उतरौला/बलरामपुर (राष्ट्र की परम्परा)। उतरौला के इमानुएल चर्च स्कूल में आयोजित जिला स्तरीय 5 वीं ग्रांड मास्टर क्वेस्ट चेस प्रतियोगिता के फाइनल मुकाबले में मोहम्मद उस्मान ने पवन कश्यप को पराजित कर ट्राफी अपने नाम कर लिया। प्रतियोगिता में कुल 94 प्रतिभागियों ने भाग लिया। प्रतियोगिता की अध्यक्षता हकीक अंसारी ने किया। और डायरेक्टर आशीष विक्टर अजीत कुमार मौर्य मैच के ऑर्बिटर रहे। यह प्रतियोगिता 15 व 16 अगस्त को 6 राउंड में सम्पन्न हुआ। जिसमें 6 अंक के साथ मोहम्मद उस्मान प्रथम स्थान 5.5 अंकों के साथ अशोक कुमार शुक्ला द्वितीय स्थान व 5 अंक के साथ स्वदेश नाथ तृतीय स्थान प्राप्त किया। प्रथम स्थान के लिए अंतिम बाजी मोहम्मद उस्मान व पवन कश्यप के मध्य हुआ है। आयोजक मंडल द्वारा विजेता मोहम्मद उस्मान को ट्रॉफी देकर पुरस्कृत किया गया। प्रधानाचार्य आशीष विक्टर ने कहा कि प्रतियोगिता का मुख्य उद्देश्य जिले की शतरंज प्रतिभाओं को सामने लाना है। खिलाड़ियों और अभिभावकों में इस आयोजन को लेकर उत्साह देखा गया। ऑर्बिटर एडवोकेट अजीत कुमार मौर्य ने कहा कि शारीरिक एवं बौद्धिक विकास के लिए खेल आवश्यक है। साथ ही समाज में खेलों की भूमिका को समझाते हुए सभी को बधाई दी। आशा व्यक्त की कि आने वाले समय में सभी उच्च स्तर पर अपना और हम सभी का नाम रोशन करेंगे।
नवीमुंबई/महाराष्ट्र (राष्ट्र की परम्परा)। संतश्रेष्ठ श्रीज्ञानेश्वर महाराज का सन 2025 यह वर्ष सप्तशतकोत्तर सुवर्ण महोत्सवी (750वीं) जयंती वर्ष है। इसी उपलक्ष्य में मुख्यमंत्री की संकल्पना अनुसार, महाराष्ट्र शासन द्वारा निर्गमित परिपत्रक के अंतर्गत नवी मुंबई महानगरपालिका की ओर से आयुक्त डॉ. कैलास शिंदे के मार्गदर्शन में बड़े उत्साह से ज्ञानेश्वर माऊली का जयंती उत्सव मनाया गया। इस अवसर पर सजाई गई पालखी में विराजमान श्री ज्ञानेश्वर माऊली की प्रतिमा और ज्ञानेश्वरी ग्रंथ का पूजन कर महापालिका मुख्यालय से दिंडी स्वरूप शोभायात्रा का प्रारंभ किया गया। संत ज्ञानेश्वर की वेशभूषा में छात्र सभी का आकर्षण केंद्र बने हुए थे। टाळ-मृदंग की गूंज, लेझीम पथक के साथ मुख्यालय के सामने की सेवा मार्ग से निकली दिंडी में छोटे-बड़े नागरिक बड़ी संख्या में शामिल हुए। विशेष रूप से ज्ञानदीप सेवा मंडल के प्राथमिक-माध्यमिक विद्यालय के छात्र-छात्राएं, मुख्याध्यापक रत्नाकर टांडेल के मार्गदर्शन में वारकरी वेश और लेझीम पथक के साथ दिंडी में सम्मिलित हुए। युवक-युवतियों की भी उल्लेखनीय भागीदारी रही। ‘पुंडलिका वरदे हरी विठ्ठल’, ‘ज्ञानोबा माऊली तुकाराम’, ‘जय जय राम कृष्ण हरी’ जैसे नामगजर के साथ दिंडी में सहभागी ज्ञानाई प्रासादिक भजन मंडल करावे के भजनीबुवा पंढरीनाथ भोईर, विजय नाईक, रविंद्र भोईर, नेरुल के अमृतबुवा पाटील तथा पत्रकार श्री मनोज जालनावाला ने अभंग गायन कर दिंडी को भावमय वातावरण प्रदान किया। अतिरिक्त आयुक्त सुनील पवार सहित अनेक अधिकारी और कर्मचारी भी शुभ्रधवल वारकरी वेश में दिंडी में सहभागी हुए। सहायक नगररचना संचालक सोमनाथ केकाण, परिमंडल 1 के उपायुक्त सोमनाथ पोटरे, समाजविकास उपायुक्त किसनराव पलांडे, वैद्यकीय स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. प्रशांत जवादे, घनकचरा प्रबंधन विभाग उपायुक्त डॉ. अजय गडदे व स्मिता काळे, महापालिका सचिव चित्रा बाविस्कर, क्रीड़ा व सांस्कृतिक विभाग उपायुक्त अभिलाषा म्हात्रे, सहायक स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. रत्नप्रभा चव्हाण समेत कई अधिकारी-कर्मचारी दिंडी में सहभागी हुए। नवी मुंबई की विभिन्न संस्थाओं के पदाधिकारी और प्रतिनिधि भी उपस्थित रहे। स्वच्छता दिंडी की टोपी सभी का ध्यान आकर्षित कर रही थी। विशेष यह रहा कि रास्ते में जगह-जगह रुककर तथा मुख्यालय के प्रांगण में रिंगण घालकर फुगड्या, झिम्मा जैसे पारंपरिक दिंडी के खेल भी खेले गए। ज्ञानेश्वर महाराज के पसायदान के साथ दिंडी का भावपूर्ण समापन हुआ। इसके पश्चात मुख्यालय के एम्फीथिएटर में सुप्रसिद्ध गायक मंगेश बोरगांवकर और उनके साथियों द्वारा प्रस्तुत ‘भक्तिरंग स्वरयात्रा’ ने सभी को भक्ति रस में सराबोर कर दिया। संतश्रेष्ठ ज्ञानेश्वर माऊली की 750वीं जयंती उत्सव के लिए नवी मुंबईकरों ने उत्साहपूर्वक एकत्रित होकर सहभागिता की—इसका विशेष उल्लेख आयुक्त डॉ. कैलास शिंदे ने अपने मनोगत में किया।
शिक्षण संस्थान ज्ञान देने के साथ-साथ आदर्श आचरण के केंद्र भी होते हैं। लेकिन जब यहां कार्यरत महिला शिक्षिकाएं असुरक्षा, अशोभनीय व्यवहार और अनुचित दबाव का सामना करती हैं, तो यह केवल एक व्यक्ति नहीं, पूरे माहौल की गरिमा को चोट पहुंचाता है। महिला सुरक्षा के लिए केवल कानून होना पर्याप्त नहीं, बल्कि संस्थानों में सख़्त नियम और रोकथाम के उपाय जरूरी हैं। महिला स्टाफ रूम और शौचालय अलग हों, परिसर में हर जगह सक्रिय कैमरे लगें, खाली पीरियड में महिला और पुरुष शिक्षक अपने-अपने स्टाफ रूम में ही रहें, और एकांत में अनावश्यक बातचीत पर रोक लगे। कार्य-संबंधी संदेश कार्य समय में ही भेजे जाएं, निजी चैटिंग पर प्रतिबंध हो। हर संस्थान में आंतरिक शिकायत समिति सक्रिय रहे, गोपनीय शिकायत तंत्र हो, और दोषी पाए जाने पर तुरंत कार्रवाई हो। साथ ही, साल में कम से कम एक बार कार्यस्थल आचरण और कानून पर प्रशिक्षण हो, ताकि सभी को सम्मान और मर्यादा का महत्व समझ में आए। सुरक्षित कैंपस और सम्मानजनक कार्यस्थल केवल महिला का अधिकार नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता और समाज की गरिमा का आधार है। अब समय है चुप्पी तोड़ने और सख़्त कदम उठाने का। शिक्षण संस्थान केवल पढ़ाई-लिखाई की जगह नहीं होते, बल्कि समाज का आईना और भविष्य का निर्माण स्थल होते हैं। यहां का वातावरण सीधे तौर पर बच्चों की सोच, शिक्षकों की प्रेरणा और पूरे संस्थान की प्रतिष्ठा को प्रभावित करता है। एक स्वस्थ और सम्मानजनक कार्यस्थल कोई विलासिता नहीं, बल्कि बुनियादी आवश्यकता है। विशेष रूप से महिला शिक्षिकाओं और महिला कर्मचारियों के लिए यह सुनिश्चित करना कि वे अपने कार्यस्थल पर सुरक्षित और सम्मानित महसूस करें, किसी भी संस्थान की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। हाल के वर्षों में कई घटनाएं सामने आई हैं, जहां महिला शिक्षिकाओं ने अपने ही सहयोगियों या वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा किए गए अनुचित व्यवहार, अशोभनीय संदेश और निजी तौर पर अनुचित हरकतों की शिकायत की है। देशभर से समय-समय पर ऐसी खबरें आती रही हैं—कभी खाली पीरियड में एकांत में लंबी बातचीत, कभी व्यक्तिगत नंबर पर अनावश्यक और निजी संदेश, कभी नज़र और शब्दों से अपमानजनक संकेत, तो कभी काम में मदद या पदोन्नति के बदले अनुचित मांग। ये सब केवल व्यक्तिगत आचरण की गड़बड़ी नहीं हैं, बल्कि कार्यस्थल की गरिमा और सुरक्षा को तोड़ने वाली गंभीर प्रवृत्तियां हैं। ऐसी घटनाएं केवल एक महिला के मानसिक स्वास्थ्य को चोट नहीं पहुंचातीं, बल्कि पूरे वातावरण को विषैला बना देती हैं। असुरक्षा का भाव महिला शिक्षिकाओं के आत्मविश्वास को कमजोर करता है। वे हमेशा सतर्क और तनावग्रस्त रहती हैं, जिससे उनका ध्यान पढ़ाई से भटकता है। बार-बार अपमानजनक स्थिति का सामना करने से उनका आत्मसम्मान टूटने लगता है। कई महिलाएं ऐसे माहौल से बचने के लिए नौकरी छोड़ देती हैं या स्थानांतरण की मांग करती हैं। इसका असर छात्रों पर भी पड़ता है, क्योंकि असुरक्षित और असंतुष्ट शिक्षक पूरी ऊर्जा और सकारात्मकता के साथ पढ़ाने में सक्षम नहीं रहते। महिलाओं की कार्यस्थल पर सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भारत में यौन उत्पीड़न (कार्यस्थल पर) अधिनियम, 2013 यानी “पॉश अधिनियम” लागू है। इसके तहत प्रत्येक संस्थान में आंतरिक शिकायत समिति का गठन अनिवार्य है, जिसकी अध्यक्ष महिला हो और आधे से अधिक सदस्य महिलाएं हों। शिकायत दर्ज होने पर सात कार्य दिवस में प्रारंभिक सुनवाई और नब्बे दिनों में जांच पूरी करनी होती है। दोषी पाए जाने पर प्रशासनिक और अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। शिकायतकर्ता के साथ किसी भी प्रकार के प्रतिशोध को रोकना भी संस्थान की जिम्मेदारी है। दुर्भाग्य से, अनेक स्थानों पर यह समिति केवल कागजों में ही सीमित रहती है और शिकायतें या तो दबा दी जाती हैं या पीड़ित को चुप करा दिया जाता है। समाधान केवल सज़ा देने में नहीं, बल्कि रोकथाम में है। इसके लिए कुछ बुनियादी कदम हर शैक्षणिक संस्थान में तुरंत लागू किए जाने चाहिए। महिला शिक्षिकाओं के लिए अलग और सुरक्षित स्टाफ रूम होना चाहिए, ताकि वे अपने कार्य से जुड़ी चर्चाएं और आवश्यक बातचीत आराम से कर सकें। महिला कर्मचारियों और छात्राओं के लिए अलग, स्वच्छ और सुरक्षित शौचालय की व्यवस्था हो। परिसर के प्रमुख स्थानों, गलियारों, प्रवेश-द्वारों, खेल के मैदान और कॉमन एरिया में उच्च गुणवत्ता वाले कैमरे लगाए जाएं और वे हमेशा सक्रिय रहें। फुटेज को कम से कम नब्बे दिनों तक सुरक्षित रखा जाए और केवल अधिकृत व्यक्तियों को ही उसकी पहुंच हो। खाली पीरियड में महिला और पुरुष शिक्षक अपने-अपने स्टाफ रूम में ही रहें। बिना किसी औपचारिक कार्य के, एकांत में लंबे समय तक बैठना या बातचीत करना प्रतिबंधित हो। शिक्षकों और सहकर्मियों के बीच निजी संदेश केवल कार्य संबंधी हों और वह भी कार्य समय में ही भेजे जाएं। देर रात या गैर-जरूरी चैटिंग पूरी तरह वर्जित हो, विशेषकर जब वह विपरीत लिंग के बीच हो। प्रत्येक सत्र की शुरुआत में कार्यस्थल पर आचरण और कानून के बारे में प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएं। इसमें सभी शिक्षक, गैर-शिक्षण कर्मचारी और वरिष्ठ छात्रों को शामिल किया जाए, ताकि सभी को यह समझ में आए कि कार्यस्थल पर सम्मान और मर्यादा कैसे बनाए रखी जाती है। संस्थान में ऐसा गोपनीय तंत्र हो जहां पीड़ित बिना डर और शर्म के शिकायत दर्ज करा सके। यह ऑनलाइन पोर्टल, सीलबंद शिकायत बॉक्स या हेल्पलाइन नंबर के रूप में हो सकता है। शिकायत आने पर तुरंत जांच हो, आरोपी और पीड़ित को अलग किया जाए और दोषी पाए जाने पर बिना देरी कड़ी कार्रवाई की जाए। शिकायतकर्ता की गोपनीयता की रक्षा संस्थान की सर्वोच्च जिम्मेदारी होनी चाहिए। महिला सुरक्षा केवल कानूनी या प्रशासनिक मामला नहीं है, यह सामाजिक सोच का भी मुद्दा है। हमें अपने बच्चों को यह सिखाना होगा कि कार्यस्थल पर सम्मान, मर्यादा और सीमाएं क्या होती हैं। स्कूलों में लैंगिक संवेदनशीलता और आत्मसम्मान पर आधारित विशेष कक्षाएं शुरू की जानी चाहिएं। समाज को यह समझना होगा कि महिला सुरक्षा किसी एक वर्ग का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे समाज और देश की गरिमा का प्रश्न है। सुरक्षित कैंपस और सम्मानजनक कार्यस्थल कोई आदर्शवादी कल्पना नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता और संस्थान की विश्वसनीयता का आधार है। जिस स्थान पर महिलाएं खुद को सुरक्षित न महसूस करें, वहां शिक्षा का वातावरण कभी भी स्वस्थ नहीं हो सकता। यह केवल महिला का मुद्दा नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति का मुद्दा है जो अपने कार्यस्थल को गरिमा और मर्यादा से भरपूर देखना चाहता है। अगर हम अब भी चुप रहे तो अगली घटना का इंतज़ार करना पड़ेगा और तब तक किसी का आत्मविश्वास, किसी का करियर और किसी की ज़िंदगी बर्बाद हो चुकी होगी। अब समय है चुप्पी तोड़ने का—नियम बनाने का, उन्हें कड़ाई से लागू करने का, और हर शैक्षणिक संस्थान को सचमुच सुरक्षित और सम्मानजनक कार्यस्थल बनाने का। यह केवल प्रशासन की नहीं, बल्कि हर शिक्षक, हर कर्मचारी, हर छात्र और पूरे समाज की जिम्मेदारी है। तभी हम आने वाली पीढ़ी को न केवल किताबों का ज्ञान, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी सीख—सम्मान और सुरक्षा—भी दे पाएंगे।
-प्रियंका सौरभ रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,हिसार
क्या कभी छोटे भाई, माता- पिता और बहनें उस त्याग को समझेंगे? या यह भी एक ऐसी कहानी होगी, जो सिर्फ पीपल के पत्तों की सरसराहट में सुनी जाएगी… घर के आँगन में पीपल का पुराना पेड़ खामोशी से खड़ा था। उसकी छाँव में खेलते हुए बीते साल जैसे किसी पुराने संदूक में बंद पड़े थे। इस घर की दीवारों ने न जाने कितनी कहानियाँ देखी थीं — हँसी की, आँसुओं की, त्याग और उपेक्षा की। बड़े बेटे ने महज़ छठी कक्षा से ही घर का बोझ अपने कंधों पर उठा लिया था। पिता का स्वभाव ऐसा कि घर के कामों में कोई स्थायी हाथ बँटाना उनकी आदत में नहीं था। न कोई बड़ा सपना, न मेहनत से आगे बढ़ने की चाह। उस उम्र में, जब बाकी बच्चे अपनी पढ़ाई और खेलों में मग्न होते हैं, उसने ट्यूशन पढ़ाकर खुद की पढ़ाई भी पूरी की और छोटे भाई की भी। बहनों की पढ़ाई के लिए जितना संभव हो सका, उसने पैसे जुटाए। कपड़े, किताबें, फीस — हर ज़रूरत में वह आगे खड़ा था। शादी के बाद उसकी पत्नी भी इस जिम्मेदारी में बराबर की साझेदार बनी। वह न सिर्फ अपने घर की जिम्मेदारी निभाती, बल्कि ननदों को उनके घर जाकर पढ़ाती, उन्हें अपने साथ कोचिंग ले जाती। घर की छोटी-बड़ी ज़रूरतों के लिए बड़े की नौकरी और उसकी पत्नी के पैसों पर ही घर चलता रहा। पत्नी के फिक्स्ड डिपॉज़िट तक घर के खर्च में लग गए। जब उसकी पत्नी की भी नौकरी लगी, तब भी उनकी पूरी तनख्वाह घर की उन्नति में लगती रही। कई सालों बाद बड़ा भाई नौकरी में स्थिर हुआ। उसने घर का सपना सजाया — नया मकान बनवाया, एक पुरानी गाड़ी खरीदी ताकि घर के काम आसानी से हों। लेकिन गाड़ी का इस्तेमाल भी ज्यादातर छोटा ही करता। यहाँ तक कि जब उसकी पत्नी गर्भवती थी, तब भी छोटा गाड़ी लेकर चला जाता और भाभी बस से ड्यूटी जाती। बड़ा भाई खुद किसी और के साथ काम पर जाता। बड़े के बेटे के जन्म से पहले ही छोटे भाई की नौकरी लग चुकी थी। पर जिम्मेदारियों में हाथ बँटाने या घर का पुराना कर्ज़ चुकाने के बजाय वह अपने ही आराम में लगा रहा। एक-दो बार बड़े ने माता-पिता से भी कहा कि छोटे की जरूरतों पर ध्यान दो, पर उसकी इच्छाओं को पंख मत लगाओ। मगर माता-पिता ने यह नहीं सोचा कि बड़ा सालों से परिवार का बोझ उठाए हुए है और अपना सब कुछ घर के लिए झोंक चुका है। बड़ा भाई और भाभी हमेशा छोटे के लिए खुद से अच्छा ढूंढते और सोचते रहे — कपड़ों से लेकर पढ़ाई और सुविधा तक, हर बार उन्होंने पहले छोटे की ज़रूरत पूरी की। लेकिन माता-पिता और छोटे की इच्छाओं को कभी सब्र नहीं मिला; जो चाहा, तुरंत चाहिए था, चाहे उसके लिए बड़े का त्याग और मेहनत क्यों न कुर्बान हो। बड़े भाई और उसकी पत्नी दोनों ड्यूटी करते और बच्चा पिता की गोद में पलता। इस वक्त भी न सास-ससुर, न बहनें और न ही छोटा भाई मदद को आगे आए। कुछ समय बाद छोटे भाई की शादी हुई। उसकी पत्नी भी नौकरी में थी। घर के कर्ज़ को उतारने के बजाय दोनों ने नई गाड़ी खरीद ली। जबकि बड़े भाई की पत्नी को मायके से गाड़ी के लिए जो पैसे मिले थे, वे भी इस घर को आगे बढ़ाने में खर्च हो चुके थे। सबसे चुभने वाली बात यह थी कि बहनों की पढ़ाई और ज़रूरतों के लिए सालों तक सबकुछ देने के बाद भी, वे छोटे भाई के पक्ष में रहीं। जैसे बड़े का हर त्याग, हर मेहनत किसी पुराने कपड़े की तरह बेमानी हो गया हो। अब घर का माहौल बदल चुका था। छोटा भाई और उसकी पत्नी के बीच अहम का भाव बढ़ चुका था। बातें तानों में बदल गई थीं, और ताने अपमान में। कभी-कभी तो छोटे का गुस्सा हाथ तक पहुँच जाता। सास-ससुर भी इस पर चुप रहते। बड़ा भाई अब अपने बेटे और पत्नी के साथ ही अपनी छोटी-सी दुनिया में सीमित हो चुका था। पर एक अजीब-सी खामोशी उसके भीतर घर कर गई थी — वह खामोशी, जो सिर्फ वही समझ सकता था, जिसने सालों तक दूसरों के लिए अपना सब कुछ दे दिया हो और बदले में सिर्फ दूरी पाई हो। दुख इस बात का नहीं था कि मेहनत का प्रतिफल नहीं मिला, बल्कि इस बात का था कि जिनके लिए जीवन का हर पल खपा दिया, उन्होंने ही मुंह मोड़ लिया। बड़े ने बहनों की पढ़ाई के लिए जो त्याग किया, उन्हें अपने घर तक पढ़ाया, वे भी चुपचाप छोटे के साथ खड़ी रहीं। बड़े के बेटे के जन्म के बाद भी किसी ने उसका ध्यान नहीं रखा — न दादी ने, न बुआओं ने, न चाचा-चाची ने। समय का चक्र घूमता रहा, पर एक सच्चाई स्थिर रही — वह किशोर, जिसने छठी कक्षा से घर संभालना शुरू किया था, आज भी अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटा। बस अब उसने उम्मीद करना छोड़ दिया था। एक रात, बरसों के घुटे हुए दर्द के बाद, उसने पत्नी से कहा — “शायद गलती हमारी ही थी… हमने सोचा था कि खून का रिश्ता सबसे बड़ा होता है। पर असल में, समझ और सम्मान ही रिश्तों को जीवित रखते हैं।” पत्नी ने बस उसका हाथ थाम लिया। आँसुओं से भरी आँखों में कोई शिकवा नहीं था, बस एक दृढ़ता थी “अब हम अपने बेटे को ये सिखाएँगे कि इंसानियत पहले, रिश्ते बाद में।” आंगन में हवा चल रही थी। दूर मंदिर की घंटियाँ बज रही थीं। घर वही था, लोग वही थे, पर बड़ा भाई अब भीतर से बदल चुका था। वह जान चुका था कि त्याग का फल हमेशा आभार नहीं होता — कभी-कभी बस चुप्पी और दूरी मिलती है। एक शाम, जब घर के आँगन में पीपल की पत्तियाँ सरसराईं, बड़ा भाई चुपचाप अपने बेटे को गोद में लेकर बैठा था। बेटा मासूमियत से पूछ बैठा “पापा, आप हमेशा इतने चुप क्यों रहते हो?” बड़े ने हल्की मुस्कान दी, पर भीतर का दर्द आँखों में उतर आया। उसने बस इतना कहा — “कभी-कभी बेटा, चुप रहना सबसे बड़ी ताकत होती है।” पीपल का पेड़ उस शाम और भी स्थिर हो गया था। जैसे उसने भी यह वादा कर लिया हो कि वह इस घर के त्याग की छाया को हमेशा संजोकर रखेगा चाहे लोग भूल जाएँ, पर हवा की हर सरसराहट में वह कहानी ज़िंदा रहेगी।
