिहास की गलती:पृथ्वीराज चौहान ने 1191 में तराइन की पहली लड़ाई में मोहम्मद गौरी को हराया और जीवनदान दिया। लेकिन 1192 में, गौरी ने फिर हमला किया और चौहान को हराकर पूरे भारतीय उपमहाद्वीप का भूगोल बदल दिया। क्या हम भी आज बार-बार माफ़ी देकर वही भूल दोहरा रहे हैं?
इतिहास अपने आप में एक जीवंत कथा है, जो समय-समय पर हमें चेतावनी देता है। इसे नज़रअंदाज़ करने की भूल, एक सभ्यता के पतन की सबसे बड़ी वजह बनती है। पृथ्वीराज चौहान का उदाहरण इसका एक सटीक प्रमाण है। बार-बार की गई माफ़ी और शत्रु पर दया दिखाने की भूल ने एक साम्राज्य को समाप्त कर दिया। यह केवल मध्यकालीन भारत की गाथा नहीं है, बल्कि आज के दौर में भी यह संदर्भ उतना ही प्रासंगिक है।
पृथ्वीराज चौहान: एक वीर राजा की भूलइतिहासकार मानते हैं कि पृथ्वीराज चौहान, अपनी वीरता और अदम्य साहस के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने कई युद्धों में अद्वितीय पराक्रम दिखाया, लेकिन जब बात मोहम्मद गौरी की आई, तो उनकी माफ़ी देने की प्रवृत्ति ने उन्हें भारी नुकसान पहुँचाया। 1191 में तराइन की पहली लड़ाई में चौहान ने गौरी को पराजित किया और जीवनदान देकर एक गंभीर भूल की। अगले ही वर्ष, 1192 में गौरी ने फिर हमला किया और इस बार चौहान को हराने में सफल रहा। यह वह पल था जिसने भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया।
इतिहास की पुनरावृत्ति: क्या हम फिर से वही भूल कर रहे हैं?अगर हम अपने वर्तमान हालात पर नज़र डालें, तो क्या हम भी उसी भूल की ओर बढ़ रहे हैं? बार-बार की माफ़ी, नरमी और गलतियों से सबक न लेने की आदत हमें कमजोर बना रही है। चाहे वह सीमा सुरक्षा का मामला हो, या फिर आंतरिक सुरक्षा की चुनौती, हर बार की चुप्पी, समझौते और क्षमादान हमें कमजोर बना रहे हैं।
क्या पाकिस्तान के साथ भी हम वही भूल दोहरा रहे हैं?आज का भारत भी बार-बार पाकिस्तान के साथ उसी भूल का शिकार होता नज़र आ रहा है। बार-बार की गई शांति वार्ताएँ, संघर्षविराम समझौते, और आतंकवाद के हर वार को क्षमा करना क्या हमें फिर से एक कमजोर राष्ट्र की छवि नहीं दे रहा?
पाकिस्तान, जो बार-बार हमारी सीमाओं पर हमला करता है, हमारे सैनिकों पर कायराना हमले करता है, और हमारे नागरिकों के खिलाफ आतंकी गतिविधियाँ प्रायोजित करता है, क्या उसे बार-बार माफ़ करना उचित है? क्या हमें इस बात का अहसास नहीं है कि जैसे गौरी ने चौहान की सहिष्णुता का गलत फायदा उठाया, वैसे ही पाकिस्तान भी हमारी हर माफ़ी और नरमी को कमजोरी समझ सकता है?
यह केवल सीमा पर गोलीबारी या आतंकी हमलों तक सीमित नहीं है, बल्कि कूटनीतिक मंचों पर भी हम बार-बार शांति और समझौते की बात करते हैं, जबकि दूसरी ओर से विश्वासघात और आक्रमण की नीति जारी रहती है। यह हमारी सहनशीलता और शांति की भावना का अपमान है, जिसे बार-बार नज़रअंदाज़ करना एक गंभीर भूल हो सकती है।
अमेरिका की छाया में खड़ा पाकिस्तानअमेरिका का रुख भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। इतिहास गवाह है कि कैसे अमेरिका ने पाकिस्तान को हर मोर्चे पर समर्थन दिया, चाहे वह सैन्य सहायता हो या वित्तीय मदद। अमेरिका ने कई बार पाकिस्तान को अपने भू-राजनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल किया, जबकि पाकिस्तान ने उस समर्थन का उपयोग भारत विरोधी गतिविधियों के लिए किया। यह हमें एक बार फिर सोचने पर मजबूर करता है – क्या हमें बार-बार माफ़ करने की नीति पर पुनर्विचार नहीं करना चाहिए?
पाकिस्तान, जो आतंकवाद का सबसे बड़ा निर्यातक है, उसकी सैन्य और आर्थिक सहायता करने वाला अमेरिका, क्या भारत के रणनीतिक हितों के खिलाफ नहीं है? क्या यह समय नहीं आ गया है कि हम अपनी विदेश नीति को और अधिक सशक्त और आत्मनिर्भर बनाएं, ताकि हमें किसी बाहरी शक्ति पर निर्भर न रहना पड़े?
इतिहास हमें सिखाता है कि अगर हम अपने शत्रुओं की मंशा को बार-बार नज़रअंदाज़ करेंगे, तो हमें फिर से उसी त्रासदी का सामना करना पड़ेगा जो पृथ्वीराज चौहान ने की थी। माफ़ी की आदत हमें वीर से विवश बना सकती है, और समझौते की कमजोरी हमारे गौरव को मिटा सकती है। समय आ गया है कि हम अपने इतिहास से सबक लें और अपनी सुरक्षा को सर्वोपरि मानें। माफ़ी एक आदर्श हो सकती है, लेकिन जब बात राष्ट्रीय सम्मान और स्वाभिमान की हो, तब हमें पाषाण की तरह अडिग और लोहे की तरह कठोर होना पड़ेगा। यही संदेश इस कविता में छिपा है – माफ़ी की जगह पराक्रम, और समझौते की जगह संकल्प।
अमेरिका ने पाकिस्तान को कई बार समर्थन दिया है, जबकि पाकिस्तान ने इस समर्थन का उपयोग भारत विरोधी गतिविधियों में किया। यह एक और उदाहरण है कि कैसे बाहरी शक्ति हमारे राष्ट्रीय हितों के खिलाफ काम कर सकती है, और हमें अपनी नीति को मजबूत बनाने की आवश्यकता है। भारत को अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए और शत्रु के सामने कठोर और अडिग रहना चाहिए। माफ़ी की जगह पराक्रम और समझौते की जगह संकल्प हो, ताकि हम भविष्य में ऐसे ही संकटों से बच सकें।

प्रियंका सौरभ

rkpnews@desk

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