Saturday, June 27, 2026
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9 साल की मासूम के साथ दरिंदगी, दुष्कर्म में नाकाम रहने पर बोरी में बंद कर बेरहमी से पीटा; अस्पताल में मौत

उज्जैन/खाचरोद (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले से मानवता को शर्मसार करने वाली घटना सामने आई है। खाचरोद तहसील के एक गांव में 9 साल की मासूम बच्ची के साथ नृशंसता की सारी हदें पार कर दी गईं। आरोपी ने पहले बच्ची के साथ दुष्कर्म की कोशिश की और सफल न होने पर उसे बोरी में बंद कर मोगरी (भारी डंडे) से पीट-पीटकर अधमरा कर दिया। इलाज के दौरान मासूम ने दम तोड़ दिया।

खेलते समय आरोपी ने किया अपहरण

​जानकारी के अनुसार, रविवार को स्कूल की छुट्टी होने के कारण बच्ची अपनी नानी के घर आई हुई थी। दोपहर के समय जब परिवार के अन्य सदस्य छत पर थे, बच्ची घर के बाहर खेल रही थी। तभी पड़ोस में रहने वाले आरोपी रियाज खान ने उसे अकेला पाकर अपने घर खींच लिया।

बोरी में भरकर मोगरी से वार, फिर रची झूठी कहानी

​पुलिस जांच में सामने आया कि आरोपी ने बच्ची के साथ गलत काम करने की कोशिश की। जब बच्ची चिल्लाने लगी, तो आरोपी ने उसे चुप कराने के लिए धक्का दिया और फिर बोरी में बंद कर भारी मोगरी से उसके सिर, चेहरे और आंखों पर ताबड़तोड़ वार किए।

​खुद को बचाने के लिए आरोपी ने शातिर चाल चली। जब बच्ची बेहोश हो गई, तो वह उसे उठाकर नानी के घर ले गया और कहानी गढ़ी कि बच्ची छत से गिर गई है। गंभीर रूप से घायल बच्ची को खाचरोद से रतलाम रेफर किया गया, जहां उसकी मौत हो गई।

पुलिस जांच और आरोपी की गिरफ्तारी

​खाचरोद एसडीओपी आकांक्षा बिछोटे के अनुसार, बच्ची के शरीर पर मौजूद घाव ऊंचाई से गिरने जैसे नहीं थे। डॉक्टरों के संदेह जताने के बाद पुलिस ने डॉग स्क्वाड और फॉरेंसिक टीम के साथ रियाज के घर की तलाशी ली, जहां से अहम सबूत मिले। पुलिस की सख्ती के आगे आरोपी टूट गया और अपना जुर्म कबूल कर लिया। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है और सख्त कार्रवाई की जा रही है।

देवरिया औद्योगिक भूखंड फर्जीवाड़ा: एसआईटी जांच तेज, उद्योग विभाग के अफसर-कर्मचारी घेरे में

देवरिया(राष्ट्र की परम्परा)
देवरिया में पूर्व आईपीएस अमिताभ ठाकुर की पत्नी के नाम औद्योगिक भूखंड के आवंटन और उसकी बाद में की गई बिक्री से जुड़े कथित फर्जीवाड़े की एसआईटी जांच ने रफ्तार पकड़ ली है। जांच के दायरे में अब उद्योग विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका भी आ गई है, जिन पर नियमों के उल्लंघन और मिलीभगत के आरोप हैं।

सूत्रों के मुताबिक, जिला उद्योग बंधु की बैठक के दौरान नियमों को ताक पर रखकर जिस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया, उसमें शामिल अधिकारियों पर एसआईटी सख्त कार्रवाई कर सकती है। मामले के विवेचक सोबरन सिंह ने न्यायालय को अवगत कराया है कि अभी कई अन्य आरोपियों के नाम सामने आना बाकी हैं, इसी कारण 24 घंटे के भीतर विवेचना पूरी नहीं हो सकी।

जांच में यह तथ्य सामने आया है कि इस कथित घोटाले में उद्योग विभाग के अधिकारी-कर्मचारी, दलाल और पूर्व आवंटी शामिल हैं। आरोप है कि इन सभी ने मिलकर नियमों को दरकिनार करते हुए औद्योगिक भूखंडों के आवंटन और उनकी बिक्री का खेल खेला।

सूत्र बताते हैं कि पिछले करीब दो दशकों में औद्योगिक क्षेत्र में दर्जनों भूखंडों की खरीद-बिक्री करोड़ों रुपये में हुई, जबकि विभागीय अभिलेखों में बेहद कम राशि दर्शाई गई। नियमों के अनुसार, यदि कोई आवंटी तय समय में उद्योग स्थापित नहीं करता है तो उसे भूखंड विभाग को वापस करना होता है। इसके बाद भूखंड का पुनः आवंटन टेंडर प्रक्रिया के माध्यम से किया जाना चाहिए, लेकिन आरोप है कि दलालों और अधिकारियों की सांठगांठ से इस पूरी प्रक्रिया को नजरअंदाज कर दिया गया।

फिलहाल एसआईटी पूरे प्रकरण की गहन जांच में जुटी हुई है। उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में इस मामले में और भी बड़े खुलासे होंगे और कई जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की गाज गिर सकती है।

राहुल-सोनिया गांधी को बड़ी राहत: नेशनल हेराल्ड केस में ईडी की चार्जशीट पर कोर्ट ने संज्ञान लेने से किया इनकार

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। नेशनल हेराल्ड मामले में कांग्रेस नेता राहुल गांधी और सोनिया गांधी को बड़ी कानूनी राहत मिली है। दिल्ली की अदालत ने मनी लॉन्ड्रिंग केस में प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा दाखिल चार्जशीट पर संज्ञान लेने से इनकार कर दिया है। यह फैसला गांधी परिवार के लिए अहम माना जा रहा है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ईडी की जांच किसी एफआईआर पर आधारित नहीं है, बल्कि यह भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी की निजी शिकायत और मजिस्ट्रेट के समन आदेशों के आधार पर शुरू हुई थी। हालांकि, अदालत ने ईडी को आगे की जांच जारी रखने की अनुमति दे दी है।

नई एफआईआर की कॉपी देने से भी इनकार

अदालत ने दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) द्वारा दर्ज नई एफआईआर की प्रति राहुल गांधी, सोनिया गांधी और अन्य आरोपियों को देने से भी इनकार कर दिया। कोर्ट के अनुसार, आरोपी इस स्तर पर एफआईआर की कॉपी पाने के हकदार नहीं हैं।

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ईडी को जांच जारी रखने की छूट

कोर्ट ने कहा कि एजेंसी इस मामले से जुड़े तथ्यों और सबूतों को इकट्ठा करने के लिए स्वतंत्र है। आगे की जांच में यदि नए तथ्य सामने आते हैं तो ईडी कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई कर सकती है।

