Friday, June 26, 2026
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भटनी से चले गोरखपुर–लखनऊ इंटरसिटी: रेल सुविधाओं के विस्तार को लेकर सौंपा गया मांग–पत्र

भटनी/देवरिया।(राष्ट्र की परम्परा)
जनपद देवरिया एवं आसपास के क्षेत्रों में रेल सुविधाओं के विस्तार, सुदृढ़ीकरण और जनहितकारी ट्रेनों के संचालन की मांग को लेकर रविवार, 20 दिसंबर 2025 को राष्ट्रीय समानता दल के तत्वावधान में राष्ट्रीय महिला बहुजन संगठन तथा क्षेत्रीय नागरिकों की संयुक्त बैठक भटनी जंक्शन परिसर में आयोजित की गई। बैठक के उपरांत रेल प्रशासन को एक विस्तृत मांग–पत्र सौंपा गया।
बैठक में वक्ताओं ने कहा कि भारतीय रेलवे देश की जीवनरेखा है और गरीबों, किसानों, श्रमिकों, विद्यार्थियों, महिलाओं एवं बुजुर्गों के लिए सस्ती और सुरक्षित यात्रा का प्रमुख साधन है। ऐसे में देवरिया जैसे जनपदों में रेल सेवाओं का विस्तार और समयबद्ध संचालन अत्यंत आवश्यक है।
मांग–पत्र में प्रमुख रूप से गोरखपुर–लखनऊ इंटरसिटी एक्सप्रेस (15031) का संचालन प्रातः 05 बजे भटनी जंक्शन से प्रारंभ करने, चौरीचौरा एक्सप्रेस (15004) का संचालन गोरखपुर से सायं 06 बजे करने, बरहज बाजार, सतरांव, सिसई गुलाब राय, देवरहवा बाबा हाल्ट सहित विभिन्न स्टेशनों के प्लेटफार्म की ऊंचाई मानक के अनुरूप बढ़ाने की मांग की गई। इसके साथ ही बरहजिया सवारी गाड़ियों का प्रति फेरा भटनी से बरहज नियमित संचालन, भटनी से कुशीनगर तथा बरहज से दोहरीघाट को रेलमार्ग से जोड़ने और शालीमार एक्सप्रेस (15022) को पुरी (ओडिशा) तक विस्तार देने की मांग शामिल रही।
राष्ट्रीय समानता दल के प्रदेश अध्यक्ष संजयदीप कुशवाहा ने कहा कि पूर्वांचल के ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों की जनता वर्षों से बेहतर रेल सुविधाओं की प्रतीक्षा कर रही है। राष्ट्रीय मुख्यमहासचिव अगमस्वरूप कुशवाहा ने प्लेटफार्म सुदृढ़ीकरण को महिलाओं, बुजुर्गों और दिव्यांगजनों की सुरक्षा से जोड़ा। वहीं सुरेंद्र बौद्ध ने कुशीनगर को रेलमार्ग से जोड़ने को पर्यटन और रोजगार के लिए मील का पत्थर बताया। जिलाध्यक्ष विजय कुमार ने कहा कि रेल सुविधाओं के विस्तार से व्यापार और आवागमन को गति मिलेगी, जबकि संगठन सचिव विमलेश कुमार ने मांगों पर शीघ्र कार्रवाई की अपेक्षा जताई।
कार्यक्रम के अंत में प्रतिनिधिमंडल ने स्टेशन अधीक्षक के माध्यम से रेलवे बोर्ड एवं पूर्वोत्तर रेलवे प्रशासन को मांग–पत्र सौंपा। बैठक में रामज्ञानी आचार्य, मोतीलाल, रामविश्वास, हरिनारायण, सुरेश मौर्य, श्रीकृष्ण कुशवाहा, रमेश यादव, ओमप्रकाश चौधरी, वीरेंद्र यादव सहित सैकड़ों नागरिक उपस्थित रहे।

