दुष्यंत कुमार: असहमति, संवेदना और समय की आवाज

नवनीत मिश्र

दुष्यंत कुमार हिन्दी कविता और ग़ज़ल की परंपरा में वह सशक्त हस्ताक्षर हैं, जिन्होंने शब्दों को सौंदर्य की सीमा से निकालकर सामाजिक संघर्ष का माध्यम बनाया। उनकी रचनाएँ केवल पढ़ी नहीं जातीं, बल्कि महसूस की जाती हैं। वे कविता को जनता की आवाज़ बनाते हैं और व्यवस्था से प्रश्न पूछने का साहस देते हैं।
दुष्यंत कुमार का जन्म 1 सितंबर 1933 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर जनपद में हुआ। उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राप्त की। आरंभ में उन्होंने कविता लिखी, किंतु बाद में ग़ज़ल को अपना प्रमुख माध्यम बनाया। उन्होंने ग़ज़ल को दरबारों और महफ़िलों की सीमाओं से बाहर निकालकर आम आदमी के दुःख, ग़ुस्से और उम्मीदों से जोड़ा।

उनकी प्रसिद्ध पंक्ति-
“हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए”
केवल काव्य सौंदर्य नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का उद्घोष है। यह पंक्ति बताती है कि जब पीड़ा असहनीय हो जाती है, तब परिवर्तन अनिवार्य हो जाता है।
दुष्यंत कुमार की ग़ज़लें सत्ता की संवेदनहीनता, व्यवस्था की विफलता और आम जन की पीड़ा को बेनकाब करती हैं-
सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।”

यह पंक्तियाँ आज भी आंदोलनों, सभाओं और जनसंवादों में उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी अपने समय में थीं।
तु किसी रेल सी गुज़रती है…
यह पंक्ति दुष्यंत कुमार की काव्य दृष्टि का प्रतीक है। यहाँ ‘रेल’ केवल गति का बिंब नहीं, बल्कि समय, दूरी और टूटते संबंधों का संकेत बन जाती है। उनके यहाँ प्रेम भी समाज से कटकर नहीं आता, बल्कि उसी यथार्थ से टकराता है, जिसमें आम आदमी जीता है।
दुष्यंत कुमार की भाषा सरल, सीधी और आम जन की बोलचाल से निकली हुई है। यही कारण है कि उनकी कविता विद्वानों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि किसान, मजदूर, छात्र और आम पाठक सभी से संवाद करती है। उन्होंने जटिल प्रतीकों के बजाय सहज शब्दों को चुना, ताकि बात सीधे मन तक पहुँचे।
उनका साहित्य यह सिखाता है कि कवि का दायित्व केवल सौंदर्य रचना नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना भी है। वे निर्भीक अभिव्यक्ति के कवि हैं, जो सत्ता से समझौता नहीं करते।
30 दिसंबर 1975 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनके शब्द आज भी जीवित हैं। दुष्यंत कुमार केवल एक कवि नहीं, बल्कि चेतना हैं। जो हर उस समय जाग उठती है, जब कोई चुप्पी तोड़ता है, सवाल करता है और कहता है-

कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिए,
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए।”

rkpNavneet Mishra

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