ग्रीक मुद्राओं में दिखता है भारतीय संस्कृति से संवाद: प्रो. राजवन्त राव

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग तथा राजकीय बौद्ध संग्रहालय, गोरखपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सात दिवसीय प्राचीन भारतीय अभिलेख एवं मुद्राएं–अभिरुचि कार्यशाला की राष्ट्रीय व्याख्यान श्रृंखला के अंतर्गत तृतीय व्याख्यान बुधवार को राजकीय बौद्ध संग्रहालय के यशोधरा सभागार में सम्पन्न हुआ।
कार्यशाला के अंतर्गत प्रो. राजवन्त राव, आचार्य, प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय ने “भारत का ग्रीक संस्कृति से संवाद—मुद्राओं के विशेष संदर्भ में” विषय पर व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि प्रारंभिक काल में वित्तीय लेनदेन एवं वस्तु-विनिमय के लिए आंतरिक मूल्य वाली वस्तुओं का उपयोग किया जाता था, लेकिन भंडारण और आवागमन की कठिनाइयों के कारण धातु मुद्राओं का प्रचलन प्रारंभ हुआ।
उन्होंने कहा कि चांदी, स्वर्ण और ताम्र से निर्मित मुद्राएं प्रारंभ में उच्च सामाजिक वर्ग द्वारा उपयोग की जाती थीं, जिन्हें बाद में राजनीतिक प्रमाणिकता मिली। धातु मुद्राएं संग्रह और आवागमन की दृष्टि से सुविधाजनक थीं। मुद्रा एक ऐसी वस्तु है जो किसी भी वस्तु को प्राप्त करने का माध्यम बनती है और यह जाति, लिंग अथवा सामाजिक भेद नहीं करती।
प्रो. राजवन्त राव ने मावेस, एंटीआलकिडस, अगाथाक्लीज और मिनांडर जैसे ग्रीक शासकों की मुद्राओं का उल्लेख करते हुए बताया कि उन पर भारतीय संस्कृति का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। अगाथाक्लीज की मुद्राओं पर बलराम और कृष्ण का अंकन मिलता है, हालांकि उनकी वेशभूषा पर विदेशी प्रभाव दिखाई देता है। उन्होंने बताया कि पहली बार ब्राह्मी लिपि का प्रयोग भी अगाथाक्लीज की मुद्राओं पर देखने को मिलता है। वेदिका में वृक्ष का अंकन ग्रीक मुद्राओं पर भारतीय सांस्कृतिक प्रभाव को दर्शाता है।
ग्रीक मुद्राओं के अग्रभाग में राजसत्ता सूचक आकृतियों तथा पृष्ठभाग में देवी-देवताओं का अंकन किया गया है। मिनांडर भारतीय संस्कृति से प्रभावित होकर बौद्ध अनुयायी बने, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय संस्कृति से संवाद करते हुए ग्रीक संस्कृति विकसित हुई, जिसके प्रमाण मुद्राओं में मिलते हैं।
कार्यशाला संयोजक डॉ. यशवन्त सिंह राठौर, उप निदेशक, राजकीय बौद्ध संग्रहालय, गोरखपुर ने बताया कि ग्रीक मुद्राओं पर आक्रामकता के प्रतीक अंकित हैं, जबकि भारतीय मुद्राओं में सांस्कृतिक सौम्यता और प्रतीकात्मकता दिखाई देती है। भारतीय संस्कृति ने सदैव विदेशी संस्कृतियों को आकर्षित किया है और भारत आए शासक इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके।
कार्यशाला के तृतीय व्याख्यान में लगभग 73 प्रतिभागियों के साथ संग्रहालय के कार्मिक भी उपस्थित रहे।

rkpNavneet Mishra

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