Monday, June 29, 2026
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अरावली की सिकुड़ती ढाल और दिल्ली का डूबता पर्यावरण

अरावली संरक्षण के दायरे को 100 मीटर की परिभाषा से सीमित कर देना दिल्ली-एनसीआर की हवा, पानी और तापमान के लिए एक गहरी पर्यावरणीय चोट

डॉ. सत्यवान सौरभ

भारत के उत्तरी भूगोल में अरावली केवल एक पर्वतमाला नहीं, बल्कि एक जीवित पारिस्थितिक दीवार, एक भूजल भंडार, एक शीतलन तंत्र और एक धूल-रोधी प्राकृतिक ढाल के रूप में जानी जाती है। किंतु हाल में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पर्यावरण मंत्रालय की उस अनुशंसा को मान्यता देना, जिसमें केवल वे भूमि संरचनाएँ—जो स्थानीय भू-स्तर से 100 मीटर से अधिक ऊँची हों—“अरावली की पहाड़ी” कही जाएँगी, इस पूरी पर्वतमाला को अभूतपूर्व कानूनी और पारिस्थितिक संकट में डाल देता है। 100 मीटर से नीचे के छोटे-बड़े कटक, क्रीड़ा-रूप, पथरीली ढालें, झाड़-झंखाड़ वाले क्षेत्र और टूटे पहाड़, जो वास्तविक पारिस्थितिकी में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं, वे इस परिभाषा से लगभग बाहर हो जाते हैं। अनुमानतः 80–90% तक का वह भू-क्षेत्र, जो आज भी दिल्ली-एनसीआर को धूल, गर्मी, बाढ़ और जल-संकट से बचाता है, उसकी कानूनी रक्षा क्षीण हो जाने का डर स्पष्ट दिख रहा है।

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इस परिभाषात्मक परिवर्तन से जो सबसे बड़ा खतरा खड़ा होता है, वह यह कि अरावली का संरक्षण अब “ऊँचाई” पर आधारित हो गया है, “परिस्थितिक कार्यों” पर नहीं। कोई भी पहाड़ी तंत्र अपनी जैव-भूगर्भीय भूमिका ऊँचाई से नहीं, बल्कि अपनी स्थिति, उसके जुड़ाव, उसकी जल-नालियों, मिट्टी की परतों, वनस्पति, पशु-आवागमन, हवा-रोध क्षमता, रंध्रिता और वर्षा संचयन पर आधारित होता है। अरावली की निम्न ऊँचाई वाली श्रृंखलाएँ, जो दूर से देखने पर साधारण टीले लगती हैं, वास्तव में NCR-Delhi के पारिस्थितिक संतुलन की रीढ़ हैं। इन्हें हटाने, काटने या इनके बीच कृत्रिम दरारें डाल देने का अर्थ है—दिल्ली का प्रदूषण और बदतर, पानी और गहरा, तथा गर्मी और अधिक झुलसानेवाली।

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अरावली का यह क्षरण केवल एक भूगोलिक घटना नहीं है, बल्कि यह दिल्ली की साँसों, नलकों, खेतों, हवा की दिशा, तापमान की प्रवृत्तियों और पूरे उत्तरी भारत के मानसूनी पैटर्न से सीधे जुड़ा हुआ प्रश्न है। दिल्ली-एनसीआर आज पहले से ही चरम प्रदूषण, गिरते भूजल, सूखे होते जलाशयों और 50 डिग्री के आसपास पहुँचती गर्मी से संघर्ष कर रहा है। ऐसे समय में, अरावली के प्राकृतिक कवच का सिकुड़ना, टूटना और उसकी निरंतर अवैध खनन-निर्माण से कमजोर होना एक ऐसे भारी पारिस्थितिक पतन का संकेत है, जो आने वाले वर्षों में दिल्ली की रहने-लायक स्थिति को ही बदल सकता है।

जब अरावली के पहाड़ काटे जाते हैं, तो सबसे पहले उनकी मिट्टी की पकड़ छूट जाती है। यह मिट्टी हवा के पहले झोंके में धूल बनकर उड़ती है। रेतीले कण, पथरीले अवशेष, टूटे हुए क्वार्ट्जाइट की महीन परतें—ये सभी दिल्ली की हवा में बड़े सूक्ष्म कणों का हिस्सा बन जाते हैं। दिल्ली की भौगोलिक संरचना पहले ही ऐसी है कि हवा की प्रवाह गति शीतकाल में धीमी पड़ जाती है, और प्रदूषण फँसकर परतें जमा कर लेता है। अरावली की टूटी दीवारें इस प्रदूषण को न केवल कई गुना बढ़ा देती हैं, बल्कि राजस्थान की तरफ से आने वाली पश्चिमी हवाओं को बिना किसी अवरोध के धूल और गर्मी लेकर आने का रास्ता भी प्रदान करती हैं।

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इस स्थिति का दूसरा पहलू दिल्ली के पानी से जुड़ा है। अरावली की पहाड़ियाँ भूमिगत जल के लिए प्राकृतिक पुनर्भरण क्षेत्र हैं। उनकी पथरीली सतहों में प्राकृतिक दरारें, बिखरे हुए खनिज, पथरीली नालियाँ और रंध्रता—ये सभी वर्षा जल को धरती के भीतर कई सौ फीट तक खींचकर ले जाती हैं। किंतु जब पहाड़ियों को काटकर समतल कर दिया जाता है, या उन पर कंक्रीट और बस्तियाँ उग आती हैं, तब यह पूरी प्राकृतिक जल-प्रवाह प्रणाली टूट जाती है। पानी अब रिसता नहीं, बह जाता है। मिट्टी कटाव बढ़ता है, छोटे जलस्रोत नष्ट होते हैं, और भूजल recharge लगभग समाप्त हो जाता है। परिणाम यह कि दिल्ली-गुड़गाँव-फरीदाबाद-सोहना क्षेत्र में जलसंकट और गहरा हो जाता है। अनेक इलाकों में भूजल पहले ही 800–1000 फीट तक जा चुका है; अरावली के और कटने से यह स्तर खतरनाक रूप से और नीचे जाएगा।

लेकिन आज सबसे बड़ा संकट, जिसे दिल्ली हर गर्मियों में महसूस करती है, वह है “चरम ऊष्मा”—extreme heat. अरावली का विस्तृत वन-तंत्र, उसकी झाड़ियाँ, उसके वृक्ष, उसकी ऊबड़-खाबड़ ढालें—ये सभी प्राकृतिक शीतलन तंत्र (कूलिंग सिस्टम) का हिस्सा हैं। यह प्रणाली न केवल छाया और वाष्पोत्सर्जन से गर्मी कम करती है, बल्कि गर्म हवाओं को रोकने की प्राकृतिक क्षमता भी रखती है। परंतु जब पहाड़ियों को कंक्रीट, पक्की सड़कें और भवन निगल जाते हैं, तब पूरा क्षेत्र “हीट-आइलैंड” में बदल जाता है। अरावली का हर टूटा टुकड़ा दिल्ली के तापमान में 0.2–0.4 डिग्री की वृद्धि जोड़ देता है। और जब यह प्रक्रिया कई किलोमीटर तक फैल जाती है, तो दिल्ली की गर्मी औसतन कई डिग्री तक बढ़ जाती है।

और तब आता है अरावली का वह पहलू, जिसे भारत के कई भाग गंभीरता से नहीं लेते—अरावली एक “रेगिस्तान-रोधी दीवार” है। यह पर्वतमाला थार मरुस्थल की पूर्वी सीमा के ठीक आगे खड़ी है। यदि यह पर्वतमाला कमजोर हो जाए, इनके बीच कृत्रिम रास्ते बन जाएँ, वृक्ष कट जाएँ या खनन से दरारें खुल जाएँ, तो राजस्थान की ओर से चलने वाली धूल, रेत और शुष्क हवाएँ बड़ी मात्रा में हरियाणा और दिल्ली तक पहुँचने लगेंगी। अरावली सदियों से रेगिस्तान को रोकने वाली प्राकृतिक सीमा रही है। यह सीमा कमजोर पड़ने का अर्थ है कि रेतीले क्षेत्र धीरे-धीरे दिल्ली की ओर खिसकेंगे—इसे वैज्ञानिक भाषा में “डेजर्टिफिकेशन की पूर्वगामी प्रवृत्ति” कहा जाता है। इसका खतरा केवल धूल तक सीमित नहीं, बल्कि यह पूरी भूमि-उपजाऊ क्षमता, मिट्टी का प्रकार, जल-न्यूनता और स्थानीय जलवायु तक को बदल सकता है।

इस पूरे परिदृश्य में सबसे चिंता की बात यह है कि 100 मीटर की परिभाषा अरावली को “टुकड़ों” में बदल देगी। जब कोई भी पर्वतमाला एक सतत श्रृंखला रहती है, तभी वह अपनी पर्यावरणीय भूमिका निभा सकती है। लेकिन जब उसे 50–100 मीटर के अंतराल पर काट-काटकर अलग कर दिया जाता है, तो उसकी हवा, जल और तापमान से संबंधित भूमिकाएँ ध्वस्त हो जाती हैं। यह fragmentation न केवल कानूनी सुरक्षा को कम करता है, बल्कि अवैध निर्माणकर्ताओं को खुला निमंत्रण देता है कि वे उन भू-भागों को निर्माण योग्य मानें, जो अब “पहाड़” नहीं माने जाएँगे। नतीजतन—खनन, फार्महाउस, कंक्रीट, सड़कें, विला, रिज़ॉर्ट और उद्योग अरावली के शरीर को खोखला करते जाएँगे।

यह स्थिति दिल्ली के प्रदूषण को केवल बढ़ाती नहीं, बल्कि उसे स्थायी बनाती है। हवा में धूल बढ़ने का अर्थ है कि दिल्ली के समूचे वायुमंडल में PM-10 और PM-2.5 दोनों की मात्रा लगातार उच्चतर स्तर पर रहना। जब हवा के प्रवाह में अरावली की ढालें टूट जाती हैं, तो स्मॉग का बाहर निकलना कठिन हो जाता है। दिल्ली का भौगोलिक कटोरा-नुमा स्वरूप वैसे ही प्रदूषण को फँसा कर रखता है; यदि उसके एकमात्र पश्चिमी-दक्षिणी “सांस लेने के रास्ते” अर्थात् अरावली के छिद्र भर दिए जाएँ, तो यह संकट और भी विकराल हो जाएगा।

भूजल के स्तर के गिरने का प्रभाव केवल पानी की उपलब्धता तक सीमित नहीं रहता। यह पूरे पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन उत्पन्न करता है। जब भूजल की सतह लगातार नीचे जाती है, तो मिट्टी की नमी कम होती है, खेतों की सिंचाई कठिन होती है, शहरी हरियाली सूखती है, और अंततः तापमान और तेजी से बढ़ता है। इस प्रकार अरावली का क्षरण दिल्ली की गर्मी को अप्रत्यक्ष रूप से भी बढ़ाता है।

गर्मी बढ़ने से न केवल अस्वस्थता, बल्कि बिजली की खपत, जल की माँग, शहरी ताप-दबाव और दुर्घटनाएँ तक बढ़ जाती हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों में स्पष्ट किया गया है कि दिल्ली में गर्मी का 30–40% नियंत्रण अरावली के वन-कवच पर निर्भर है। इस कवच के हटते ही दिल्ली को आने वाले दशक में 50–52 डिग्री की गर्मी स्थायी रूप से महसूस होने लगेगी।

प्रश्न यह है कि समाधान क्या है? पहला समाधान यही है कि अरावली की कानूनी परिभाषा “ऊँचाई आधारित” नहीं, बल्कि “परिस्थितिक कार्य आधारित” होनी चाहिए। दूसरा यह कि वन, चरागाह, झाड़ी-वन, पथरीले परिदृश्य—इन सभी को अरावली का हिस्सा मानकर संरक्षित किया जाए। तीसरा, खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लागू किया जाए और अवैध निर्माणों को कठोरता से हटाया जाए। चौथा, टूटे पहाड़ों का पुनरुत्थान किया जाए—मिट्टी भरकर, देशज प्रजातियों के वृक्ष लगाकर और जलसंचयन संरचनाएँ बनाकर। पाँचवाँ, भौतिक-प्राकृतिक निरंतरता पुनः स्थापित की जाए, ताकि पूरे NCR-Delhi को एक सघन, अविच्छिन्न पर्यावरणीय कवच प्राप्त हो सके।

अरावली केवल हरियाणा, राजस्थान या दिल्ली का संगठनात्मक मसला नहीं, बल्कि यह उत्तरी भारत की जलवायु सुरक्षा दीवार है। इसे कमजोर करने का अर्थ है—दिल्ली की हवा को और जहरीला, उसका पानी और गहरा संकटग्रस्त, और उसकी गर्मी और अधिक घनघोर बना देना। अरावली का टूटना, दिल्ली का टूटना है। यदि अरावली जीवित रहेगी, तभी दिल्ली सांस ले पाएगी। यदि अरावली बचेगी, तभी दिल्ली बचेगी।

सीएम योगी का बड़ा ऐलान: बाबा साहब की हर मूर्ति के आसपास बनेगी सुरक्षात्मक बाउंड्री वॉल

लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। डॉ. भीमराव आंबेडकर के महापरिनिर्वाण दिवस पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि बाबा साहब की प्रतिमाओं के साथ छेड़छाड़ करने वाले शरारती तत्वों को रोकने के लिए राज्य सरकार नई योजना लागू कर रही है। इसके तहत प्रदेश में स्थापित हर आंबेडकर मूर्ति के चारों ओर सुरक्षात्मक बाउंड्री वॉल बनाई जाएगी। जिन मूर्तियों पर छत नहीं है, वहां छत भी निर्माण कराई जाएगी।

सीएम योगी शनिवार को हजरतगंज स्थित आंबेडकर महासभा कार्यालय में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। कार्यक्रम की शुरुआत बौद्ध भिक्षुओं द्वारा बुद्ध वंदना और त्रिशरण पंचशील पाठ से हुई।

शरारती तत्वों से सुरक्षा के लिए बाउंड्री वॉल आवश्यक: योगी

सीएम योगी ने कहा कि कई स्थानों पर बाबा साहब की प्रतिमाओं के साथ छेड़छाड़ की घटनाएँ सामने आती हैं। ऐसे में सरकार ने निर्णय लिया है कि सभी मूर्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी। यदि कहीं कार्य अधूरा है तो उसे जल्द पूरा कराया जाएगा।

संविदा सफाई कर्मचारियों को मिलेगा न्यूनतम मानदेय

कार्यक्रम के दौरान लालजी प्रसाद निर्मल द्वारा उठाए गए चतुर्थ श्रेणी संविदा सफाई कर्मियों के मुद्दे पर सीएम ने बताया कि सरकार ने इस संबंध में कॉरपोरेशन का गठन कर दिया है। आने वाले एक-दो महीनों में यह सुनिश्चित किया जाएगा कि सभी संविदा कर्मियों को न्यूनतम मानदेय मिले।

“वंचित वर्ग की सुविधाएँ बाबा साहब की प्रेरणा का परिणाम”

सीएम योगी ने कहा कि वंचित, दलित और कमजोर वर्गों को जो अधिकार और सम्मान आज मिल रहा है, वह बाबा साहब की दिए गए विचारों का परिणाम है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पंचतीर्थ, छात्रवृत्ति योजनाएं और सामाजिक न्याय से जुड़े अन्य प्रयास बाबा साहब के सपनों को साकार कर रहे हैं।