इससे पहले दर्ज हुई थी एफआईआर

गौरतलब है कि इससे पहले दिल्ली पुलिस ने नेशनल हेराल्ड केस में सोनिया गांधी, राहुल गांधी समेत कांग्रेस नेता सुमन दुबे, सैम पित्रोदा, यंग इंडियन (YI), डोटेक मर्चेंडाइज लिमिटेड, इसके प्रमोटर सुनील भंडारी और एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (AJL) के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी।

इन सभी नामों को ईडी की चार्जशीट में भी शामिल किया गया है, जिसे अप्रैल महीने में दिल्ली की अदालत में दाखिल किया गया था। इस चार्जशीट पर संज्ञान लेने के मुद्दे पर अदालत ने फैसला सुरक्षित रखा था, जिस पर अब आदेश आ गया है।

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कैंसर बनाम भारत : स्वास्थ्य संकट से न्यायिक चेतावनी तक, एक निर्णायक दौर

कैंसर बीमारी का बढ़ता प्रकोप- 21वीं सदी की वैश्विक महामारी- सुप्रीम कोर्ट की हस्तक्षेपकारी भूमिका, एक ऐतिहासिक मोड़-एक समग्र विश्लेषण

कैंसर बीमारी-भारत की चुनौतियाँ और नीति सुधार की अनिवार्यता

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर कैंसर आज केवल एक चिकित्सकीय बीमारी नहीं रह गया है,बल्कि यह वैश्विक स्तरपर मानवसभ्यता के लिए एक गंभीर सामाजिक, आर्थिक औरनीतिगत चुनौती बन चुका है।दुनियाँ के लगभग हर देश में कैंसर मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल है और विश्व स्वास्थ्य संगठन सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं इसे नॉन- कम्युनिकेबल डिजीज के सबसे खतरनाक रूपों में गिनती हैं। कैंसर की भयावहता इस तथ्य से समझी जा सकती है कि यह मानवीय शरीर पर विभिन्न स्वरूपों में हमला करता है कभी फेफड़ों के रूप में, कभी स्तन, सर्वाइकल, प्रोस्टेट, लिवर या रक्त कैंसर के रूप में,और कई बार तब तक पहचान में नहीं आता जब तक यह जीवन के लिए गंभीर खतरा यानें स्टेज फोर या अंतिम समय न बन जाए। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि आधुनिक जीवनशैली, पर्यावरणीय प्रदूषण, खानपान में बदलाव, तंबाकू और शराब का बढ़ता सेवन, तनाव और शारीरिक निष्क्रियता ने कैंसर को एक ऐसी बीमारी बना दिया है जो अब केवल वृद्धावस्था तक सीमित नहीं रही, बल्कि कार्यशील आयु वर्ग को भी तेजी से अपनी चपेट में ले रही है।वैश्विक रिपोर्टों और स्वास्थ्य अध्ययनों के अनुसार, 40 से 50 वर्ष की आयु के लोगों में कैंसर के मामलों में आने वाले वर्षों में तीव्र वृद्धि की आशंका जताई जा रही है।2030 तक यह आयु वर्गकैंसर के सबसे बड़े जोखिम समूहों में शामिल हो सकता है।

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यह स्थिति इसलिए और भी चिंताजनक है क्योंकि यही वर्ग किसी भी देश की अर्थव्यवस्था,सामाजिक संरचना और पारिवारिकव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। यदि इस आयु वर्ग में बड़ी संख्या में लोग गंभीर बीमारियों से ग्रस्त होते हैं, तो इसका प्रभाव केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि उत्पादकता,रोजगार गरीबी, सामाजिक असमानता और मानसिक स्वास्थ्य तक गहराई से महसूस किया जाएगा।यही कारण है कि आज कैंसर से मुकाबला केवल अस्पतालों और डॉक्टरों की जिम्मेदारी नहीं रह गया है, बल्कि यह सार्वजनिक नीति,शासन व्यवस्था और सामाजिक व्यवहार में मूलभूत परिवर्तन की मांग करता है।

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साथियों बात अगर हम कैंसर से प्रतिरक्षात्मक उपायों की करें तो जीवनशैली परिवर्तन, कैंसर रोकथाम की पहली सीढ़ी है,कैंसर के बढ़ते मामलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल इलाज पर आधारित रणनीति पर्याप्त नहीं है। रोकथाम,समय पर जांच और प्रारंभिक निदान ही इस बीमारी से लड़ने के सबसे प्रभावी हथियार हैं। जीवनशैली में बदलाव जैसे संतुलित आहार, नियमित व्यायाम,तंबाकू और शराब से दूरी, मानसिक तनाव को नियंत्रित करना और प्रदूषण से बचाव,कैंसर के जोखिम को काफी हद तक कम कर सकते हैं। विकसित देशों में सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों का एक बड़ा हिस्सा इन्हीं निवारक उपायों पर केंद्रित है।स्कूल स्तर से लेकर कार्यस्थलों तक स्वास्थ्य जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं, ताकि लोग बीमारी के शुरुआती संकेतों को समझ सकें और समय रहते जांच करा सकें। भारत जैसे विकासशील देश में, जहां स्वास्थ्य संसाधनों पर पहले से ही भारी दबाव है, जीवनशैली आधारित रोकथाम और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
साथियों बात अगर हम भारत में कैंसर: बढ़ता संकट और असमानताएँ इसको समझने की करें तो,भारत में कैंसर की स्थिति वैश्विक रुझानों से अलग नहीं है,बल्कि कई मामलों में यह और अधिक गंभीर है।

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जनसंख्या का विशाल आकार, सामाजिक- आर्थिक असमानताएँ, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच स्वास्थ्य सुविधाओं का अंतर, और जागरूकता की कमी,ये सभी कारक कैंसर के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देते हैं। शहरी क्षेत्रों में जहां निजी अस्पताल और उन्नत जांच सुविधाएं उपलब्ध हैं, वहीं ग्रामीण इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भी कई बार बुनियादी संसाधनों से वंचित रहते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि ग्रामीण मरीजों में कैंसर का पता अक्सर बहुत देर से चलता है, जब इलाज की संभावनाएं सीमित हो जाती हैं। इस असमानता का सीधा असर मृत्यु दर पर पड़ता है और यही कारण है कि भारत में कैंसर से होने वाली मौतों का अनुपात कई विकसित देशों की तुलना में अधिक है।

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साथियों बात अगर हम सुप्रीम कोर्ट की हस्तक्षेपकारी भूमिका, एक ऐतिहासिक मोड़ इसको समझने की करें तो,भारत में कैंसर प्रबंधन की खामियों को उजागर करने में न्यायपालिका की भूमिका हाल के वर्षों में और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच द्वारा कैंसर को देशव्यापी अधिसूचित बीमारी घोषित करने की मांग से जुड़ी जनहित याचिका पर केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी करना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह याचिका एम्स के सेवानिवृत्त विशेषज्ञ डॉ. अनुराग श्रीवास्तव द्वारा दायर की गई, जिसमें देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे में कैंसर प्रबंधन से जुड़ी गंभीर कमियों की ओर अदालत का ध्यान आकर्षित किया गया। 12 दिसंबर 2025 को केंद्रीयस्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को औपचारिक नोटिस जारी किया जाना यह दर्शाता है कि अब इस मुद्दे को केवल नीति-स्तर की चर्चा तक सीमित नहीं रखा जा सकता।सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को केवल एक कानूनी प्रश्न के रूप में नहीं, बल्कि एक व्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के रूप में देखा है। अदालत ने स्पष्ट रूप से यह संकेत दिया है कि यदि सरकारें समय रहते ठोस कदम नहीं उठातीं, तो इसका खामियाजा लाखों नागरिकों को अपनी जान देकर चुकाना पड़ सकता है।न्यायपालिका का यह रुख भारत में स्वास्थ्य अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा सकता है।

