भारत का राष्ट्र-निर्माण विमर्श बनाम सामाजिक यथार्थ:- किसान,सांप्रदायिक हिंसा और लोकतांत्रिक परीक्षा भूमिका:- एक समग्र विश्लेषण
गोंदिया – 14 जनवरी 2026 को दिल्ली में आयोजित पोंगल महोत्सव के मंच से भारतीय प्रधानमंत्री का यह कथन कि राष्ट्र निर्माण में किसानों का महत्वपूर्ण योगदान है,केवल एकसांस्कृतिक या औपचारिक वक्तव्य नहीं था, बल्कि यह भारत की आत्मा, अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना की ओर संकेत करने वाला राजनीतिक-वैचारिक संदेश था। पोंगल, जो कृषि, प्रकृति और श्रम के सम्मान का उत्सव है,उसी भारत का प्रतीक है जिसकी जड़ें खेतों में हैं। किंतु इसी कालखंड में प्रकाशित सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड सेक्युलरिज़्म (सीएसएसएस) की ताज़ा मॉनिटरिंग रिपोर्ट एक ऐसे भारत की तस्वीर पेश करती है,जहाँ सांप्रदायिक दंगों में गिरावट के बावजूद मॉब लिंचिंग, नफरत आधारित अपराध और पहचान- केंद्रित हिंसा अब भी लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती बने हुए हैं। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है,जिसकी सामाजिक संरचना बहुधर्मी बहुभाषी और बहु सांस्कृतिक ताने-बाने से निर्मित है। ऐसे समाज में सांप्रदायिक सौहार्द केवल आंतरिक स्थिरता का प्रश्न नहीं,बल्कि वैश्विक लोकतांत्रिक विश्व के लिए एक नैतिक और राजनीतिक संकेतक भी है, इसलिए, यह लेख इन्हीं दो समानांतर सच्चाइयों,आशा और चिंता,के बीच भारत के समकालीन सामाजिक- राजनीतिक परिदृश्य का अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से विश्लेषण प्रस्तुत करता है।यह लेख सीएसएसएस की रिपोर्टिंग पर आधारित है इसकी सटीकता को प्रमाणित नहीं किया जा सकता।
साथियों बात अगर हम कृषि और राष्ट्र-निर्माण: भारतीय सभ्यता की आधारशिला इसको समझनें की करें तोभारत में कृषि केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत संरचना है। सिंधु घाटी से लेकर आधुनिक भारत तक, किसान समाज की स्थिरता, खाद्य सुरक्षा और सांस्कृतिक निरंतरता का मूल आधार रहा है।प्रधानमंत्री का पोंगल मंच से दिया गया वक्तव्य इसी ऐतिहासिक सत्य को पुनःरेखांकित करता है। वैश्विक संदर्भ में देखें तो आज जब विकसित देश भी खाद्य आत्मनिर्भरता को राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा मान रहे हैं,भारत का किसान- केंद्रित विमर्श उसे एक स्थायी विकास मॉडल के रूप में प्रस्तुत करता है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ जैसे एफएओ और विश्व बैंक भी मानती हैं कि भारत की कृषि व्यवस्थातमाम चुनौतियों के बावजूद,वैश्विक खाद्य संकट के दौर में एक स्थिर स्तंभ बनी हुई है।पोंगल केवल तमिल संस्कृति का पर्व नहीं,बल्कि यह श्रम, प्रकृति और समुदाय केसामूहिक उत्सव का प्रतीक है। जब प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति इस पर्व के माध्यम से किसानों को राष्ट्र-निर्माण का नायक बताते हैं, तो यह संदेश केवल घरेलू नहीं बल्कि वैश्विक भी होता है। यह भारत को एक ऐसे देश के रूप में प्रस्तुत करता है जहाँ विकास का मॉडल जमीनी स्तर से जुड़ा है। किंतु यही समावेशी सांस्कृतिक संदेश तब कमजोर पड़ता है,जब समाज के भीतर पहचान- आधारित हिंसा और नफरत की राजनीति सामाजिक ताने-बाने को चोट पहुँचाती है। सीएसएसएस की 2025 की मॉनिटरिंग रिपोर्ट के अनुसार भारत में दर्ज बड़े सांप्रदायिक दंगों की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट आई है।यह एक सकारात्मक संकेत है और इसे कानून- व्यवस्था में सुधार,त्वरित प्रशासनिक हस्तक्षेप और न्यायिक सक्रियता से जोड़ा जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय स्तरपर यह भारत के लिए एक राहतकारी आंकड़ा है, क्योंकि लंबे समय से वैश्विक मानवाधिकार संगठनों द्वारा भारत में सांप्रदायिक हिंसा को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं। किंतु रिपोर्ट का दूसरा पक्ष अधिक चिंताजनक है हिंसा समाप्त नहीं हुई है, बल्कि उसने नए, अधिक विकेंद्रीकृत और अप्रत्याशित रूप धारण कर लिए हैं।