पुनीत मिश्र
हिन्दी साहित्य के इतिहास में जैनेन्द्र कुमार का नाम एक ऐसे रचनाकार के रूप में स्थापित है, जिन्होंने कथा-साहित्य को बाह्य घटनाओं की दुनिया से निकालकर मनुष्य के अंतर्जगत तक पहुँचाया। वे केवल कथाकार नहीं थे, बल्कि मानव मन की जटिलताओं के सूक्ष्म विश्लेषक, विचारक और संवेदनशील निबंधकार भी थे। हिन्दी उपन्यास में मनोविश्लेषणात्मक परंपरा के प्रवर्तक के रूप में उनका योगदान आज भी अद्वितीय और अनुकरणीय माना जाता है।
जैनेन्द्र कुमार का जन्म ऐसे समय में हुआ, जब देश स्वतंत्रता संग्राम की उथल-पुथल से गुजर रहा था। यह दौर उनके व्यक्तित्व और लेखन दोनों पर गहरा प्रभाव छोड़ता है। वे स्वतंत्रता आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े और महात्मा गांधी के विचारों से गहराई तक प्रभावित रहे। सत्य, अहिंसा, आत्मसंयम और नैतिकता जैसे मूल्य उनके जीवन ही नहीं, उनकी रचनाओं की भी आत्मा बने।
उनका साहित्य मनुष्य के बाहरी संघर्षों से अधिक उसके भीतर चलने वाले द्वंद्वों पर केंद्रित है। प्रेम, दांपत्य, नैतिकता, अपराधबोध, आत्मसंघर्ष और सामाजिक बंधनों के बीच व्यक्ति की असहायता, ये सब उनके उपन्यासों और कहानियों के केंद्रीय विषय हैं। जैनेन्द्र कुमार ने यह स्पष्ट किया कि मनुष्य केवल सामाजिक प्राणी नहीं, बल्कि एक जटिल मानसिक संरचना भी है, जिसे समझे बिना जीवन को पूरी तरह नहीं जाना जा सकता।
‘त्यागपत्र’, ‘सुनीता’, ‘कल्याणी’, ‘सुखदा’ और ‘नीलम देश की राजकन्या’ जैसे उपन्यास हिन्दी उपन्यास को एक नई दिशा देते हैं। ‘त्यागपत्र’ में नायिका का आत्मसंघर्ष और सामाजिक नैतिकता से टकराव, स्त्री-स्वातंत्र्य और आत्मसम्मान की गहरी पड़ताल करता है। जैनेन्द्र की स्त्री पात्र कमजोर नहीं, बल्कि सोचने-समझने वाली, प्रश्न करने वाली और अपने निर्णयों की जिम्मेदारी उठाने वाली स्त्रियाँ हैं। यह दृष्टि उन्हें अपने समकालीन लेखकों से अलग और आगे खड़ा करती है।
शैली की दृष्टि से जैनेन्द्र कुमार का लेखन सादा, संयमित और आत्मसंवादी है। वे संवादों और घटनाओं से अधिक मौन, संकेत और आत्मचिंतन पर भरोसा करते हैं। उनके पात्र अक्सर स्वयं से बात करते दिखाई देते हैं, मानो लेखक पाठक को सीधे उस मानसिक प्रक्रिया में प्रवेश करा देता हो। यही कारण है कि उनका साहित्य केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्कि महसूस किया जाता है।
निबंधकार के रूप में भी जैनेन्द्र कुमार ने भारतीय समाज, नैतिकता, धर्म और राजनीति पर गहन चिंतन प्रस्तुत किया। उनके निबंधों में प्रश्न करने का साहस है और किसी भी स्थापित विचार को आँख मूँदकर स्वीकार करने से इंकार है। वे साहित्य को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मबोध और सामाजिक चेतना का माध्यम मानते थे।
जैनेन्द्र कुमार का साहित्य आज भी प्रासंगिक है, क्योंकि मनुष्य की मानसिक उलझनें, नैतिक प्रश्न और आत्मसंघर्ष आज भी उतने ही जीवंत हैं, जितने उनके समय में थे। उनकी रचनाएँ हमें भीतर झाँकने, स्वयं से प्रश्न करने और अपने निर्णयों की नैतिक जिम्मेदारी समझने की प्रेरणा देती हैं।
जैनेन्द्र कुमार की जयंती केवल एक महान साहित्यकार को स्मरण करने का अवसर नहीं है, बल्कि हिन्दी साहित्य की उस परंपरा को नमन करने का भी दिन है, जिसने मनुष्य को उसके भीतर से समझने की कोशिश की। उनका साहित्य आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाता रहेगा कि सच्चा लेखन वही है, जो मनुष्य को स्वयं से ईमानदार होने का साहस दे।