यह कहानी खुली छोड़ दी गई है, ताकि पाठक सोच सके — क्या कभी छोटे भाई, माता- पिता और बहनें उस त्याग को समझेंगे? या यह भी एक ऐसी कहानी होगी, जो सिर्फ पीपल के पत्तों की सरसराहट में सुनी जाएगी…
डॉo सत्यवान सौरभ, कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, भिवानी,हरियाणा
सादुल्लानगर/बलरामपुर(राष्ट्र की परम्परा)।स्थानीय आमिना कान्वेंट स्कूल के छात्र मोहम्मद आसिफ ने प्रतिष्ठित नीट परीक्षा में सफलता प्राप्त कर क्षेत्र का मान बढ़ाया है। उनकी इस उपलब्धि पर न केवल विद्यालय परिवार, बल्कि पूरा जनपद गर्व महसूस कर रहा है। विद्यालय परिसर में खुशी का माहौल देखने को मिला। विद्यालय प्रबंधक/ग्राम प्रधान कम्मरपुर शब्बू रजा ने मिठाई खिलाकर आसिफ को बधाई दी और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की। उन्होंने कहा कि आसिफ की यह सफलता अन्य छात्रों के लिए प्रेरणा का कार्य करेगी। मोहम्मद आसिफ ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा आमिना कान्वेंट स्कूल से ही प्राप्त की। उनका निवास ग्राम सभा सादुल्लानगर अहरौला में है। उनके पिता अहमद हुसैन सादुल्लानगर मार्केट में कपड़े की दुकान चलाते हैं। नीट में सफलता के बाद आसिफ को सोनभद्र मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिला है। उन्होंने अपनी उपलब्धि का श्रेय माता-पिता, शिक्षकों और विद्यालय को दिया। जनपद भर में इस सफलता की चर्चा जोरों पर है और मोहम्मद आसिफ को बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ है।इस अवसर पर बीना शर्मा प्रिंसिपल ,फसीुल्लाह वाइस प्रिंसिपल,मिथिलेश मिश्रा,शाह मो० आदि उपस्थित रहें।
तहसील बैरिया में सोमवार को संपूर्ण समाधान दिवस का आयोजन किया गया। जिलाधिकारी मंगला प्रसाद सिंह एवं पुलिस अधीक्षक ओमवीर सिंह ने संयुक्त रूप से जनसुनवाई कर क्षेत्रवासियों की समस्याएं सुनीं। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग अपनी शिकायतों और समस्याओं को लेकर पहुंचे। डीएम और एसपी ने संबंधित अधिकारियों को निर्देशित किया कि हर शिकायत का गुणवत्तापूर्ण और समयबद्ध निस्तारण किया जाए। उन्होंने कहा कि राजस्व संबंधी मामलों में राजस्व व पुलिस की संयुक्त टीम मौके पर जाकर जांच कर समाधान सुनिश्चित करे।जिलाधिकारी ने योजनाओं से संबंधित आवेदनों को ऑनलाइन दर्ज कर पात्र लोगों को लाभान्वित करने का निर्देश भी दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि शासन की मंशा है कि जनता की प्रत्येक समस्या का शीघ्र समाधान हो, ताकि लोगों को वास्तविक राहत मिल सके। कार्यक्रम में कुल 66 आवेदन पत्र प्राप्त हुए, जिनमें से 05 मामलों का मौके पर निस्तारण किया गया। पुलिस अधीक्षक ओमवीर सिंह ने थाना स्तर पर लंबित प्रकरणों की समीक्षा कर मातहत अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि जनहित से जुड़ी शिकायतों का प्राथमिकता के आधार पर निस्तारण होना चाहिए और पीड़ितों को न्याय दिलाने में किसी भी प्रकार की लापरवाही स्वीकार्य नहीं होगी। इस अवसर पर उप जिलाधिकारी (न्यायिक) बैरिया निशांत उपाध्याय, सीएमओ, डीडीओ सहित सभी विभागों के अधिकारी उपस्थित रहे।
आगरा,(राष्ट्र की परम्परा)तहसील किरावली में जिलाधिकारी अरविन्द मल्लप्पा बंगारी की अध्यक्षता में संपूर्ण समाधान दिवस आयोजित हुआ। इस दौरान कुल 47 शिकायतें प्राप्त हुईं, जिनमें से 6 का मौके पर ही निस्तारण कर दिया गया। शेष शिकायतें मुख्यतः भूमि विवाद, चकरोड निर्माण, अतिक्रमण, नाली निर्माण आदि से संबंधित रहीं। जिलाधिकारी ने अधिकारियों को गुणवत्तापूर्ण एवं समयबद्ध निस्तारण सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि शिकायतकर्ता से वार्ता कर स्थलीय निरीक्षण किया जाए और निस्तारण की जानकारी उन्हें उपलब्ध कराई जाए। जिलाधिकारी ने यह भी चेतावनी दी कि लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी। कार्यक्रम में मुख्य विकास अधिकारी प्रतिभा सिंह, एडीएम प्रशासन चन्द्रशेखर आजाद, सीएमओ अरुण कुमार श्रीवास्तव सहित कई विभागों के अधिकारी उपस्थित रहे।
जिलाधिकारी व पुलिस अधीक्षक ने दिए त्वरित निस्तारण के निर्देश
