महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। सरकार की महत्वाकांक्षी स्वच्छ पेयजल योजनाओं को जमीनी स्तर पर किस तरह पलीता लगाया जा रहा है, इसका ताजा उदाहरण मिठौरा विकास खंड की ग्राम पंचायत पिपरा सोनाड़ी में सामने आया है। यहां सांसद निधि से स्थापित आरो प्लांट ग्रामीणों के लिए राहत बनने के बजाय अब निजी कमाई का साधन बन गया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार ग्राम पंचायत भवन परिसर में लगाया गया यह आरो प्लांट नि:शुल्क शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से स्थापित किया गया था, लेकिन वर्तमान में इसे निजी प्लांट की तरह संचालित किया जा रहा है। आरोप है कि ग्राम प्रधान प्रतिनिधि द्वारा लोगों से पानी के बदले पैसे वसूले जा रहे हैं, जिससे गरीब और जरूरतमंद परिवारों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ग्रामीणों ने बताया कि सांसद पंकज चौधरी ने क्षेत्रवासियों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए सांसद निधि से लाखों रुपये की लागत से यह आरो प्लांट लगवाया था। योजना का उद्देश्य था कि गांव के सभी परिवारों को स्वच्छ पानी नि:शुल्क उपलब्ध कराया जाए। लेकिन पंचायत स्तर पर इस जनहित योजना की मंशा को बदलकर इसे व्यवसाय का रूप दे दिया गया। ग्रामीणों का आरोप है कि 15 लीटर पानी के लिए 15 रुपये वसूले जा रहे हैं। ग्रामीणों ने नाराजगी जताते हुए कहा कि उन्होंने उम्मीद की थी कि अब गांव में साफ पानी मिलेगा, लेकिन पानी खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। इस मामले में ग्राम पंचायत अधिकारी सत्यम चौधरी ने स्पष्ट किया कि यह विषय उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है और यदि आरो प्लांट का संचालन निजी तौर पर किया जा रहा है तो इसकी जिम्मेदारी ग्राम प्रधान की होगी। अधिकारियों की यह प्रप्रतिक्रिया ग्रामीणों में नाराजगी और बढ़ा रही हैं, क्योंकि जनता की सुविधा के लिए लगाए गए सरकारी सांसदीय संसाधनों का खुला दुरुपयोग हो रहा है और कोई जिम्मेदार इस पर कार्यवाही करने के लिए आगे नहीं आ रहा। स्थानीय निवासियों ने संसद, जिला प्रशासन तथा ब्लॉक प्रशासन से इस मामले की जांच कर कार्रवाई की मांग की है ताकि सांसद निधि से लगाई गई जनता की सुविधा पूर्ण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई जा सके और इससे निजी कमाई के लिए की जा रही अवैध वसूली पर रोक लग सके।
पैसे की दौड़ में रिश्ते छूटे, और जीवन ने खो दिया अपना सुकून।
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। आज की तेज रफ्तार ज़िंदगी में सफलता को अक्सर धन और भौतिक उपलब्धियों के तराज़ू पर तौला जाने लगा है। बड़े शहर, आलीशान मकान, महंगी गाड़ियां और आधुनिक सुविधाएं इन सबको ही सुख- समृद्धि का पर्याय मान लिया गया है। लेकिन क्या वास्तव में केवल पैसा जीवन को पूर्ण और खुशहाल बना सकता है? यह सवाल आज समाज के हर वर्ग में गूंज रहा है। निस्संदेह, पैसा जीवन में कई दरवाज़े खोलता है। यह शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और अवसर उपलब्ध कराता है, जिससे व्यक्ति अपने सपनों की दिशा में आगे बढ़ सकता है। लेकिन यही पैसा जीवन के सफर को अर्थ पूर्ण नहीं बनाता। जीवन की असली खूबसूरती उन रिश्तों से आती है, जो कठिन समय में संबल बनें, सफलता में जमीन से जोड़े रखें और असफलता में टूटने न दें। यहां हमसफर का अर्थ केवल जीवनसाथी से नहीं है, बल्कि वे सभी लोग हैं जो जीवन की यात्रा में साथ निभाते हैं—परिवार, मित्र, सहयोगी और वे रिश्ते, जो बिना कहे भी भावनाओं को समझ लेते हैं। इन्हीं संबंधों से जीवन को भावनात्मक मजबूती मिलती है, जो किसी भी भौतिक संपत्ति से कहीं अधिक मूल्यवान होती है। अक्सर देखने में आता है कि अपार धन होने के बावजूद कई लोग अकेलेपन और खालीपन का शिकार होते हैं, क्योंकि उनके पास सुख-दुख बांटने वाला कोई नहीं होता। वहीं सीमित साधनों में जीवन जीने वाले लोग भी अपनापन, संतोष और मुस्कान से भरा संसार रच लेते हैं। यह स्पष्ट करता है कि खुशियां जेब से नहीं, दिल से जन्म लेती हैं।