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साथियों बात अगर हम कैंसर को अधिसूचित बीमारी का दर्जा क्यों है यह इतना जरूरी? इसको समझने की करें की करें तो किसी बीमारी को अधिसूचित घोषित करने का अर्थ यह होता है कि उसके मामलों की रिपोर्टिंग कानूनी रूप से अनिवार्य हो जाती है।अस्पतालों प्रयोगशालाओं और डॉक्टरों को ऐसे मामलों की जानकारी सरकार को देनी होती है,जिससे बीमारी के प्रसार,भौगोलिक वितरण और जोखिम कारकों का सटीक आकलन किया जा सके।भारत में टीबी, मलेरिया, कोविड-19 जैसी कई बीमारियां अधिसूचित हैं, जिसके कारण इनके मामलों पर निगरानी और नियंत्रण अपेक्षाकृत बेहतर ढंग से किया जा सका। कैंसर को अभी तक देशव्यापी स्तर पर अधिसूचित न किया जाना एक गंभीर नीतिगत चूक मानी जा रही है। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि देश के 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से केवल 17 ने ही अपने सार्वजनिक स्वास्थ्य कानूनों के तहत कैंसर को अधिसूचित बीमारी घोषित किया है। इसका अर्थ यह है कि देश का लगभग आधा हिस्सा अभी भी कैंसर मामलों की अनिवार्य रिपोर्टिंग से बाहर है।जब बीमारी के वास्तविक आंकड़े ही सरकार के पास नहीं होंगे, तो प्रभावी नीति निर्माण कैसे संभव हो पाएगा? यही वह बुनियादी प्रश्न है जिसने सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में हस्तक्षेप के लिए प्रेरित किया।

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साथियों बात अगर हम आईसीएमआर कैंसर रजिस्ट्री: सीमित कवरेज,सीमित समझ इसको समझने की करें तो, भारत में कैंसर के आंकड़ों का मुख्य स्रोत इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) द्वारा संचालित कैंसर रजिस्ट्री है। लेकिन याचिका के अनुसार, यह रजिस्ट्री फिलहाल देश की केवल लगभग 10 प्रतिशत आबादी को ही कवर करती है। ग्रामीण इलाकों में यह कवरेज मात्र 1 प्रतिशत के आसपास है। इसका सीधा अर्थ यह है कि देश में कैंसर के वास्तविक मामलों का एक बड़ा हिस्सा कभी आधिकारिक आंकड़ों में दर्ज ही नहीं हो पाता।जब डेटा अधूरा होगा,तो उस पर आधारित रणनीतियां भी अधूरी और अप्रभावी ही होंगी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखें तो कई देशों में कैंसर रजिस्ट्री की कवरेज 80 से 100 प्रतिशत तक है। इन देशों में कैंसर की रोकथाम, स्क्रीनिंग और इलाज की योजनाएं इसी व्यापक डेटा के आधार पर बनाई जाती हैं। भारत में डेटा की यह कमी न केवल नीति निर्माण को कमजोर करती है, बल्कि शोध और नवाचार की संभावनाओं को भी सीमित कर देती है। नई दवाओं, उपचार पद्धतियों और रोकथाम कार्यक्रमों के विकास के लिए सटीक और व्यापक आंकड़े अनिवार्य होते हैं।

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साथियों बात अगर हम ग्रामीण भारत और कैंसर एक अदृश्य संकट इसको समझने की करें तो,ग्रामीण भारत में कैंसर की स्थिति को अक्सर अदृश्य संकट कहा जाता है। जागरूकता की कमी,सामाजिक रूढ़ियां,आर्थिक तंगी और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव ये सभी कारक मिलकर कैंसर को एक मूक हत्यारा बना देते हैं। कई बार मरीज शुरुआती लक्षणों को सामान्य बीमारी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। जब तक वे किसी बड़े अस्पताल तक पहुंचते हैं,तब तक बीमारी उन्नत अवस्था में पहुंच चुकी होती है। अधिसूचित बीमारी का दर्जा मिलने से ग्रामीण क्षेत्रों में भी कैंसर मामलों की पहचान और रिपोर्टिंग बेहतर हो सकती है, जिससे समय पर हस्तक्षेप संभव होगा।

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साथियों बात अगर हम अंतरराष्ट्रीय अनुभव: भारत के लिए सबक इसको समझने की करें तो,अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई देशों ने कैंसर को सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति के रूप में देखा है। यूरोप,उत्तरी अमेरिका और कुछ एशियाई देशों में कैंसर स्क्रीनिंग कार्यक्रमों को सरकारी स्वास्थ्य प्रणाली का अभिन्न हिस्सा बनाया गया है। नियमित मैमोग्राफी, पैप स्मीयर, कोलोनोस्कोपी और लो-डोज सीटी स्कैन जैसे परीक्षणों को उच्च जोखिम समूहों के लिए अनिवार्य या अत्यधिकप्रोत्साहित किया गया है। इन देशों में कैंसर को अधिसूचित बीमारी के रूप में देखने का लाभ यह हुआ कि नीति निर्माण डेटा- आधारित और लक्ष्य-उन्मुख बन सका।भारत यदि इन अंतरराष्ट्रीय अनुभवों से सीख लेकर कैंसर को देशव्यापी अधिसूचित बीमारी घोषित करता है, तो यह न केवल आंकड़ों की गुणवत्ता में सुधार करेगा, बल्कि स्वास्थ्य प्रणाली की जवाबदेही भी बढ़ाएगा। केंद्र और राज्य सरकारों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो सकेगा और संसाधनों का आवंटन वास्तविक जरूरतों के अनुसार किया जा सकेगा।