सपा पर पलटवार—“अखिलेश यादव ने दलितों का आरक्षण खत्म किया”

सीएम योगी ने सपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव पर हमला बोलते हुए कहा कि सपा और उसके नेता शुरू से ही आंबेडकर और आरक्षण के विरोधी रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि अखिलेश सरकार ने दलित कर्मचारियों के प्रोन्नति में आरक्षण खत्म किया और दो लाख दलित कर्मियों को पदावनत कर अपमानित किया।


6 दिसंबर की रैली रद्द—बसपा सुप्रीमो मायावती ने रखी वजह

बहुजन समाज पार्टी ने घोषणा की है कि मायावती 6 दिसंबर को नोएडा में प्रस्तावित रैली को संबोधित नहीं करेंगी। वह अपने आवास पर ही बाबा साहब को श्रद्धांजलि देंगी।
मायावती ने कहा कि उनकी सुरक्षा व्यवस्था के कारण आम लोगों और कार्यकर्ताओं को असुविधा होती है, इसलिए यह फैसला लिया गया।

सपा की नाराजगी—“सरकार ने जानबूझकर कार्यक्रम की अनुमति रोकी”

इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में 6 दिसंबर को तय कार्यक्रम को अनुमति न मिलने पर समाजवादी पार्टी भड़क गई।
सपा सांसद आरके चौधरी ने कहा कि यह अलोकतांत्रिक कदम है और भाजपा सरकार बाबा साहब का अपमान कर रही है।

सपा नेताओं ने कहा कि भाजपा सिर्फ वोट के लिए बाबा साहब का नाम लेती है, लेकिन उनके विचारों से नफरत करती है। पार्टी ने घोषणा की है कि वह पूरे प्रदेश में परिनिर्वाण दिवस मनाएगी।

मोदी-पुतिन मुलाकात से बदला वैश्विक समीकरण

India Russia relations 2025: पुतिन के स्वागत से लेकर यूएन में भारत के रुख तक, बदली वैश्विक कूटनीति की दिशा

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)दिल्ली की सर्द रात, हल्की ठंडी हवा और पलाम एयरपोर्ट का रनवे—यह सिर्फ एक सामान्य राजनयिक आगमन नहीं था। जैसे ही रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का विमान उतरा, वहां मौजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रोटोकॉल की सीमाएं तोड़कर जिस गर्मजोशी से उनका स्वागत किया, वह आने वाले समय की वैश्विक राजनीति का एक स्पष्ट संकेत बन गया। हाथ मिलाने के बाद दोनों नेताओं का गले मिलना सिर्फ एक भावनात्मक पल नहीं था, बल्कि यह दोस्ती, विश्वास और स्थिर साझेदारी का प्रतीक था।

India Russia relations 2025 में यह दृश्य एक ऐतिहासिक क्षण के रूप में दर्ज हो गया। यह नज़ारा सीधे वॉशिंगटन, लंदन, पेरिस और बर्लिन तक एक सशक्त संदेश पहुंचा गया—भारत अब अपनी शर्तों पर वैश्विक नीति का हिस्सा बन रहा है, न कि किसी दबाव में।

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ठीक इसी दौरान न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र में यूक्रेन मुद्दे पर जबरदस्त राजनीतिक दबाव चल रहा था। अमेरिका और यूरोपीय देशों ने रूस के खिलाफ प्रस्ताव लाया और भारत से खुलकर विरोध करने की अपेक्षा की गई। लेकिन भारत ने न समर्थन किया, न विरोध। भारत ने एब्सेंट रहकर स्पष्ट किया कि वह संघर्ष नहीं, शांति को प्राथमिकता देता है।

भारत का यह कदम India Russia relations 2025 को एक नई पहचान देता है—एक ऐसा देश जो मानवाधिकारों के पक्ष में है, लेकिन किसी राजनीतिक खेमे का हिस्सा बनकर टकराव को बढ़ाना नहीं चाहता।

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हैदराबाद हाउस में हुई मोदी-पुतिन मुलाकात के दौरान हेल्थ, मोबिलिटी, शिपिंग, एनर्जी और टेक्नोलॉजी जैसे कई अहम क्षेत्रों में सहयोग के नए रास्ते खुले। दोनों देशों ने वर्ष 2030 तक का आर्थिक रोडमैप तैयार किया, जिससे स्पष्ट है कि यह साझेदारी केवल वर्तमान नहीं, बल्कि भविष्य की भी रणनीति है।

भारत ने दुनिया को दिखा दिया कि कूटनीति सिर्फ बयान नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर निर्णय लेने की शक्ति है। न झुकना, न टूटना—सिर्फ राष्ट्रीय हितों के साथ खड़े रहना ही नई भारतीय विदेश नीति की पहचान बन गई है।

India Russia relations 2025 अब केवल एक संबंध नहीं, बल्कि एक संतुलित वैश्विक शक्ति-समीकरण का प्रतीक बन चुका है।

कम नहीं हो रहीं आज़म खां और अब्दुल्ला आज़म की मुश्किलें: सजा बढ़ाने की मांग पर सेशन कोर्ट में सुनवाई 23 दिसंबर को

रामपुर (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। दो पैन कार्ड मामले में सपा नेता आज़म खां और उनके बेटे अब्दुल्ला आज़म की कानूनी मुश्किलें और बढ़ती दिख रही हैं। अभियोजन पक्ष ने एमपी-एमएलए मजिस्ट्रेट कोर्ट द्वारा दी गई सात साल की सजा बढ़ाने की मांग को लेकर सेशन कोर्ट में अपील दायर की है। दूसरी ओर, बचाव पक्ष ने राहत की मांग में कई तर्क रखते हुए सजा के खिलाफ अपील दाखिल की है। अब दोनों पक्षों की अपील पर 23 दिसंबर को फैसला आ सकता है।

सजा बढ़ाने की मांग पर अभियोजन ने दाखिल की अपील

शुक्रवार को हुई सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से सहायक शासकीय अधिवक्ता सीमा सिंह राणा ने बताया कि मजिस्ट्रेट कोर्ट द्वारा दी गई सात साल की सजा को अपर्याप्त बताते हुए इसे बढ़ाने की मांग की गई है। इस प्रार्थना पत्र पर भी 23 दिसंबर को सुनवाई निर्धारित है।

बचाव पक्ष ने राहत की मांग में पेश किए अतिरिक्त आधार

आजम खां और अब्दुल्ला आज़म की ओर से निचली अदालत के फैसले के खिलाफ अपील दाखिल की गई है। बचाव पक्ष ने इस अपील में कई अतिरिक्त आधार जोड़ते हुए जमानत की मांग भी की है। दोनों ही प्रार्थना पत्रों पर एक ही दिन सुनवाई होगी।

दो पासपोर्ट मामले में अब्दुल्ला आज़म को भी सात साल की सजा

दो पैन कार्ड मामले की सजा काट रहे पूर्व विधायक अब्दुल्ला आज़म को शुक्रवार को दो पासपोर्ट मामले में भी सात साल की कैद और 50 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई। कोर्ट ने उन्हें वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश किया और दोषी करार दिया।

क्या है पूरा मामला?

