Wednesday, July 8, 2026
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“झारखंड की सबसे युवा मुखिया लापता: बोकारो के ललपनिया में दहशत और रहस्य, तीसरे दिन भी सुराग नदारद”

धनबाद (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) झारखंड के बोकारो ज़िले के ललपनिया क्षेत्र में उस समय सनसनी फैल गई जब पलिहारी गुरूडीह पंचायत की मुखिया सपना कुमारी, जो जिले की सबसे कम उम्र की महिला मुखिया मानी जाती हैं, रहस्यमय तरीके से तीन दिनों से लापता हो गईं।
उनके परिजन और ग्रामीण गहरी चिंता में हैं, जबकि पुलिस लगातार खोजबीन में जुटी है।

घर से निकलीं, फिर गायब — कोई सुराग नहीं

जानकारी के अनुसार, सपना कुमारी 2 अक्टूबर की दोपहर किसी कार्यक्रम में शामिल होने की बात कहकर घर से निकली थीं, लेकिन उसके बाद से उनका कोई अता-पता नहीं चला।
परिजनों ने जब संपर्क साधने की कोशिश की, तो पता चला कि उनका मोबाइल फोन घर पर ही पड़ा है, जिससे पुलिस की जांच भी मुश्किल हो गई है।

पति ने दर्ज कराई गुमशुदगी, अनहोनी की आशंका

मुखिया के पति ने 3 अक्टूबर को गोमिया थाना में लिखित आवेदन देकर उनकी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई है। उन्होंने आशंका जताई है कि सपना कुमारी के साथ कोई अनहोनी घटना घट सकती है।
थाना प्रभारी ने बताया कि मुखिया की तलाश के लिए पुलिस टीम गठित की गई है और आसपास के इलाकों में सघन जांच अभियान चलाया जा रहा है।

गाँव में फैली चर्चाएँ और चिंता

पलिहारी गुरूडीह पंचायत में इस घटना से हड़कंप मचा हुआ है। ग्रामीणों के बीच तरह-तरह की अटकलें और सोशल मीडिया चर्चाएँ तेज हैं। सपना कुमारी के पुराने रील्स और वीडियो क्लिप्स अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं, जिससे स्थिति और पेचीदा हो गई है।

2022 में बनी थीं सबसे युवा मुखिया

सपना कुमारी ने वर्ष 2022 के पंचायत चुनाव में शानदार जीत दर्ज कर बोकारो जिले की सबसे कम उम्र की मुखिया बनने का गौरव हासिल किया था।
उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान कई विकास कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाई और लोगों के बीच कर्मठ जनप्रतिनिधि के रूप में पहचान बनाई थी।

जांच जारी, परिवार बेहाल

पुलिस ने बताया कि अभी तक कोई ठोस सुराग हाथ नहीं लगा है।
परिवार के सदस्य रिश्तेदारों और परिचितों के घरों में खोजबीन कर चुके हैं लेकिन सपना का कोई पता नहीं चला।
गांव के लोग उनके सुरक्षित लौटने की दुआ कर रहे हैं।

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रफ्तार का कहर: आगरा-दिल्ली हाईवे पर दर्दनाक हादसा, कैंटर-ट्रक की टक्कर में चार की मौत, एक गंभीर


आगरा (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में शनिवार रात एक दर्दनाक सड़क हादसा हुआ।
रुनकता फ्लाईओवर के पास तेज रफ्तार कैंटर आगे चल रहे कंटेनर से टकरा गया, जिससे चार लोगों की मौके पर मौत हो गई, जबकि एक की हालत गंभीर बताई जा रही है।
हादसा देर रात करीब 12 बजे हुआ और टक्कर इतनी भीषण थी कि कैंटर के केबिन का कुछ हिस्सा हाईवे पर गिर गया।

तेज रफ्तार कैंटर कंटेनर से टकराया, चार की मौके पर मौत

पुलिस के मुताबिक, हादसे में कैंटर चालक, एक महिला, एक पुरुष और एक किशोर की मौके पर ही मौत हो गई।
केबिन से बाहर गिरने की वजह से एक युवक की जान बच गई।
उसे गंभीर हालत में भरतपुर अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
पुलिस जांच में यह बात सामने आई है कि चालक ने शराब पी रखी थी, जिसके चलते वाहन पर नियंत्रण नहीं रहा।

रुनकता फ्लाईओवर के पास हुआ हादसा

जानकारी के अनुसार, सिकंदरा से मथुरा की ओर जा रहा कैंटर फ्लाईओवर से उतरने के बाद आगे चल रहे कंटेनर में पीछे से जा टकराया।
कैंटर में बांस-बल्लियां भरी हुई थीं।
टक्कर इतनी जोरदार थी कि कैंटर का अगला हिस्सा पूरी तरह चकनाचूर हो गया और केबिन का हिस्सा टूटकर अलग गिर पड़ा।
हादसे के बाद कुछ समय के लिए हाईवे पर जाम लग गया, जिसे पुलिस ने हटवाया।

घायल की हालत गंभीर, अस्पताल में भर्ती

घायल युवक की पहचान उपेंद्र निवासी भरतपुर के रूप में हुई है, जो ग्वालियर से परीक्षा देकर गुरुग्राम लौट रहा था।
उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां उसका इलाज जारी है।
दुर्घटना में शामिल एक किशोर की सिर में बल्लियां लगने से मौत हो गई।

दो मृतकों की पहचान बाकी, पुलिस जांच जारी

एसीपी हरीपर्वत अक्षय संजय महाडिक ने बताया कि मृतकों में शामिल महिला और पुरुष मथुरा जा रहे थे, जबकि चालक और किशोर की अभी पहचान नहीं हो सकी है।
पुलिस ने कंटेनर को जब्त कर लिया है और कैंटर को चौकी में खड़ा किया गया है।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।

स्थानीय लोगों में दहशत, रफ्तार पर उठे सवाल

लगातार हो रहे सड़क हादसों ने आगरा-दिल्ली हाईवे की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
स्थानीय लोगों ने मांग की है कि फ्लाईओवर के नीचे स्पीड कंट्रोल जोन बनाया जाए और रात के समय पुलिस गश्त बढ़ाई जाए।

दार्जिलिंग में भारी बारिश से तबाही: भूस्खलन और पुल टूटने से सात लोगों की मौत, कई इलाकों में जनजीवन ठप


पश्चिम बंगाल (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। दार्जिलिंग और कालिम्पोंग जिलों में लगातार हो रही भारी बारिश ने तबाही मचा दी है। जिले के कई इलाकों में भूस्खलन (Landslide in Darjeeling) और पुल टूटने की घटनाओं में कम से कम सात लोगों की मौत हो गई है, जबकि कई लोगों के फंसे होने की आशंका जताई जा रही है।

भूस्खलन और पुल ढहने से बाधित हुआ यातायात

मिली जानकारी के अनुसार, मिरिक और सुखिया क्षेत्रों में भूस्खलन के चलते कई घरों को नुकसान पहुंचा है। वहीं, दुधिया में लोहे का पुल ढह जाने से सिलीगुड़ी–दार्जिलिंग एसएच-12 मार्ग पर यातायात पूरी तरह से ठप हो गया है।
बारिश के कारण सड़कें जलमग्न हैं और कई इलाकों का आपसी संपर्क टूट गया है।

राहत-बचाव कार्य जारी, मौसम बना बाधा

दार्जिलिंग के उप-निबंधक रिचर्ड लेप्चा ने बताया कि अब तक सात लोगों की मौत की पुष्टि हुई है।
हालांकि, लगातार बारिश से राहत और बचाव कार्यों में दिक्कतें आ रही हैं।
पुलिस, एनडीआरएफ, स्थानीय प्रशासन और स्वयंसेवक मिलकर राहत अभियान चला रहे हैं।
कई घरों और दुकानों को भी नुकसान पहुंचा है, जिससे लोगों को भारी आर्थिक क्षति झेलनी पड़ रही है।

भाजपा सांसद राजू बिस्ता ने जताया दुख

दार्जिलिंग से भाजपा सांसद राजू बिस्ता ने घटना पर गहरा शोक जताया है।
उन्होंने X (Twitter) पर लिखा —

“दार्जिलिंग और कालिम्पोंग जिलों के कई हिस्सों में भारी बारिश से हुए नुकसान के बारे में जानकर बेहद दुख हुआ है। कई लोगों की मौतें हुई हैं और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा है। मैं लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए हूं और अधिकारियों से संपर्क में हूं।”

लोगों की मदद के लिए जुटे कार्यकर्ता

राजू बिस्ता ने आगे कहा कि भाजपा कार्यकर्ताओं को राहत और बचाव कार्यों में लोगों की मदद के लिए निर्देश दिए गए हैं।
उन्होंने कहा —

“हम अपने लोगों की हरसंभव मदद करेंगे और अन्य राजनीतिक व सामाजिक संगठनों से भी अपील करते हैं कि वे जरूरतमंदों की सहायता के लिए आगे आएं।”

कालिम्पोंग में भी गंभीर हालात

कालिम्पोंग जिले में भी बारिश से स्थिति गंभीर बनी हुई है। कई ग्रामीण क्षेत्रों का संपर्क कट गया है और बिजली आपूर्ति भी बाधित है।
स्थानीय प्रशासन ने लोगों से सुरक्षित स्थानों पर जाने की अपील की है।

“रानी दुर्गावती : वीरता, स्वाभिमान और मातृभूमि की अमर गाथा”