मॉब लिंचिंग:-भीड़ का उभार और राज्य की परीक्षा मॉब लिंचिंग आधुनिक लोकतंत्र की सबसे भयावह विफलताओं में से एक मानी जाती है। भारत में यह हिंसा अक्सर अफवाह,पहचान और सामाजिक पूर्वाग्रहों से प्रेरित होती है।सीएसएसएस रिपोर्ट बताती है कि 2025 में मॉब लिंचिंग की घटनाएँ भले ही बड़े दंगों की तरह सुर्खियों में न रही हों, लेकिन उनकी सामाजिक क्षति कहीं अधिक गहरी रही है।अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विमर्श में मॉब लिंचिंग को अनऑफिशियल जस्टिस सिस्टम के रूप में देखा जाता है, जहाँ राज्य की वैधता और कानून का शासन सीधे चुनौती के घेरे में आ जाता है।नफरत आधारित अपराध:- वैश्विक प्रवृत्ति,भारतीय संदर्भ नफरत आधारित अपराध केवल भारत की समस्या नहीं हैं।अमेरिका यूरोप और एशिया के कई हिस्सों में यह एक उभरती वैश्विक प्रवृत्ति है। किंतु भारत में इसकी जटिलता इस कारण बढ़ जाती है क्योंकि यहाँ पहचान, धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र, इतिहास से गहराई से जुड़ी हुई है। सीएसएसएस रिपोर्ट के अनुसार 2025 में नफरत अपराधों का बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया से उपजी गलत सूचनाओं और राजनीतिक ध्रुवीकरण से जुड़ा रहा। यह स्थिति भारत के डिजिटल लोकतंत्र के लिए गंभीर चेतावनी है।पहचान:-आधारित हिंसा और सामाजिक विखंडन पहचान- केंद्रित हिंसा का सबसे बड़ा खतरा यह है कि यह समाज को स्थायी रूप से विभाजित कर देती है। किसान, मजदूर और निम्न- आय वर्ग,जिनका राष्ट्र- निर्माण में सबसे बड़ा योगदान है, वही वर्ग अक्सर ऐसी हिंसा का शिकार बनता है। यह विरोधाभास भारतीय लोकतंत्र के मूल सिद्धांत,समानता और बंधुत्व को कमजोर करता है। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक मानते हैं कि यदि पहचान-आधारित हिंसा पर समय रहते नियंत्रण नहीं पाया गया, तो यह आर्थिक विकास और सामाजिक स्थिरता दोनों को प्रभावित कर सकती है।
साथियों बात अगर हम राज्य, नीति और नैतिक जिम्मेदारी इसको समझने की करें तो, प्रधानमंत्री का किसान- सम्मान संदेश तभी सार्थक होगा जब राज्य समान रूप से हर नागरिक की सुरक्षा सुनिश्चित करे।सीएसएसएस रिपोर्ट अप्रत्यक्ष रूप से यह सवाल उठाती है कि क्या कानून का कार्यान्वयन हर स्तर पर निष्पक्ष है।अंतरराष्ट्रीय लोकतांत्रिक मानकों के अनुसार, हिंसा की रोकथाम केवल पुलिसिंग का विषय नहीं, बल्कि शिक्षा,सामाजिक संवाद और राजनीतिक जिम्मेदारी का भी प्रश्न है। भारत के लिए यह एक निर्णायक मोड़ है,या तो वह अपने विकास मॉडल को सामाजिक न्याय के साथ जोड़े, या फिर आर्थिक प्रगति के बावजूद सामाजिक असंतोष से जूझता रहे।
साथियों बात अगर हम वैश्विक छवि और भारत की सॉफ्ट पावर इसको समझने की करें तो,भारत आज स्वयं को विश्व गुरु, ग्लोबल साउथ के नेता और लोकतांत्रिक आदर्श के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। किसान-केंद्रित सांस्कृतिक आयोजनों और विकासशील अर्थव्यवस्था के साथ-साथ सामाजिक सौहार्द इसकी सॉफ्ट पावर का अहम हिस्सा है। किंतु मॉब लिंचिंग और नफरत अपराधों की खबरें अंतरराष्ट्रीय मीडिया में इस छवि को नुकसान पहुँचाती हैं। सीएसएसएस जैसी रिपोर्टें वैश्विक नीति- निर्माताओं और निवेशकों के लिए संकेतक बन जाती हैं।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि एक समग्र राष्ट्र- निर्माण की आवश्यकता,14 जनवरी 2026 को पोंगल मंच से दिया गया प्रधानमंत्री का वक्तव्य भारत की आत्मा की आवाज़ है, एक ऐसा भारत जो किसान, श्रम और प्रकृति के सम्मान पर खड़ा है।किंतु सीएसएसएस की 2025 की रिपोर्ट यह याद दिलाती है कि राष्ट्र-निर्माण केवल आर्थिक या सांस्कृतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और सुरक्षा की भी कसौटी है। जब तक किसान की मेहनत और नागरिक की सुरक्षा समान रूप से संरक्षित नहीं होंगी, तब तक भारत का राष्ट्र-निर्माण अधूरा रहेगा। अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से भी भारत की सफलता इसी संतुलन में निहित है,विकास के साथ मानवीय गरिमा, और सांस्कृतिक गर्व के साथ सामाजिक सद्भाव।
-संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया
