लोकतंत्र और राजनीतिक चंदे की पारदर्शिता का प्रश्न- 2024-25 के आंकड़े यह दिखाते हैं कि इलेक्टोरल ट्रस्ट्स मॉडल भी सत्ता संतुलन की समस्या से मुक्त नहीं है
सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलेक्टोरल बॉन्ड पर रोक के बाद जिस तरह से चंदे का बड़ा हिस्सा कुछ चुनिंदा दलों, विशेषकर सत्तारूढ़ पार्टी, की ओर केंद्रित हुआ है,वह लोकतंत्र के लिए नए प्रश्न खड़े करता है- एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों की वित्तीय पारदर्शिता केवल एक प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा से जुड़ा प्रश्न है।चुनाव प्रचार, संगठन विस्तार, मीडिया अभियान और जमीनी स्तरपर कार्यकर्ताओं की गतिविधियों के लिए राजनीतिक दलों को भारी मात्रा में धन की आवश्यकता होती है।यही आवश्यकता राजनीतिक फंडिंग को जन्म देती है। नियमानुसार, राजनीतिक दलों को 20 हज़ार रूपए से अधिक के प्रत्येक चंदे की जानकारी चुनाव आयोग को देनी होती है।इलेक्टोरल बॉन्ड योजना (2017-2024) के तहत 16,000 करोड़ रूपए से अधिक का गुमनाम चंदा जुटाया गया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया था।अब सभी चंदे पारदर्शी माध्यमों (चेक/डिजिटल) से लिए जा रहे हैं। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में यह प्रश्न और भी संवेदनशील हो जाता है कि राजनीतिक दलों को धन कहां से मिलता है, किसने दिया, कितना दिया और बदले में क्या अपेक्षा की गई।इसी संदर्भ में इलेक्टोरल ट्रस्ट्स की अवधारणा सामने आती है, जिसे लंबे समय तक राजनीतिक चंदे की पारदर्शिता बढ़ाने के एक महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया गया।
ये भी पढ़ें – अजमेर शरीफ में दर्शन के दौरान भिटौली निवासी की मौत, शव गांव पहुंचते ही मचा कोहराम
साथियों बातें कर हम इलेक्टोरल बॉन्ड पर सुप्रीम कोर्ट का बैन और बदला हुआ परिदृश्य इसको समझने की करें तो, इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को सुप्रीम कोर्ट द्वारा असंवैधानिक घोषित किए जाने के बाद राजनीतिक फंडिंग का परिदृश्य अचानक बदल गया। बॉन्ड के जरिए मिलने वाला गोपनीय चंदा बंद होने के बाद इलेक्टोरल ट्रस्ट्स एक बार फिर राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ा वैध माध्यम बनकर उभरे। वित्तीय वर्ष 2024-25 में यह बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।रिपोर्ट्स के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पहले ही वर्ष में राजनीतिक दलों को इलेक्टोरल ट्रस्ट्स के माध्यम से 3,811 करोड़ रुपये का चंदा प्राप्त हुआ,जो पिछले वर्ष की तुलना में असाधारण वृद्धि को दर्शाता है।2024-25 के आंकड़े: अभूतपूर्व वृद्धि और सत्ता का केंद्रीकरण इलेक्टोरल ट्रस्ट्स द्वारा चुनाव आयोग को सौंपी गई रिपोर्ट्स के अनुसार,वर्ष 2024- 25 में कुल नौ इलेक्टोरल ट्रस्ट्स ने राजनीतिक दलों को 3,811 करोड़ रुपये का चंदा दिया। यह राशि वर्ष 2023-24 में दिए गए 1,218 करोड़ रुपये की तुलना में 200 प्रतिशत से अधिक और लगभग तीन गुना है। इस चंदे का सबसे बड़ा हिस्सा 3,112 करोड़ रुपये, यानें लगभग 82 प्रतिशत, केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को प्राप्त हुआ। यह आंकड़ा अपने आप में भारत की राजनीतिक फंडिंग में सत्ता के केंद्रीकरण की ओर इशारा करता है। यह जानकारी इलेक्टोरल ट्रस्ट्स की ओर से चुनाव आयोग को सौंपी गई रिपोर्ट्स से सामने आई है। चुनाव आयोग की वेबसाइट पर अपलोड इन रिपोर्ट्स के मुताबिक, बाकी सभी दलों को मिलाकर करीब 400 करोड़ रूपए (10 प्रतिशत) फंड मिला।