लेखक : राजकुमार मणि

स्त्री शक्ति की अमर प्रतीक
भारतीय इतिहास वीरांगनाओं के त्याग, पराक्रम और स्वाभिमान से भरा पड़ा है। इनमें रानी दुर्गावती का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। 16वीं शताब्दी की इस गोंडवाना की रानी ने मुगल साम्राज्य के विस्तार को चुनौती दी और अपनी मातृभूमि की रक्षा में प्राणों की आहुति दी। वह केवल गोंडवाना की ही नहीं, सम्पूर्ण भारत की गौरवगाथा की प्रतीक हैं।
जन्म और प्रारंभिक जीवन (1524)
रानी दुर्गावती का जन्म वर्ष 1524 ई. में कालिंजर किले (वर्तमान बांदा, उत्तर प्रदेश) में चंदेल राजवंश में हुआ था। उनके पिता कीर्तिसिंह चंदेल बुंदेलखंड के शासक थे। दुर्गावती बचपन से ही अद्भुत प्रतिभा, सौंदर्य और पराक्रम की प्रतीक थीं। उन्हें घुड़सवारी, धनुर्विद्या, शस्त्र संचालन, राजनीति और युद्ध कौशल का विशेष प्रशिक्षण दिया गया था।
दुर्गावती की बुद्धिमत्ता और साहस देखकर ही कहा गया —

“जिस युग में दुर्गावती जैसी नारी हो, उस युग में मातृभूमि कभी गुलाम नहीं रह सकती।”
विवाह और गोंडवाना का स्वर्ण युग
दुर्गावती का विवाह 1542 ई. में गोंडवाना के राजा दलपत शाह गोंड से हुआ। यह विवाह चंदेल और गोंड राज्यों के बीच एकता का प्रतीक था। दलपत शाह के निधन के बाद रानी ने बालक वीर नारायण के नाम पर राज्य की बागडोर अपने हाथों में ली और गोंडवाना की रक्षक बन गईं।
उनके शासनकाल में राज्य ने संपन्नता, न्याय और लोककल्याण के क्षेत्र में असाधारण प्रगति की। उन्होंने अनेक तालाब, मंदिर और सड़कों का निर्माण कराया, जिससे गोंडवाना एक समृद्ध राज्य के रूप में उभरा। रानी प्रजा की सच्ची संरक्षिका थीं, जो “माँ दुर्गा” के समान अपने राज्य के हर नागरिक की रक्षा करती थीं।
मुगलों से संघर्ष : स्वाभिमान की ज्वाला
रानी दुर्गावती के शासनकाल में मुग़ल बादशाह अकबर का साम्राज्य उत्तर भारत में फैल रहा था। अकबर के अधीन सेनापति आसफ खाँ ने गोंडवाना पर अधिकार करने की योजना बनाई। उसने रानी को झुकने का प्रस्ताव भेजा, पर रानी ने दृढ़ स्वर में उत्तर दिया —
“जो अपने स्वाभिमान के लिए जीती है, वह कभी झुकती नहीं, या तो विजयी होती है या वीरगति प्राप्त करती है।”
1564 ई. में आसफ खाँ ने गोंडवाना पर आक्रमण किया। रानी ने अदम्य साहस के साथ सेना का नेतृत्व किया। नरई की घाटी (जबलपुर के पास) में भीषण युद्ध हुआ। रानी स्वयं हाथी पर सवार होकर रणभूमि में उतरीं। उन्होंने कई मुगल सैनिकों का संहार किया। परन्तु संख्या बल और शस्त्र बल में मुगल सेना भारी थी।
वीरगति : पराजय नहीं, अमरता की विजय
युद्ध में रानी गंभीर रूप से घायल हो गईं। उनके सैनिकों ने उन्हें रणभूमि से हटाने की प्रार्थना की, लेकिन रानी ने कहा —
“जिस भूमि की रक्षा का व्रत लिया है, उसे छोड़कर जीवित रहना अपमान है।”
जब उन्हें लगा कि शत्रु उन्हें बंदी बना सकता है, तब उन्होंने अंतिम समय में अपने ही खंजर से आत्मबलिदान दे दिया। यह घटना 24 जून 1564 ई. की है। उस दिन मातृभूमि ने अपनी एक अमर पुत्री को खोया, पर इतिहास ने एक अमर वीरांगना पा ली।
रानी दुर्गावती की शासन नीति और जनसेवा
रानी केवल युद्धनीति में ही नहीं, बल्कि प्रशासन और सामाजिक न्याय में भी आदर्श थीं।
उन्होंने कर-प्रणाली को सरल बनाया और किसानों पर भार कम किया।
सिंचाई के लिए अनेक तालाबों व नहरों का निर्माण कराया।
शिक्षा, धर्म और संस्कृति के संरक्षण के लिए विद्वानों व संतों का सम्मान किया।
महिला सुरक्षा और सम्मान को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।
उनके राज्य में प्रजा को न्याय न केवल मिलता था, बल्कि “अन्याय की आशंका भी नहीं होती थी।” यही कारण था कि गोंडवाना उनकी मृत्यु के बाद भी वर्षों तक उनकी स्मृति से प्रेरित रहा।
इतिहास में स्थान और स्मारक
रानी दुर्गावती की स्मृति में मध्य प्रदेश में “रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर” और “रानी दुर्गावती संग्रहालय” स्थापित हैं। उनके नाम पर रानी दुर्गावती राष्ट्रीय उद्यान (कान्हा क्षेत्र) और कई सड़कें, संस्थान व पुरस्कार भी रखे गए हैं।
उनका नाम भारतीय इतिहास की उन महान वीरांगनाओं में लिया जाता है, जिन्होंने अपने राज्य की स्वतंत्रता के लिए झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई से पहले बलिदान दिया था।
रानी दुर्गावती का संदेश : स्त्री शक्ति की ज्योति
रानी दुर्गावती केवल एक रानी नहीं थीं, बल्कि भारतीय नारी के स्वाभिमान, साहस और मातृत्व की सजीव प्रतिमा थीं।
उनका जीवन संदेश देता है —
“जो अपने धर्म, संस्कृति और भूमि के लिए खड़ी होती है, वही सच्ची नारी है, वही राष्ट्रमाता है।”
आज भी जब हम नारी सशक्तिकरण की बात करते हैं, तो रानी दुर्गावती का जीवन आदर्श बन जाता है। उनकी तलवार की गूंज आज भी कहती है —
“बलिदान ही स्वतंत्रता की पहली सीढ़ी है।”
समापन : इतिहास की अमर ज्योति
रानी दुर्गावती का जीवन भारतीय संस्कृति में वीरता और मातृभूमि-प्रेम का शाश्वत उदाहरण है। उन्होंने दिखाया कि एक नारी जब संकल्प लेती है, तो वह साम्राज्यों की दिशा बदल सकती है।
उनका बलिदान केवल गोंडवाना की कहानी नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारत की आत्मा की गाथा है।
रानी दुर्गावती आज भी हमारे हृदयों में जीवित हैं उनकी तलवार भले मौन है, पर उनका साहस युगों-युगों तक गूंजता रहेगा।

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मुजफ्फरपुर: निजी स्कूल में शिक्षक की पिटाई से आठ वर्षीय छात्र की मौत, पुलिस जांच में जुटी

मुजफ्फरपुर/बिहार (राष्ट्र की परम्परा)। मुजफ्फरपुर जिले में एक निजी स्कूल में पढ़ने वाले आठ वर्षीय छात्र प्रिंस कुमार की इलाज के दौरान मौत हो गई। मृतक छात्र चौथी कक्षा का विद्यार्थी था और उसे गंभीर चोटों के साथ श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज अस्पताल (SKMCH) में भर्ती कराया गया था। परिजनों का आरोप है कि बच्चे की मौत शिक्षक की पिटाई के कारण हुई है।

घटना का विवरण

पिता सुजीत कुमार ने बताया कि लगभग चार माह पहले उन्होंने अपने बेटे का एडमिशन अहियापुर थाना क्षेत्र के पुरानी जीरो माइल स्थित एक निजी स्कूल में कराया था। बीते 17 तारीख को उन्हें सूचना मिली कि उनका बेटा स्कूल में चोटिल हो गया है। जब वे स्कूल पहुंचे तो बच्चे के शरीर पर चोट के निशान थे। स्कूल प्रशासन ने बताया कि बच्चों के बीच झगड़ा हुआ था और प्राथमिक उपचार कर दिया गया था।

परिजन बच्चे को घर ले आए, लेकिन कुछ दिनों बाद उसकी तबीयत बिगड़ गई। इसके बाद प्रिंस को SKMCH में भर्ती कराया गया जहाँ इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।

परिजनों का आरोप और पुलिस जांच

सुजीत कुमार ने आरोप लगाया कि उनके बेटे की मौत स्कूल शिक्षक रवि कुमार की पिटाई के कारण हुई। उन्होंने कहा,

“स्कूल वाले अब हमसे मिल नहीं रहे हैं और पुलिस केस की बात करने पर कहते हैं कि दो महीने में सब शांत हो जाएगा, हमारी ऊंची पैरवी है।”

अहियापुर थाना पुलिस ने पुष्टि की है कि मामला गंभीर है और शव का पोस्टमार्टम कराया जा रहा है। परिजनों के बयान दर्ज किए जा रहे हैं और पूरे मामले की जांच चल रही है।

पुलिस कार्रवाई

अहियापुर थाना पुलिस ने बताया कि घटना की पूरी जांच की जा रही है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही मौत के कारण और आरोप तय किए जाएंगे।

“5 अक्टूबर 1864: कोलकाता का प्रलय — जब चक्रवात ने निगल लिए थे 50,000 से अधिक जीवन

