दिल्ली हाई कोर्ट ने DU संकाय सदस्य की बर्खास्तगी को बरकरार रखा

न्यायालय ने देखा शैक्षणिक अखंडता पर हमला

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली विश्वविद्यालय की वाणिज्य विभाग की पूर्व रीडर (बिना कुर्सी वाला प्रोफेसर) डॉ. थील्मा जे. टैल्लू की बर्खास्तगी को वैध ठहराते हुए उनके उस फैसले को बरकरार रखा जोकि अदालत ने 2012 में DU की Appeals Committee द्वारा दिया गया था।
अभियोग: छात्रों ने आरोप लगाया था कि डॉ. टैल्लू उपस्थिति और अंक देने के बदले रिश्वत (नकद, मोबाइल फोन, हीरे की बालियाँ, मोती की माला आदि) मांगती थीं।

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कार्रवाई की शुरुआत: शिकायत मिलने के बाद कॉलेज और विश्वविद्यालय ने inquiry committee गठित की, जिसने आरोपों को सही पाया। इसके बाद विश्वविद्यालय की Appeals Committee ने 23 अक्टूबर, 2012 के निर्णय में दोष सिद्ध किया और बर्खास्तगी को लेकिन “termination” (संबंध विच्छेद) में बदल दिया ताकि उनकी सेवानिवृत्ति सम्बन्धी भत्तों का हनन न हो।

प्रतिवादी की दलीलें: डॉ. टैल्लू ने कहा कि शिकायत झूठी है, उन्हें व्यक्तिगत दुश्मनी के कारण फंसाया गया है और प्रस्तुत आडियो रिकॉर्डिंगों को संपादित किया गया है। उन्होंने यह भी दावा किया कि जांच प्रक्रिया में न्याय नहीं हुआ, उन्हें उचित कानूनी प्रतिनिधित्व नहीं मिला।
न्यायालय की गुहार और निर्णय
न्यायमूर्ति जसमीत सिंह की पीठ ने कहा कि छात्रों से ऐसे अवैध पारिश्रमिक की मांग “गंभीर” है, और यह शैक्षणिक अखंडता (academic integrity) की नींव को कमजोर करती है।

उन्होंने यह भी माना कि विश्वविद्यालय की Appeals Committee ने दंड की सीमा निर्धारित करते समय संतुलन बनाया है — बर्खास्तगी से “termination” की दूसरी सजा दी गई ताकि निवृत्ति भत्तों (retirement dues) को बरकरार रखा जा सके।

न्यायालय ने देखा कि 2012 का निर्णय साक्ष्यों के आधार पर था, जांच प्रक्रिया उम्मीद के मुताबिक थी और किसी प्रकार की प्रक्रियात्मक अनियमितता नहीं मिली जो निर्णय को रद्द करने लायक हो। § Section 34 of the Act के तहत दायर याचिका को अस्वीकार कर दिया गया।
महत्व और निहितार्थ
इस फैसले से शैक्षिक संस्थानों के प्रति एक सुस्पष्ट संकेत मिलता है कि छात्रों से उपस्थिति या अंक देने के बदले रिश्वत की मांग को न्यायालय नहीं बर्दाश्त करेगा।
यह निर्णय शैक्षणिक नीति और संस्थागत जवाबदेही (accountability) के लिहाज से मील का पत्थर है।
इसके पीछे यह संदेश है कि शिक्षक-छात्र संबंधों में पारदर्शिता और निष्पक्षता अपरिहार्य हैं।

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Editor CP pandey

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