ये भी पढ़ें –मुठभेड़ के बाद आरोपी की गिरफ्तारी से खुलेंगे कई राज
इसमें कांग्रेस को 299 करोड़ रूपए मिले, जो कुल चंदे का 8 प्रतिशत से भी कम है।चुनाव आयोग के पास उपलब्ध रिपोर्ट्स और पारदर्शिता का प्रश्न-20 दिसंबर तक के आंकड़ों के अनुसार, चुनाव आयोग के पास कुल 19 में से 13 इलेक्टोरल ट्रस्ट्स की रिपोर्ट्स उपलब्ध थीं। इनमें से 9 ट्रस्ट्स ने सक्रिय रूप से 2024- 25 में चंदा दिया। यह तथ्य एक ओर जहां कानूनी पारदर्शिता को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर यह सवाल भी उठाता है कि शेष ट्रस्ट्स की निष्क्रियता या रिपोर्टिंग में देरी क्यों है। उपरोक्त सभी आंकड़े और जानकारी चुनाव आयोग की वेबसाइट और मीडिया में उपलब्ध जानकारी से ली गई है।
ये भी पढ़ें – कड़ाके की ठंड से जनजीवन ठप, फसलों पर भी संकट, अलाव के सहारे जूझते लोग
साथियों बात अगर हम इलेक्टोरल ट्रस्ट क्या हैं, अवधारणा उत्पत्ति और उद्देश्य इसको समझने की करें तो, इलेक्टोरल ट्रस्ट एक ऐसी रजिस्टर्ड गैर-लाभकारी संस्था होती है जिसका मुख्य उद्देश्य कॉर्पोरेट कंपनियों,समूहों और व्यक्तियों से प्राप्त चंदे को विधिसम्मत तरीके से राजनीतिक दलों तक पहुंचाना होता है।भारत में इलेक्टोरल ट्रस्ट्स की अवधारणा को औपचारिक रूप से 2013 में आयकर नियमों के तहत मान्यता दी गई, ताकि राजनीतिक चंदे को अधिक पारदर्शी,नियंत्रित और दस्तावेजीकृत बनाया जा सके।इन ट्रस्ट्स को इस शर्त पर मान्यता दी जाती है कि वे अपने पास आने वाले हर एक रुपये का पूरा हिसाब रखें और यह जानकारी नियमित रूप से भारत निर्वाचन आयोग को सौंपें। इसका मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि राजनीतिक फंडिंग अज्ञात स्रोतों से न आए और जनता को यह जानने का अधिकार मिले कि किस राजनीतिक दल को किसने और कितना धन दिया है।
ये भी पढ़ें – देवरिया में यातायात पुलिस का सख्त अभियान, 126 वाहनों का ई-चालान, 4 वाहन सीज
इलेक्टोरल ट्रस्ट्स की संरचना और कानूनी ढांचा-इलेक्टोरल ट्रस्ट्स को आयकर अधिनियम के तहत पंजीकृत किया जाता है। ये ट्रस्ट्स किसी भी राजनीतिक दल से सीधे जुड़े नहीं होते और सिद्धांत रूप में इन्हें तटस्थ संस्था के रूप में काम करना होता है। इनके संचालन के लिए ट्रस्टी बोर्ड बनाया जाता है,जिसमें आमतौर पर कॉर्पोरेट क्षेत्र के वरिष्ठ अधिकारी,कानूनी विशेषज्ञ, वित्तीय सलाहकार और स्वतंत्र सदस्य शामिल होते हैं। कानून के अनुसार, इलेक्टोरल ट्रस्ट को प्राप्त कुल चंदे का कम-से-कम 95 प्रतिशत हिस्सा उसी वित्तीय वर्ष में राजनीतिक दलों को वितरित करना अनिवार्य होता है। ट्रस्ट स्वयं धन को अपने पास जमा करके रखने या निवेश करने का अधिकार नहीं रखता। इस व्यवस्था का उद्देश्य यह था कि ट्रस्ट केवल एक माध्यम के रूप में कार्य करे,न कि शक्ति केंद्र के रूप में।इलेक्टोरल ट्रस्ट्स द्वारा चुनाव आयोग को सौंपी जाने वाली रिपोर्ट्स,इलेक्टोरल ट्रस्ट्स की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है,चुनाव आयोग को विस्तृत वार्षिक रिपोर्ट सौंपना।इस रिपोर्ट में यह जानकारी देना अनिवार्य होता है कि किस कॉर्पोरेट या व्यक्ति से कितना चंदा प्राप्त हुआ,वह चंदा किस राजनीतिक दल को दिया गया और किस तारीख को दिया गया।इन रिपोर्ट्स के माध्यम से पहली बार यह संभव हुआ कि राजनीतिक दलों को मिलने वाले बड़े कॉर्पोरेट चंदे का एक औपचारिक और सार्वजनिक रिकॉर्ड तैयार हो। चुनाव आयोग इन रिपोर्ट्स को अपनी वेबसाइट पर उपलब्ध कराता है, जिससे मीडिया, शोधकर्ता और आम नागरिक राजनीतिक फंडिंग के रुझानों का विश्लेषण कर सकें।