डिजिटल युग में जहां संपर्क के साधन बढ़े हैं, वहीं रिश्तों में दूरी भी बढ़ी है। व्यस्त जीवन -शैली ने इंसान को अपनों से दूर कर दिया है। ऐसे में ज़रूरत है कि हम यह समझें कि पैसा केवल साधन है, लक्ष्य नहीं। जीवन का असली वैभव धन में नहीं, बल्कि उन कदमों में है जो साथ-साथ चलते हैं।
स्कूली वाहन में लगी आग, चालक की सूझबूझ से टला बड़ा हादसा
सलेमपुर/देवरिया(राष्ट्र की परम्परा)सलेमपुर के भठवां धर्मपुर में संचालित एक निजी विद्यालय के वाहन में मझौली राज वार्ड नंबर 11 के पास वाहन में अचानक आग लग गई। घटना उस समय हुई जब स्कूल वाहन बच्चों को उनके घरों से बैठाने के लिए जा रहा था।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, घटना के समय वाहन में दो शिक्षिकाएं, तीन बच्चे तथा चालक मौजूद थे। चालक को जैसे ही वाहन से धुआं और आग की भनक लगी, उसने तत्परता और सूझबूझ दिखाते हुए सभी बच्चों और शिक्षिकाओं को सुरक्षित बाहर निकाल लिया। कुछ ही क्षणों में आग ने विकराल रूप धारण कर लिया और वाहन पूरी तरह आग की चपेट में आ गया।
सूचना मिलते ही फायर डिपार्टमेंट की टीम मौके पर पहुंची और आग पर काबू पाया। अग्निशमन कार्य में अमरेंद्र कुमार पांडेय, अनूप यादव, भूपेंद्र राजभर, अनूप कुमार सहित अन्य कर्मी शामिल रहे। हालांकि तब तक स्कूली वाहन पूरी तरह जलकर राख हो चुका था।
स्थानीय लोगों ने भी आग बुझाने का प्रयास किया, लेकिन आग इतनी तेजी से फैली कि वाहन को बचाया नहीं जा सका। गनीमत यह रही कि समय रहते सभी को बाहर निकाल लिया गया, जिससे किसी प्रकार की जनहानि नहीं हुई।
घटना के बाद क्षेत्र में हड़कंप मच गया। लोगों का कहना है कि निजी विद्यालयों द्वारा संचालित स्कूली वाहनों की नियमित फिटनेस जांच, अग्निशमन उपकरणों की उपलब्धता और सुरक्षा मानकों की अनदेखी की जा रही है। यदि चालक समय पर सतर्कता न दिखाता, तो एक बड़ा हादसा हो सकता था।
इस घटना ने एक बार फिर निजी विद्यालय प्रबंधन की जिम्मेदारी और प्रशासनिक निगरानी पर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय नागरिकों व अभिभावकों ने मांग की है कि सभी स्कूली वाहनों की फिटनेस, फायर सेफ्टी उपकरणों और सुरक्षा मानकों की सख्त जांच कराई जाए, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
फिलहाल घटना में किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है, लेकिन स्कूल प्रबंधन की लापरवाही को लेकर अभिभावकों में नाराजगी देखी जा रही है।
गाँवों की सेहत पर संकट: टूटी स्वास्थ्य व्यवस्थाएँ और अनसुनी आवाज़ें कब तक इंतज़ार करेंगी?
भारत के ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की दुर्दशा आज भी विकास की सच्चाई को कठोर रूप में सामने रखती है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की भारी कमी, आवश्यक दवाओं का अभाव, एम्बुलेंस सेवा की अनियमितता और जागरूकता की कमी—ये सभी समस्याएँ मिलकर ग्रामीण भारत की सेहत को लगातार खतरे में डाल रही हैं। देश की बड़ी आबादी गाँवों में रहती है, लेकिन वही आबादी सबसे ज़्यादा उपेक्षित भी दिखती है। ऐसे में सवाल उठता है—जब आम नागरिकों को बुनियादी इलाज भी उपलब्ध नहीं, तो विकास के दावों पर भरोसा कैसे किया जाए?