शहर विधायक आकाश सक्सेना ने 2019 में सिविल लाइंस थाने में केस दर्ज कराया था। आरोप था कि अब्दुल्ला आज़म ने दो पासपोर्ट बनवाए, जिनमें जन्मतिथि अलग-अलग दर्ज है।

• शैक्षिक प्रमाणपत्रों में जन्मतिथि: 1 जनवरी 1993

• पासपोर्ट संख्या Z4307442 में जन्मतिथि: 30 सितंबर 1990

शिकायतकर्ता के अनुसार, इन दस्तावेजों का विभिन्न संस्थाओं, विदेश यात्राओं और पहचान प्रमाण के रूप में उपयोग करके अनुचित लाभ लिया गया। केस में IPC की धारा 420, 467, 468, 471 और पासपोर्ट अधिनियम की धारा 12(1)(A) के तहत आरोप लगाए गए थे।

23 दिसंबर महत्वपूर्ण दिन, आएगा बड़ा फैसला

अब दोनों ही मामलों पर सेशन कोर्ट 23 दिसंबर को फैसला सुनाएगी, जिससे यह तय होगा कि सजा बढ़ेगी या राहत मिलेगी।

चमन–कंधार बॉर्डर पर हिंसक संघर्ष, तालिबानी व पाक अधिकारियों में आरोप–प्रत्यारोप

इस्लामाबाद (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच शुक्रवार देर रात हुई भारी गोलीबारी ने सीमावर्ती बलूचिस्तान और कंधार प्रांत की border स्थिति को और गंभीर बना दिया है। विशेष रूप से पाकिस्तान अफगानिस्तान सीमा गोलीबारी के बाद, हफ्ते की शुरुआत में असफल शांति वार्ता के बाद पहले से ही व्याप्त तनाव एक बड़े हिंसक मोड़ पर पहुंच गया। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर गोलीबारी की ज़िम्मेदारी ठहराई है, जबकि शुरुआती जानकारी यह है कि इस हमले में कोई भी तुरंत हताहत नहीं हुआ।

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पक्षों के अधिकारियों ने आरोप लगाया कि अफगान सेना ने चमन बॉर्डर पर “बिना किसी उकसावे के फायरिंग” की, वहीं अफगान तालिबान के प्रवक्ता ने इसे “स्पिन बो्ल्दक” इलाके में पाकिस्तान की ओर से शुरू किया गया आक्रमण बताया। पाकिस्तान की ओर से कहा गया कि बदानी इलाके में अफगान बलों ने मोर्टार दागे, और जवाब में सीमा पार से की गई फायरिंग का प्रत्युत्तर दिया गया। हालांकि, चमन से कंधार तक फैले “चमन-कंधार राजमार्ग” पर गोलीबारी की खबरों की पुष्टि अभी नहीं हो सकी है।

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स्थानीय अस्पतालों में घायलों को लाए जाने की सूचना मिली है—चमन जिला अस्पताल के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, एक महिला समेत तीन घायलों को तत्काल इलाज के लिए भर्ती कराया गया है। हालांकि, उस समय कोई मौत की खबर सामने नहीं आई। पाकिस्तानी सेना की मीडिया शाखा या विदेश मंत्रालय की ओर से इस घटना पर अब तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं हुआ है।

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पिछले महीने संघर्षविराम समझौते के बाद स्थिति कुछ बेहतर होने की उम्मीद थी, लेकिन पाकिस्तान सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी थी कि यह समझौता केवल तकनीकी था — और असल शांति तालिबान द्वारा पाकिस्तान में आतंकवादी गतिविधियाँ बंद करने पर निर्भर थी, जो उसके अनुसार पूरी नहीं हुई। पाकिस्तान का दावा है कि अफगान इलाके से मिलिटेंट्स पाकिस्तान में घुसकर हमले करते रहे हैं, जिनमें कथित अफगान नागरिकों द्वारा किए गए आत्मघाती हमले भी शामिल थे। काबुल इन आरोपों से इनकार करता रहा है और कहता है कि वह पाकिस्तान की अंदरूनी सुरक्षा मामलों के लिए ज़िम्मेदार नहीं है।

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इस गोलीबारी की घटना ने सीमा पार दोनों देशों के बीच स्वीकृत युद्धविराम की नाजुकता को फिर से उजागर कर दिया है। 2021 में तालिबान द्वारा अफगानिस्तान पर कब्जा करने के बाद से यह सीमा पर सबसे गंभीर हिंसा की झड़प मानी जा रही है। अब देखना होगा कि दोनों देश किस प्रकार कूटनीतिक स्तर पर इस घटना का जवाब देते हैं और सीमावर्ती इलाकों की सुरक्षा व्यवस्था को और कैसे मजबूत करते हैं।

खुशहाल जीवन का रहस्य: मजबूत रिश्ते बनाने के असरदार सूत्र

(राष्ट्र की परम्परा)
आज के तेज़-रफ्तार जीवन में इंसान भले ही तकनीकी रूप से पहले से अधिक जुड़ा हुआ है, लेकिन भावनात्मक रूप से रिश्ते लगातार कमजोर होते जा रहे हैं। बदलती जीवनशैली, व्यस्त दिनचर्या और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के कारण लोगों के बीच संवाद कम होता जा रहा है। ऐसे में यह बेहद ज़रूरी हो गया है कि हम यह समझें कि मजबूत रिश्ते कैसे बनाएं और उन्हें लंबे समय तक कैसे निभाया जाए।

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी रिश्ते की सबसे मज़बूत नींव खुला संवाद (Open Communication) होता है। जब दो लोग बिना डर, संकोच और झिझक के अपनी बात एक-दूसरे के सामने रख पाते हैं, तभी सच्चा रिश्ता बनता है। रिश्ते में अगर भावनाएँ दबाई जाती हैं या मन की बातें कही नहीं जातीं, तो गलतफहमियां जन्म लेती हैं, जो धीरे-धीरे दूरी का कारण बन जाती हैं।

ईमानदारी और पारदर्शिता का महत्व

रिश्ता चाहे पति-पत्नी का हो, दोस्ती का या पारिवारिक—जब तक उसमें ईमानदारी नहीं होगी, वह अधिक समय तक टिक नहीं सकता। सच बोलना और एक-दूसरे के साथ पारदर्शी रहना विश्वास को मजबूत करता है। अगर आप सोच रहे हैं कि मजबूत रिश्ते कैसे बनाएं, तो सबसे पहला कदम है—ईमानदार बनना। छोटी-छोटी बातें छुपाना भी भविष्य में बड़े विवाद का रूप ले सकती हैं।

समय देना भी है बेहद जरूरी

आज लोग रिश्तों से ज्यादा मोबाइल और सोशल मीडिया को समय देने लगे हैं। लेकिन रिश्तों को समय देना बेहद ज़रूरी है। साथ बैठकर बातें करना, एक-दूसरे की परेशानियों को सुनना और खुशियों में शामिल होना रिश्ता मजबूत करता है। यही कारण है कि विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि हर दिन कुछ समय अपनों के लिए जरूर निकालिए, क्योंकि मजबूत रिश्ते कैसे बनाएं इसका जवाब समय देने में भी छुपा है।

सम्मान और समझदारी से बढ़ता है रिश्ता

रिश्ते में सम्मान का होना बेहद जरूरी है। एक-दूसरे की भावनाओं, विचारों और सीमाओं का सम्मान करना रिश्ते को नई ऊँचाई देता है। जब आप सामने वाले की बात को ध्यान से सुनते हैं और बिना टोके उसे समझने की कोशिश करते हैं, तो सामने वाले को आत्मिक शांति और सुरक्षा का एहसास होता है। यही एहसास विश्वास में बदलता है, जो रिश्ते की मजबूती की पहचान है।

दोस्ती का भाव बनाएं

रिश्ते में अगर दोस्ती का भाव जुड़ जाए, तो वो रिश्ता बोझ नहीं बल्कि ताकत बन जाता है। जीवनसाथी या करीबी व्यक्ति को अगर आप केवल पार्टनर ही नहीं बल्कि दोस्त भी मानें, तो हर समस्या आसान लगने लगती है। हँसी-मज़ाक, साथ में समय बिताना, छोटी-छोटी खुशियां साझा करना—यही तो रिश्ते को खूबसूरत बनाता है।

साथ मिलकर यादें बनाएं

यादें ही वो धागा हैं जो इंसान को भावनात्मक रूप से जोड़कर रखती हैं। परिवार के साथ यात्राएं करना, विशेष दिनों को साथ मनाना, पुराने पलों को याद करना—यह सब रिश्ते को और भी गहरा बनाता है। अगर आप जानना चाहते हैं कि मजबूत रिश्ते कैसे बनाएं, तो इसका एक सरल उत्तर है—खूबसूरत यादें बनाइए।