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साथियों बात अगर हम नीति सुधार और भविष्य की दिशा इसको समझने की करें तो,कैंसर को अधिसूचित बीमारी घोषित करना केवल पहला कदम होगा। इसके साथ-साथ व्यापक नीति सुधारों की भी आवश्यकता है। प्राथमिक स्वास्थ्य स्तर पर स्क्रीनिंग सुविधाओं का विस्तार, जिला स्तर पर कैंसर उपचार केंद्रों की स्थापना, स्वास्थ्य कर्मियों का प्रशिक्षण और डिजिटल हेल्थ रिकॉर्ड्स का एकीकृत ढांचा ये सभी कदम समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। इसके अलावा, स्वास्थ्य बीमा योजनाओं में कैंसर उपचार को पर्याप्त कवरेज देना और मरीजों के लिए आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करना भी जरूरी है।सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मुद्दे पर जवाब तलब करना यह संकेत देता है कि अब कैंसर को नजरअंदाज करने की गुंजाइश नहीं बची है।यह मामला केवल कानूनी बहस का विषय नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के जीवन और भविष्य से जुड़ा हुआ प्रश्न है। यदि समय रहते ठोस कदम उठाए गए, तो भारत न केवल कैंसर से होने वाली मौतों को कम कर सकता है, बल्कि एक मजबूत, डेटा-आधारित और न्यायसंगत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की ओर भी बढ़ सकता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि एक साझा जिम्मेदारी, अंततः कैंसर से लड़ाई सरकार, न्यायपालिका चिकित्सा समुदाय और समाज,सभी की साझा जिम्मेदारी है। जीवनशैली में बदलाव से लेकर नीति सुधार तक, हर स्तर पर समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है। सुप्रीम कोर्ट की पहल ने इस बहस को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया है।अब यह सरकारों पर निर्भर करता है कि वे इस अवसर को एक ऐतिहासिक सुधार में बदलती हैं या इसे भी एक और फाइल में बंद कर देती हैं। कैंसर जैसी भयावह बीमारी के संदर्भ में देरी का अर्थ है अनगिनत जिंदगियों का नुकसान। इसलिए समय की मांग है कि भारत कैंसर को देशव्यापी अधिसूचित बीमारी घोषित कर, एक मजबूत और संवेदनशील सार्वजनिक स्वास्थ्य भविष्य की नींव रखे।

-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425

तकनीक के युग में तप की जरूरत: गति के बीच संतुलन की तलाश

कैलाश सिंह

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। इक्कीसवीं सदी को तकनीक की सदी कहा जाता है। मोबाइल, इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने जीवन को तेज, सुविधाजनक और प्रभावी बना दिया है। कामकाज से लेकर रिश्तों तक, हर क्षेत्र में तकनीक की गहरी मौजूदगी है। लेकिन इस तेज़ रफ्तार प्रगति के बीच मनुष्य का मन ठहराव खोता जा रहा है। बाहरी विकास जितना तेज़ हुआ है, भीतर की शांति उतनी ही दुर्लभ होती चली गई है। ऐसे समय में तप की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है।
आज तप का अर्थ जंगलों में जाकर कठोर साधना करना नहीं, बल्कि विवेक, संयम और अनुशासन के साथ जीवन जीना है। तकनीक ने हमें एक-दूसरे से जोड़ दिया है, लेकिन विडंबना यह है कि हम स्वयं से दूर होते जा रहे हैं। लगातार स्क्रीन पर बिताया गया समय, सूचनाओं की बाढ़ और आभासी दुनिया ने मन को चंचल बना दिया है। ध्यान की क्षमता घट रही है और धैर्य कमजोर पड़ता जा रहा है। ऐसे में इच्छाओं पर नियंत्रण और मन की स्थिरता ही आधुनिक तपस्या है।
भारतीय परंपरा में तप का अर्थ कष्ट सहना नहीं, बल्कि आत्म- अनुशासन रहा है। सीमित उपभोग, समय पर सोना-जागना, सत्य और करुणा का पालन—ये सभी तप के ही स्वरूप हैं। तकनीक जब साधन बनती है तो जीवन को सरल बनाती है, लेकिन जब वही साध्य बन जाए, तो मनुष्य यंत्रवत हो जाता है। तप हमें यह विवेक देता है कि आवश्यकता और आकर्षण में अंतर कैसे किया जाए।
आज बढ़ता तनाव, अवसाद और पारिवारिक विघटन इस बात की चेतावनी हैं कि तकनीकी सुविधा मानसिक संतुलन का विकल्प नहीं हो सकती। समाज को ऐसे नागरिक चाहिए जो दक्ष होने के साथ संवेदनशील भी हों। अनावश्यक स्क्रीन समय से दूरी, मौन के क्षण और स्वयं से संवाद—यही आधुनिक युग की सच्ची साधनाएं हैं।
अंततः, तकनीक जीवन को तेज़ बना सकती है, लेकिन उसे अर्थ तप ही देता है। यदि प्रगति को मानव कल्याण की दिशा देनी है, तो तप को फिर से जीवन के केंद्र में लाना होगा।

मंत्र से सूत्र तक: भारतीय चेतना की विज्ञान बनती यात्रा

जहां ध्यान, साधना और ऋषि-दृष्टि ने आधुनिक विज्ञान की वैचारिक नींव रखी — अध्यात्म और विज्ञान के संगम से मानव कल्याण की दिशा

कैलाश सिंह

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)।मानव सभ्यता का इतिहास केवल औजारों, तकनीक और मशीनों के विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव चेतना के क्रमिक विस्तार की भी कहानी है। यह यात्रा मंदिरों की घंटियों, मंत्रोच्चार और साधना से शुरू होकर आज प्रयोगशालाओं के जटिल सूत्रों और समीकरणों तक पहुंच चुकी है। जिसे कभी केवल आध्यात्म कहा गया, वही आज विज्ञान की भाषा में समझा और स्वीकारा जा रहा है।
प्राचीन भारतीय ऋषियों ने प्रकृति और ब्रह्मांड को जानने के लिए किसी प्रयोगशाला या यंत्र का सहारा नहीं लिया। उन्होंने ध्यान, साधना और आत्म अनुभूति को ज्ञान का माध्यम बनाया। वेदों और उपनिषदों में परमाणु, ऊर्जा, समय, आकाश और चेतना जैसे तत्वों पर जिस गहराई से विचार किया गया, वह आज भी आधुनिक विज्ञान को चकित करता है। हजारों वर्ष पूर्व कही गई ये बातें आज क्वांटम भौतिकी, न्यूरोसाइंस और ब्रह्मांड विज्ञान के सिद्धांतों से मेल खाती दिखाई देती हैं। आध्यात्म ने मनुष्य को भीतर झांकने की दृष्टि दी, जबकि विज्ञान ने बाहरी जगत को मापने और समझने की पद्धति सिखाई। दोनों का उद्देश्य एक ही है—सत्य की खोज। अंतर केवल मार्ग का है। जहां अध्यात्म अनुभूति और साधना के सहारे आगे बढ़ता है, वहीं विज्ञान प्रयोग, परीक्षण और प्रमाण को आधार बनाता है। वास्तव में ये दोनों मार्ग एक ही लक्ष्य की ओर जाने वाली समानांतर धाराएं हैं।
आज आधुनिक विज्ञान यह मानने लगा है कि सृष्टि की मूल इकाइयां चेतना, ऊर्जा और कंपन हैं। यही विचार उपनिषदों में “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” जैसे सूत्रों के माध्यम से व्यक्त किए गए थे। विज्ञान मानो उसी बिंदु पर लौट रहा है, जहां से ऋषियों की यात्रा आरंभ हुई थी।विडंबना यह है कि वर्तमान समय में विज्ञान को प्रगतिशील और अध्यात्म को पिछड़ा बताने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। जबकि सच्चाई यह है कि विज्ञान बिना अध्यात्म के दिशाहीन हो सकता है और अध्यात्म बिना विज्ञान के अंधविश्वास में बदल सकता है। मानव कल्याण के लिए दोनों का संतुलन आवश्यक है।
विज्ञान बाहर के सत्य को खोजता है, अध्यात्म भीतर के—दोनों मिलें तो मानवता का भविष्य सुरक्षित हो सकता है। अंततः, अध्यात्म से विज्ञान तक का यह सफर किसी टकराव की कथा नहीं, बल्कि मानव चेतना के विस्तार की स्वाभाविक यात्रा है—जहां मंत्र धीरे-धीरे सूत्र बनते हैं और अनुभूति प्रमाण का रूप ले लेती है।