सलेमपुर तहसील में संपूर्ण समाधान दिवस का आयोजन, कई शिकायतों का मौके पर निस्तारण

सलेमपुर/देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)सलेमपुर तहसील परिसर में शनिवार को संपूर्ण समाधान दिवस का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता मुख्य राजस्व अधिकारी जल राजन चौधरी ने की। इस अवसर पर उपजिलाधिकारी सलेमपुर दिशा श्रीवास्तव एवं तहसीलदार अलका सिंह भी उपस्थित रहीं।समाधान दिवस के दौरान तहसील क्षेत्र से आए फरियादियों की समस्याओं को गंभीरता से सुना गया। राजस्व, पुलिस, विकास, आपूर्ति, विद्युत, जल निगम सहित विभिन्न विभागों से जुड़े मामलों की क्रमवार सुनवाई की गई। कई मामलों में संबंधित विभागीय अधिकारियों द्वारा मौके पर ही शिकायतों का निस्तारण किया गया, जिससे फरियादियों को राहत मिली।मुख्य राजस्व अधिकारी जल राजन चौधरी ने अधिकारियों को निर्देशित किया कि जनसमस्याओं का समाधान प्राथमिकता के आधार पर किया जाए। उन्होंने कहा कि जिन प्रकरणों का निस्तारण तत्काल संभव नहीं है, उन्हें समयबद्ध ढंग से पूर्ण कर इसकी सूचना शिकायतकर्ता को दी जाए। अनावश्यक रूप से किसी भी शिकायत को लंबित न रखा जाए।उपजिलाधिकारी दिशा श्रीवास्तव ने कहा कि संपूर्ण समाधान दिवस का उद्देश्य जनता को एक ही मंच पर त्वरित न्याय और समाधान उपलब्ध कराना है। इसके लिए सभी विभागों के अधिकारी आपसी समन्वय के साथ कार्य करें। तहसीलदार अलका सिंह ने भी राजस्व से जुड़े मामलों में शीघ्र कार्रवाई के निर्देश देते हुए कहा कि भूमि विवाद, दाखिल-खारिज और पैमाइश से संबंधित प्रकरणों को विशेष प्राथमिकता दी जाए।समाधान दिवस में बड़ी संख्या में फरियादी उपस्थित रहे। अधिकारियों के सकारात्मक रुख और त्वरित कार्रवाई से लोगों में संतोष देखने को मिला। कार्यक्रम के अंत में अधिकारियों ने आमजन से अपील की कि वे अपनी समस्याओं के समाधान के लिए संपूर्ण समाधान दिवस का अधिक से अधिक लाभ उठाएं।

हाईकोर्ट का सख्त संदेश: ‘सर तन से जुदा’ नारा भारत के संविधान के खिलाफ

लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए साफ कर दिया है कि ‘सर तन से जुदा’ जैसे नारे भारत में किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं हैं। यह टिप्पणी मौलाना तौकीर रजा से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की गई। अदालत ने स्पष्ट कहा कि भारत में न्याय और सजा का अधिकार केवल कानून के पास है, किसी भी भीड़ या व्यक्ति को यह हक नहीं दिया जा सकता।
न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने कहा कि इस तरह के नारे न केवल भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 के तहत दंडनीय हैं, बल्कि ये भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता के लिए सीधी चुनौती भी हैं। अदालत ने यह भी जोड़ा कि ऐसे नारे इस्लाम के मूल सिद्धांतों के भी विपरीत हैं, क्योंकि कोई भी धर्म हिंसा या भीड़तंत्र को बढ़ावा नहीं देता।
बरेली हिंसा मामले की पृष्ठभूमि
26 सितंबर को बरेली में नमाज के बाद एक बड़ा उपद्रव हुआ था। सैकड़ों लोगों की भीड़ ने प्रदर्शन के दौरान आपत्तिजनक नारे लगाए और देखते ही देखते स्थिति हिंसक हो गई। पुलिस को रोकने की कोशिश में बाधा डाली गई, पुलिसकर्मियों पर हमला हुआ, उनकी वर्दी फाड़ी गई और हथियार तक लूट लिए गए। इस हिंसा में कई पुलिसकर्मी घायल हुए और सरकारी व निजी संपत्तियों को नुकसान पहुंचा।
अभिव्यक्ति की आज़ादी की सीमा
हाईकोर्ट ने दो टूक कहा कि हिंसा भड़काने वाले नारे अभिव्यक्ति की आज़ादी के दायरे में नहीं आते। ऐसे नारे सार्वजनिक शांति भंग करते हैं और कानून व्यवस्था पर सीधा हमला माने जाते हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि धार्मिक नारे ईश्वर के सम्मान के लिए होते हैं, न कि हत्या या हिंसा के समर्थन के लिए।
जमानत से इनकार
अदालत ने केस डायरी का हवाला देते हुए कहा कि याचिकाकर्ता गैरकानूनी सभा का हिस्सा था और हिंसा में सक्रिय रूप से शामिल था, इसलिए उसे जमानत देने का कोई आधार नहीं बनता।