अंत में यही कहा जा सकता है कि रिश्ते कोई बोझ नहीं, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी पूंजी हैं। जब हम उनमें प्रेम, सम्मान, संवाद और समझदारी का भाव जोड़ते हैं, तो वही रिश्ते हमारी सबसे बड़ी ताकत बन जाते हैं। इसलिए आज ही यह संकल्प लें कि आप अपने रिश्तों को और बेहतर बनाएंगे और जानेंगे कि मजबूत रिश्ते कैसे बनाएं और उन्हें कैसे निभाएं।

जीवन यात्रा: जहां हर कदम एक नई सीख है

✍️ कैलाश सिंह

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। जीवन एक ऐसी यात्रा है, जिसकी कोई निश्चित राह, तय मंज़िल या स्थिर दिशा नहीं होती। यह निरंतर आगे बढ़ती कहानी है, जिसमें हर दिन, हर स्थिति और हर कदम हमें कुछ न कुछ नया सिखाता चला जाता है। इंसान चाहे कितनी ही उम्र का क्यों न हो, वह जीवन से सीखना कभी नहीं छोड़ता। यही निरंतर सीखने की क्षमता मानव जीवन को सबसे अद्भुत और अर्थपूर्ण बनाती है।जीवन की शुरुआत मासूमियत और अनजान दुनिया से होती है।

बचपन वह दौर है जहां हर चीज पहली बार होती है—पहला शब्द, पहली गलती, पहला डर और पहली खुशी। यहीं से सीखने का सिलसिला शुरू होता है। बच्चे का हर अनुभव उसके भविष्य की नींव तैयार करता है। परिवार के संस्कार और आस-पास का माहौल उसे दिशा देते हैं और वही सीख जीवन की पहली पूँजी बन जाती है। युवावस्था में कदम रखते ही जीवन की सीखें और गंभीर हो जाती हैं। इस दौर में सपनों की ऊँचाई और वास्तविकताओं की कठोरता दोनों सामने आती हैं।

करियर चुनने से लेकर रिश्तों की समझ तक, हर कदम एक चुनौती होता है। असफलता से हिम्मत, सफलता से विनम्रता, और संघर्ष से धैर्य—यह सब इसी उम्र में सीखा जाता है। यही वह पड़ाव है जो व्यक्ति की पहचान, सोच और भविष्य को आकार देता है। मध्य आयु में यात्रा का स्वरूप बदल जाता है। अब सीख केवल अपने लिए नहीं बल्कि परिवारों और समाज के लिए होती है। जिम्मेदारियों का बोझ, समय का दबाव और जीवनशैली की बदलती जरूरतें—ये सब मनुष्य को संतुलन का महत्व सिखाती हैं। यही वह उम्र है जहां इंसान समझता है कि जीवन केवल दौड़ नहीं, बल्कि समझदारी से जीने की कला भी है।

इस चरण में धैर्य सबसे बड़ी सीख होती है—क्योंकि यही धैर्य रिश्तों को संभालता है, उतार–चढ़ाव को साधता है और मनुष्य को परिपक्व बनाता है। वृद्धावस्था इस यात्रा का वह पड़ाव है जहाँ सीखें सबसे गहरी होती हैं। अनुभवों से भरे साल मनुष्य को जीवन की सच्चाई और समय के मूल्य का एहसास कराते हैं। यह वह समय है जब व्यक्ति समझता है कि जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मन की शांति है, और सबसे बड़ी संपत्ति अच्छे कर्म और रिश्ते हैं।

उम्र का यह पड़ाव जीवन को नए दृष्टिकोण से देखने की ताकत देता है—जहां शिकायतें कम और कृतज्ञता ज्यादा रहती है।
अंततःजीवन यात्रा में हर कदम हमें कुछ सिखाता है—कभी कठोरता, कभी करुणा, कभी संयम और कभी बदलाव स्वीकारने की ताकत। यही सीखें हमें मजबूत बनाती हैं, वही हमारी सफलता की पायदान बनती हैं और वही हमें बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देती हैं।

जीवन की यही खूबसूरती है कि यह हमें कभी स्थिर नहीं रहने देता—हमेशा कुछ नया सिखाता है, कुछ नया दिखाता है और कुछ नया सोचने पर मजबूर करता है।इसीलिए कहा गया है—जीवन की यात्रा का कोई अंत नहीं होता; केवल सीखें बदलती हैं, और आदमी हर कदम के साथ थोड़ा और बेहतर बनता जाता है। यही सीखें मानव जीवन की असली पूँजी हैं—और यही जीवन को सार्थक बनाती हैं।

देश का सबसे हाई-टेक सदन बनेगा यूपी विधान परिषद, सदन में लगेंगी 110 वीडियो यूनिटें और डिजिटल रिकॉर्डिंग सिस्टम

लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। उत्तर प्रदेश विधान परिषद अब पूरी तरह हाई-टेक मॉडल की ओर बढ़ रहा है। सदन की कार्यवाही को पारदर्शी, आधुनिक और डिजिटल बनाने के उद्देश्य से परिषद भवन में 110 वीडियो यूनिट, इंटरैक्टिव डिस्प्ले, डिजिटल रिकॉर्ड रिपॉजिटरी और ऑटोमेटिक सेशन मैनेजमेंट सिस्टम लगाए जाएंगे। इस तकनीकी अपग्रेड के बाद यूपी देश का पहला राज्य बन जाएगा जहां विधान मंडल का पूरा रिकॉर्ड डिजिटल, सुरक्षित और रियल-टाइम एक्सेस में उपलब्ध होगा।

हर गतिविधि होगी रिकॉर्ड, सेकंडों में मिलेगा वीडियो

परियोजना के तहत सदन में मल्टी-कैमरा सिस्टम, डेटा कन्वर्जन मशीन और एनोटेशन सर्वर स्थापित किया जाएगा।
एनोटेशन सर्वर की मदद से सवाल, बहस, बयान जैसे विषयों के आधार पर वीडियो ऑटो-टैग होंगे। इससे कोई भी वीडियो कुछ ही सेकंड में खोजा जा सकेगा। यह बदलाव सदन की कार्यप्रणाली को तेज, बेहतर और पारदर्शी बनाएगा।

विधानसभा के बाद विधान परिषद की बड़ी डिजिटल छलांग

इससे पहले विधानसभा में अध्यक्ष सतीश महाना की पहल पर इसी तरह का डिजिटल मॉडल लागू करने का निर्णय लिया गया था। अब विधान परिषद भी उसी दिशा में एक बड़ा कदम बढ़ा रही है।
नए सिस्टम से परिषद की दशकों पुरानी वीडियो रिकॉर्डिंग भी ऑनलाइन उपलब्ध होंगी। क्लाउड आधारित रिपॉजिटरी से डेटा खोने का खतरा समाप्त होगा और

विधायी शोध, मीडिया उपयोग, पिछले संदर्भ खोजने में बड़ी सुविधा मिलेगी।

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निविदा की शर्तें भी तय

परिषद ने प्रोजेक्ट के लिए कुछ महत्वपूर्ण शर्तें निर्धारित की हैं—

• परिषद भवन में डेल्टा कंपनी का इंटरैक्टिव डिस्प्ले लगाना अनिवार्य।

• सप्लायर को 110 वीडियो यूनिट, एनोटेशन सिस्टम और डिजिटल रिपॉजिटरी एक साथ आपूर्ति करनी होगी।

• सभी उपकरणों की इंस्टॉलेशन और टेस्टिंग परिषद भवन में करनी होगी।

• सप्लायर का लखनऊ में कार्यालय और सर्विस सेंटर होना आवश्यक।

• निविदा में वही कंपनियां शामिल होंगी जिन्हें पिछले 3 साल में कम से कम 4.5 करोड़ रुपये की समान श्रेणी की आपूर्ति का अनुभव हो।