एक त्रासदी जिसने इतिहास बदल दिया
भारत के पूर्वी तट पर बसे कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) का इतिहास कई प्राकृतिक आपदाओं का साक्षी रहा है, लेकिन 5 अक्टूबर 1864 का दिन उस इतिहास की सबसे भीषण और भयावह तारीखों में दर्ज है। इस दिन एक विनाशकारी चक्रवात ने बंगाल की खाड़ी से उठकर कोलकाता और उसके आसपास के क्षेत्रों को तबाह कर दिया था। इस प्रलयंकारी तूफान में 50,000 से अधिक लोग मारे गए, हजारों घर नष्ट हो गए और व्यापारिक रूप से संपन्न बंगाल की अर्थव्यवस्था को गहरा झटका लगा।
चक्रवात की उत्पत्ति : समुद्र से उठी विनाश की लहर
1864 का यह चक्रवात बंगाल की खाड़ी के मध्य भाग में बना था। यह तूफान धीरे-धीरे उत्तर-पश्चिम की दिशा में बढ़ता हुआ 5 अक्टूबर की सुबह कोलकाता और हुगली नदी के तटीय क्षेत्रों से टकराया। उस समय मौसम पूर्वानुमान या चेतावनी प्रणाली जैसी कोई वैज्ञानिक सुविधा उपलब्ध नहीं थी, जिससे लोग इसके प्रकोप से पूर्व चेतावनी नहीं पा सके।
जब यह चक्रवात तट से टकराया, तब हवाओं की रफ्तार 200 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक थी। समुद्र की लहरें 20 फीट ऊँची उठीं और उन्होंने हुगली नदी के किनारों पर बसे क्षेत्रों में भारी तबाही मचा दी।
कोलकाता शहर पर कहर : तबाही का मंजर
कोलकाता, जो उस समय ब्रिटिश भारत की राजधानी थी, ब्रिटिश शासन का सबसे महत्वपूर्ण बंदरगाह और व्यापारिक केंद्र था। परंतु उस दिन पूरा शहर जलमग्न हो गया।
हजारों मकान और झोपड़ियाँ धराशायी हो गईं।
हुगली नदी के घाटों पर सैकड़ों जहाज़ पलट गए।
कई ब्रिटिश जहाज़ बहकर समुद्र में गायब हो गए।
शहर की सड़कें शवों और मलबे से भर गई थीं।
कोलकाता पोर्ट के पास स्थित गोदामों में रखा हजारों टन अनाज और माल नष्ट हो गया।
इतिहासकारों के अनुसार, 50,000 से अधिक लोग मारे गए थे, जबकि हजारों घायल और लापता हो गए। यह चक्रवात न केवल जनहानि बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी एक बड़ा झटका था।
रेल और नौवहन तंत्र को भारी नुकसान
1864 के इस चक्रवात ने रेल मार्गों, पुलों और बंदरगाह सुविधाओं को पूरी तरह बर्बाद कर दिया। कोलकाता से चलने वाली रेल सेवाएँ हफ्तों तक बंद रहीं। हुगली नदी पर नौवहन ठप हो गया। शहर के भीतर संचार और आपूर्ति तंत्र पूरी तरह टूट गया था।
ब्रिटिश शासन की प्रतिक्रिया
ब्रिटिश सरकार के लिए यह एक बड़ी चुनौती थी। तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड एल्गिन ने राहत कार्य शुरू करवाए, परंतु सीमित संसाधनों और खराब संचार प्रणाली के कारण राहत देर से पहुँची। रिपोर्टों के अनुसार, शवों को जलाने या दफनाने में कई सप्ताह लग गए, जिससे महामारी फैलने का भी खतरा बढ़ गया था।
सामाजिक और आर्थिक प्रभाव
इस आपदा के बाद बंगाल के सामाजिक ढांचे पर गहरा असर पड़ा। हजारों परिवार बेघर हो गए, व्यापारिक गतिविधियाँ ठप हो गईं और कृषि क्षेत्र को भारी क्षति पहुँची। इस चक्रवात के बाद ब्रिटिश सरकार ने मौसम विज्ञान से संबंधित अध्ययन को प्राथमिकता दी और भारतीय मौसम विभाग (IMD) की स्थापना की दिशा में पहल शुरू की, जो आगे चलकर 1875 में अस्तित्व में आया।
चेतावनी जो आज भी प्रासंगिक है
5 अक्टूबर 1864 का कोलकाता चक्रवात यह दर्शाता है कि प्रकृति के सामने मानव कितना असहाय हो सकता है। यह त्रासदी केवल इतिहास की एक घटना नहीं, बल्कि एक चेतावनी भी है — कि हमें जलवायु परिवर्तन और आपदा प्रबंधन के प्रति गंभीर रहना होगा।
आज भारत के पास उन्नत मौसम पूर्वानुमान प्रणाली और आपदा नियंत्रण उपाय हैं, लेकिन 1864 की यह आपदा याद दिलाती है कि तैयारी और सतर्कता ही जीवन की सबसे बड़ी रक्षा कवच है।

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RRB NTPC UG 2025: 28 अक्टूबर से शुरू होगी भर्ती, 3050 पदों पर आवेदन

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नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। रेलवे भर्ती बोर्ड (RRB) ने एनटीपीसी अंडरग्रेजुएट भर्ती 2025 (CEN 07/2025) का नोटिफिकेशन जारी कर दिया है। इस भर्ती अभियान के तहत कुल 3050 पदों पर योग्य उम्मीदवारों से ऑनलाइन आवेदन आमंत्रित किए जाएंगे। आवेदन प्रक्रिया 28 अक्टूबर 2025 से शुरू होगी और 27 नवंबर 2025 तक चलेगी।

भर्ती का नोटिस और महत्वपूर्ण जानकारी

इस भर्ती का संक्षिप्त नोटिस अक्टूबर के पहले सप्ताह में रोजगार समाचार (Employment Newspaper) में प्रकाशित किया गया है। भर्ती रेलवे के विभिन्न जोनों में नॉन-टेक्निकल पॉपुलर कैटेगरी (NTPC) के अंतर्गत पदों को भरने के लिए आयोजित की जा रही है।

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किन पदों पर निकली भर्ती?

आरआरबी NTPC UG 2025 में निम्नलिखित प्रमुख पद शामिल हैं:

कमर्शियल कम टिकट क्लर्क (Commercial cum Ticket Clerk)

अकाउंट्स क्लर्क कम टाइपिस्ट (Accounts Clerk cum Typist)

जूनियर क्लर्क कम टाइपिस्ट (Junior Clerk cum Typist)

ट्रेंस क्लर्क (Trains Clerk)

ये पद लेवल 2 और लेवल 3 पे स्केल के अंतर्गत आते हैं, जो सातवें वेतन आयोग (7th CPC) के अनुसार निर्धारित हैं।

योग्यता और आयु सीमा

योग्यता: न्यूनतम 12वीं कक्षा उत्तीर्ण या समकक्ष।

आयु सीमा: 18 से 30 वर्ष (1 जनवरी 2026 तक की गणना)। आरक्षण नियमों के अनुसार एससी, एसटी, ओबीसी और अन्य श्रेणियों को आयु में छूट मिलेगी।

उम्मीदवारों को सलाह दी गई है कि आवेदन करते समय आधार कार्ड, शैक्षणिक प्रमाणपत्र, नाम और जन्म तिथि में कोई असंगति न हो ताकि दस्तावेज सत्यापन में परेशानी न आए।

चयन प्रक्रिया (Selection Process)

RRB NTPC UG 2025 की चयन प्रक्रिया कई चरणों में होगी:

  1. कंप्यूटर आधारित परीक्षा – CBT-I और CBT-II
  2. कंप्यूटर आधारित एप्टीट्यूड टेस्ट (CBAT) – कुछ पदों के लिए
  3. टाइपिंग स्किल टेस्ट (जहां लागू हो)
  4. दस्तावेज सत्यापन
  5. मेडिकल परीक्षा

आवेदन शुल्क (Application Fee)

सामान्य, ओबीसी, ईडब्ल्यूएस: ₹500

एससी, एसटी, पीडब्ल्यूडी, पूर्व सैनिक, महिला: ₹250

आवेदन प्रक्रिया

उम्मीदवार केवल http://rrbapply.gov.in के माध्यम से ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। आवेदन फॉर्म भरते समय सभी दस्तावेज अपलोड करने होंगे और सभी विवरण सावधानीपूर्वक जांच कर जमा करने होंगे।

महत्वपूर्ण तारीखें:

आवेदन प्रारंभ: 28 अक्टूबर 2025

आवेदन अंतिम तिथि: 27 नवंबर 2025

Shubman Gill बने भारत के नए वनडे कप्तान, 2027 विश्व कप पर नजर

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नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। भारतीय क्रिकेट में एक नया युग शुरू हो चुका है। बीसीसीआई ने रोहित शर्मा से वनडे कप्तानी की कमान लेकर शुभमन गिल को जिम्मेदारी सौंपी है। 25 वर्षीय गिल ने स्पष्ट कर दिया है कि उनका सबसे बड़ा लक्ष्य 2027 का वनडे विश्व कप है, जो दक्षिण अफ्रीका में खेला जाएगा।

गिल को मिली वनडे कप्तानी

बीसीसीआई ने शनिवार को ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ तीन मैचों की वनडे सीरीज के लिए 15 सदस्यीय टीम का ऐलान किया। इस स्क्वॉड में रोहित शर्मा और विराट कोहली जैसे दिग्गज खिलाड़ी शामिल हैं, लेकिन कप्तानी की कमान शुभमन गिल को सौंपी गई है। श्रेयस अय्यर को उपकप्तानी की जिम्मेदारी दी गई है।

