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गीता की दृष्टि में सात्त्विक विवेक: कर्तव्य, धर्म और मोक्ष का मार्ग

  • दिलीप कुमार अग्रवाल

विवेक को बुद्धि, ज्ञान, प्रज्ञा, सूझबूझ अथवा समझदारी भी कहा जाता है। धरती के सभी प्राणियों में विवेक की सबसे अधिक मात्रा मनुष्य के पास है। श्रीमद्भगवद्गीता में विवेक, उसकी मात्रा तथा उसके प्रकारों का विस्तृत वर्णन मिलता है। विवेक के तीन प्रमुख प्रकार बताए गए हैं— सात्त्विक विवेक, राजसी विवेक तथा तामसी विवेक।

सबसे पहले सात्त्विक विवेक के संबंध में गीता का कथन देखिए—

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी।। (गीता 18/30)

अर्थात् सात्त्विक विवेक उसे कहते हैं जो यह भेद करना जानता हो कि किस बात में प्रवृत्ति अर्थात् मन का लगाव, झुकाव अथवा अभिरुचि होनी चाहिए और किस बात में निवृत्ति अर्थात् विरक्ति, अलगाव, मुक्ति, त्याग अथवा परहेज को प्राथमिकता देनी चाहिए। कौन-सा कार्य कर्तव्य है और कौन-सा अकर्तव्य; किस बात से भय करना उचित है और कहाँ भय की आवश्यकता नहीं है; कौन-सा बन्धन मनुष्य को बाँधता है और कौन-सा मोक्ष प्रदान करता है।

विवेक की इस परिभाषा में ज्ञान तथा सही-गलत का निर्णय करने की शक्ति दोनों सम्मिलित हैं। ज्ञान सही भी हो सकता है और गलत भी, किंतु विवेक मनुष्य को सही ज्ञान तक पहुँचने की क्षमता प्रदान करता है। उदाहरण के लिए, शीत ऋतु में अंगीठी से गर्मी प्राप्त होने तथा बर्फ से ठंडक मिलने का ज्ञान सभी को होता है, परंतु विवेक ही यह निर्णय कराता है कि जीवन की रक्षा के लिए कब और कहाँ जाना उचित है।

गृहस्थ धर्म एवं राजधर्म को अनेक विद्वान निवृत्ति मार्ग से भिन्न मानते हैं, क्योंकि इनके पालन में मोह, दुःख और पथभ्रष्ट होने की संभावना रहती है। किंतु राजा जनक ने इन्हीं कर्तव्यों को अपने लिए प्रवृत्ति मार्ग का धर्म स्वीकार किया। उन्होंने फल और आसक्ति का त्याग करते हुए राजधर्म का पालन किया, जिससे लोकशिक्षा और लोक-आदर्श की स्थापना हुई। स्पष्ट है कि विवेक के माध्यम से मनुष्य अपने कर्तव्य का निर्धारण कर सकता है। एक बार जब कर्तव्य का सही निर्णय हो जाता है, तब वही उसका धर्म बन जाता है और उसका मन दृढ़ तथा स्थिर हो जाता है।

इसके बाद गीता में कहा गया है—

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्।। (गीता 2/41)

अर्थात् जिसकी बुद्धि प्रमाण-जनित विवेक से युक्त है, उसका निश्चय दृढ़ होता है। वह स्थिरचित्त रहता है, उसके लक्ष्य स्पष्ट होते हैं तथा कर्तव्य के प्रति उसमें कोई भ्रम नहीं रहता। इसके विपरीत, जिनके पास प्रमाण-जनित विवेक नहीं होता, उनकी बुद्धि अनेक शाखाओं में बँटी रहती है। वे अनन्त इच्छाओं के कारण उचित और अनुचित का निर्णय नहीं कर पाते तथा जीवन में भटकते रहते हैं।

इस श्लोक में विवेक की शक्ति के अंतर्गत तर्क एवं प्रमाणों के आधार पर भेद करने की क्षमता को सम्मिलित बताया गया है। जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने अपने गीता-भाष्य में लिखा है कि प्रमाण-जनित विवेक-बुद्धि ही मनुष्य को सत्य का बोध कराती है। जब यह विवेक पूर्ण रूप से विकसित हो जाता है, तब अज्ञान का नाश होता है और संसार-बन्धन से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

प्रमाण-जनित विवेक वह शक्ति है जिसके द्वारा किसी तथ्य को तर्क, प्रयोग, आप्तवचन, स्वयं सिद्ध कथनों अथवा स्वीकृत सिद्धांतों के आधार पर परखा और प्रमाणित किया जा सकता है। इसके परिणामस्वरूप मनुष्य में अपने कर्तव्यों के प्रति निश्चयात्मक बुद्धि का विकास होता है तथा वह भ्रम से मुक्त होकर धर्मानुकूल आचरण करता है।

श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय के श्लोक 42–43 में बताया गया है कि जो लोग प्रमाण और तर्क से युक्त विवेक का आश्रय नहीं लेते, वे वेदों के ज्ञाता होने पर भी वास्तविक ज्ञान से वंचित रहते हैं। उनमें निश्चयात्मक बुद्धि का अभाव होता है। ऐसे लोग भड़कीले कर्मकाण्डों तथा उनके फलों के प्रति अधिक आकर्षित रहते हैं। स्वर्ग की प्राप्ति, भोग-विलास तथा इन्द्रिय-सुख की कामना उनके जीवन का उद्देश्य बन जाती है।

इसके विपरीत, तर्कसंगत और प्रमाण-आधारित विवेक मनुष्य को निष्काम कर्मयोग, भक्ति तथा लोककल्याण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। यही सात्त्विक विवेक मनुष्य को कर्तव्य, धर्म और मोक्ष का यथार्थ ज्ञान कराता है तथा उसके जीवन को संतुलित, सार्थक और आदर्श बनाता है।

(लेखक बिहार प्रशासनिक सेवा के सेवानिवृत अधिकारी हैं।)

rkpNavneet Mishra

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