इन नए बदलावों से यूपी विधान परिषद तकनीकी रूप से देश का सबसे अग्रणी सदन बनने जा रहा है।

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पश्चिमी विक्षोभ से यूपी में शीतलहर का अलर्ट, तापमान में गिरावट और कोहरे का असर बढ़ेगा

लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। उत्तर भारत में मौसम एक बार फिर करवट ले चुका है। पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होने से उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में सर्दी का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है। यूपी में रात का तापमान लगातार लुढ़क रहा है। कानपुर में शुक्रवार को रात का पारा गिरकर 4.2 डिग्री सेल्सियस पहुंच गया, जो सामान्य से 6 डिग्री कम है। वहीं इटावा और मुजफ्फरनगर में न्यूनतम तापमान 5.4 डिग्री दर्ज किया गया।

मौसम विभाग के अनुसार शनिवार से हवाओं का रुख बदलने की उम्मीद है। अरब सागर से आने वाली नमी वाली हवाओं के असर से प्रदेश में फिर से पारे में उतार-चढ़ाव देखने को मिलेगा।

3-4 डिग्री बढ़ सकता है रात का तापमान

आंचलिक मौसम विज्ञान केंद्र लखनऊ के वरिष्ठ वैज्ञानिक अतुल कुमार सिंह ने बताया कि पश्चिमी विक्षोभ के कारण हवा की दिशा बदल रही है। इससे आने वाले 3-4 दिनों में रात के तापमान में 3-4 डिग्री तक बढ़ोतरी हो सकती है।
कोहरा हल्के से मध्यम स्तर का रहेगा, हालांकि अभी घने कोहरे का कोई अलर्ट नहीं है।

पहाड़ों में भी बढ़ी सर्दी, मैदानी क्षेत्रों में शीतलहर जारी

उत्तर भारत के पहाड़ी और मैदानी दोनों क्षेत्रों में ठंड का असर तेज हो गया है।

• दिल्ली-NCR, पंजाब, हरियाणा और यूपी में शीतलहर का प्रभाव बढ़ रहा है।

• उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में कई इलाकों का तापमान शून्य से नीचे पहुंच गया है, जिससे जनजीवन प्रभावित हो रहा है।

मौसम विभाग का कहना है कि दिसंबर की शुरुआत के साथ ही मौसम में तेज बदलाव दर्ज किया जा रहा है। पहाड़ों में बर्फबारी की संभावना बढ़ गई है, जबकि मैदानी इलाकों में कड़ाके की ठंड और कोहरा बढ़ सकता है।

दो पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय, मौसम में और बदलाव की आशंका

मौसम विशेषज्ञों के अनुसार उत्तर भारत में मौसम के बदलते रुख के पीछे लगातार सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ जिम्मेदार हैं।

• एक महत्वपूर्ण पश्चिमी विक्षोभ उत्तर पंजाब के आसपास 3.1 से 4.5 किमी की ऊंचाई पर सक्रिय है।

• इससे बना चक्रवाती प्रसार उत्तर-पश्चिम यूपी को प्रभावित कर रहा है।

• एक अन्य विक्षोभ ऊपरी वायुमंडल में सक्रिय है, जो आने वाले दिनों में बारिश और बर्फबारी बढ़ा सकता है।

उत्तराखंड के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बारिश और बर्फबारी की संभावना जताई गई है, जबकि मैदानी क्षेत्रों में शीतलहर और कोहरा लोगों की परेशानी बढ़ा सकते हैं।

सिर्फ 10 मिनट की भाप से खुलेगी बंद छाती और नाक

सर्दियों में कफ और खांसी से राहत पाने के असरदार घरेलू उपाय, जानिए पूरा तरीका

सर्दियों का मौसम आते ही खांसी, जुकाम और गले में जमा कफ आम समस्या बन जाती है। ठंडी हवा, प्रदूषण, वायरल इन्फेक्शन और कमजोर इम्युनिटी के कारण छाती में जकड़न महसूस होती है और सांस लेने में भी परेशानी हो सकती है। ऐसे में कई लोग बार-बार दवाइयों का सेवन करने लगते हैं, लेकिन कुछ कफ निकालने के घरेलू उपाय ऐसे भी हैं जो सुरक्षित, सस्ते और बेहद असरदार साबित हो सकते हैं।

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यहां हम आपको बता रहे हैं एक ऐसा सरल और कारगर देसी नुस्खा, जो लंबे समय से आयुर्वेद में इस्तेमाल होता आ रहा है और कफ को जड़ से खत्म करने में सहायक माना जाता है।

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अजवायन और अदरक की भाप – सबसे असरदार उपाय

अगर छाती में कफ जमा है और खांसी रुकने का नाम नहीं ले रही तो अजवायन और अदरक की भाप लेना आपके लिए बेहद फायदेमंद हो सकता है। इसके लिए आपको चाहिए:

1 लीटर गर्म पानी
आधा चम्मच अजवायन
1 इंच अदरक का टुकड़ा
गर्म पानी में अजवायन और कुटा हुआ अदरक डालें। अब एक तौलिया ओढ़कर 5 से 10 मिनट तक इस पानी से भाप लें। इससे बंद नाक खुलती है, गले में जमा बलगम ढीला होकर बाहर निकलने लगता है और सांस लेने में राहत मिलती है। यह कफ निकालने के घरेलू उपाय में से सबसे प्रभावी उपायों में गिना जाता है।

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शहद और काली मिर्च का सेवन

रात में सोने से पहले एक चम्मच शहद में चुटकीभर काली मिर्च पाउडर मिलाकर चाटने से गले की सूजन कम होती है और कफ पतला होने लगता है। यह देसी नुस्खा खांसी को शांत करने में मदद करता है।

हल्दी वाला गर्म दूध

हल्दी में प्राकृतिक एंटीबैक्टीरियल और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं। रोज रात को एक गिलास गर्म दूध में आधा चम्मच हल्दी मिलाकर पीने से गले की खराश दूर होती है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है।

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नमक के पानी से गरारे

गुनगुने पानी में थोड़ा सा नमक डालकर दिन में दो से तीन बार गरारे करें। इससे गले में जमा बैक्टीरिया नष्ट होते हैं और सूजन कम होती है। यह आसान तरीका भी कफ निकालने के घरेलू उपाय में बहुत कारगर माना जाता है।

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हाइड्रेटेड रहना बेहद जरूरी

कफ से छुटकारा पाने के लिए शरीर को हाइड्रेट रखना बेहद आवश्यक है। दिन भर में 8 से 10 गिलास गुनगुना पानी जरूर पिएं। हर्बल चाय, सूप और काढ़ा भी पी सकते हैं। इससे शरीर का विषाक्त पदार्थ बाहर निकलता है और बलगम धीरे-धीरे खत्म होने लगता है।

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धूम्रपान से दूरी बनाएं

अगर आप धूम्रपान करते हैं तो यह समस्या को और बढ़ा सकता है। सिगरेट और तंबाकू फेफड़ों को कमजोर करते हैं और कफ को जमने में मदद करते हैं। ऐसे में कफ निकालने के घरेलू उपाय अपनाने के साथ-साथ धूम्रपान से दूरी बनाना भी बेहद जरूरी है।

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महत्वपूर्ण सूचना: ऊपर बताए गए उपाय पूरी तरह घरेलू और सामान्य जानकारी पर आधारित हैं। किसी भी उपाय को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या आयुर्वेद विशेषज्ञ से परामर्श जरूर लें, खासकर यदि आपको अस्थमा, एलर्जी या कोई पुरानी बीमारी है।

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इंडिगो संकट गहराया: पांच दिनों में 2000 से ज्यादा उड़ानें रद्द, लाखों यात्री प्रभावित