अपराध नियंत्रण और त्योहारों की सुरक्षा को लेकर उच्चस्तरीय पुलिस गोष्ठी

गोरखपुर(राष्ट्र क़ी परम्परा)
उप महानिरीक्षक पुलिस परिक्षेत्र गोरखपुर एस. चनप्पा एवं वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक गोरखपुर राज करन नय्यर ने पुलिस लाइन स्थित व्हाइट हाउस सभागार कक्ष में अपराध एवं अपराधियों पर प्रभावी अंकुश लगाने, साइबर अपराध की रोकथाम तथा आगामी त्योहारों और नववर्ष के अवसर पर कानून एवं सुरक्षा व्यवस्था को लेकर एक महत्वपूर्ण गोष्ठी आयोजित की। इस गोष्ठी में जिले की समग्र कानून व्यवस्था की समीक्षा करते हुए आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए गए।
गोष्ठी के दौरान डीआईजी एस. चनप्पा ने कहा कि जनपद में शांति, सुरक्षा और कानून व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने सभी अधिकारियों को निर्देशित किया कि अपराधियों के विरुद्ध सख्त और प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए तथा किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने लंबित मामलों के त्वरित निस्तारण, वांछित एवं इनामी अपराधियों की गिरफ्तारी तथा नियमित गश्त को और अधिक प्रभावी बनाने पर विशेष बल दिया।
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक राज करन नय्यर ने कहा कि आगामी त्योहारों और नववर्ष के मद्देनजर पुलिस को अतिरिक्त सतर्कता बरतने की आवश्यकता है। उन्होंने संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर वहां पर्याप्त पुलिस बल की तैनाती, फ्लैग मार्च, चेकिंग अभियान तथा भीड़भाड़ वाले इलाकों में सतर्क निगरानी रखने के निर्देश दिए। एसएसपी ने कहा कि आमजन की सुरक्षा और विश्वास बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है, इसके लिए पुलिस को जनता के साथ समन्वय बनाकर कार्य करना होगा।
गोष्ठी में साइबर अपराध की बढ़ती घटनाओं पर भी विशेष चर्चा की गई। अधिकारियों को निर्देशित किया गया कि साइबर अपराध से संबंधित शिकायतों का त्वरित निस्तारण किया जाए और आम नागरिकों को जागरूक करने के लिए अभियान चलाए जाएं। सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहों पर कड़ी नजर रखने तथा किसी भी भ्रामक सूचना पर तत्काल कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए गए।
आगामी त्योहारों के दौरान कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए सभी थाना क्षेत्रों में पीस कमेटी की बैठकें आयोजित करने, धार्मिक स्थलों और बाजारों में पर्याप्त पुलिस बल की तैनाती तथा यातायात व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के निर्देश दिए गए। इसके साथ ही असामाजिक तत्वों पर विशेष निगरानी रखने, अवैध शराब, जुआ, सट्टा एवं मादक पदार्थों के खिलाफ सघन अभियान चलाने पर भी जोर दिया गया।
गोष्ठी के दौरान पुलिस अधीक्षक नगर अभिनव त्यागी, पुलिस अधीक्षक उत्तरी ज्ञानेन्द्र, पुलिस अधीक्षक दक्षिणी दिनेश कुमार, पुलिस अधीक्षक अपराध सुधीर जायसवाल, पुलिस अधीक्षक यातायात राजकुमार पाण्डेय सहित समस्त क्षेत्राधिकारीगण एवं प्रभारी निरीक्षक/थानाध्यक्ष उपस्थित रहे। सभी अधिकारियों से उनके-अपने क्षेत्र की कानून व्यवस्था की जानकारी ली गई तथा आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाने के निर्देश दिए गए।
अधिकारियों ने आश्वस्त किया कि जनपद में कानून एवं शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस पूरी तरह मुस्तैद है। आम जनता से भी अपील की गई कि किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तत्काल पुलिस को दें और कानून व्यवस्था बनाए रखने में सहयोग करें। गोष्ठी के अंत में सभी अधिकारियों को निर्देशित किया गया कि वे फील्ड में सक्रिय रहते हुए अपने दायित्वों का निष्ठा एवं ईमानदारी से निर्वहन करें, ताकि गोरखपुर जनपद में सुरक्षित और शांतिपूर्ण वातावरण बना रहे।

विजय दिवस: शौर्य, संकल्प और राष्ट्रगौरव का अमर अध्याय

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नवनीत मिश्र

16 दिसंबर भारतीय इतिहास का वह स्वर्णिम दिन है, जब पराक्रम ने अत्याचार को परास्त किया और न्याय ने इतिहास की धारा मोड़ दी। 1971 में ढाका के रेसकोर्स मैदान में पाकिस्तानी सेना का आत्मसमर्पण केवल एक सैन्य विजय नहीं था, बल्कि मानवीय मूल्यों, साहस और राष्ट्रधर्म की निर्णायक जीत थी। इसी विजय ने बांग्लादेश को स्वतंत्रता दिलाई और विश्व मानचित्र पर भारत की नैतिक व सामरिक शक्ति को स्थायी पहचान दी।
यह युद्ध अचानक नहीं हुआ था। इसके पीछे पूर्वी पाकिस्तान में वर्षों से चल रहा दमन, लाखों शरणार्थियों का भारत आना और मानवीय संकट की अनदेखी थी। ऐसे समय में भारत ने केवल अपने हितों की नहीं, बल्कि मानवता की पुकार की रक्षा का संकल्प लिया। सीमित संसाधनों के बावजूद भारतीय सेना ने असाधारण रणनीति, अनुशासन और अदम्य साहस का परिचय दिया। मात्र 13 दिनों में मिली यह ऐतिहासिक विजय सैन्य इतिहास में अद्वितीय मानी जाती है।
विजय दिवस हमें यह भी स्मरण कराता है कि युद्ध केवल हथियारों से नहीं जीते जाते, बल्कि नेतृत्व, नैतिक बल और जनसमर्थन से जीते जाते हैं। सैनिकों की वीरता के साथ-साथ उस दौर की कूटनीति, जनता का धैर्य और राष्ट्र की एकजुटता इस सफलता के स्तंभ बने। यह वह क्षण था जब भारत ने विश्व को दिखाया कि शक्ति का प्रयोग तब ही सार्थक है, जब वह न्याय और मानवता के पक्ष में हो।
आज, जब हम विजय दिवस मनाते हैं, तो यह उत्सव मात्र अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए प्रेरणा है। यह हमें सिखाता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता और मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए संकल्प अडिग होना चाहिए। यह दिन उन वीर सैनिकों को नमन करने का अवसर है, जिनके त्याग और बलिदान से देश सुरक्षित है और नागरिक गर्व से सिर ऊँचा रख पाते हैं।
विजय दिवस हमें याद दिलाता है कि इतिहास केवल तारीखों से नहीं बनता, बल्कि साहसिक निर्णयों और त्याग से गढ़ा जाता है। 16 दिसंबर 1971 की विजय भारतीय आत्मविश्वास की स्थायी धरोहर हैl एक ऐसा दीपक, जो हर पीढ़ी को राष्ट्रसेवा, एकता और कर्तव्यबोध की राह दिखाता रहेगा।