ग्रामीण स्वास्थ्य ढाँचा वास्तविक रूप से चरमराया हुआ है। कई उप-स्वास्थ्य केंद्र महीनों बंद रहते हैं, और जहाँ खुले हैं वहाँ स्टाफ की उपस्थिति संदिग्ध रहती है। मातृ-स्वास्थ्य, टीकाकरण अभियान और आपातकालीन इलाज जैसी बुनियादी सेवाएँ अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच पातीं। प्रसव के समय महिलाओं को उचित सुविधा न मिलने का जोखिम आज भी गाँवों में मौजूद है, जबकि किशोरियों में कुपोषण और एनीमिया जैसी समस्याएँ लगातार बढ़ रही हैं, जो भविष्य की पीढ़ियों को कमजोर बनाती हैं।
सरकार की ओर से कई योजनाएँ शुरू की गई हैं—जैसे आयुष्मान भारत, टेलीमेडिसिन और डिजिटल हेल्थ मिशन—लेकिन इनका लाभ तभी ग्रामीणों तक पहुँच सकता है जब इंटरनेट, सड़क और संचार जैसी बुनियादी सुविधाएँ मजबूत हों। गाँवों में सूचना का अभाव और सरकारी व्यवस्था में जवाबदेही की कमी इन योजनाओं की गति को रोक देती है। परिणामस्वरूप, कागज़ पर उत्कृष्ट दिखने वाली योजनाएँ ज़मीन पर फीकी पड़ जाती हैं।
निजी अस्पताल ग्रामीण परिवारों के लिए किसी दूर के सपने की तरह हैं। महंगे इलाज के कारण कई परिजनों को कर्ज लेना पड़ता है, जबकि बड़ी संख्या ऐसे परिवारों की है जो वित्तीय बोझ से बचने के लिए इलाज ही नहीं कराते। मामूली बीमारी भी बड़े संकट में बदल जाती है और कई बार जानलेवा साबित होती है।
ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की यह स्थिति केवल स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौती नहीं, बल्कि एक सामाजिक, आर्थिक और मानवाधिकार संबंधी मुद्दा भी है। जब गाँव स्वस्थ होंगे, तभी देश के विकास की नींव मजबूत होगी। इसलिए यह समय है कि सरकार, स्वास्थ्य विभाग, स्थानीय प्रशासन और समाज सभी मिलकर यह समझें कि ग्रामीण भारत की सेहत ही राष्ट्र की वास्तविक प्रगति का पैमाना है।
आख़िरकार बड़ा प्रश्न यही है—गाँवों की स्वास्थ्य व्यवस्था की ज़िम्मेदारी कौन लेगा और कब? जब तक इस प्रश्न का जवाब ईमानदारी से नहीं खोजा जाएगा, तब तक ग्रामीण भारत की आवाज़ें अनसुनी ही रहेंगी।
गाँवों की सेहत पर संकट: टूटी स्वास्थ्य व्यवस्थाएँ और अनसुनी आवाज़ें कब तक इंतज़ार करेंगी?
भारत के ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की दुर्दशा आज भी विकास की सच्चाई को कठोर रूप में सामने रखती है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की भारी कमी, आवश्यक दवाओं का अभाव, एम्बुलेंस सेवा की अनियमितता और जागरूकता की कमी—ये सभी समस्याएँ मिलकर ग्रामीण भारत की सेहत को लगातार खतरे में डाल रही हैं। देश की बड़ी आबादी गाँवों में रहती है, लेकिन वही आबादी सबसे ज़्यादा उपेक्षित भी दिखती है। ऐसे में सवाल उठता है—जब आम नागरिकों को बुनियादी इलाज भी उपलब्ध नहीं, तो विकास के दावों पर भरोसा कैसे किया जाए?
ग्रामीण स्वास्थ्य ढाँचा वास्तविक रूप से चरमराया हुआ है। कई उप-स्वास्थ्य केंद्र महीनों बंद रहते हैं, और जहाँ खुले हैं वहाँ स्टाफ की उपस्थिति संदिग्ध रहती है। मातृ-स्वास्थ्य, टीकाकरण अभियान और आपातकालीन इलाज जैसी बुनियादी सेवाएँ अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच पातीं। प्रसव के समय महिलाओं को उचित सुविधा न मिलने का जोखिम आज भी गाँवों में मौजूद है, जबकि किशोरियों में कुपोषण और एनीमिया जैसी समस्याएँ लगातार बढ़ रही हैं, जो भविष्य की पीढ़ियों को कमजोर बनाती हैं।
सरकार की ओर से कई योजनाएँ शुरू की गई हैं—जैसे आयुष्मान भारत, टेलीमेडिसिन और डिजिटल हेल्थ मिशन—लेकिन इनका लाभ तभी ग्रामीणों तक पहुँच सकता है जब इंटरनेट, सड़क और संचार जैसी बुनियादी सुविधाएँ मजबूत हों। गाँवों में सूचना का अभाव और सरकारी व्यवस्था में जवाबदेही की कमी इन योजनाओं की गति को रोक देती है। परिणामस्वरूप, कागज़ पर उत्कृष्ट दिखने वाली योजनाएँ ज़मीन पर फीकी पड़ जाती हैं।
निजी अस्पताल ग्रामीण परिवारों के लिए किसी दूर के सपने की तरह हैं। महंगे इलाज के कारण कई परिजनों को कर्ज लेना पड़ता है, जबकि बड़ी संख्या ऐसे परिवारों की है जो वित्तीय बोझ से बचने के लिए इलाज ही नहीं कराते। मामूली बीमारी भी बड़े संकट में बदल जाती है और कई बार जानलेवा साबित होती है।
ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की यह स्थिति केवल स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौती नहीं, बल्कि एक सामाजिक, आर्थिक और मानवाधिकार संबंधी मुद्दा भी है। जब गाँव स्वस्थ होंगे, तभी देश के विकास की नींव मजबूत होगी। इसलिए यह समय है कि सरकार, स्वास्थ्य विभाग, स्थानीय प्रशासन और समाज सभी मिलकर यह समझें कि ग्रामीण भारत की सेहत ही राष्ट्र की वास्तविक प्रगति का पैमाना है।
आख़िरकार बड़ा प्रश्न यही है—गाँवों की स्वास्थ्य व्यवस्था की ज़िम्मेदारी कौन लेगा और कब? जब तक इस प्रश्न का जवाब ईमानदारी से नहीं खोजा जाएगा, तब तक ग्रामीण भारत की आवाज़ें अनसुनी ही रहेंगी।
देवरिया पुलिस का ‘मार्निंग वॉकर चेकिंग’ अभियान, आमजन से सीधा संवाद कर दिलाया सुरक्षा का भरोसा
देवरिया(राष्ट्र की परम्परा)
जनपद में शांति, सुरक्षा एवं कानून व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ बनाए रखने के उद्देश्य से पुलिस अधीक्षक देवरिया संजीव सुमन के निर्देशन में शुक्रवार को ‘मार्निंग वॉकर चेकिंग’ अभियान चलाया गया। यह अभियान प्रातः 5 बजे से 8 बजे तक जनपद के विभिन्न थाना क्षेत्रों में संचालित किया गया।अभियान के तहत सभी थाना प्रभारी एवं थानाध्यक्षों ने मॉर्निंग वॉक पर निकले नागरिकों से सीधे संवाद स्थापित किया और उन्हें सुरक्षा का भरोसा दिलाया। पुलिस अधिकारियों ने सामुदायिक सहभागिता को बढ़ावा देते हुए लोगों की समस्याएं सुनीं तथा छोटे-मोटे विवादों का मौके पर ही समाधान किया। इस पहल से मित्र पुलिसिंग की भावना को मजबूती मिली।चेकिंग के दौरान संदिग्ध व्यक्तियों एवं वाहनों की सघन जांच की गई। पुलिस ने तीन सवारी, नाबालिगों द्वारा वाहन चलाने, मॉडिफाइड साइलेंसर वाले दोपहिया वाहनों के खिलाफ कार्रवाई की। साथ ही चोरी के वाहनों, अवैध असलहा एवं मादक पदार्थों पर विशेष नजर रखी गई।संवाद के दौरान पुलिस ने आमजन को ‘मार्निंग वॉकर चेकिंग’ अभियान के उद्देश्य और महत्व से अवगत कराया। लोगों ने पुलिस की इस पहल की सराहना करते हुए मॉर्निंग वॉक के दौरान बेहतर सुरक्षा व्यवस्था पर संतोष व्यक्त किया।पुलिस विभाग ने स्पष्ट किया कि ऐसे अभियान आगे भी निरंतर जारी रहेंगे, ताकि जनपद में कानून व्यवस्था मजबूत बनी रहे और नागरिकों में सुरक्षा व विश्वास की भावना कायम रहे।
अभियान की संक्षिप्त उपलब्धि
इस चेकिंग अभियान के दौरान जनपद के कुल 23 स्थानों पर जांच की गई, जिसमें 368 व्यक्तियों एवं 202 वाहनों की चेकिंग की गई।
आवारा कुत्तों का आतंक: सुप्रीम कोर्ट के आदेश बेअसर, आमजन भयभीत
मऊ (राष्ट्र की परम्परा)।शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों तक मऊ में आवारा कुत्तों का आतंक लगातार बढ़ता जा रहा है। अस्पताल, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, बाजार और रिहायशी गलियों में झुंड के रूप में मौजूद ये कुत्ते आए दिन लोगों को अपना शिकार बना रहे हैं। बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं में भय का माहौल है, लेकिन इसके बावजूद प्रशासनिक स्तर पर ठोस पहल नज़र नहीं आ रही है। सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देशों के बाद भी जमीनी कार्रवाई का अभाव चिंता बढ़ा रहा है।
स्थानीय नागरिकों के अनुसार, कई इलाके ऐसे हैं जहां कुत्तों के डर से लोग रास्ता बदलकर निकलने को मजबूर हैं। अचानक हमला कर देना, पीछे से काट लेना और रात के समय झुंड में दौड़ाना अब आम बात हो गई है। सबसे ज्यादा परेशानी स्कूल जाने वाले बच्चों और सुबह-शाम टहलने वालों को हो रही है। कई मामलों में लोग गंभीर रूप से घायल भी हुए हैं।
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जिला अस्पताल और ग्रामीण क्षेत्रों के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) पर एंटी-रेबीज इंजेक्शन लगवाने वालों की लंबी कतारें देखी जा रही हैं। शासन-प्रशासन हर माह लाखों रुपये खर्च कर रहा है, फिर भी आवारा कुत्तों की संख्या में कोई कमी नहीं दिखती। यह स्थिति न केवल स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव बढ़ा रही है, बल्कि आमजन की सुरक्षा पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के लिए शेड, नसबंदी और वैज्ञानिक प्रबंधन की दिशा में सख्त आदेश दिए हैं। आदेशों से आमजन को उम्मीद जगी थी कि नगर पालिका और नगर पंचायतें तेजी से कदम उठाएंगी, लेकिन अब तक केवल कागजी प्रक्रियाएं ही आगे बढ़ती दिख रही हैं। नगर पालिका क्षेत्र में जमीन चिन्हित करने की बात कही जा रही है, पर शेड निर्माण की समय-सीमा स्पष्ट नहीं है।