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो इन दिनों गंभीर परिचालन संकट से जूझ रही है, जिसका सीधा असर देशभर के यात्रियों पर पड़ रहा है। पिछले पांच दिनों में इंडिगो की 2000 से ज्यादा उड़ानें रद्द हो चुकी हैं, जिससे हवाई यातायात बुरी तरह प्रभावित हो गया है।

शनिवार को भी हालात सामान्य नहीं हुए। अहमदाबाद एयरपोर्ट पर सुबह 6 बजे तक 19 उड़ानें रद्द कर दी गईं, जबकि तिरुवनंतपुरम एयरपोर्ट पर भी 6 घरेलू उड़ानें रद्द होने की पुष्टि हुई है। शुक्रवार को इंडिगो का परिचालन लगभग ठप रहा और एक ही दिन में 1000 उड़ानें रद्द करनी पड़ीं। इससे पहले 4 दिसंबर को 550 से ज्यादा उड़ानें कैंसिल की गई थीं।

तीन लाख से ज्यादा यात्री प्रभावित

इंडिगो संकट के कारण देशभर में यात्रियों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। पिछले चार दिनों में 3 लाख से ज्यादा यात्री उड़ान रद्द होने से सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं। कई यात्रियों को नई बुकिंग, वैकल्पिक उड़ान और रिफंड से जुड़ी समस्याएँ झेलनी पड़ रही हैं।

मामले की गंभीरता देखते हुए सरकार और डीजीसीए को भी रुख नरम करना पड़ा है। विमानन नियामक DGCA ने फिलहाल FDTL नियमों में अस्थायी छूट देने की घोषणा की है, ताकि उड़ानों का संचालन सामान्य हो सके और स्थिति में सुधार लाया जा सके।

वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए यात्रा करने वाले यात्रियों को एयरलाइन की ताज़ा अपडेट लगातार चेक करने की सलाह दी जा रही है।

यूपी में तेज़ हुई राजनीतिक मोर्चाबंदी, नए समीकरणों से सियासत में आया भूचाल

✍️ डॉ. सतीश पाण्डेय

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। उत्तर प्रदेश में चुनावी हलचल ने इस समय राजनीतिक तापमान को चरम पर पहुंंचा दिया है। चुनाव नजदीक आते ही सभी राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी रणनीतियां धारदार करना शुरू कर दिया है, जिससे प्रदेश की सियासत में अचानक नए समीकरण और तेज मोर्चाबंदी देखने को मिल रही है।

यही वजह है कि पूरे प्रदेश में राजनीति एक बार फिर बड़े बदलावों की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। सत्ताधारी दल विकास, कानून व्यवस्था और कल्याणकारी योजनाओं को प्रमुख आधार बनाकर जनता के बीच उतर रहा है। दूसरी ओर विपक्ष बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार और किसानों की समस्याओं को लेकर सरकार को कठघरे में खड़ा करने में जुटा है। प्रदेश की जनता किन मुद्दों को तरजीह देती है—इस पर सभी दलों की नज़रें टिकी हैं।

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इस बार छोटे और क्षेत्रीय दलों की सक्रियता भी खास तौर पर बढ़ी है। कई दल अपनी प्रभाव वाली सीटों पर चुनावी समीकरण बदलने की क्षमता रखते हैं, जिसके कारण बड़ी पार्टियाँ भी गठबंधन और सीट बंटवारे पर गंभीर मंथन कर रही हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि वर्तमान परिदृश्य बहुकोणीय मुकाबले की ओर इशारा कर रहा है, जहां तीन से चार या अधिक उम्मीदवार अहम भूमिका निभा सकते हैं।

प्रदेश में दलबदल की रफ्तार ने भी चुनावी गणित को और जटिल बना दिया है। कई नेता अपने राजनीतिक भविष्य को ध्यान में रखते हुए दल बदल रहे हैं, जिससे कई सीटों पर समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं। नए चेहरे, युवा उम्मीदवार और स्थानीय जनाधार वाले नेताओं को टिकट देने की कवायद भी जोर पकड़ चुकी है।

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कुल मिलाकर, यूपी की राजनीति इन दिनों नए गठबंधनों, बदलते पाले और तीखी रणनीतियों के कारण बेहद रोमांचक चरण में है। आगामी चुनाव में कौन सा मोर्चा मजबूत उभरकर सामने आएगा, यह देखना प्रदेश की जनता के लिए भी रुचिकर होने वाला है।

पुतिन का भारत दौरा: बदलते विश्व परिदृश्य में साझेदारी का नया अध्याय

नवनीत मिश्र

भारत और रूस के संबंध दशकों से भरोसे, रणनीतिक सहयोग और परस्पर सम्मान पर आधारित रहे हैं। वैश्विक राजनीति के बदलते स्वरूप जहाँ शक्ति-संतुलन नए सिरे से गढ़ा जा रहा है, के बीच रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का हालिया भारत दौरा केवल औपचारिक कूटनीतिक घटना नहीं, बल्कि भविष्य की बहुध्रुवीय दुनिया की दिशा तय करने वाला एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुआ।
पिछले कुछ वर्षों में पश्चिमी देशों के साथ रूस के तनावपूर्ण संबंधों, यूक्रेन संकट और प्रतिबंधों की श्रृंखला ने विश्व राजनीति में गंभीर बदलाव पैदा किए हैं। ऐसे दौर में भारत ने अपनी विदेश नीति के मूल मंत्र रणनीतिक स्वायत्तता, को कायम रखा है। पुतिन की यात्रा इसी सिद्धांत की मजबूत अभिव्यक्ति थी, जिसमें भारत ने दिखाया कि वह किसी भी शक्ति-गुट का अनुयायी नहीं, बल्कि वैश्विक संतुलन का स्वतंत्र स्तंभ है।
इस दौरे में ऊर्जा, रक्षा, अंतरिक्ष और व्यापार जैसे प्रमुख क्षेत्रों में सहयोग को नई गति मिली। विशेषकर ऊर्जा सुरक्षा पर हुई चर्चाएँ भारत के लिए महत्वपूर्ण हैं। रूस विश्व के प्रमुख ऊर्जा-उत्पादक देशों में से है और भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था को स्थिर, सस्ती और दीर्घकालिक ऊर्जा आपूर्ति की आवश्यकता है। यह साझेदारी केवल आर्थिक नहीं, भू-राजनीतिक रूप से भी अहम है, क्योंकि यह भारत को वैश्विक ऊर्जा बाजार में मजबूती प्रदान करती है।
रक्षा क्षेत्र में सहयोग भारत-रूस संबंधों की पहचान रहा है। सुखोई, ब्रह्मोस और एस-400, एस-500 जैसे परियोजनाएँ इस भरोसे का प्रमाण हैं। पुतिन के दौरे ने यह संदेश दिया कि भविष्य में भी रक्षा प्रौद्योगिकी के संयुक्त विकास और उत्पादन पर दोनों देश समान रूप से प्रतिबद्ध हैं। यह सहयोग भारत की आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को भी बल देता है।
जहाँ एक ओर भारत पश्चिमी देशों के साथ गहन साझेदारी बनाए हुए है, वहीं रूस के साथ संबंधों का संतुलन बनाए रखना उसकी सामरिक मजबूरी नहीं, बल्कि रणनीतिक बुद्धिमत्ता का संकेत है। यह संतुलन भारत को किसी भी वैश्विक परिवर्तन के बीच अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को सुरक्षित रखने में सक्षम बनाता है।
पुतिन का यह दौरा यह भी याद दिलाता है कि भारत कूटनीतिक संवाद और संतुलित नीति के माध्यम से आज अंतरराष्ट्रीय मंच पर मध्यस्थ, साझेदार और निर्णायक शक्ति की भूमिका में है। बहुध्रुवीय विश्व के निर्माण में भारत और रूस दोनों की भूमिका अनिवार्य है, और इस यात्रा ने इस दिशा में नई ऊर्जा का संचार किया है।

