प्राण का संचार करने,
चेतना का राग भरने।
सुप्त जीवन आश बनकर,
सर ,नदी सैलाब बन कर।।
दे रही सुख ,शांति,
बूंद बारिश की।।1।।
मलिन पत्ते धो रही,
प्रकृति आतप खो रही।
भावना के पंख फहरे,
जीवन्त होने लगी लहरें।।
तन मन मिटाएं श्रांति,
बूंद बारिश की।।2।।
तन हिंडोले,मन हिंडोले,
पेड़ पर बहके हिंडोले।
पेंग ऊंची उठ रही है,
मुक्त तरुणी सज रही है।।
देती धरणि पर कांति।
बूंद बारिश की।।3।।
मद ,गंधवाही है पवन,
है मुदित वन और उपवन।
तीज व त्योहार आए,
जीवन में नव अनुराग छाए।।
हैं मिटाती भ्रांति,
बूंद बारिश की।।4।।
कृषक में आशा जगी,
कामना मन में पगी।
नभ ,मेंदिनी उत्फुल्ल हर्षित,
सुमन का मन है प्रहर्षित।।
दे गयी एक क्रांति,
बूंद बारिश की।।
आज कयी दिनों से बादल आकर घेरे रहते थे,लगता था कि बरसेंगे, लेकिन निराश कर वापस चलें जाते थे।आज भी सुबह ऐसे ही बादल आए और बरस कर एक नयी आशा व चेतना का संचार कर गये।
सभी सम्माननीय मित्रों को अगणित अमित शुभकामनाएं,आज का दिन मंगलमय हो।
गोपाल त्रिपाठी
शांति पुरम
प्रयागराज
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