चयन समिति के प्रमुख अजीत अगरकर ने कहा कि यह फैसला टीम के लंबे भविष्य को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। गिल पहले टेस्ट टीम के कप्तान रह चुके हैं और अब वनडे में टीम का नेतृत्व करेंगे।

शुभमन गिल का विजन: “2027 विश्व कप हमारा सबसे बड़ा लक्ष्य”

बीसीसीआई मीडिया से बातचीत में गिल ने कहा,

“भारत को वनडे में लीड करना मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान है। यह गर्व की बात है और मैं उम्मीद करता हूं कि इस जिम्मेदारी पर खरा उतर पाऊंगा। हमारा सबसे बड़ा लक्ष्य 2027 विश्व कप है और हम हर सीरीज को उसी दिशा में खेलेंगे।”

गिल ने यह भी जोड़ा कि विश्व कप से पहले भारत के पास लगभग 20 वनडे मैच हैं, जिनमें टीम पूरी तैयारी के साथ उतरेगी।

रोहित शर्मा और विराट कोहली के भविष्य पर सवाल

इस निर्णय से रोहित शर्मा और विराट कोहली के भविष्य को लेकर बहस छिड़ गई है। दोनों ही खिलाड़ी टीम में शामिल हैं, लेकिन कप्तानी नहीं संभालेंगे। रोहित शर्मा 2027 में 40 साल के होंगे और विराट कोहली की उम्र 38 होगी, इसलिए चयन समिति ने भविष्य के कप्तान के रूप में गिल को जिम्मेदारी दी है।

गिल वर्तमान में टेस्ट टीम के कप्तान हैं और टी20 में उपकप्तान, जो संकेत देता है कि वे भविष्य में तीनों प्रारूपों में कप्तानी कर सकते हैं।

गिल का संदेश

“हर खिलाड़ी पूरी मेहनत करेगा ताकि हम बेहतरीन तैयारी के साथ उतरें और खिताब जीत सकें।”

संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थायी सीट: समर्थन करने वाले और विरोध में खड़े देश कौन?

संयुक्त राष्ट्र महासभा में विश्व समुदाय ने सुरक्षा परिषद सुधार की दिशा में एक नए विमर्श को आगे बढ़ाया

गोंदिया – वैश्विक स्तर पर दुनियाँ में अनेकों डेवलपमेंट्स के बीच 29 सितंबर 2025 को समाप्त हुई संयुक्त राष्ट्र महासभा की एक महत्वपूर्ण वाद-विवाद सत्र में विश्व समुदाय ने सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) सुधार की दिशा में एक नए विमर्श को आगे बढ़ाया। इस सत्र में भारत की स्थायी सदस्यता और वीटो शक्ति (निरस्त्रीकरण शक्ति) देने का प्रस्ताव खासतौर पर चर्चा का केंद्र बना। कई देशों ने इस प्रस्ताव का जोरदार स्वागत किया, जबकि कुछ प्रमुख शक्तियों ने इसके विरोध में अपनी आपत्तियाँ प्रकट कीं। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपना दृष्टिकोण दृढ़ता से प्रस्तुत किया और यह स्पष्ट किया कि यदि यह प्रस्ताव स्वीकार किया जाए, तो यह न केवल भारत की प्रतिष्ठा को बढ़ाएगा,बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन और विकासशील देशों की आवाज़ को सशक्त करेगा। पिछले कई दशकों से यूएनएससी सुधार की माँग उठ रही है, विशेष रूप से नये स्थायी सदस्यों को शामिल करना, वीटो शक्ति का दायरा बदलना या सीमित करना,और निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता व जवाबदेही लाना।भारत इस सुधार आंदोलन का एक प्रमुख प्रस्तावक रहा है।भारत का तर्क रहा है कि एक बढ़ी हुई, अधिक प्रतिनिधि और न्यायसंगत परिषद ही आज की जटिल चुनौतियों (जैसे आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, महामारी, क्षेत्रीय संघर्ष) को अधिक प्रभावी रूप से संभाल सकती है हालाँकि, सुधार प्रक्रिया बेहद जटिल है क्योंकि चार्टर संशोधन की प्रक्रिया में न केवल महासभा बल्कि सभी पांच स्थायी सदस्यों की स्वीकृति आवश्यक होती है। इसके अतिरिक्त, कई देश नए स्थायी सदस्यों को वीटो शक्ति देने पर संकोच करते हैं, उन्हें डर रहता है कि इससे उनकी मौलिक प्रभावशीलता अथवा वैश्विक शक्ति संतुलन प्रभावित होगा। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र ऐसा मानता हूं कि इस पृष्ठभूमि में, 2025 की यूएनएससी जनरल असेंबली सत्र में भारत की स्थायी सदस्यता और वीटो शक्ति को शामिल करने की चर्चा एक ऐतिहासिक एवं निर्णायक प्रस्ताव बनकर सामने आई।बता दें कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) की संरचना और उसके अभ्यस्त कार्यप्रणाली की जड़ें 1945 की यूएन चार्टर में हैं। आज यूएनएससी में पाँच (पी5) स्थायी सदस्य,चीन, फ्रांस, रूस, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका वीटो शक्ति रखते हैं, जबकि दस अन्य सदस्य गैर-स्थायी होते हैं, जिनका कार्यकाल दो वर्ष का होता है और वे वीटो शक्ति नहीं रखते। इस व्यवस्था ने दशकों तक वैश्विक शांति और सुरक्षा में भूमिका निभाई, लेकिन समय के साथ इसके प्रति आलोचनाएँ भी बढ़ीं- विशेष रूप से यह तर्क कि यह संरचना 1945 के विश्व व्यवस्था को निरंतर बनाए रखती है और आधुनिक शक्ति संतुलन, लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व एवं वैश्विक बहुसंख्यकता को प्रतिबिंबित नहीं करती।
साथियों बात अगर हम भारत को वीटो पावर मिलने के पक्ष और विपक्ष में उठी आवाजों की करें तो समर्थन की आवाजें-(1) उभरते विश्व अर्थशक्तियों का प्रतिनिधित्व:-आज की दुनियाँ विभिन्न महाशक्तियों,आर्थिक शक्ति केन्द्रों और क्षेत्रीय समूहों (जैसे ब्रिक्स,जी20) द्वारा संचालित है। इन समूहों में भारत एक महत्त्वपूर्ण शक्ति बन चुका है। कई देशों ने स्वीकार किया है कि यूएएससी का ढांचा 1945 की स्थिति पर आधारित बनावट को प्रतिबिंबित करता है और उसमें परिवर्तन आवश्यक है। उदाहरणतः,भूटान के प्रधानमंत्री ने स्पष्ट रूप से भारत और जापान को स्थायी सदस्यता का “योग्य राष्ट्र” घोषित करते हुए उनकी वकालत की। (2) ब्रिक्स एवं साझी घोषणाएँ:-ब्रिक्स देशों (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) ने संयुक्त रूप से प्रस्ताव रखा है कि यूएनएससी को व्यापक, अधिक प्रतिनिधि और समावेशी बनाना आवश्यक है। वे भारत एवं ब्राज़ील को स्थायी सदस्यता दिलाने की अपील करते हैं। रूस,जो स्वयं एक पी5 सदस्य है,ने भी सार्वजनिक रूप से 2025 सत्र में भारत को स्थायी सदस्यता के हकदार बताया। (3)कार्यक्षमता एवं जवाबदेही में सुधार:-नए सदस्यों के शामिल होने से परिषद की निर्णय क्षमता और वैधता बढ़ सकती है। साथ ही, कई प्रस्तावों में यह भी कहा गया कि नए सदस्यों को प्रारंभ में वीटो शक्ति “स्थगित” (फ्रीज) कर दी जाए-जैसे जापान की जी 4 प्रस्तावना कि नए सदस्यों के वीटो अधिकारों को 15 वर्षों के लिए स्थगित रखा जाए।(4) वैश्विक दक्षिण की आवाज़ को सशक्त करना:-विकसित देशों और पश्चिमी शक्तियों के दबदबे को तोड़ने की दिशा में यह कदम एक प्रतीक हो सकता है कि विकासशील देशों की सुरक्षा, न्याय और भागीदारी की मांग गंभीरता से ली जा रही है। विरोध एवं संदेह-(1)स्थायी सदस्यों की अनिच्छा और शक्ति संतुलन का डर:-वर्तमान पी5 सदस्यों में से कुछ,विशेष रूप से चीन-वे बदलाव स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं जो उनकी शक्ति को प्रभावित कर सकें।चीन ने भारत की यूएनएससी स्थायी सदस्यता कासमर्थन नहीं किया है।यह विरोध रणनीतिक और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा के कारण भी है।(2)वीटो शक्तिदेने संबंधी संवेदनशीलता :- यदि नए स्थायी सदस्यों को वीटो शक्ति दी जाए, तो प्रश्न उठते हैं: क्या उन्हें ऐसी शक्ति देना उचित है यदि वे पहले निर्दलीय या विकासशील देश रहे हों? और यह शक्ति दुरुपयोग का खतरा भी रखती है। इस कारण कई देशों ने यह प्रस्ताव कि नए सदस्यों को तत्काल वीटो शक्ति न मिले, या सीमित अधिकार हो, को स्वीकार किया। लेकिन भारत ने यह स्पष्ट किया कि यदि सदस्यता दी जाए तो वीटो शक्ति अनिवार्य हो। (3)संशोधन प्रक्रिया की जटिलता:- यूएनएससी सुधार करने के लिए यूएन चार्टर के अनुसार संशोधन करना होगा। यह प्रक्रिया दो चरणों में होती है: (1) महासभा में दो तिहाई अनुपालन(अप्प्रोक्स 128 सदस्य) से प्रस्ताव पारित करना,और (2) प्रत्येक सदस्य देश (उन देशों की राष्ट्रीय स्वीकृति प्रक्रिया) द्वारा अनुमोदन जिसमें सभी पाँच स्थायी सदस्यों का स्वीकृति देना अनिवार्य है। यदि कोई स्थायी सदस्य इस प्रस्ताव को स्वीकृत न करे, तो entire सुधार प्रक्रिया विफल हो सकती है। (4)पार्टियल समाधान का विरोध:-कुछ प्रस्ताव केवल नए सदस्यों को स्थायी सदस्यता देना चाहते हैं, पर वीटो शक्ति न देना या अस्थायी वीटो देना। भारत इस तरह के “पार्टियल” या “मध्यवर्ती” समाधान को स्वीकार नहीं करता। भारत की स्पष्ट नीति रही है कि स्थायी सदस्यता के साथ वीटो शक्ति होना चाहिए।(5) भेदभाव एवं नए चयन मानदंडों पर बहस:-सुधार प्रस्तावों में कभी-कभी धर्म, जाति, जीडीपी, सैन्य शक्ति आदि जैसे पैरामीटर प्रस्तावित होते हैं।भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि यूएनएससी प्रतिनिधित्व में धर्म या धार्मिक आधार आधारित मानदंडों को स्वीकार नहीं किया जाएगा; प्रतिनिधित्व क्षेत्रीय आधार पर होना चाहिए।
साथियों बात अगर हम भारत का दृढ़ दृष्टिकोण और रणनीति की करें तो,भारत ने इस प्रस्ताव को केवल एक महत्वाकांक्षी राजनीतिक प्रस्ताव नहीं, बल्कि एक न्यायोचित, तर्कसंगत और वैध माँग के रूप में पेश किया। निम्नलिखित बिंदु उसके दृष्टिकोण और रणनीति को स्पष्ट करते हैं: (1)योग्यता एवं स्वाभाविक दावेदारी:-भारत का तर्क है कि उसने आर्थिक, वैज्ञानिक सैन्य, राजनयिक और जनसंख्या स्तर पर वह शक्ति और प्रभाव अर्जित किया है जो उसे स्थायी सदस्यता का हकदार बनाती है। इसके अलावा, भारत लगातार संयुक्त राष्ट्र की कार्रवाइयों में सक्रिय भूमिका निभाता रहा है। (2)वीटो पहल प्रस्ताव: भारत ने 2022 में “वीटो पहल” (वीटो इनिशिटिव) का प्रस्ताव रखा, जिसमें यह सुझाव दिया गया कि यदि कोई स्थायी सदस्य वीटो शक्ति का उपयोग करता है, तो उसे महासभा में आकर स्पष्ट रूप से कारण बताना आवश्यक हो। यह पहल सुरक्षा परिषद को अधिक जवाबदेह बनाना चाहती है। (3) संविधान संशोधन की बाधाओं को समझने की रणनीति:-भारत यह अच्छी तरह जानता है कि सुधार प्रक्रिया में स्थायी सदस्यों की सहमति अनिवार्य हैइसलिए वह सहमत प्रयास, गठबंधन और कूटनीतिक दबाव की रणनीति पर निर्भर है। उसे यह समझ है कि चीन या अन्य बड़े सदस्य विरोध कर सकते हैं।(4)बहुबाहु साझेदारी एवं समर्थन जुटाने का कदम:-भारत ने अनेक देशों के साथ द्विपक्षीय और बहुपक्षीय संवाद बढ़ाए हैं। उदाहरणतः भूटान ने समर्थन दिया। रूस ने सार्वजनिक भाषण में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन किया।भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि अधिक से अधिक देश इस प्रस्ताव का समर्थन करें और इसे व्यापक वैश्विक बहुमत मिले।
साथियों बात अगर हम चुनौतियाँ एवं निहिताएँ को समझने की करें तो (1) स्थायी सदस्यों काविरोध: यदि कोई पी5 सदस्य (जैसेचीन) इस प्रस्ताव का विरोध करे और वह सुधार प्रस्ताव को राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत न करे, तो सुधार प्रक्रिया ठप हो सकती है।(2)भविष्य की शक्ति संरचना बदलने का भय:-कुछ देशों को डर है कि यदि कई देशों को वीटो शक्ति दी जाए, तो निर्णय प्रक्रिया अधिक जटकशील हो सकती है,अर्थात् निर्णय लेने में समय बढ़ सकता है।(3)नवस्थापित सदस्यों की जवाबदेही व विश्वास:-यदि नए सदस्यों को वीटो शक्ति दी जाए, तब उनसे उम्मीद की जाएगी कि वे इसे विवेकपूर्ण एवं अंतरराष्ट्रीय हितों की दिशा में उपयोग करें। यदि यह शक्ति दुरुपयोग में चली जाए, तो परिषद की साख पर प्रश्न खड़ा होगा।(4)समयनिष्ठता बनाए रखना:-प्रस्तावना के अनुसार सुधार जल्द करना आवश्यक है, किंतु समय की कसौटी यह है कि महासभा और राष्ट्रीय अनुमोदन प्रक्रिया समय ले सकती है। इस बीच विश्व में संघर्ष, युद्ध या अन्य आपात स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं (5) भागीदारी की असमानता और मानदंड विवाद:-यदि नए सदस्यों को चुने जाने का मानदंड स्पष्ट न हो, तो विवाद उत्पन्न हो सकते हैं -किन देशों को स्थायी सदस्यता मिले, किन देशों को न मिले,और यह वैश्विक ध्रुवीकरण को जन्म दे सकता है।
अतःअगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि, संयुक्त राष्ट्र महासभा की 29 सितंबर 2025 तक की सभा ने वास्तव में एक ऐतिहासिक प्रस्ताव को,भारत को संयुक्त राष्ट्र रक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाना और वीटो शक्ति देना वैश्विक स्तर पर चर्चा योग बनाए रखा। इस प्रस्ताव ने उजागर किया कि विश्व व्यवस्था बदल रही है और वैश्विक समुदाय अब पुराने ढाँचे से आगे बढ़ने की मांग कर रहा है।भारत ने इस प्रस्ताव को न केवल एक व्यक्तिगत आकांक्षा के रूप में उठाया है, बल्कि एक व्यापक दृष्टि के साथ, वह यह दिखाना चाहता है कि वैश्वीकरण, विकेंद्रीकरण और बहुध्रुवीय शक्ति संरचनाएं अब समय की माँग हैं।