ये भी पढ़ें – शीतलहर से बेहाल महराजगंज, गांव-गांव कंबल वितरण की उठी पुरजोर मांग
साथियों बातें अगर हम इलेक्टोरल ट्रस्ट्स को क्या फायदा होता है? इसको समझने की करें तो,सैद्धांतिक रूप से इलेक्टोरल ट्रस्ट्स गैर-लाभकारी संस्थाएं होती हैं, यानी इन्हें सीधे आर्थिक मुनाफा कमाने की अनुमति नहीं होती। फिर भी इनके अस्तित्व से जुड़े कुछ अप्रत्यक्ष लाभ स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।पहला,ट्रस्ट्स के माध्यम से कॉर्पोरेट कंपनियों को यह सुविधा मिलती है कि वे राजनीतिक दलों को चंदा देते समय प्रत्यक्ष रूप से सामने न आएं, जबकि कानूनन उनका नाम रिकॉर्ड में दर्ज रहता है।दूसरा, ट्रस्ट्स राजनीतिक और कॉर्पोरेट जगत के बीच एक संगठित संवाद का मंच बन जाते हैं। इससे नीति निर्माण, आर्थिक सुधारों और उद्योग हितों पर प्रभाव डालने की क्षमताअप्रत्यक्ष रूप से बढ़ जाती है। तीसरा, ट्रस्ट के ट्रस्टी और सदस्य नीति, शासन और सत्ता संरचना के बेहद करीब आ जाते हैं, जिससे सामाजिक और संस्थागत प्रभाव बढ़ता है।इलेक्टोरल ट्रस्ट्स के सदस्य कौन होते हैं-इलेक्टोरल ट्रस्ट्स के सदस्य और ट्रस्टी आमतौर पर बड़े कॉर्पोरेट समूहों,उद्योग संगठनों, वित्तीय संस्थानों और कभी-कभी पूर्व नौकरशाहों या पेशेवर विशेषज्ञों में से होते हैं। इनमें से कई लोग नीति-निर्माण प्रक्रिया की गहरी समझ रखते हैं। हालांकि कानून यह कहता है कि ट्रस्ट किसी राजनीतिक दल के नियंत्रण में नहीं हो सकता,लेकिन व्यावहारिक रूप से ट्रस्ट्स का झुकाव अक्सर कुछ विशेष दलों की ओर अधिक दिखाई देता है।
ये भी पढ़ें – नगर आयुक्त ने की विभिन्न परियोजनाओं की समीक्षा बैठक
साथियों बात अगर हम अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य: भारत बनाम वैश्विक लोकतंत्र इसको समझने की करें तो,यदि भारतकी तुलना अमेरिका,ब्रिटेन या जर्मनी जैसे लोकतंत्रों से की जाए, तो वहां राजनीतिक फंडिंग पर कहीं अधिक सख्त सीमाएं और निगरानी तंत्र मौजूद हैं। कई देशों में कॉर्पोरेट चंदे पर सीमाएं हैं या उन्हें पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया है। भारत में इलेक्टोरल ट्रस्ट्स एक मध्य मार्ग के रूप में सामने आए, लेकिन 2024-25 के आंकड़े यह दिखाते हैं कि यह मॉडल भी सत्ता संतुलन की समस्या से मुक्त नहीं है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि पारदर्शिता से आगे जवाबदेहीकी जरूरत,इलेक्टोरल ट्रस्ट्स ने निस्संदेह भारत में राजनीतिक चंदे को दस्तावेजीकृत और अपेक्षाकृत पारदर्शी बनाया है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलेक्टोरल बॉन्ड पर रोक के बाद जिस तरह से चंदे का बड़ा हिस्सा कुछ चुनिंदा दलों, विशेषकर सत्तारूढ़ पार्टी, की ओर केंद्रित हुआ है, वह लोकतंत्र के लिए नए प्रश्न खड़े करता है।अब आवश्यकता केवल पारदर्शिता की नहीं, बल्कि जवाबदेही, संतुलन और समान अवसर की है। इलेक्टोरल ट्रस्ट्स यदि वास्तव में लोकतंत्र को मजबूत करना चाहते हैं, तो उन्हें केवल कानूनी औपचारिकताओं से आगे बढ़कर राजनीतिक वित्तपोषण की नैतिकता पर भी खरा उतरना होगा।
ये भी पढ़ें –मुख्यमंत्री रविवार को गोरखपुर दौरे पर एनसीसी एकेडमी व विरासत गलियारे का करेंगे निरीक्षण
-संकलनकर्ता लेखक – एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) महाराष्ट्र
