तुलसी महिमा एवं एकादशी व्रत की कथा से गूंज उठा कालीचरण घाट

भागलपुर/देवरिया(राष्ट्र की परम्परा)
सरयू नदी के पावन तट स्थित कालीचरण घाट पर गुरुवार को आस्था और श्रद्धा का अद्भुत संगम देखने को मिला। हजारों श्रद्धालुओं ने प्रातःकाल सरयू में स्नान कर पूजा-अर्चना की तथा तुलसी पूजन, एकादशी व्रत और सनातन परंपराओं की महिमा का श्रवण किया। धार्मिक आयोजन में कथावाचकों और विद्वानों ने तुलसी माता की महत्ता, एकादशी व्रत तथा भगवान विष्णु और वृंदा की पौराणिक कथा का विस्तृत वर्णन किया।
कथावाचकों ने बताया कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चतुर्दशी और एकादशी तिथि पर तुलसी जी को जल अर्पित नहीं किया जाता, क्योंकि इन दिनों तुलसी माता स्वयं व्रत रखती हैं। वहीं बृहस्पतिवार को तुलसी पूजन और जल अर्पण का विशेष महत्व बताया गया। प्रदोष काल में भी तुलसी को जल न चढ़ाने की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा गया कि तुलसी को मोक्षदायिनी माना गया है और मृत्यु के समय व्यक्ति को तुलसी दल एवं गंगाजल देने की परंपरा इसी आस्था से जुड़ी हुई है।
धार्मिक प्रवचन के दौरान जालंधर और उसकी पत्नी वृंदा की कथा का भी उल्लेख हुआ। बताया गया कि दैत्यराज जालंधर की पत्नी वृंदा अत्यंत पतिव्रता थीं, जिनके तप और सतीत्व के प्रभाव से देवताओं के लिए जालंधर को पराजित करना असंभव हो गया था। तब भगवान विष्णु ने जालंधर का रूप धारण कर वृंदा की तपस्या भंग की, जिससे उसका पतिव्रत टूट गया और युद्ध में जालंधर का अंत संभव हो सका। इस घटना से आहत वृंदा ने भगवान विष्णु को श्राप दिया, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया। मान्यता है कि इसी श्राप के फलस्वरूप भगवान शालिग्राम रूप में पूजित हुए।
कथा में आगे बताया गया कि भगवान विष्णु ने वृंदा को वरदान दिया कि वे मृत्यु लोक में तुलसी के रूप में पूजित होंगी और समस्त प्राणियों के कष्टों का निवारण करेंगी। तभी से तुलसी को सनातन धर्म में विशेष स्थान प्राप्त है। वक्ताओं ने कहा कि तुलसी केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि औषधीय गुणों से भी भरपूर है और अनेक रोगों में लाभकारी मानी जाती है।
रामायण प्रसंग का उल्लेख करते हुए कथावाचकों ने बताया कि जब हनुमान जी लंका पहुंचे थे, तब उन्होंने विभीषण के घर पर तुलसी का पौधा और “राम-राम” अंकित घर देखा था। यह देखकर हनुमान जी अत्यंत प्रसन्न हुए थे। इस प्रसंग को सुनकर श्रद्धालुओं ने जय श्रीराम और हरि नाम के उद्घोष लगाए।
धार्मिक सभा में यह भी बताया गया कि बिना तुलसी और गंगाजल के कोई भी शुभ कार्य पूर्ण नहीं माना जाता। जन्म से लेकर अंतिम संस्कार तक सनातन परंपराओं में तुलसी और गंगाजल का विशेष महत्व है। अमृत बेला और अंतिम समय में भी श्रद्धालुओं को तुलसी दल और गंगाजल देने की परंपरा मोक्ष प्राप्ति की भावना से जुड़ी मानी जाती है।

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