-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

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नवजोत सिंह सिद्धू बोले – ‘मेरे बाबा की आंखों में आंसू आ गए थे’, इंडियाज गॉट टैलेंट पर याद किया संघर्ष का दौर

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। क्रिकेटर से नेता और अब टीवी पर्सनालिटी बन चुके नवजोत सिंह सिद्धू इन दिनों सोनी टीवी के रियलिटी शो ‘इंडियाज गॉट टैलेंट’ (India’s Got Talent) में बतौर जज नजर आ रहे हैं। शो के बारे में बात करते हुए उन्होंने न सिर्फ इसके मकसद की तारीफ की, बल्कि अपने शुरुआती संघर्षों को भी याद किया, जिसने उन्हें “स्ट्रोकलेस वंडर” से “स्ट्रोक्स थंडर” बनने तक का सफर तय करवाया।

इंडियाज गॉट टैलेंट को बताया “टैलेंट का खजाना”

उन्होंने आगे कहा कि,

“असम का ग्रुप भूपेन हजारिका की याद दिलाता है, राजस्थान का एक मदारी पारंपरिक कला लेकर आया, और एक छोटी बच्ची ने योग का असली अर्थ सिखाया। यही इस शो की खूबसूरती है।”

संघर्ष का दौर: “चार साल तक रंगीन कपड़े नहीं पहने”

अपने क्रिकेट करियर की शुरुआत पर बोलते हुए सिद्धू ने कहा,

“मुझे ‘स्ट्रोकलेस वंडर’ कहकर दफना दिया गया था। मेरे बाबा की आंखों में आंसू आ गए थे। उनका सपना था कि मैं इंडिया के लिए खेलूं, लेकिन मुझे टीम से निकाल दिया गया।”

उन्होंने बताया कि टीम से बाहर होने के बाद उन्होंने खुद से वादा किया कि अब हार नहीं मानेंगे।

“चार साल तक मैंने रंगीन कपड़े नहीं पहने। अखबार में छपे उस आर्टिकल को मैं अपने बिस्तर के पास चिपकाकर सोता था। रोज सुबह 3 बजे उठता, सवा सौ छक्के मारता और तब तक प्रैक्टिस करता जब तक हाथों से खून न निकल आए।”

“स्ट्रोकलेस वंडर से स्ट्रोक्स थंडर” बनने की कहानी

सिद्धू ने कहा,

“चार साल की मेहनत के बाद वर्ल्ड कप टीम में जगह मिली। पहले दो मैचों में मैंने खूब छक्के लगाए। रवि शास्त्री ने अखबार दिखाकर कहा – ‘यही वो अखबार है जिसने लिखा था कि सिद्धू खत्म हो चुका है।’ उसी दिन अखबार के पहले पेज पर लिखा था – ‘नवजोत सिंह सिद्धू : स्ट्रोकलेस वंडर से स्ट्रोक्स थंडर तक’।”

सिद्धू ने कहा कि उनकी कहानी इस बात का सबूत है कि “इंसान अपना मुकद्दर खुद बनाता है।”

मलाइका अरोड़ा को बताया शो की “जान”