इस संबंध में नगर पालिका मऊ के अधिशासी अधिकारी दिनेश कुमार ने बताया कि नगर पालिका में जमीन चिन्हित कर ली गई है और अन्य नगर पंचायतों को भी जमीन चिन्हित करने के निर्देश दिए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार सभी प्रक्रियाएं जल्द पूरी की जाएंगी। हालांकि, आम नागरिकों का कहना है कि जब तक ठोस कार्रवाई जमीन पर नहीं दिखेगी, तब तक समस्या जस की तस बनी रहेगी।
शहरवासियों की मांग है कि आवारा कुत्तों की नसबंदी, शेड निर्माण और निगरानी व्यवस्था को प्राथमिकता दी जाए, ताकि मऊ में बढ़ते इस खतरे पर प्रभावी नियंत्रण किया जा सके।
बिहार के सात शहरों की हवा हुई खतरनाक, पटना में AQI 343 तक पहुंचा, स्वास्थ्य पर मंडराया संकट
पटना/बिहार (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) बिहार के शहरी इलाकों में एक बार फिर वायु प्रदूषण ने गंभीर रूप ले लिया है। राजधानी पटना सहित राज्य के सात प्रमुख शहरों की हवा ‘खराब’ श्रेणी में पहुंच चुकी है, जिससे आम जनजीवन और स्वास्थ्य पर सीधा असर पड़ रहा है। सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक पटना, आरा, हाजीपुर, बिहारशरीफ, बक्सर, राजगीर और समस्तीपुर ऑरेंज जोन में दर्ज किए गए हैं, जहां औसत एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 200 से 300 के बीच बना हुआ है।
ये भी पढ़ें –बिहार सरकार का बड़ा एक्शन: लालू यादव की जब्त संपत्तियों पर खुलेंगे सरकारी स्कूल, गृह मंत्री सम्राट चौधरी का ऐलान
शुक्रवार को पटना का औसत AQI 217 रिकॉर्ड किया गया, लेकिन कई इलाकों में हालात बेहद चिंताजनक रहे। वेटनरी कॉलेज मैदान क्षेत्र में AQI 343 तक पहुंच गया, जो ‘बेहद खराब’ श्रेणी में आता है। सचिवालय क्षेत्र में 253, तारामंडल में 254, दानापुर में 202 और गांधी मैदान इलाके में 163 AQI दर्ज किया गया। हालांकि पटना सिटी क्षेत्र में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रही, जहां AQI 90 रिकॉर्ड हुआ।
अन्य शहरों में भी प्रदूषण का स्तर खतरनाक बना हुआ है। आरा का AQI 266, बिहारशरीफ 261, हाजीपुर 229, राजगीर 261 और समस्तीपुर 258 दर्ज किया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति शहरीकरण, लगातार निर्माण कार्य, सूखी सड़कों और वाहनों से उड़ने वाली धूल के कारण पैदा हुई है। पीएम 2.5 और पीएम 10 का स्तर मानक से तीन गुना तक अधिक पाया गया है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चेतावनी
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने लोगों को विशेष सतर्कता बरतने की सलाह दी है। डॉक्टरों के अनुसार AQI 300 के पार जाने पर सांस संबंधी बीमारियों, आंखों में जलन, सिरदर्द और हृदय रोग का खतरा बढ़ जाता है। बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और फेफड़ों के मरीजों को घर के अंदर रहने और मास्क का उपयोग करने की सलाह दी गई है।
वहीं, नगर निगम की प्रदूषण नियंत्रण व्यवस्था पर सवाल भी उठ रहे हैं। हालांकि बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के चेयरमैन डॉ. डीके शुक्ला ने स्पष्ट किया है कि एंटी-स्मॉग जेट से मशीनों के पास पानी छिड़काव करने से AQI रीडिंग प्रभावित नहीं होती।
बिहार सरकार का बड़ा एक्शन: लालू यादव की जब्त संपत्तियों पर खुलेंगे सरकारी स्कूल, गृह मंत्री सम्राट चौधरी का ऐलान
पटना (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)बिहार में नई सरकार के गठन के साथ ही माफिया और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख अपनाया गया है। इसी कड़ी में राज्य के गृह मंत्री सम्राट चौधरी ने बड़ा बयान देते हुए कहा है कि राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की जब्त की गई संपत्तियों का उपयोग अब जनहित के कार्यों में किया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार से अर्जित संपत्तियों पर ताले नहीं लटकेंगे, बल्कि वहां सरकारी स्कूल खोले जाएंगे, जिससे गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों को सीधा लाभ मिल सके।
ये भी पढ़ें –राजनीति में रिश्तों का टूट रहा दम—स्वार्थ की आंच में जलती मानवीय संवेदनाएं
