भारत की संवैधानिक धरोहर हिंसक नहीं है: प्रो. रजनीकांत पाण्डेय

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। पं. दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय गोरखपुर के मदन मोहन मालवीय टीचर ट्रेनिंग सेंटर में आयोजित 11वें गुरुदीक्षा कार्यक्रम में वक्ताओं ने भारतीय संविधान, सतत विकास, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वैदिक चिकित्सा पर अपने विचार रखे। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता प्रो. रजनीकांत पाण्डेय ने कहा कि भारत की संवैधानिक धरोहर हिंसक नहीं है, बल्कि यह देश सदैव से शांति और मानवता का संदेश देता रहा है। उन्होंने ‘भारतीय संविधान: ऐतिहासिक अवधारणा एवं विकास’ विषय पर बोलते हुए संविधान निर्माण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, स्वतंत्रता आंदोलन की भूमिका, सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों और ब्रिटिश शासन की नीतियों की क्रमबद्ध व्याख्या की।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं गांधी, नेहरू, चन्द्रशेखर आजाद, अंबेडकर, पटेल और भगत सिंह की प्रतिबद्धता ने संविधान को केवल कानूनी दस्तावेज नहीं रहने दिया, बल्कि इसे राष्ट्र की चेतना और राष्ट्रीय मानसिकता का प्रतिबिंब बनाया। संविधान का निर्माण दो वर्ष ग्यारह महीने अठारह दिनों में पूरा हुआ, किंतु इसकी प्रक्रिया लगभग नब्बे वर्षों के संघर्षों और समाज में हुए गहरे परिवर्तनों का परिणाम थी। प्रो. पाण्डेय ने 1857 के विद्रोह, कर्ज़न की विभाजनकारी नीतियों, मिंटो-मॉर्ले सुधार, रॉलेट एक्ट, नेहरू समिति रिपोर्ट और भारत शासन अधिनियम-1935 को संवैधानिक विकास की प्रमुख कड़ियों के रूप में रेखांकित किया।
कार्यक्रम में प्रो. दिव्या सिंह ने सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) में उच्च शिक्षा की भूमिका पर विस्तृत विचार रखे। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय भविष्य के उत्तरदायी और जागरूक नागरिकों का निर्माण करते हैं, इसलिए स्थिरता के सिद्धांतों को सभी संकायों के पाठ्यक्रम में शामिल करना आवश्यक है। उन्होंने बहुआयामी शोध, उद्योग एवं शासन के साथ सहयोग और समुदाय के साथ सहभागिता को सतत विकास के लिए अनिवार्य बताया।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता विषय पर प्रो. अजय कुमार गुप्ता ने कहा कि चैटजीपीटी, परप्लेक्सिटी, गूगल जेमिनी, नोटबुक एलएम और एआई स्टूडियो जैसे मंच शोध प्रक्रिया को सरल और सुलभ बना रहे हैं। अब शोधार्थी बड़ी संख्या में शोध पत्र अपलोड कर उनका सार, शोध अंतर और दिशा आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने इन तकनीकों का प्रत्यक्ष प्रशिक्षण देते हुए बताया कि एआई आधारित साधन प्रस्तुतिकरण, संदर्भ प्रबंधन और शोध सर्वेक्षण के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो रहे हैं।
डॉ. लक्ष्मी मिश्रा ने ‘भारतीय ज्ञान परंपरा में वैदिक चिकित्सा पद्धतियाँ’ विषय पर आयुर्वेद की वैज्ञानिक संरचना, पंचभूत सिद्धांत, त्रिदोष वात, पित्त, कफ और त्रिगुण सिद्धांत की विस्तृत व्याख्या की। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद केवल उपचार प्रणाली नहीं, बल्कि जीवन में संतुलन बनाए रखने की पूर्वनिवारक चिकित्सा पद्धति है। उन्होंने वेदों में जड़ी-बूटियों, रोगों, अंगों और शल्य चिकित्सा से जुड़े वैज्ञानिक संकेतों का भी उल्लेख किया।
कार्यक्रम का संचालन प्रो. राकेश तिवारी ने किया और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. के. एम. मिश्रा ने किया। देशभर के विभिन्न विश्वविद्यालयों से जुड़े प्रतिभागियों ने कार्यक्रम में हिस्सा लिया।

rkpNavneet Mishra

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