‘इंडियाज गॉट टैलेंट’ में अपने साथी जजों के बारे में बोलते हुए सिद्धू ने कहा,

“हर जज से मैंने कुछ सीखा है। मलाइका शो की सूत्रधार हैं – असल में शो की जान हैं। उनका अनुशासन और गरिमा से भरा अंदाज देखने लायक है। वहीं, शान से मैंने सीखा कि गुस्सा जरूरी नहीं होता। उसका मुस्कुराता चेहरा बहुत सुकून देता है।”

आईजीटी बनाम कपिल शर्मा शो: “यहां असली पर्सनालिटी दिखाने का मौका”

सिद्धू ने कहा,

“इंडियाज गॉट टैलेंट में मुझे मेरी असली पर्सनालिटी दिखाने का मौका मिलता है। यह शो सिर्फ हंसी-मजाक नहीं, बल्कि गंभीरता और इनोवेशन भी लेकर आता है। आप नहीं जानते कि अगला परफॉर्मेंस आपको कितना चौंका देगा – यही इसकी खूबसूरती है।”

उन्होंने आगे कहा कि,

“कपिल शर्मा को मैंने उनके शुरुआती सीजन में डिस्कवर किया था। कपिल की जर्नी संघर्ष और बेहतर करने का प्रतीक है। उनके शो में एडिटिंग के कारण सिर्फ हंसी का हिस्सा दिखता था, लेकिन आईजीटी में हर भावना – हंसी, गंभीरता और इंस्पिरेशन – सब कुछ दिखाने का अवसर मिलता है।”

नवजोत सिंह सिद्धू का यह इंटरव्यू न सिर्फ उनके संघर्ष और प्रेरणा की कहानी बताता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि वे आज भी मेहनत, आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच को सफलता की असली चाबी मानते हैं।

इतिहास के आईने में “लॉर्ड कार्नवालिस

“लॉर्ड कार्नवालिस : भारत में ब्रिटिश शासन के स्तंभ, जिनकी नीतियों ने साम्राज्य को दी नई दिशा”
भारत में ब्रिटिश शासन के निर्णायक दौर का अंत

1805 ईस्वी का वर्ष ब्रिटिश भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ लेकर आया। इसी वर्ष 5 अक्टूबर को भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल और कमांडर-इन-चीफ लॉर्ड चार्ल्स कार्नवालिस (Lord Charles Cornwallis) का गाज़ीपुर (उत्तर प्रदेश) में निधन हो गया। वह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के उन प्रशासनिक अधिकारियों में से थे जिन्होंने भारत में औपनिवेशिक शासन की नींव को संगठित, व्यवस्थित और सुदृढ़ किया।
उनका कार्यकाल न केवल प्रशासनिक सुधारों के लिए जाना जाता है बल्कि भारतीय जमींदारी व्यवस्था, न्यायिक प्रणाली और राजस्व नीति की दिशा भी उसी ने तय की, जिसके परिणाम आज तक भारतीय समाज पर देखे जा सकते हैं।
प्रारंभिक जीवन और सैन्य करियर
लॉर्ड कार्नवालिस का जन्म 31 दिसंबर 1738 को इंग्लैंड में एक कुलीन परिवार में हुआ था। वे एक कुशल सैनिक और रणनीतिकार के रूप में जाने जाते थे। उन्होंने ईटन कॉलेज और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। युवावस्था में उन्होंने ब्रिटिश सेना में प्रवेश किया और शीघ्र ही अपनी योग्यता से उच्च पदों तक पहुंचे।
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम (American War of Independence) में कार्नवालिस ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, परंतु 1781 में यॉर्कटाउन (Yorktown) की प्रसिद्ध लड़ाई में उन्हें अमेरिकी और फ्रांसीसी सेनाओं के हाथों पराजय का सामना करना पड़ा। इस हार के बावजूद, उन्हें ब्रिटिश प्रशासन में एक कुशल प्रशासक और संगठनकर्ता के रूप में सम्मान प्राप्त रहा।
भारत में आगमन और पहला कार्यकाल (1786–1793)
भारत में लॉर्ड कार्नवालिस का पहला कार्यकाल 1786 में प्रारंभ हुआ जब उन्हें गवर्नर जनरल और कमांडर-इन-चीफ नियुक्त किया गया। इस समय भारत में ब्रिटिश शासन को कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था — प्रशासनिक भ्रष्टाचार, राजस्व अव्यवस्था, और स्थानीय विद्रोहों की बढ़ती संख्या।
कार्नवालिस ने इन सभी समस्याओं के समाधान के लिए व्यापक सुधार आरंभ किए।

  1. प्रशासनिक सुधार
    उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों में फैले भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कठोर नियम लागू किए।
    उच्च पदों पर ब्रिटिश मूल के अधिकारियों की नियुक्ति सुनिश्चित की गई।
    भारतीय कर्मचारियों के वेतन में कटौती की गई ताकि सत्ता के महत्वपूर्ण निर्णय अंग्रेजों के हाथ में बने रहें।
    यह नीति बाद में “रacial bias in administration” का प्रतीक बन गई।
  2. न्यायिक सुधार (Cornwallis Code, 1793)
    1793 में उन्होंने “कार्नवालिस कोड” (Cornwallis Code) लागू किया।
    इस कोड के तीन मुख्य स्तंभ थे:
    न्यायिक सुधार: दीवानी और फौजदारी न्यायालयों की स्थापना।
    प्रशासनिक सुधार: अधिकारियों के अधिकारों का स्पष्ट विभाजन।
    राजस्व सुधार: स्थायी बंदोबस्त की नीति (Permanent Settlement)।
  3. स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement, 1793)
    यह उनकी सबसे चर्चित नीति थी, जो बंगाल, बिहार और उड़ीसा में लागू की गई।
    इसके अंतर्गत:
    जमींदारों को भूमि का मालिक माना गया।
    उनसे निश्चित राजस्व की वसूली तय की गई, जो स्थायी रूप से एक दर पर स्थिर थी।
    इसका उद्देश्य ब्रिटिश राजस्व को स्थायित्व देना था, परंतु परिणामस्वरूप किसानों का शोषण बढ़ गया।
    दूसरा कार्यकाल (1805): अंतिम अभियान और निधन
    1805 में, लॉर्ड कार्नवालिस को पुनः भारत भेजा गया। उस समय ब्रिटिश साम्राज्य और मराठों के बीच तनाव चल रहा था। लॉर्ड वेलेजली के आक्रामक विस्तारवादी नीतियों से कंपनी की छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा था।
    कार्नवालिस को भारत भेजे जाने का मुख्य उद्देश्य था — मराठों के साथ युद्ध को समाप्त कर शांति स्थापित करना।
    भारत पहुंचने के कुछ ही दिनों बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर की ओर यात्रा की, जहां उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया।
    5 अक्टूबर 1805 को गाज़ीपुर में उनका निधन हो गया। ब्रिटिश शासन ने उनके योगदान की स्मृति में गाज़ीपुर में उनका भव्य समाधि स्थल (Cornwallis Tomb) बनवाया, जो आज भी औपनिवेशिक इतिहास की गवाही देता है।
    कार्नवालिस की नीतियों का भारत पर प्रभाव
  4. प्रशासनिक प्रभाव
    उन्होंने भारत में आधुनिक नौकरशाही की नींव रखी। उनके द्वारा शुरू की गई “सिविल सर्विस” प्रणाली आगे चलकर भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के रूप में विकसित हुई।
  5. न्यायिक प्रभाव
    “कार्नवालिस कोड” ने न्यायिक व्यवस्था को दो स्तरों में बाँटा — दीवानी और फौजदारी अदालतें। यह व्यवस्था ब्रिटिश काल में लंबे समय तक लागू रही और स्वतंत्र भारत की न्यायिक संरचना पर भी इसका प्रभाव पड़ा।
  6. आर्थिक प्रभाव
    स्थायी बंदोबस्त ने राजस्व संग्रह में स्थायित्व तो दिया, लेकिन किसानों को जमींदारों के अधीन कर दिया। इससे ग्रामीण गरीबी और असमानता बढ़ी, जो औपनिवेशिक भारत की स्थायी समस्या बन गई।
  7. सामाजिक प्रभाव
    कार्नवालिस ने भारतीयों को उच्च प्रशासनिक पदों से वंचित कर दिया, जिससे अंग्रेज़ और भारतीय समाज के बीच दूरी बढ़ी। इस भेदभावपूर्ण नीति ने भविष्य में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के बीज बो दिए।
    लॉर्ड कार्नवालिस का ऐतिहासिक मूल्यांकन
    इतिहासकारों के बीच कार्नवालिस की भूमिका को लेकर भिन्न मत हैं।
    कुछ इतिहासकार उन्हें “भारत में प्रशासनिक सुधारों का जनक” मानते हैं, जबकि कुछ के अनुसार उन्होंने भारतीय समाज में “विभाजन और अन्याय की नींव” रखी।
    उनकी नीतियाँ ब्रिटिश साम्राज्य के हित में थीं, परंतु उन्होंने भारत को एक संगठित प्रशासनिक ढांचे से परिचित करवाया — जो बाद में स्वतंत्र भारत की शासन प्रणाली का आधार बना।
    गाज़ीपुर में समाधि — औपनिवेशिक इतिहास का प्रतीक गाज़ीपुर में स्थित लॉर्ड कार्नवालिस की समाधि भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक काल की दुर्लभ धरोहरों में से एक है।