एक न्यूज चैनल को दिए गए इंटरव्यू में सम्राट चौधरी ने कहा कि लालू प्रसाद यादव चारा घोटाले के मामलों में दोषी ठहराए जा चुके हैं, जिनकी कुल राशि लगभग 950 करोड़ रुपये बताई जाती है। उन्होंने यह भी बताया कि ईडी और सीबीआई पहले ही लालू यादव की कई संपत्तियों को अटैच कर चुकी हैं। इनमें पटना चिड़ियाघर के पास स्थित एक बड़ी बिल्डिंग भी शामिल है, जो बीते करीब 20 वर्षों से बंद पड़ी है।
गृह मंत्री ने कहा कि जनता के टैक्स के पैसों से बने अवैध ढांचों को अब जनता के काम में लाया जाएगा। उक्त भवन की रंगाई-पुताई कर वहां सरकारी स्कूल शुरू करने की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है। उनका कहना था कि कानून से ऊपर कोई नहीं है, चाहे वह कितना ही बड़ा नेता क्यों न हो।
उन्होंने आगे कहा कि बिहार सरकार भ्रष्टाचार से अर्जित हर इंच जमीन और संपत्ति को जब्त कर जनकल्याण के लिए इस्तेमाल करेगी। आम नागरिकों को डरने की कोई जरूरत नहीं है, डर उन्हें होना चाहिए जो अपराध और भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। या तो उन्हें सुधरना होगा या बिहार छोड़ना होगा।
इधर, पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी को सरकारी आवास खाली करने के नोटिस के बाद लालू परिवार के महुआबाग स्थित नए बंगले को लेकर भी सियासी चर्चा तेज हो गई है। सत्ता पक्ष लगातार इस आलीशान निर्माण की जांच की मांग कर रहा है, जिससे बिहार की राजनीति और अधिक गर्मा गई है।
राजनीति में रिश्तों का टूट रहा दम—स्वार्थ की आंच में जलती मानवीय संवेदनाएं
कैलाश सिंह
महराजगंज( राष्ट्र की परम्परा)। भारतीय लोकतंत्र की जड़ें सामाजिक संबंधों, विश्वास और संवाद की संस्कृति पर टिकी रही हैं। लेकिन बीते कुछ वर्षों में राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है, जहां रिश्तों का दम टूटता जा रहा है। मित्रता,सहयोग, सम्मान और नैतिक संबंधों की जिस परंपरा ने राजनीति को सेवा का माध्यम बनाया था, वह अब निजी महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ती दिख रही है। राजनीति का स्वरूप जितना विस्तार पा रहा है, उतना ही मानवीय रिश्तों का दायरा सिकुड़ता जा रहा है।
आज की राजनीति में दल बदल, अवसरवाद, वादे तोड़ना, भरोसा तोड़ना और गठबंधन का बिखरना आम तस्वीरें बन चुकी हैं। रिश्ते अब विचारधारा पर नहीं, बल्कि सत्ता- समीकरणों पर आधारित होने लगे हैं। नेता एक-दूसरे के साथ वर्षों पुरानी निष्ठा को एक झटके में त्याग देते हैं, और राजनीतिक रिश्तों की यह नाजुकता लोकतंत्र की सेहत के लिए गंभीर संकेत है।
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सबसे चिंताजनक बात यह है कि राजनीति में रिश्तों का यह पतन केवल नेताओं तक सीमित नहीं,यह संस्कृति समाज तक भी पहुंच रही है। जहां कभी राजनीतिक मतभेद स्वस्थ्य बहस का माध्यम होते थे, वहीं आज वे सामाजिक कटुता और व्यक्तिगत वैमनस्यता का रूप ले रहे हैं। राजनीतिक दलों में विचारधारा से अधिक महत्व व्यक्ति-पूजा और हित-समूहों ने ले लिया है। ऐसे में रिश्ते टिकते नहीं, केवल निभाए जाते हैं—वह भी स्वार्थ पूर्ति की सीमा तक।
कभी राजनीति समाज का दर्पण होती थी, आज राजनीति समाज के विचारों को दिशा देने का बड़ा माध्यम है। जब राजनीतिक रिश्ते ही स्वार्थ की बलि चढ़ेंगे, तो समाज में भरोसा और संवाद का ताना- बाना कैसे सुरक्षित रह पाएगा? यह प्रश्न केवल राजनेताओं के लिए नहीं, हम सबके लिए है।
आज राजनीति को रिश्तों की गरिमा, मर्यादा और विश्वसनीयता को फिर से पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, यह संस्कृति, विश्वास और संवाद से चलता है। राजनीतिक रिश्तों को पवित्र न सही, पर कम से कम जिम्मेदार तो होना ही चाहिए।
आखिर राजनीति का उद्देश्य सेवा है, साजिश नहीं, समन्वय है, टूटन नहीं, और रिश्तों को तोड़ना नहीं, जोड़ना है।
यदि राजनीति यह मूलमंत्र भूल गई, तो सत्ता की सीढ़ियां भले ही चढ़ जाएं, लेकिन लोकतंत्र की आत्मा धीरे-धीरे दम तोड़ती रहेंगी।
सिंचाई के समय में हो रही नहर की सफाई—किसानों की परेशानियों का अंतहीन सिलसिला
