बुझा दीपक कैसे जलेगा
बाती भी सुलग चुकी है,
चिकनाई ही कहाँ बची है
रोशनी भी बुझ चुकी है,
निर्झर झर पवन बहती
झकझोर लव को गई है,
बुझा दीपक कैसे जलेगा
बाती भी सुलग चुकी है ।
घटा घनघोर छायी, नभ में
बदली उमड़ घुमड़ गरजी,
विद्युत कड़क रही है, तिमिर
की काली घटा भी घिरी है,
घोंसले सब भर चुके हैं,
पक्षी जाति दुबक चुकी है,
बुझा दीपक कैसे जलेगा
बाती भी सुलग चुकी है ।
देवेंद्र का प्रकोप देख
गोकुल नगरी व्याकुल हुई,
गोपी ग्वाले भयाक्रान्त,
मेघों की झड़ी लग चुकी,
गोकुल के घर द्वार डूबे,महल
व गली गली डूब चुकी है,
बुझा दीपक कैसे जलेगा
बाती भी सुलग चुकी है ।
गोविंद को पुकारें बार बार,
रक्षा करो विनती भी करी है,
गोवर्धन शिखर का छत्र
बना कृष्ण तर्जनी ने धरी है,
इंद्र का प्रताप खंड खंड हुआ,
अभिमान की गर्दिश उड़ी है,
दीपक जलेगा अब फिर से
बाती में चिकनई पड़ चुकी है ।
श्री कृष्ण के प्रताप से
द्वापर की महिमा बढ़ी है,
कंस संहार्यो, कालिया दहन
कियो, पूतना बध कियो है,
इंद्र से गोकुल बचायो, कौरवों
पर पांडवों को विजय दिलवायो,
आदित्य ऐसे ही हर युग में श्री
हरि विष्णु ने अवतार लियो है ।
कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
लखनऊ
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