संत कबीर नगर(राष्ट्र की परम्परा)। जिले के तहसील मेहदावल में सोमवार को संपूर्ण समाधान दिवस का आयोजन किया गया। इस अवसर पर जिलाधिकारी आलोक कुमार एवं पुलिस अधीक्षक संदीप कुमार मीना ने संयुक्त रूप से जनसुनवाई कर लोगों की समस्याएँ सुनीं और संबंधित अधिकारियों को तत्काल निस्तारण के निर्देश दिए। जनसुनवाई में बड़ी संख्या में लोग अपनी शिकायतें लेकर पहुँचे। ग्रामीणों ने मुख्य रूप से सड़क मरम्मत, बिजली आपूर्ति, आवास, भूमि विवाद और पुलिस से जुड़ी समस्याएँ उठाईं। जिलाधिकारी ने राजस्व अधिकारियों को भूमि विवादों के शीघ्र समाधान पर जोर दिया, वहीं पुलिस अधीक्षक ने कानून-व्यवस्था संबंधी शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई करने को कहा। पुलिस अधीक्षक संदीप कुमार मीना ने स्पष्ट कहा कि शिकायतों के समाधान में किसी प्रकार की लापरवाही सहन नहीं की जाएगी। वहीं जिलाधिकारी आलोक कुमार ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि समस्याओं का निस्तारण गुणवत्तापूर्ण ढंग से समयसीमा के भीतर होना चाहिए। इस दौरान राजस्व, पुलिस, विकास एवं अन्य विभागों के अधिकारी मौजूद रहे। जनसुनवाई में आए लोगों ने उम्मीद जताई कि उनकी समस्याओं का शीघ्र और प्रभावी समाधान होगा।
नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने सोमवार को पार्टी की ओर से सी.पी. राधाकृष्णन को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किया। चुनाव की अधिसूचना जारी कर दी गई है और 9 सितंबर को मतदान के साथ ही मतगणना भी होगी।
भाजपा संसदीय बोर्ड ने अपने सहयोगी दलों और विपक्षी नेताओं से चर्चा के बाद यह निर्णय सर्वसम्मति से लिया। नड्डा ने कहा कि भाजपा चाहती है कि राधाकृष्णन को सभी दल मिलकर निर्विरोध चुनें। इसके लिए विपक्ष से बातचीत का सिलसिला जारी रहेगा।
आरएसएस पृष्ठभूमि और दो बार सांसद रहे राधाकृष्णन तमिलनाडु से ताल्लुक रखने वाले सी.पी. राधाकृष्णन भाजपा के वरिष्ठ नेता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की पृष्ठभूमि से आते हैं। वे ओबीसी समुदाय से हैं और दो बार लोकसभा सदस्य रह चुके हैं। पार्टी का मानना है कि उनका अनुभव और राजनीतिक समझ उपराष्ट्रपति पद को और मजबूत बनाएगी।
धनखड़ के इस्तीफे से खाली हुआ पद
गौरतलब है कि मौजूदा उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए 21 जुलाई को संसद के मानसून सत्र की शुरुआत के दिन ही इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद यह संवैधानिक पद रिक्त हो गया।
चुनाव की प्रक्रिया भारतीय संविधान के अनुच्छेद 66(1) के तहत उपराष्ट्रपति का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली और एकल संक्रमणीय मत प्रणाली द्वारा किया जाता है। इसमें लोकसभा और राज्यसभा के निर्वाचित व मनोनीत दोनों सदस्य वोट डालते हैं।
राष्ट्रपति चुनाव के विपरीत, इसमें राज्य विधानसभाओं की कोई भूमिका नहीं होती।
प्रत्येक सांसद का मत मूल्य समान यानी “1” होता है।मतदान गुप्त बैलेट से होता है और इस दौरान सांसद किसी भी पार्टी व्हिप से बाध्य नहीं होते।
सत्ता और विपक्ष के आंकड़े फिलहाल निर्वाचक मंडल में कुल 782 सांसद शामिल हैं। उपराष्ट्रपति चुनाव जीतने के लिए उम्मीदवार को 392 से अधिक मतों की आवश्यकता होगी।
एनडीए के पास 427 सांसदों का समर्थन (लोकसभा 293, राज्यसभा 134) माना जा रहा है।विपक्षी इंडिया ब्लॉक के पास संयुक्त रूप से करीब 355 सांसद हैं।लगभग 133 सांसद ऐसे हैं जिन्हें अभी तक किसी खेमे का स्पष्ट समर्थन नहीं मिला है।
निर्विरोध चुनाव की संभावना कम यदि इंडिया ब्लॉक अपना उम्मीदवार नहीं उतारता है तो राधाकृष्णन निर्विरोध चुने जाएंगे। हालांकि, विपक्ष द्वारा उम्मीदवार उतारे जाने की संभावना अधिक है। ऐसे में यह मुकाबला सीधा एनडीए बनाम इंडिया ब्लॉक का होगा।
संभावित नतीजे संसदीय गणित को देखते हुए सी.पी. राधाकृष्णन की जीत लगभग तय मानी जा रही है। भाजपा और एनडीए के बहुमत के साथ-साथ अन्य दलों का भी समर्थन मिलने की संभावना जताई जा रही है।
देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। सदर कोतवाली क्षेत्र के जमुना सदन मोहल्ले में झाड़ियों के बीच एक नर कंकाल मिलने से सनसनी फैल गई। घटना की जानकारी मिलते ही स्थानीय लोग दहशत में आ गए और मौके पर भारी भीड़ जुट गई।
सूचना पाकर सदर कोतवाली पुलिस तुरंत मौके पर पहुंची। इसके साथ ही फॉरेंसिक टीम और डॉग स्क्वायड भी जांच में जुट गए हैं।
बताया जा रहा है कि मोहल्ले में दो एकड़ जमीन में फैली झाड़ियों के बीच यह कंकाल मिला। इसकी जानकारी स्थानीय सभासद ने पुलिस को दी थी। फिलहाल पुलिस मामले की गहन जांच कर रही है और कंकाल की पहचान कराने का प्रयास किया जा रहा है।
