जीवन में कठिनाई जब भी आती है
तो कष्ट देती है, और जब जाती है
तो उस कष्ट से अधिक मूल्यवान
आत्म बल का उपहार दे जाती है।
हमारा सफ़र जूतों से तय नहीं होता,
सफ़र कदम बढ़ाने से तय होता है,
जीवन के सफ़र को यादगार बनायें,
जीवन का जीना भी अर्थपूर्ण बनायें।
जीवन मूल्य समझने में भूल होती है,
प्रभू की माया है, जिसके पैर में जूते
नहीं होते, वह उस इंसान से ज़्यादा
भाग्यवान है जिसके पैर नहीं होते।
जीवन में हमारी सम्पन्नता केवल
धन वैभव से ही नहीं, बल्कि हमारे
अनुशासन, जीवन-मूल्य, व्यवहार
व नज़रिये से भी पहचानी जाती है।
इंसान की ज़िद, क्रोध, ग़लती, लोभ
व अपमान खर्राटों की तरह होते हैं,
जब दूसरा करे तो ख़राब लगते हैं,
खुद करें तो महसूस भी नही होते हैं।
यह सत्य है हम भूल गए धरती पर
दान,दया व धर्म का आदर करना,
ईश्वर ने अपने हाथों इस शरीर की
रचना कर हमको इंसान बनाया ।
इंसानों को खुद की रक्षा व सुरक्षा
हेतु दिये हाथ, पैर, आँख, नाक, मुँह,
पर इंसानी फ़ितरत ऐसी है देखो,
औरों पर ज़्यादा निर्भर हैं हम सब।
अंदर बाहर की कश्मकश कहाँ करने
देती अपनों और परायों का कोई हित,
उलझा रहता है मानव विधि निर्मित
माया जाल में बेख़बर सा होकर नित।
आज ज़रूरत है उत्साहित करने
की और खुद उत्साहित होने की भी,
आदित्य चरैवेति करते रहिए तब तक,
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, मिले जब तक।
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