यह एक संगमरमर से निर्मित स्मारक है, जिसकी वास्तुकला यूरोपीय और मुगल शैली का मिश्रण प्रस्तुत करती है।आज भी यह स्थान भारत में ब्रिटिश उपस्थिति की ऐतिहासिक याद दिलाता है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) द्वारा इस स्थल को संरक्षित किया गया है।
इतिहास के आईने में कार्नवालिस
लॉर्ड कार्नवालिस का जीवन भारत के औपनिवेशिक इतिहास का ऐसा अध्याय है जिसमें शासन, सुधार, और साम्राज्य विस्तार की नीति एक साथ चलती दिखती है।
उन्होंने भारत में एक स्थायी प्रशासनिक ढांचा खड़ा किया, लेकिन उसी के साथ सामाजिक विषमता और आर्थिक असमानता की जड़ें भी बोईं।
गाज़ीपुर में उनका निधन केवल एक व्यक्ति का अंत नहीं था, बल्कि ब्रिटिश भारत के प्रारंभिक प्रशासनिक युग का समापन था।
उनकी नीतियाँ आने वाले सौ वर्षों तक ब्रिटिश शासन की दिशा तय करती रहीं — और इतिहास में उनका नाम “सुधारक भी, साम्राज्यवादी भी” के रूप में दर्ज हुआ।

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अंतराष्ट्रीय ज्ञान की रोशनी का पर्व शिक्षक दिवस

हर देश की अपनी तिथि, पर माता-पिता समान आदर

शिक्षक वे व्यक्ति जो केवल ज्ञान नहीं देते, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाते हैं। मानव सभ्यता में शिक्षक का स्थान सदैव सर्वोच्च माना गया है। “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः” — यह मंत्र हमें बताता है कि शिक्षक केवल शिक्षणकर्ता नहीं, बल्कि सृष्टि का सार समझाने वाले पथप्रदर्शक हैं। इसी सम्मान को अभिव्यक्त करने हेतु विश्वभर में “शिक्षक दिवस” (Teachers’ Day) मनाया जाता है।
परंतु क्या आप जानते हैं कि हर देश में शिक्षक दिवस की तिथि अलग होती है? आइए, समझते हैं क्यों और कैसे यह परंपरा वैश्विक रूप में विकसित हुई।
शिक्षक: समाज की आत्मा और विकास का आधार शिक्षक समाज के निर्माण की सबसे मजबूत नींव हैं। वे केवल पुस्तक का ज्ञान नहीं देते, बल्कि बच्चों के भीतर विचार, अनुशासन, संवेदना और नैतिकता का बीज बोते हैं।
आज जब डिजिटल शिक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और तकनीकी क्रांति तेज़ी से बदल रही है, तब भी शिक्षक की भूमिका अपरिवर्तनीय है — क्योंकि केवल शिक्षक ही मानवीय संवेदना और सोच को दिशा दे सकते हैं।
इसी योगदान को सम्मान देने के लिए दुनिया के लगभग हर देश में किसी-न-किसी रूप में शिक्षक दिवस मनाया जाता है।
अन्तरराष्ट्रीय शिक्षक दिवस — 5 अक्टूबर की ऐतिहासिक भूमिका
हर वर्ष 5 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय शिक्षक दिवस (World Teachers’ Day) मनाया जाता है।
यह परंपरा UNESCO द्वारा 1994 में शुरू की गई थी।
इस दिन को चुने जाने के पीछे एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कारण है —
5 अक्टूबर 1966 को UNESCO और ILO (International Labour Organization) ने एक सम्मेलन में “Recommendation concerning the Status of Teachers” को अपनाया था।
यह दस्तावेज़ शिक्षकों के अधिकारों, कर्तव्यों, प्रशिक्षण, कार्य स्थिति और सामाजिक सम्मान से संबंधित था।
इस दिवस का उद्देश्य है:

शिक्षकों के योगदान को वैश्विक स्तर पर पहचान देना।
शिक्षा की गुणवत्ता में उनकी भूमिका को स्वीकार करना।
सरकारों और समाज को शिक्षकों के हित में नीतियाँ बनाने के लिए प्रेरित करना।
UNESCO हर वर्ष इस दिन की एक थीम (Theme) घोषित करता है।
उदाहरण के लिए —2024 की थीम थी: “Valuing teachers’ voices: Towards a new social contract for education”
(अर्थात्: “शिक्षकों की आवाज़ का मूल्य — शिक्षा के लिए नया सामाजिक अनुबंध।”)
यह दिन केवल समारोह नहीं, बल्कि विश्वभर के शिक्षकों को सम्मान और प्रेरणा देने का प्रतीक है।
भारत में शिक्षक दिवस — 5 सितंबर की अनूठी परंपरा
भारत में शिक्षक दिवस 5 सितंबर को मनाया जाता है, जो देश के महान दार्शनिक, विद्वान और दूसरे राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस के रूप में जाना जाता है।
राधाकृष्णन और शिक्षक दिवस की प्रेरणा
डॉ. राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर 1888 को हुआ था। वे अपने समय के प्रमुख शिक्षाविद्, दार्शनिक और मानवतावादी थे।
जब वे राष्ट्रपति बने, तो उनके विद्यार्थियों ने उनका जन्मदिन मनाने का प्रस्ताव रखा।
उन्होंने कहा —“यदि आप वास्तव में मेरा सम्मान करना चाहते हैं, तो इस दिन को सभी शिक्षकों के सम्मान में मनाइए।”
तभी से 1962 से यह दिन “शिक्षक दिवस” के रूप में मनाया जाने लगा।
आज यह परंपरा भारत के हर स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय में गहरी जड़ें जमा चुकी है।
शिक्षक दिवस के समारोह और महत्व
5 सितंबर को देशभर के स्कूलों में विशेष कार्यक्रम आयोजित होते हैं।
विद्यार्थी अपने शिक्षकों के सम्मान में भाषण, कविता, नाटक और गीत प्रस्तुत करते हैं।
कई जगह “रोल रिवर्सल” होता है — छात्र शिक्षक बनकर पढ़ाते हैं।
शिक्षकों को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार (National Teachers’ Awards) से सम्मानित किया जाता है।
इस दिन शिक्षकों को केवल मंच पर सम्मान नहीं, बल्कि भावनात्मक रूप से आदर मिलता है — क्योंकि शिक्षा केवल पेशा नहीं, एक पवित्र मिशन है।
दुनिया के विभिन्न देशों में शिक्षक दिवस की तिथियाँ
हर देश का सांस्कृतिक इतिहास अलग है, इसलिए शिक्षक दिवस की तिथि भी भिन्न है।
नीचे कुछ प्रमुख देशों की तिथियाँ दी गई हैं:
देश / क्षेत्र शिक्षक दिवस की तिथि विशेष कारण या टिप्पणी
भारत 5 सितंबर डॉ. राधाकृष्णन का जन्मदिन
रूस 5 अक्टूबर UNESCO के अनुरूप 1994 से
चीन 10 सितंबर शिक्षा के नए सत्र के आरंभ से जुड़ा
अमेरिका मई का पहला सप्ताह “Teacher Appreciation Week” के रूप में
ईरान 2 मई प्रसिद्ध प्रोफेसर की स्मृति में
इंडोनेशिया 25 नवंबर “Hari Guru” के रूप में राष्ट्रीय उत्सव
सिंगापुर 1 सितंबर स्कूल आधा दिन चलते हैं
अर्जेंटीना 11 सितंबर शिक्षाविद् डोमिंगो सर्मिएंटो की पुण्यतिथि
पोलैंड 14 अक्टूबर शिक्षा मंत्रालय की स्थापना तिथि
ऑस्ट्रेलिया अक्टूबर का अंतिम शुक्रवार राज्यवार परंपराएँ भिन्न
हंगरी जून का पहला शनिवार स्थानीय शिक्षण दिवस
अरब देश (कतर, ओमान आदि) 28 फरवरी क्षेत्रीय एकरूपता यह सूची यह दर्शाती है कि शिक्षक दिवस का स्वरूप वैश्विक है, लेकिन इसका उत्सव सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से विविध।
क्या शिक्षक दिवस पर अवकाश होता है?
कई देशों में शिक्षक दिवस एक औपचारिक सम्मान दिवस होता है, न कि सार्वजनिक अवकाश।
भारत में 5 सितंबर को विद्यालय खुले रहते हैं, केवल विशेष आयोजन होते हैं।
सिंगापुर में आधे दिन की छुट्टी रहती है, पर राष्ट्रीय अवकाश नहीं।
रूस, पोलैंड, अमेरिका में सामान्य दिनचर्या रहती है।कुछ देशों में ही इसे अवकाश दिवस माना जाता है, पर वह अपवाद है।इससे स्पष्ट है कि शिक्षक दिवस का उद्देश्य अवकाश देना नहीं, बल्कि “सम्मान देना” है।
विश्व और भारत में शिक्षक दिवस मनाने के तरीके
विद्यालयों में सांस्कृतिक कार्यक्रम, भाषण, निबंध प्रतियोगिता आयोजित होती हैं।
विद्यार्थी शिक्षकों को कार्ड, उपहार या पौधे भेंट करते हैं।
समारोहों में शिक्षकों की जीवन यात्रा और योगदान साझा किए जाते हैं।
कुछ देशों में शैक्षिक संगोष्ठियाँ और कॉन्फ्रेंस भी आयोजित की जाती हैं।
सोशल मीडिया पर #TeachersDay ट्रेंड करता है, जहां लोग अपने पसंदीदा शिक्षकों को टैग करके धन्यवाद देते हैं।
भारत में तो कई विद्यालय “गुरु पूजन” की भारतीय परंपरा को पुनर्जीवित करते हैं — जिससे शिक्षक-छात्र संबंध का आध्यात्मिक पक्ष भी मजबूत होता है।
शिक्षक दिवस का सामाजिक और शैक्षिक संदेश
शिक्षक दिवस हमें यह याद दिलाता है कि शिक्षा केवल ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया है।
यह दिन हमें प्रेरित करता है कि —
हम अपने शिक्षकों के मार्गदर्शन का सम्मान करें,
शिक्षा को केवल डिग्री नहीं, जीवन का मूल समझें,और यह स्वीकार करें कि शिक्षक ही समाज की आत्मा हैं।
शिक्षक सम्मान की चुनौतियाँ और भविष्य की दिशा
आज के युग में शिक्षकों के सामने कई चुनौतियाँ हैं —
तकनीकी परिवर्तन के साथ तालमेल,
सामाजिक अपेक्षाएँ,और कभी-कभी उचित मान-सम्मान की कमी।
इसलिए अब आवश्यकता है कि —
शिक्षकों को नीतिगत और आर्थिक रूप से सशक्त बनाया जाए।
नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के अनुसार उन्हें प्रशिक्षण, संसाधन और सम्मान मिले।
डिजिटल माध्यमों के साथ-साथ मानवीय मूल्य शिक्षा को भी समान महत्व दिया जाए।
भविष्य में शिक्षक केवल पाठ्यक्रम नहीं, बल्कि “लाइफ कोच” और “नॉलेज नेविगेटर” के रूप में उभरेंगे।
यह दिन हमें याद दिलाता है कि हर युग में शिक्षक ही वह दीपक हैं जो अंधकार को मिटाते हैं।
गुरु का आदर, मानवता का आदर शिक्षक दिवस केवल एक दिन नहीं, बल्कि एक भावना है —
ज्ञान, आभार और प्रेरणा की।
विश्व स्तर पर 5 अक्टूबर को UNESCO ने इसे स्थापित किया,
जबकि भारत में 5 सितंबर को यह अपने सांस्कृतिक आदर्श के रूप में मनाया जाता है।
हर देश में तिथि भले अलग हो, पर उद्देश्य एक ही
“शिक्षकों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान।”जब हम अपने गुरु का आदर करते हैं, तब वास्तव में हम ज्ञान, संस्कृति और सभ्यता की जड़ों का आदर करते हैं।
और यही शिक्षक दिवस का सच्चा संदेश है —
“गुरु ही वह सूर्य हैं जो ज्ञान की रोशनी से संसार को आलोकित करते हैं।”