सांसों में सिमटी साधना: भागदौड़ भरी जिंदगी में आत्मशांति पाने का सरल आध्यात्मिक मार्ग

डॉ. सतीश पाण्डेय
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। आधुनिक जीवन की तेज रफ्तार, निरंतर प्रतिस्पर्धा और बाहरी शोर ने आज के मनुष्य को भीतर से थका दिया है। सुविधाएं बढ़ी हैं, आकांक्षाएं भी बढ़ी हैं, लेकिन मानसिक शांति और आत्मसंतुलन कहीं पीछे छूटता जा रहा है। ऐसे समय में अध्यात्म कोई कठिन या दूरस्थ साधना नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन से जुड़ा एक सहज और सरल मार्ग बनकर उभरता है।

भारतीय दर्शन में सांस को केवल श्वास-प्रश्वास नहीं, बल्कि ‘प्राण’ कहा गया है—यानी जीवन की मूल ऊर्जा। जब मन अशांत होता है, तो सांसें भी अनियमित हो जाती हैं और जब व्यक्ति सांसों पर ध्यान केंद्रित करता है, तो मन स्वतः शांत होने लगता है। यही कारण है कि योग, ध्यान और प्राणायाम में सांस को केंद्र में रखा गया है। आत्मशांति का सत्य कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारी अपनी सांसों में ही निहित है।

आज समाज में मंदिरों, धार्मिक आयोजनों और कर्मकांडों की संख्या बढ़ी है, लेकिन मन का मंदिर सूना होता जा रहा है। पूजा-पाठ कई बार बाहरी आडंबर तक सीमित रह गया है, जबकि आध्यात्म का वास्तविक उद्देश्य आत्मशुद्धि, चेतना का विकास और मानवीय मूल्यों का विस्तार है। जब सांसों के साथ जागरूकता जुड़ती है, तो अहंकार कमजोर होता है और करुणा, संयम व विवेक जैसे गुण विकसित होते हैं।

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समाज में बढ़ता तनाव, अवसाद और हिंसा इस बात के संकेत हैं कि हम भीतर की साधना से दूर होते जा रहे हैं। कानून और व्यवस्था आवश्यक हैं, लेकिन मानसिक शांति का स्थायी समाधान अध्यात्म और आत्मचिंतन से ही निकलता है। जब व्यक्ति स्वयं से जुड़ता है, तो समाज में सकारात्मक बदलाव स्वतः आने लगते हैं।

सांसों में सिमटी साधना हमें यह सिखाती है कि साधना कोई पलायन नहीं, बल्कि जिम्मेदारी के साथ जागरूक होकर जीने की कला है। आध्यात्म का सत्य किसी ग्रंथ तक सीमित नहीं, वह हर क्षण हमारी सांसों के साथ चलता है। आवश्यकता है बस एक पल रुकने की, गहरी सांस लेने की और स्वयं से मिलने की।

दिल्ली में हवा बेहद जहरीली: कई इलाकों में AQI 400 के पार, सांस लेना हुआ मुश्किल

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण का संकट लगातार गंभीर बना हुआ है। ठंड और कोहरे के साथ स्मॉग की मोटी चादर ने राजधानी की हवा को और ज्यादा दमघोंटू बना दिया है। मंगलवार सुबह दिल्ली के कई इलाकों में घना कोहरा और धुंध देखने को मिली, जिससे दृश्यता काफी कम रही।

एयर क्वालिटी अर्ली वार्निंग सिस्टम फॉर दिल्ली के अनुसार, मंगलवार सुबह राजधानी का औसत एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 381 दर्ज किया गया, जो ‘बहुत खराब’ श्रेणी में आता है।

दिल्ली के इन इलाकों में AQI 400 के पार

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के सुबह 7 बजे के आंकड़ों के मुताबिक, राजधानी के कई क्षेत्रों में AQI बेहद खतरनाक स्तर पर पहुंच गया: आनंद विहार – 406, अशोक विहार – 410, बवाना – 403, चांदनी चौक – 438, डीटीयू – 425, आईटीओ – 402, जहांगीरपुरी – 426, मुंडका – 426, पंजाबी बाग – 405, विवेक विहार – 411, वजीरपुर – 426

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इसके अलावा अलीपुर (377), बुराड़ी (376), द्वारका सेक्टर-8 (391), सोनिया विहार (393), आरकेपुरम (397) और रोहिणी (356) में भी हवा की गुणवत्ता बेहद खराब दर्ज की गई।

स्वास्थ्य पर बढ़ा खतरा

विशेषज्ञों के अनुसार, इतने ऊंचे AQI स्तर से बुजुर्गों, बच्चों और सांस के मरीजों को सबसे ज्यादा खतरा है। लोगों को बिना जरूरत घर से बाहर न निकलने और मास्क पहनने की सलाह दी गई है।

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अंकों की दौड़ से आगे—शिक्षा में संस्कारों की कमी और समाज पर उसका असर

आज के भारत में शिक्षा को सफलता की कुंजी माना जाता है, जहाँ अच्छे अंक, नामी संस्थान और ऊँचा वेतन ही उपलब्धि का पैमाना बन चुके हैं। स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा तक पढ़ाई का मुख्य उद्देश्य रोजगार तक सिमटता जा रहा है। लेकिन अंकों की दौड़ से आगे—शिक्षा में संस्कारों की कमी और समाज पर उसका असर अब एक गंभीर सामाजिक प्रश्न बन चुका है। बढ़ती हिंसा, असहिष्णुता, नैतिक पतन और सामाजिक विघटन इस ओर संकेत करते हैं कि हमारी शिक्षा प्रणाली ज्ञान तो दे रही है, पर मानवीय मूल्य नहीं।

सीमित होती शिक्षा की परिभाषा
वास्तविक शिक्षा केवल परीक्षा पास करने तक सीमित नहीं होती। यह व्यक्ति की सोच, आचरण और जिम्मेदारी को गढ़ती है। वर्तमान व्यवस्था में रटंत विद्या और तीव्र प्रतिस्पर्धा छात्रों में तनाव, आत्मकेंद्रित व्यवहार और नैतिक भ्रम को जन्म दे रही है। संस्कारों के बिना अर्जित ज्ञान कई बार समाज के लिए हानिकारक भी सिद्ध हो सकता है।

