यह संसार मनुष्य की कर्मभूमि व भोगभूमि दोनों है,
मनुष्य के कर्मफल का भण्डार अक्षय सुख दुःख में है,
उसे भोगने के लिए ही जीव चौरासी लाख योनियों में,
जन्म जन्म तक विभिन्न शरीर धारण करता रहता है।
इसीलिए मानव शरीर का एक नाम ‘भोगायतन’ है,
कर्म की गति जानने में देवता भी समर्थ नहीं हैं,
विभिन्न प्राणियों और मानव की तो बात ही क्या है?
सभी जीवों का प्रारब्ध निश्चय ही विधि द्वारा निर्मित है।
यमराज (धर्मराज) सभी को उनके
पाप-पुण्य का फल प्रदान करते हैं,
पर उनसे कोई गलती हो जाती है
तो उन्हें माफ नहीं किया जाता है।
देवताओं के विषय में भी विधि का
विधान अटल है सभी देवता भी कर्म
के वश में हैं और अपने किए कर्मों के
फलस्वरूप सुख-दु:ख प्राप्त करते हैं।
भगवान विष्णु भी अपनी इच्छा से
जन्म लेने के लिए स्वतन्त्र होते तो
वैकुण्ठपुरी का निवास छोड़कर
विभिन्न योनियों में जन्म क्यों लेते।
(मत्स्य, कूर्म, वराह, वामन)
सूर्य, चन्द्रमा कर्मफल के कारण ही
नियमित रूप से परिभ्रमण करते हैं,
तथा सबको सुख प्रदान करते हैं,
किन्तु राहु उन्हें सदा पीड़ित करते हैं।
सूर्यपुत्र शनि मन्द और चन्द्रमा
क्षयरोगी व कलंकी कहे जाते हैं,
श्रीहरिविष्णु रामावतार ग्रहण कर
वनवास का दारुण कष्ट सहते हैं।
पिता दशरथ का स्वर्गारोहण,
सीता हरण का महान वियोग,
रावण से युद्ध व सीता परित्याग
की असीम वेदना सहनी पड़ती है।
उसी प्रकार कृष्णावतार में बन्दीगृह
में जन्म, गोकुल गमन, कंस वध फिर
द्वारका के लिए प्रस्थान आदि अनेक
सांसारिक दु:खों को भोगना पड़ा।
त्रेता में रामावतार के समय देवता
कर्मबन्धन के कारण वानर बने थे,
कृष्णावतार में भी श्रीकृष्ण जी की
मदद के लिए देवता यादव बने थे।
समस्त जीवों को किये गये शुभ एवं
अशुभ कर्मों का फल निश्चित रूप से
भोगना पड़ता है; आदित्य इस लिए
कहा गया है क़र्मफल मिलता ही है।
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