पटना (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)सोमवार को बड़ी संख्या में बिहार के STET अभ्यर्थी अपनी मांगों को लेकर सड़क पर उतर आए। अभ्यर्थियों का कहना है कि BPSC TRE-4 से पहले STET परीक्षा आयोजित की जाए।
प्रदर्शनकारियों की भीड़ जैसे ही डाकबंगला चौराहा की ओर बढ़ी, पुलिस ने उन्हें रोक दिया। लेकिन अभ्यर्थी जब डटे रहे तो पुलिस ने उन्हें तितर-बितर कर दिया। कुछ देर तक हल्का तनाव का माहौल बना रहा, हालांकि बाद में स्थिति पुलिस के नियंत्रण में आ गई।
डीएसपी लॉ एंड ऑर्डर कृष्ण मुरारी प्रसाद ने बताया कि पुलिस ने बल प्रयोग नहीं किया है। उन्होंने कहा कि अभ्यर्थियों के प्रतिनिधिमंडल से सरकार पहले भी मिल चुकी है, लेकिन वे अपनी मांग पर अड़े हुए हैं।
डीएसपी ने सलाह दी कि अगर अभ्यर्थियों को प्रदर्शन करना है तो इसके लिए निर्धारित स्थल गर्दनीबाग धरनास्थल है। डाकबंगला चौराहा जाम करने से आम लोगों को परेशानी होती है। उन्होंने कहा कि यह मार्ग राजधानी का मुख्य मार्ग है, जहां से बच्चों की स्कूल बसें और एयरपोर्ट जाने वाले यात्री भी गुजरते हैं। ऐसे में जाम करना स्वीकार्य नहीं है।
राजगीर (राष्ट्र की परम्परा डेस्क )घूमने आने वाले पर्यटक 19 अगस्त को रोपवे की सैर नहीं कर पाएंगे। 8 सीटर रोपवे इस दिन मेंटेनेंस कार्य के कारण बंद रहेगा। रोपवे प्रबंधन ने बताया कि सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए मरम्मत का काम किया जाएगा।
प्रबंधक दीपक कुमार ने जानकारी दी कि यदि मरम्मत कार्य समय पर पूरा हो जाता है तो 20 अगस्त से रोपवे को सामान्य समय पर फिर से शुरू कर दिया जाएगा। हालांकि, यदि तकनीकी कार्य अपेक्षा से अधिक समय लेता है तो संचालन की तिथि को आगे बढ़ाया जा सकता है।
गौरतलब है कि हर साल हजारों पर्यटक राजगीर आते हैं और रोपवे उनके लिए विश्व शांति स्तूप और गृद्धकूट पर्वत तक पहुंचने का सबसे आसान साधन है। गृद्धकूट पर्वत वही स्थान है जहां भगवान बुद्ध ने अपने उपदेश दिए थे। रोपवे के जरिए पर्यटक कुछ ही मिनटों में यहां पहुंच जाते हैं, जबकि पहले लंबी पैदल दूरी तय करनी पड़ती थी।
मधेपुरा (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) जिले के मुरलीगंज थाना क्षेत्र के बेलो गांव में सोमवार को नहर किनारे से एक किसान का शव बरामद किया गया। मृतक की पहचान खाड़ी वार्ड-14 निवासी जसवंत कुमार (45 वर्ष) के रूप में हुई है।
जानकारी के अनुसार, जसवंत कुमार की हत्या गला रेतकर की गई है। घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।
मृतक की मां ने पुलिस को दिए बयान में जसवंत की पत्नी पुनीता देवी और दामाद अमित कुमार पर हत्या का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि पुनीता अपने दामाद के नाम पर एक बीघा जमीन लिखवाना चाहती थी। इस मामले को लेकर पिछले एक साल से कोर्ट में केस चल रहा था। लेकिन मृतक जमीन देने के लिए तैयार नहीं था और हाल ही में उसने जमीन सूदभरना पर दे दी थी। इसी विवाद के कारण इस वारदात को अंजाम देने की बात कही जा रही है।
पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। गांव में इस घटना के बाद तनाव का माहौल बना हुआ है।
औरंगाबाद(राष्ट्र की परम्परा डेस्क)शहर के जय मां कॉलोनी मुहल्ले में सोमवार की सुबह एक हृदयविदारक घटना घटी। यहां 35 वर्षीय महिला रानी कुमारी, जो मूल रूप से पटना जिले के बद्दोपुर निवासी मंटू कुमार सिंह की पत्नी थीं, ने अपने किराए के कमरे में फांसी लगाकर जीवनलीला समाप्त कर ली।
जानकारी के अनुसार, मृतका का मायका रफीगंज प्रखंड के बलवंत बिगहा गांव में है। रानी कुमारी का पति दिल्ली की एक निजी कंपनी में नौकरी करता है, जबकि रानी अपने बेटे और बेटी को पढ़ाने के लिए औरंगाबाद शहर में किराए के कमरे में रह रही थी।
सोमवार सुबह वह रोज़ की तरह बच्चों को स्कूल छोड़कर लौटी। घर पहुंचते ही कमरे का दरवाजा बंद कर लिया और पंखे से दुपट्टा के सहारे फांसी लगा ली। जब काफी देर तक वह बाहर नहीं निकली, तो पड़ोसी ने खिड़की से झांका तो देखा कि रानी का शव पंखे से झूल रहा है। शोर मचने पर लोग इकट्ठा हुए और उसे नीचे उतारा। आनन-फानन में सदर अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
