एक सुंदर वाक़या हमारी मानसिकता यह दर्शाती है,
हम किसी तथ्य को कैसे समझते हैं,
कोई अपना परोसा भोजन भी किसी
की ज़रूरत देख समर्पित करते हैं।
स्वार्थ में कोई किसी के पेट पर पैर
की ठोकर मारने से नहीं हिचकता है,
पर यह देखा जाता है ऐसे स्वार्थी
लोगों का पेट कभी नहीं भरता है।
कितना प्रभाव पड़ता हमारे संस्कारों
का जो हम अगली पीढ़ी को देते हैं,
यह तय है कि बाँट कर खाने वाले
कभी भी कहीं भी भूखे नहीं रहते हैं।
एक छोटे बच्चे की संस्कारशीलता
की बिना अचरज की एक बताता हूँ,
कल मंदिर में भंडारे का एक भावपूर्ण
एवं मनमोहक सुंदर वृत्तांत सुनाता हूँ।
एक पति-पत्नी अपने बच्चे के साथ
मंदिर में मंगल के भंडारे में आये थे,
अपने साथ अपने छोटे बच्चे को भी
वे उत्साह सहित अपने संग लाये थे।
जब पति पत्नी दोनो ने मुझे आदर
सहित पैर छू कर चरण स्पर्श किया,
छोटे बालक ने ऐसा देख उसने भी
दोनो हाथों से मेरे चरण स्पर्श किया।
मुझे ख़ुशी यह देख हुई कि उस छोटे
बालक में स्वतः संस्कार विकसित हैं,
वैसे देखने में यह बात बहुत छोटी है,
कि हमारे यहाँ छोटे बड़ों के पैर छूते हैं।
पर जब मैं और बहुत से लोगों का
बायें हाथ से नमस्ते करना देखता हूँ,
आदित्य संस्कारहीनता के समक्ष
छोटे बच्चे के सुसंस्कार दर्शाती है।
कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
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