महराजगंज(राष्ट्र की परम्परा)। किसानों के लिए सिंचाई का समय सबसे महत्वपूर्ण होता है। फसलें पानी की हर बूंद पर निर्भर करती हैं और नहरें ग्रामीण कृषि व्यवस्था की जीवन रेखा मानी जाती हैं, लेकिन विडंबना यह है कि जब नहरों से पानी बहना चाहिए, ठीक उसी समय सफाई का ढोल पीट दिया जाता है। यह व्यवस्था की वह खामोशी है जो किसानों के पसीने पर भारी पड़ती है। नहर की सफाई निश्चित रूप से आवश्यक है, पर सवाल यह है कि यह काम सिंचाई सीजन के ठीक बीच में ही क्यों याद आता है? जब खेतों को पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तभी नहरों का बहाव रोक देना किसानों की नियति के साथ खिलवाड़ है। कई स्थानों पर देखा गया है कि सफाई के नाम पर नहरें बंद कर दी जाती हैं, मिट्टी निकासी आधी-अधूरी रहती है और सफाई पूरी होने तक फसलें प्यास से तड़पती रहती हैं।
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किसान शिकायत करते हैं कि अधिकारी जमीन पर नहीं उतरते, केवल कागजों पर योजनाएं बनती रहती हैं। सफाई के नाम पर जिस सिस्टम को पारदर्शी और समयबद्ध होना चाहिए, वही सबसे अधिक लापरवाह प्रतीत होता है। नतीजा यह होता है कि फसलों की बढ़वार रुक जाती है, पैदावार पर असर पड़ता है और फिर उसी किसान को बाजार में कम दाम का बोझ भी झेलना पड़ता है। यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि योजनाबद्ध समय प्रबंधन की असफलता है। किसी भी सिंचाई विभाग को पता होता है कि कब रबी-सिंचाई की मांग बढ़ेगी, कब खरीफ की फसल को पानी चाहिए। इसके बावजूद सफाई का काम उसी समय शुरू करना समझ से परे है। यदि यही कार्य सिंचाई सीजन से पहले किया जाए, तो न केवल किसानों को राहत मिलेगी बल्कि नहरों की उपयोगिता भी अधिक बढ़ेगी। सरकार चाहे जितनी योजनाएं घोषित करे, पर धरातल पर उनका अमल तभी सफल माना जाएगा जब किसान की तकलीफ कम हो, उसकी फसल सुरक्षित रहे और उसका श्रम सम्मान पाए। नहर सफाई जैसे तकनीकी कार्यों में समय की प्राथमिकता को समझना सबसे जरूरी है।
किसानों की मांग सीधी और स्पष्ट है, सफाई हो,पर समय पर हो, नहर बंद हो, पर फसल को नुकसान न पहुंचे। प्रशासन के लिए यह चेतावनी है कि यदि कृषि व्यवस्था के मूल तत्व—पानी, नहरें और सिंचाई—का प्रबंधन सही न रहा, तो किसानों का भरोसा तंत्र से उठ जाएगा। और जब किसान ही निराश हो जाए, तो किसी भी अर्थव्यवस्था की नींव डगमगाना तय है।
गेहूं-चावल के बोरे में मिला खड़ा नमक, गरीबों के हक पर सीधा डाका
एफसीआई गोदाम की लापरवाही उजागर, गरीबों को मिल रहा घटिया राशन
अम्बेडकर नगर (राष्ट्र की परम्परा)।जिले के विकासखंड जहांगीरगंज अंतर्गत ग्राम पंचायत शिवराज पट्टी में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) की गंभीर खामियां उजागर हुई हैं। यहां राशन वितरण के दौरान सरकारी गेहूं और चावल के कई बोरे में भारी मात्रा में खड़ा नमक मिलने से हड़कंप मच गया। ग्रामीणों का आरोप है कि कोटेदार द्वारा न सिर्फ घटिया गुणवत्ता का राशन वितरित किया जा रहा है, बल्कि प्रति यूनिट लगभग दो किलो राशन की कटौती भी की जा रही है, जिससे राशनकार्ड धारक बेहद परेशान हैं।
ग्रामीण उपभोक्ताओं के अनुसार, कई गेहूं के बोरे में 4 से 8 किलो तक खड़ा नमक मिला, जो सीधे तौर पर खाद्यान्न की गुणवत्ता और सप्लाई चेन पर सवाल खड़ा करता है। जब इस बारे में कोटेदार विश्वनाथ वर्मा से पूछा गया तो उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि “हमें जैसा अनाज मिलता है, वैसा ही हम वितरित करते हैं। बोरे में नमक पहले से मिला होता है।” इससे यह स्पष्ट होता है कि अनियमितता केवल वितरण स्तर तक सीमित नहीं, बल्कि आपूर्ति की शुरुआती कड़ी में ही गड़बड़ी है।
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तहसील आलापुर क्षेत्र के सप्लाई इंस्पेक्टर अजय कुमार वर्मा ने फोन पर जानकारी देते हुए बताया कि यह खाद्यान्न एफसीआई गोदाम शाहगंज (जौनपुर) से उठान कर कोटेदारों को दिया जाता है। उन्होंने माना कि एफसीआई गोदाम और ठेकेदार की लापरवाही के कारण गुणवत्ता प्रभावित हुई है, जिसका खामियाजा गरीब उपभोक्ताओं को भुगतना पड़ रहा है।
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इस पूरे मामले ने खाद्यान्न आपूर्ति विभाग, एफसीआई और ठेकेदारों की भूमिका को संदेह के घेरे में ला दिया है। ग्रामीणों ने कोटेदार सहित पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की है। यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो इस तरह की लापरवाही और भ्रष्टाचार से लाखों गरीब परिवारों के स्वास्थ्य और अधिकारों पर गंभीर खतरा बना रहेगा।
