खरा उतरना पड़ता है
मनुष्य को औरों के मापदंड पर ,
करना पड़ता है
स्वयं को सिद्ध दूसरों के लिए ।
कहा जाता है कि रंगमंच है
यह दुनिया ,
प्रदर्शन करता है मनुष्य अपनी भूमिका का ।
क्या प्रत्येक मनुष्य प्रयत्न नहीं
करता है सर्वोत्तम भूमिका के निर्वहन का ?
पर क्या वह संतुष्ट कर पाता
है अपने प्रदर्शन से अन्य को ?
जायज़ है काय॔क्षेत्र में प्रदर्शन
पर रिश्तों में भी प्रदर्शन व
स्वयं को सिद्ध करना पड़ता है ।
जीवन का वास्तविक आनंद
तो स्वयं को सिद्ध करने में है
न कि औरों को ।
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