क्या वास्तव में कर्म ही पूजा है: सीमा त्रिपाठी

बलिया (राष्ट्र की परम्परा)l “कर्म ही पूजा है” ऐसा क्यों कहा जाता है। वास्तविकता यह है कि यदि व्यक्ति अपने कर्म को पूरी ईमानदारी से करता है तो वह पूजा बन जाता है, अर्थात् अपने कर्तव्यों का निर्वहन जब पूरी लगन और ईमानदारी से करते हैं तो वह किसी पूजा से कम नहीं होता है। गीता में स्वयं श्री कृष्ण ने कर्म को ही सर्वोपरि माना है। प्रतिदिन सुबह से शाम तक हम सभी व्यस्त रहते हैं कुछ ना कुछ कार्य करते ही रहते हैं कार्य करना अच्छी बात है हमेशा पूरी लगन और तन्मयता तथा एकाग्रता से काम करो उसमें अपना तन मन धन सब लगा दो फल की इच्छा मत करो। जब आप किसी लक्ष्य के लिए निस्वार्थ भाव से कर्म करोगे तो फल स्वयं ही मिल जाएगा, क्योंकि बिना कर्म किए कुछ हासिल हो जाए यह असंभव है।सच्चा ज्ञान ही हमारे जीवन का आधार बिंदु है। इस प्रकृति में मानव को सर्वश्रेष्ठ प्राणी माना जाता है। और मानव की श्रेष्ठता उसके कर्मों से ही मानी जाती है। मानव की उन्नति अथवा प्रगति उसके कर्म ही निर्धारित करते हैं। मानव बिना कर्म किए कुछ भी अर्जित नहीं कर सकता है। कर्म करते रहना मानव होने का प्रमाण है परिणाम भी अच्छे बुरे कर्मों पर निर्भर करता है। अर्थात जैसा कर्म करोगे वैसा फल पाओगे कर्म का आशय उसे कार्य से है जो पूर्ण लगन एवं श्रद्धा के साथ किया जाता है तो उसके परिणाम सकारात्मक ही मिलते हैं। हमें अपने नित्य कर्मों को पूरी तन्मयता से करना चाहिए। मनुष्य की पहचान उसके उच्च कुल में जन्म लेने से नहीं बल्कि उसके द्वारा उसके जीवन काल में किए गए कर्मों से होती है।

rkpNavneet Mishra

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