संस्कार और चरित्र निर्माण
संस्कार सही-गलत की पहचान कराते हैं। ईमानदारी, अनुशासन, सहानुभूति और सहिष्णुता जैसे गुण परिवार और विद्यालय के संयुक्त प्रयास से विकसित होते हैं। जब इन मूल्यों को शिक्षा से अलग कर दिया जाता है, तब चरित्र निर्माण अधूरा रह जाता है।

मूल्य आधारित शिक्षा की आवश्यकता
समय की मांग है कि पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा, जीवन कौशल, सामुदायिक सेवा और पर्यावरणीय चेतना को अनिवार्य किया जाए। शिक्षक केवल पाठ पढ़ाने वाले नहीं, बल्कि आदर्श प्रस्तुत करने वाले मार्गदर्शक बनें।

डिजिटल युग की चुनौती
तकनीक ने जानकारी सुलभ की है, पर विवेक का संकट भी बढ़ाया है। सोशल मीडिया के दौर में शिक्षा का दायित्व है कि वह जिम्मेदार डिजिटल नागरिक तैयार करे।
किताबी ज्ञान करियर बनाता है, जबकि संस्कार चरित्र। अंकों की दौड़ से आगे—शिक्षा में संस्कारों की कमी और समाज पर उसका असर समझकर ही एक संवेदनशील, जिम्मेदार और सशक्त समाज का निर्माण संभव है।

भारत बापू का देश मनरेगा को निरस्त करने का फैसला राष्ट्रविरोधी

150 दिन रोजगार गारंटी किया जाय कैलाश यादव

रांची (राष्ट्र की परम्परा )
प्रदेश राजद प्रवक्ता कैलाश यादव ने प्रेस ब्यान जारी कर कहा कि मैने राजद की ओर से दो दिन पूर्व ही मनरेगा का नाम बदलने पर केंद्र की मोदी सरकार के अनैतिक निर्णय पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त किया था।
विदित है सदन में महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम 2005 को निरस्त करने का प्रस्ताव कर नया कानून के तौर पर विकसित भारत गारंटी रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) बनाने का फैसला लिया है।
यादव ने कहा कि भारत बापू का देश है जिन्होंने अपने संघर्ष और देश की आजादी के लिए सत्य और अहिंसा का पाठ पढ़ाकर भारत को स्वतंत्रता दिलवाई थी , इनका राष्ट्रहित का सपना बहुत बृहत था इन्होंने अपने दूरदर्शी व्यक्तित्व के कारण भारत में हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई जैन और बौद्घ समाज के लोगों को एकता का संदेश दिया था जिस कारण भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य का स्थापना हुआ।
सारे जहां से अच्छा हिंदोस्ता हमारा।
रघुपति राघव राजाराम पति तपावन सीताराम ” अल्हा ईश्वर तेरो नाम सबको सन्मति दे भगवान का संदेश हरेक हिन्दुस्तानियों के जहन में समाया था।
विदित हो राष्ट्रगान लिखने वाले गुरु रवीन्द्र नाथ टैगोर ने बापू को महात्मा कहा था जिस कारण राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की उपाधि प्राप्त हुई।
यूपीए 1 डॉ मनमोहन सिंह सरकार के दौरान 2005 में तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री पूर्व केंद्रीय मंत्री श्रद्धेय डॉ रघुवंश प्रसाद सिंह के द्वारा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम पर मनरेगा कानून बनाकर देश में मजदूरों 100 दिन का रोजगार गारंटी योजना लागू किया गया था ।
अफसोस है केंद्र की मोदी सरकार देश के तमाम संस्थाओं और योजनाओं का नाम बदलने का काम कर रहा है।
राजद मनरेगा कानून को निरस्त करने का कड़ा विरोध करता है और नया कानून बनाने के फैसला को राष्ट्रोधी एवं महात्मा गांधी का अपमान करार देता है।
राजद का मांग है कि देश बेतहाशा गरीबी बेरोजगारी पलायन और महंगाई को देखते हुए मजदूरों की रोजगार गारंटी योजना 150 दिन किया जाय।

विभिन्न वार्डों की कई महिलाएं आजसू पार्टी में शामिल

नगर निकाय चुनाव की तैयारी में जुटें कार्यकर्ता -देवशरण भगत

रांची ( राष्ट्र की परम्परा )
आजसू पार्टी के केंद्रीय कार्यालय में आयोजित मिलन समारोह में विभिन्न वार्ड की कई महिलाओं ने मुख्य प्रवक्ता डॉ देवशरण भगत, केंद्रीय उपाध्यक्ष प्रवीण प्रभाकर एवं केंद्रीय सचिव विजेता वर्मा के समक्ष पार्टी का दामन थामा। कार्यक्रम की अध्यक्षता महानगर अध्यक्ष ज्ञान सिंहा ने की, जबकि महानगर उपाध्यक्ष राकेश सिंह, राकेश रौशन, अनिल गुप्ता आदि भी उपस्थित रहे।
मुख्य प्रवक्ता डॉ देवशरण भगत ने कहा कि नगर निगम चुनाव की तैयारी में कार्यकर्ता जुट जाएं। आजसू नगर निकाय चुनाव में मातृशक्ति को बेहतर भागीदारी देगी। प्रत्येक वार्ड में आजसू की महिला इकाई का गठन होगा। वर्तमान राज्य सरकार ने चुनावी लाभ के लिए मइया योजना लागू कर महिलाओं को गुमराह किया।
केंद्रीय उपाध्यक्ष प्रवीण प्रभाकर ने कहा कि आजसू पार्टी समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने में विश्वास करती है। महिलाएं जागरूक होंगी तभी राज्य आगे बढ़ेगा।
केंद्रीय सचिव विजेता वर्मा के कहा कि आजसू में मातृशक्ति को पूरा सम्मान मिलता है। उन्होंने कहा कि पूर्व उपमुख्यमंत्री सुदेश महतो ने पंचायत चुनाव में नारीशक्ति को पचास प्रतिशत आरक्षण देकर सशक्त बनाया।
महानगर अध्यक्ष ज्ञान सिंहा ने कहा कि प्रत्येक वार्ड में नगर निकाय की तैयारी शुरू कर दी गई है, जिसमे महिला समिति का भी गठन किया जा रहा है।
आजसू में शामिल होने वाली महिलाएं
रीता देवी, लक्ष्मी देवी, नेहा देवी, प्रतिमा कर्मकार, पम्मी देवी, सोनी वर्मा, सुमित्रा वर्मा, कमला साहु, तैतरी साहु, पुष्पा सिंह, अपर्णा, राधा, आरती, सुधा, संजू, दुर्गा, रेखा, मंजू, खुशबू, किरण, रागिनी, पूनम, रीना, रीता, मुन्नी, संध्या, अंजली, श्वेता, अंजिता आदि।