संस्कृति पर्व–26: देवरिया में भोजपुरी अस्मिता का महाकुंभ, शनिवार से दिग्गज कलाकारों का जमावड़ा
देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)।विश्व भोजपुरी सम्मेलन की उत्तर प्रदेश इकाई के तत्वावधान में आयोजित होने वाले दो दिवसीय प्रांतीय अधिवेशन ‘संस्कृति पर्व–26’ की तैयारियाँ पूरी कर ली गई हैं। लगभग तीन दशक बाद यह भव्य आयोजन राजकीय इंटर कॉलेज, देवरिया के मैदान पर होने जा रहा है, जिसे लेकर भोजपुरी प्रेमियों में जबरदस्त उत्साह देखने को मिल रहा है।
समारोह का उद्घाटन शनिवार को दिल्ली के सांसद एवं प्रसिद्ध भोजपुरी गायक मनोज तिवारी ‘मृदुल’ करेंगे। यह अधिवेशन संस्था के शिल्पकार अरुणेश नीरन को समर्पित रहेगा।
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विश्व भोजपुरी सम्मेलन के प्रांतीय महामंत्री प्रो. शैलेंद्र कुमार राव एवं ज़िलाध्यक्ष गिरजेश मिश्र ने संयुक्त रूप से जानकारी देते हुए बताया कि कार्यक्रम की शुरुआत दोपहर 12 बजे सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से होगी। इसमें सुविख्यात भोजपुरी गायक भरत शर्मा व्यास, मदन राय, आराधना सिंह सहित एक दर्जन से अधिक कलाकार अपनी प्रस्तुतियाँ देंगे। वहीं हास्य अभिनेता सुनील कुमार यादव मंच पर हास्य की बौछार करेंगे।
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कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्व भोजपुरी सम्मेलन के राष्ट्रीय अध्यक्ष अजित दुबे करेंगे। इस दौरान भोजपुरी भाषा, संस्कृति और साहित्य पर गहन विमर्श के साथ-साथ संगठनात्मक गतिविधियों पर भी चर्चा की जाएगी।
पहले दिन देर शाम आयोजित लोकरंग कार्यक्रम में असम मूल की चर्चित भोजपुरी गायिका कल्पना पटवारी, शिल्पी राज और आलोक कुमार अपनी प्रस्तुतियों से समां बांधेंगे। इसी मंच से भिखारी ठाकुर सम्मान, महेंद्र मिसिर सम्मान, कबीर सम्मान और शिखर सम्मान प्रदान किए जाएंगे।
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दूसरे दिन साहित्य और कवियों की महफिल
अधिवेशन के दूसरे दिन 14 दिसंबर को दोपहर 12 बजे से बतुकही सत्र आयोजित होगा, जो 2:30 बजे तक चलेगा। इसके बाद सायं 4 बजे से भव्य कवि सम्मेलन एवं मुशायरा शुरू होगा।
इसमें जौहर कानपुरी, अजहर इक़बाल, शबीना अदीब, डॉ. मजीद देवबंदी, ओम शर्मा ‘ओम’, अफजल इलाहाबादी, सीमा नयन, डॉ. जयति ओझा, अंजली अरोड़ा, राहुल राज मिश्र, डॉ. शाद सिद्दीकी, आकृति विज्ञा, डॉ. कमलेश राय, भूषण त्यागी, सरोज पांडेय और बादशाह प्रेमी अपनी रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे।
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इन साहित्यिक हस्तियों को मिलेगा सम्मान
प्रथम दिन (शनिवार):
भरत शर्मा व्यास — महेंद्र मिसिर सम्मान
कल्पना पटवारी, आलोक कुमार, शिल्पी राज, आराधना सिंह — भिखारी ठाकुर सम्मान
दूसरे दिन:
मोहन पाण्डेय ‘भ्रमर’ — वरिष्ठ साहित्यकार सम्मान।
ध्रुवदेव मिश्र ‘पाषाण’, डॉ. रविंद्र तिवारी — अरुणेश नीरन सम्मान
मदन राय — मोती बी.ए. सम्मान
संस्कृति पर्व–26 न केवल भोजपुरी लोकसंस्कृति का उत्सव बनेगा, बल्कि भाषा और साहित्य के संरक्षण की दिशा में एक मजबूत पहल के रूप में भी याद किया जाएगा।
नई दिल्ली में सुदेश–चिराग की मुलाकात में झारखंड पर चर्चा
रांची (राष्ट्र की परम्परा) नई दिल्ली में आजसू पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व उपमुख्यमंत्री सुदेश महतो और केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्री चिराग पासवान के बीच मुलाकात हुई। पासवान के कार्यालय पर हुई मुलाक़ात में बिहार विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत पर बधाई का आदान–प्रदान हुआ। मुलाक़ात के दौरान झारखंड के राजनीतिक मुद्दों तथा विकास के संबंधित विषयों पर चर्चा हुई।
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इस मौके पर आजसू पार्टी के केंद्रीय उपाध्यक्ष एवं गिरिडीह सांसद चंद्रप्रकाश चौधरी भी उपस्थित रहे। चिराग पासवान ने चंद्रप्रकाश चौधरी को उनके गिरिडीह संसदीय क्षेत्र में खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना, किसानों को उचित मूल्य दिलाने और स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय बाजार से जोड़ने के लिए अपने मंत्रालय के माध्यम से विशेष योजनाएं लागू करने का आश्वासन दिया।