अपने मतलब के अलावा कौन किसको पूछता है! पेड़ जब सूख जाए तो परिंदे भी बसेरा नहीं करते

✍️ कैलाश सिंह

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। समय बदल रहा है और इस बदलते जमाने में रिश्तों की परिभाषा भी बदल गई है। आज जब जीवन की राहों पर वक्त की बेरहमी से तिलमिलाएं हुए लोग सामने से गुजरते हैं, तो मन से एक ही आवाज उठती है— इस भरी दुनिया में कोई हमारा न हुआ! गैर तो गैर, आज के दौर में अपने भी सहारा देने से कतराने लगे हैं।जब तक शरीर में इंद्रियों का रंगमंच सजा रहता है, मनुष्य दुनिया को मुट्ठी में भर लेने के सपने देखता है।

अपनों के सपनों को संवारने के लिए न जाने कितनों को रौंद देता है। लेकिन जैसे ही वक्त करवट बदलता है, तन्हाई अंगड़ाई लेने लगती है। वही अपने, जिनके लिए थककर गिरने तक मेहनत की जाती है, पास आने से भी दूरी बना लेते हैं। घोर अंधेरी रातों में जब लोग सपनों की दुनिया में खोए रहते हैं, तब किसी बूढ़ी आंख का अकेलापन बरसात की तरह झूमकर बरसता है। मन अपनों के स्पर्श को तरसता है और चंचल यादें दिल के क्षितिज पर बिजली की तरह कड़कती हैं।

अवतरण दिवस से लेकर मरण दिवस तक आदमी वही करता है जिसकी परिणति अंत तक सार्थक नहीं होती। माया की छाया में जो कुछ कमाया, जो कुछ लुटाया—अंतिम पड़ाव में उसका फल केवल तन्हाई की तड़पन ही बनकर साथ आता है।परिवार टूट रहे हैं, आस्था कलंकित हो रही है, और बड़े–छोटे का लिहाज समाप्त हो चुका है। तन्हा रहने की ‘रश्म’ चलन बन चुकी है। हालात इतने भयावह हो गए हैं कि बाप की मौत पर भी स्वार्थी सपूत श्मशान पर नग्न तांडव करते दिख जाते हैं।

संवेदनाएं मर चुकी हैं, इंसानियत शर्मशार है, और व्यवहार में स्वार्थ का जहर घुल चुका है।आधुनिकता के उपकरणों ने दिखावटी जीवन का दंभ बढ़ा दिया है। रिश्तों की बुनियाद रोज़ दरक रही है। इंसान असहाय हो गया है और उसकी सोच पर स्वार्थ का पर्दा इस कदर चढ़ गया है कि मर्यादा भी उसके लिए बोझ बन गई है।

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जीवन स्थाई निवास नहीं, केवल एक पड़ाव है—यह जानते हुए भी मनुष्य मोह-माया से बाहर नहीं आ पाता। उम्र के तराजू पर कर्मों की खेती जब फल देती है, तो उसके पुण्य-पाप की असली तस्वीर खाट पर दिखाई देती है।दुर्भाग्य यह है कि जिनके लिए जीवन भर मेहनत की भट्ठी में खुद को जलाया, वही अपने अंतिम समय में पास आने से कतराते हैं। अंतिम सफर में अपने ही दुआओं के सहयात्री बन सकते हैं—पर इसके लिए जीवन में सत्कर्मों की खेती आवश्यक है।

धन, संपत्ति, वैभव—इन सबका गुमान छोड़ देना चाहिए। क्योंकि थोड़ा-सा स्वार्थ का झोंका भी इंसान को तिरस्कार की गहराई में डुबो देता है।याद रखिए—हम खाली हाथ आए थे, खाली हाथ ही जाएंगे। समय रहते संभल जाएं, तो सफर के अंतिम पड़ाव में राह आसान हो सकती है।

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ऑनलाइन गेमिंग से बर्बाद होता भविष्य, जागरूकता ही बचाव का रास्ता

सोमनाथ मिश्रा की रिपोर्ट
(राष्ट्र की परम्परा)


आज के डिजिटल युग में स्मार्टफोन और
इंटरनेट ने हमारे जीवन को जितना आसान बनाया है, उतना ही जोखिम भरा भी बना दिया है। ऑनलाइन गेमिंग की लत एक ऐसा ही गंभीर खतरा बनकर उभरी है, जो बच्चों से लेकर युवाओं और यहां तक कि वयस्कों को भी अपनी गिरफ्त में ले रही है। शुरू में मनोरंजन के तौर पर शुरू होने वाला यह गेमिंग शौक धीरे-धीरे लत में बदल जाता है और व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से नुकसान पहुंचाता है।
क्या है ऑनलाइन गेमिंग की लत?
जब कोई व्यक्ति हर खाली समय में गेम खेलने लगे, दिन-रात उसका ध्यान सिर्फ मोबाइल या लैपटॉप पर रहने लगे, पढ़ाई-लिखाई, काम, रिश्ते और जिम्मेदारियां उससे पीछे छूटने लगें, तब समझ लीजिए कि वह ऑनलाइन गेमिंग की लत का शिकार हो चुका है। कई बार लोग खुद को इससे बाहर निकालने की कोशिश करते हैं, लेकिन असफल रहते हैं।

स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गंभीर प्रभाव।
ऑनलाइन गेमिंग की अधिकता से कई गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं, जैसे
आंखों की रोशनी कमजोर होना।
सिरदर्द और नींद की कमी।
तनाव और चिड़चिड़ापन।
मोटापा और शारीरिक कमजोरी।
सामाजिक दूरी और अवसाद।
पढ़ाई और करियर पर नकारात्मक प्रभाव।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि समय रहते इस पर नियंत्रण न किया जाए, तो यह मानसिक रोग का रूप भी ले सकता है।
कैसे छुटकारा पाएं ऑनलाइन गेमिंग की लत से?
अगर आप या आपका कोई करीबी इस आदत से परेशान है, तो ये उपाय बेहद कारगर हो सकते हैं:

  1. समय सीमा तय करें – रोज़ाना एक तय समय से अधिक गेम न खेलें।
  2. नोटिफिकेशन बंद करें – गेम से जुड़े अलर्ट और रिमाइंडर हटाएं।
  3. खेल से दूरी बनाएं – मोबाइल से गेमिंग ऐप्स डिलीट कर दें।
  4. कोई नया शौक अपनाएं – जैसे किताबें पढ़ना, योग, जिम, खेलकूद या संगीत।
  5. परिवार और दोस्तों से जुड़ें – बातचीत और सामाजिक मेल-जोल बढ़ाएं।
  6. मोटिवेशन लें – जरूरत पड़े तो काउंसलर या मनोवैज्ञानिक की मदद लें।
    थोड़े-थोड़े प्रयास और दृढ़ संकल्प से इस लत को छोड़ा जा सकता है।
    माता-पिता के लिए जरूरी सलाह
    माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों के स्क्रीन टाइम पर नजर रखें, उनके साथ समय बिताएं और उन्हें आउटडोर एक्टिविटी के लिए प्रेरित करें। बच्चों को समझाना चाहिए कि गेम जिंदगी नहीं है, बल्कि जिंदगी में गेम केवल एक छोटा सा हिस्सा है।
    ऑनलाइन गेमिंग की लत केवल एक आदत नहीं, बल्कि एक गंभीर समस्या है जो धीरे-धीरे व्यक्ति की पूरी जिंदगी को प्रभावित कर सकती है। सही समय पर उठाया गया कदम ही इसे रोका जा सकता है। अगर हम खुद और अपने अपनों के भविष्य को सुरक्षित रखना चाहते हैं तो आज ही इस पर नियंत्रण जरूरी है।