राजनीतिक व्यंग्य में सत्ता, इतिहास और राष्ट्रवाद की नई बहस

भारतीय राजनीति में राजनीतिक व्यंग्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सत्ता के चरित्र, उसके अहंकार और इतिहास के पुनर्लेखन की प्रवृत्तियों को उजागर करने का प्रभावशाली माध्यम रहा है। विष्णु नागर और राजेंद्र शर्मा जैसे वरिष्ठ व्यंग्यकारों की रचनाएं आज के दौर में और अधिक प्रासंगिक हो उठी हैं, जब सत्ता, राष्ट्रवाद और इतिहास को एक नए फ्रेम में ढालने की कोशिशें खुलकर सामने आ रही हैं।

सत्ता की ‘पावर’ और व्यंग्य का आईना

विष्णु नागर का व्यंग्य ‘नंबर बता, नंबर’ सत्ता की उस मानसिकता पर करारा प्रहार करता है, जहां पावर स्वयं बीमारी बन जाती है। व्यंग्य में जिस तरह ‘पावर’ से अकड़ा हुआ शासक न उठ पाता है, न बैठ पाता है, वह लोकतंत्र में सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण का प्रतीक बन जाता है। सत्ता के पास सब कुछ होते हुए भी समाधान का अभाव दिखाई देता है।

डॉक्टर, वैद्य, विदेशी विशेषज्ञ और अंततः ‘सबसे पावरफुल’ व्यक्ति तक पहुंचने की कोशिश — यह पूरा घटनाक्रम इस सच्चाई को उजागर करता है कि सत्ता जब संवाद, संवेदनशीलता और जवाबदेही खो देती है, तब उसके पास केवल आदेश और नंबर ही बचते हैं। “एक नंबर बता, नंबर” जैसी पंक्तियां आज की राजनीतिक संस्कृति में नागरिक और सत्ता के रिश्ते को बेहद सटीक ढंग से परिभाषित करती हैं।

इतिहास और राष्ट्रवाद पर पुनर्लेखन की राजनीति

राजेंद्र शर्मा का व्यंग्य ‘सारे के सारे बदल डालेंगे नाम’ सीधे तौर पर उस राजनीतिक प्रवृत्ति को रेखांकित करता है, जिसमें इतिहास, राष्ट्रगीत, राष्ट्रगान और राष्ट्रपिता तक को नए सांचे में ढालने की कोशिश हो रही है। व्यंग्य में वंदे मातरम्, जन गण मन, नेहरू, गांधी और सरदार पटेल जैसे ऐतिहासिक संदर्भों के जरिए यह सवाल उठाया गया है कि क्या राष्ट्रभक्ति का पैमाना सत्ता तय करेगी?

लेख इस बात को उजागर करता है कि किस तरह इतिहास की जटिलताओं को सरल नारों में बदल दिया जाता है। व्यंग्यकार यह दिखाता है कि आज की राजनीति में ‘मजबूर’ होना कमजोरी और ‘सफल’ होना देशभक्ति का प्रमाण बना दिया गया है। यही वह बिंदु है, जहां राजनीतिक व्यंग्य इतिहास की तथाकथित आधिकारिक व्याख्या पर सवाल खड़ा करता है।

नाम बदलने से राष्ट्र बदलता है क्या?

व्यंग्य का सबसे तीखा हिस्सा वह है, जहां हर चीज़ का नाम बदलने की प्रवृत्ति पर कटाक्ष किया गया है — इमारतें, योजनाएं, विचार और अब इतिहास के नायक। सवाल यह नहीं कि नाम बदले जाएं या नहीं, सवाल यह है कि क्या नाम बदलने से सामाजिक यथार्थ, आर्थिक विषमता और लोकतांत्रिक मूल्यों में भी बदलाव आता है?

राजनीतिक व्यंग्य यहां एक चेतावनी की तरह सामने आता है। यह बताता है कि जब सत्ता केवल प्रतीकों और नामों में उलझ जाती है, तब असल मुद्दे — बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक न्याय और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता — हाशिये पर चले जाते हैं।

लोकतंत्र में व्यंग्य की भूमिका

आज के दौर में, जब आलोचना को देशद्रोह और सवाल पूछने को विरोध माना जाने लगा है, राजनीतिक व्यंग्य लोकतंत्र की अंतिम सांस की तरह महसूस होता है। यह नारे नहीं देता, बल्कि सोचने पर मजबूर करता है। न तो यह सीधा आरोप लगाता है और न ही उपदेश देता है, बल्कि हास्य के जरिए सत्ता के डर को बेनकाब करता है।

विष्णु नागर और राजेंद्र शर्मा की रचनाएं यह साबित करती हैं कि व्यंग्य केवल साहित्य नहीं, बल्कि राजनीतिक हस्तक्षेप है। यह पाठक को हंसाते-हंसाते उस बिंदु तक ले जाता है, जहां हंसी अचानक एक असहज सवाल में बदल जाती है।

राजनीतिक व्यंग्य आज के भारत में केवल लेखन की विधा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रतिरोध का स्वर है। सत्ता की पावर, इतिहास का पुनर्लेखन और राष्ट्रवाद की नई परिभाषाओं के बीच, व्यंग्य वह आईना है जिसमें सच धुंधला नहीं होता। सवाल यही है कि क्या हम इस आईने में झांकने का साहस रखते हैं?

विजय दिवस पर शौर्य बलिदान और राष्ट्रगौरव का होगा स्मरण

16 दिसंबर को शहीद सैनिक स्मारक पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम

गोरखपुर(राष्ट्र क़ी परम्परा)
भारत–पाक युद्ध 1971 में मिली ऐतिहासिक विजय की स्मृति में विजय दिवस (16 दिसंबर) को गोरखपुर में शौर्य, पराक्रम और बलिदान का भावपूर्ण स्मरण किया जाएगा। इस अवसर पर कार्यालय जिला सैनिक कल्याण एवं पुनर्वास, गोरखपुर द्वारा जनपद स्तरीय श्रद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है।
जिला सैनिक कल्याण एवं पुनर्वास कार्यालय से जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार 16 दिसंबर 2025 को प्रातः 11 बजे गोरखपुर स्थित शहीद सैनिक स्मारक पर शहीदों को पुष्पचक्र अर्पित कर भावभीनी श्रद्धांजलि दी जाएगी। कार्यक्रम में जनपद के पूर्व सैनिक, वीर नारियाँ एवं उनके आश्रित सम्मानपूर्वक सहभागिता करेंगे।
आयोजन का उद्देश्य 1971 के युद्ध में राष्ट्र की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीर सपूतों के अदम्य साहस, त्याग और राष्ट्रनिष्ठा को नमन करना है। यह कार्यक्रम देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता के लिए किए गए सर्वोच्च बलिदान को स्मरण करते हुए भावी पीढ़ी में देशभक्ति की चेतना को और अधिक प्रबल करेगा।
जिला सैनिक कल्याण एवं पुनर्वास अधिकारी ने जनपद के सभी पूर्व सैनिकों, वीर नारियों और उनके परिजनों से अपील की है कि वे इस गौरवशाली अवसर पर अपनी उपस्थिति सुनिश्चित कर कार्यक्रम की गरिमा को और ऊँचाई प्रदान करें।