परिजनों का कहना है कि रानी और उसके पति मंटू कुमार सिंह के बीच उधार लिए गए पैसे को लेकर फोन पर विवाद हुआ था। विवाद के बाद ही उसने यह कदम उठाया। हालांकि, मृतका के मायकेवालों ने आशंका जताई है कि मामला आत्महत्या भी हो सकता है और हत्या भी। उनका कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही सच्चाई सामने आएगी।
पुलिस की जांच जारी
घटना की जानकारी मिलते ही नगर थाना की पुलिस सदर अस्पताल पहुंची और शव को कब्जे में ले लिया। नगर थानाध्यक्ष उपेंद्र कुमार सिंह ने बताया कि मामले की जांच की जा रही है। पोस्टमार्टम के बाद ही वास्तविक कारण स्पष्ट होगा।
इस घटना ने इलाके में शोक की लहर दौड़ा दी है। मासूम बच्चों की आंखों के सामने मां का यूं दुनिया छोड़ जाना सभी को गहरे आघात में डाल गया है।
औरंगाबाद। शहर के जय मां कॉलोनी मुहल्ले में सोमवार की सुबह एक हृदयविदारक घटना घटी। यहां 35 वर्षीय महिला रानी कुमारी, जो मूल रूप से पटना जिले के बद्दोपुर निवासी मंटू कुमार सिंह की पत्नी थीं, ने अपने किराए के कमरे में फांसी लगाकर जीवनलीला समाप्त कर ली।
जानकारी के अनुसार, मृतका का मायका रफीगंज प्रखंड के बलवंत बिगहा गांव में है। रानी कुमारी का पति दिल्ली की एक निजी कंपनी में नौकरी करता है, जबकि रानी अपने बेटे और बेटी को पढ़ाने के लिए औरंगाबाद शहर में किराए के कमरे में रह रही थी।
सोमवार सुबह वह रोज़ की तरह बच्चों को स्कूल छोड़कर लौटी। घर पहुंचते ही कमरे का दरवाजा बंद कर लिया और पंखे से दुपट्टा के सहारे फांसी लगा ली। जब काफी देर तक वह बाहर नहीं निकली, तो पड़ोसी ने खिड़की से झांका तो देखा कि रानी का शव पंखे से झूल रहा है। शोर मचने पर लोग इकट्ठा हुए और उसे नीचे उतारा। आनन-फानन में सदर अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
परिजनों का कहना है कि रानी और उसके पति मंटू कुमार सिंह के बीच उधार लिए गए पैसे को लेकर फोन पर विवाद हुआ था। विवाद के बाद ही उसने यह कदम उठाया। हालांकि, मृतका के मायकेवालों ने आशंका जताई है कि मामला आत्महत्या भी हो सकता है और हत्या भी। उनका कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही सच्चाई सामने आएगी।
घटना की जानकारी मिलते ही नगर थाना की पुलिस सदर अस्पताल पहुंची और शव को कब्जे में ले लिया। नगर थानाध्यक्ष उपेंद्र कुमार सिंह ने बताया कि मामले की जांच की जा रही है। पोस्टमार्टम के बाद ही वास्तविक कारण स्पष्ट होगा।
इस घटना ने इलाके में शोक की लहर दौड़ा दी है। मासूम बच्चों की आंखों के सामने मां का यूं दुनिया छोड़ जाना सभी को गहरे आघात में डाल गया है।
समस्तीपुर (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)जिले के विभूतिपुर थाना क्षेत्र के वार्ड संख्या-12 मे दर्दनाक हादसा हो गया। यहां बिजली विभाग की लापरवाही तीन जिंदगियों पर भारी पड़ गई। करंट की चपेट में आने से एक ही परिवार के तीन लोगों की मौत हो गई, जबकि छह महीने की मासूम गंभीर रूप से घायल हो गई।
कैसे हुआ हादसा जानकारी के अनुसार, नरहन वार्ड संख्या-12 निवासी 40 वर्षीय अरुण राम बिजली आपूर्ति ठप होने पर सर्विस वायर से लटक रही पेड़ की टहनी हटाने लगे। इसी दौरान वह करंट की चपेट में आ गए। उन्हें बचाने के लिए उनकी मां शांति देवी और 16 वर्षीय बेटा अजीत दौड़े, लेकिन दोनों भी करंट की चपेट में आकर झुलस गए। मौके पर ही तीनों की मौत हो गई।
इस हादसे में अरुण की छह महीने की बेटी, जो दादी की गोद में थी, गंभीर रूप से झुलस गई।
इलाज और प्रशासन की कार्रवाई स्थानीय लोगों की मदद से घायलों को विभूतिपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र लाया गया, जहां डॉक्टरों ने अरुण राम, उनकी मां और बेटे को मृत घोषित कर दिया। गंभीर रूप से घायल बच्ची को बेहतर इलाज के लिए समस्तीपुर सदर अस्पताल रेफर किया गया है।
घटना की सूचना मिलते ही पुलिस और प्रशासन मौके पर पहुंचे। विभूतिपुर थाना प्रभारी संजय कुमार झा ने बताया कि घटनास्थल की जांच की जा रही है। शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है।
बिजली विभाग की लापरवाही पर सवाल ग्रामीणों का कहना है कि सर्विस वायर लंबे समय से पेड़ की टहनियों से टकरा रहा था और बार-बार इसकी शिकायत की गई थी, लेकिन विभाग ने ध्यान नहीं दिया। लापरवाही का ही नतीजा है कि तीन लोगों की जिंदगी एक झटके में खत्म हो गई।स्थानीय लोगों ने बिजली विभाग के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है और कहा है कि अगर दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो आंदोलन किया जाएगा।