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मौत बनकर लटक रहे बिजली के तार, कुंभकर्णी निद्रा में विद्युत विभाग

जगह-जगह झुके हुए बिजली के पोल और नीचे लटकते तार किसी बड़े हादसे को दे रहे न्योता

महराजगंज(राष्ट्र की परम्परा)। चौक विद्युत उपकेंद्र के अंतर्गत आने वाले बागापार फीडर की विद्युत व्यवस्था पूरी तरह अव्यवस्थित हो चुकी है। पूरे क्षेत्र में जगह-जगह बिजली के पोल झुके हुए हैं और तार नीचे लटकते नजर आ रहे हैं, जिससे किसी भी समय गंभीर हादसा हो सकता है। ग्रामीणों का कहना है कि विभाग की लापरवाही चरम पर है और शिकायतों के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की जा रही।
बागापार से रामपुर महराजगंज मार्ग पर स्थित बागापार चौराहे से मात्र 100 मीटर दूर तालाब के किनारे लगा बिजली का खंभा पूरी तरह जर्जर हो चुका है। खंभे में जंग लग चुकी है और तार नीचे लटक रहे हैं। यह स्थिति केवल एक स्थान पर नहीं, बल्कि पूरे फीडर क्षेत्र में समान रूप से देखने को मिल रही है।
ग्रामीणों ने बताया कि यदि समय रहते मरम्मत नहीं की गई, तो कभी भी कोई बड़ी दुर्घटना हो सकती है।
स्थानीय समाजसेवी उमेश चन्द्र मिश्र ने बताया कि उन्होंने इस समस्या को लेकर कई बार विद्युत विभाग को शिकायत दी, परंतु विभागीय स्तर पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। उन्होंने कहा कि यदि शिकायतों पर पहले ध्यान दिया गया होता, तो हाल ही में झुगवा क्षेत्र में हुई बिजली दुर्घटना जैसी स्थिति यहां उत्पन्न नहीं होती।
वहींं बागापार के युवा ग्राम प्रधान विवेक प्रताप सिंह उर्फ निक्कू सिंह ने भी विभागीय लापरवाही पर नाराजगी जताई। उन्होंने बताया कि शिकायत दर्ज कराने के बावजूद अधिकारी कोई कार्रवाई नहीं कर रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि अब वे जिलाधिकारी से मिलकर पूरे बागापार फीडर की समस्या से अवगत कराएंगे और यदि सुधार नहीं हुआ तो आंदोलन का रास्ता अपनाया जाएगा।

भारत-तिब्बत की संयुक्त संस्कृति बनेगी विश्व में शांति का आधार: डॉ. भाटी

तिब्बत की आज़ादी ही मानवता की सुरक्षा : प्रो. मनोज दीक्षित

जोधपुर/राजस्थान (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। राजस्थान उच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी ने कहा कि भारत और तिब्बत की संस्कृतियों का समन्वय विश्व को शांति, करुणा और मानवता का अनुपम संदेश देता है। उन्होंने कहा कि इन संस्कृतियों से अधिक विशिष्ट और समरस संस्कृति कोई और नहीं हो सकती, इसलिए इन्हें संरक्षित करना हम सबका दायित्व है।
डॉ. भाटी शनिवार को सीवांची भवन में भारत-तिब्बत समन्वय संघ (बीटीएसएस) की दो दिवसीय राष्ट्रीय बैठक “जप तप 2025” के उद्घाटन सत्र में बोल रहे थे। मुख्य अतिथि के रूप में उन्होंने तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा के 90वें जन्मवर्ष पर घेवर केक काटकर शुभकामनाएँ दीं और उपस्थित तिब्बती प्रतिनिधियों को बधाई दी।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. मनोज दीक्षित ने कहा कि “तिब्बत की स्वतंत्रता का अर्थ केवल एक भूभाग की आज़ादी नहीं, बल्कि दुनिया की तीन-चौथाई आबादी की सुरक्षा है।” उन्होंने कहा कि तिब्बत के प्राकृतिक संसाधनों से नौ देश सीधे लाभान्वित होते हैं, जिन पर वर्तमान में चीन का नियंत्रण है। ऐसे में तिब्बत की स्वतंत्रता के लिए ठोस नरेटिव तैयार कर कार्य को गति देना आवश्यक है।
बैठक की अध्यक्षता कर रहे विधायक अतुल भंसाली ने कहा कि समाज की भावना भी यही है कि तिब्बत चीन के नियंत्रण से मुक्त हो, जिससे कैलाश-मानसरोवर यात्रा भी सभी के लिए सुलभ हो सके। उन्होंने जोधपुर के तिब्बती मार्केट को सहयोग देने का आश्वासन भी दिया।
उद्घाटन सत्र में केंद्रीय संयोजक हेमेंद्र तोमर, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एन.के. सूद, राष्ट्रीय महामंत्री राजो मालवीय, लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीनिवास राव, राष्ट्रीय मंत्री विंग कमांडर के.के. शाह, प्रांत अध्यक्ष एकलव्य भंसाली और राष्ट्रीय सह संयोजक (प्रचार प्रभाग) हेमंत जैन सहित देशभर से लगभग 135 प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

प्रदेश में जल्दी ही शुरू होगी 69 हजार पदों पर आंगनवाड़ी भर्ती

लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा)। प्रदेश की महिलाओं के लिए एक बड़ी खुशखबरी है। उत्तर प्रदेश सरकार जल्द ही आंगनवाड़ी विभाग में 69,000 से अधिक पदों पर भर्ती प्रक्रिया शुरू करने जा रही है। यह भर्ती प्रदेश के सभी जिलों में एक साथ आयोजित की जाएगी।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, इन पदों में लगभग 7,952 आंगनवाड़ी कार्यकत्री और 61,254 आंगनवाड़ी सहायिका के पद शामिल होंगे। जिलों में रिक्त पदों का विवरण तैयार करने के लिए जिलाधिकारी की अध्यक्षता में समिति गठित कर दी गई है।

बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग ने सभी जिलों को निर्देश भेजे हैं कि वे अपने-अपने क्षेत्र के रिक्त पदों की जानकारी आधिकारिक पोर्टल upanganwadibharti.in पर अपलोड करें। सभी जिलों के आंकड़े मिलने के बाद भर्ती का विस्तृत नोटिफिकेशन जारी किया जाएगा।

योग्यता और आवेदन शर्तें

इस भर्ती में केवल महिला उम्मीदवार ही आवेदन कर सकेंगी। आवेदिका का निवास उसी ग्राम पंचायत (ग्रामीण क्षेत्र) या वार्ड (शहरी क्षेत्र) में होना आवश्यक है, जहाँ से आवेदन किया जा रहा है।

शैक्षिक योग्यता: न्यूनतम 12वीं पास

आयु सीमा: 18 से 35 वर्ष
यदि किसी ग्राम पंचायत में किसी श्रेणी की पात्र उम्मीदवार उपलब्ध नहीं होती हैं, तो चयन न्याय पंचायत स्तर पर किया जाएगा।

महत्वपूर्ण बातें

उम्मीदवारों को सलाह दी जाती है कि वे भर्ती पोर्टल पर नजर बनाए रखें। जैसे ही आवेदन प्रक्रिया शुरू होगी, विस्तृत जानकारी और फॉर्म लिंक पोर्टल पर उपलब्ध होगा।