पाक पूर्व पीएम इमरान खान दोषी करार, पत्नी बुशरा बीबी संग लंबी कैद

कराची (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)संघीय जांच एजेंसी (FIA) की विशेष अदालत ने शनिवार को पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के संस्थापक इमरान खान तथा उनकी पत्नी बुशरा बीबी को तोशाखाना-2 मामले में दोषी ठहराते हुए 17-17 साल की कैद की सजा सुनाई है। इसके साथ ही अदालत ने दोनों पर 1 करोड़ 64 लाख पाकिस्तानी रुपये का जुर्माना भी लगाया है। जुर्माना अदा न करने की स्थिति में अतिरिक्त कारावास की सजा भुगतनी होगी।डॉन अख़बार द्वारा अदालत के आदेश की प्रति के हवाले से बताया गया है कि सजा सुनाते समय न्यायालय ने इमरान खान की वृद्धावस्था और बुशरा बीबी के महिला होने को ध्यान में रखते हुए सजा में कुछ नरमी बरती। यह मामला एक महंगे बुल्गारी आभूषण सेट से जुड़ा है, जिसे मई 2021 में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस द्वारा आधिकारिक दौरे के दौरान उपहार स्वरूप दिया गया था। आरोप है कि इस बहुमूल्य उपहार को तोशाखाना नियमों के विपरीत बेहद कम कीमत पर खरीदा गया।यह फैसला रावलपिंडी की अदियाला जेल में सुनवाई के दौरान FIA की विशेष अदालत के न्यायाधीश शाहरुख अरजुमंद ने सुनाया, जहां इमरान खान पहले से ही अन्य मामलों में कैद हैं। अदालत ने इमरान खान को पाकिस्तान दंड संहिता की धारा 409 (आपराधिक विश्वासघात) और धारा 34 (सामान्य इरादा) के तहत 10 साल की कठोर कैद, जबकि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 5(2) के तहत 7 साल की सजा सुनाई। बुशरा बीबी को भी इन्हीं धाराओं के तहत कुल 17 साल की सजा दी गई।अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सीआरपीसी की धारा 382-बी के अंतर्गत दोषियों को पहले से बिताई गई हिरासत अवधि का लाभ मिलेगा। इस फैसले के बाद पाकिस्तान की राजनीति में एक बार फिर उथल-पुथल तेज हो गई है और पीटीआई समर्थकों की तीखी प्रतिक्रिया सामने आ रही है।

होम्योपैथिक दृष्टिकोण से सर्दी-खांसी व शीतकालीन बीमारियों से बचाव के प्रभावी उपाय–डॉ. श्याम मोहन श्रीवास्तव

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)।सर्दियों का मौसम जहां ठंडक और राहत लेकर आता है, वहीं इस दौरान सामान्य सर्दी- खांसी, जुकाम, फ्लू, बुखार और श्वसन संबंधी बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। बदलते तापमान और ठंडी हवाओं के कारण शरीर की प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होती है। ऐसे में धर्मपुर स्थित सुमित्रा होम्योपैथिक क्लिनिक के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. श्याम मोहन श्रीवास्तव होम्योपैथिक और सामान्य चिकित्सा के संयुक्त दृष्टिकोण से लोगों को जागरूक कर रहे हैं, और मौसमी बीमारियों से बचाव के सरल उपाय बता रहे हैं।
डॉ. श्रीवास्तव के अनुसार सर्दियों में सबसे पहली आवश्यकता शरीर को पर्याप्त रूप से गर्म रखना है। हल्के से मध्यम परतों में ऊनी कपड़े पहनना चाहिए तथा सिर, गला और पैरों को विशेष रूप से ढककर रखना चाहिए। रात में कंबल या गर्म चादर का प्रयोग शरीर की ऊष्मा बनाए रखने में सहायक होता है, जिससे ठंड के कारण प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर नहीं पड़ती।
आहार और पेय पर विशेष ध्यान देना भी बेहद जरूरी है। वे बताते हैं कि सूप, गर्म पानी,अदरक, तुलसी, दालचीनी या काली मिर्च से बनी हर्बल चाय शरीर का तापमान बनाए रखती है और सर्दी-खांसी के लक्षणों में राहत देती है। इसके साथ ही विटामिन-सी से भरपूर फल जैसे आंवला, संतरा और नींबू इम्यून सिस्टम को मजबूत करते हैं। पारंपरिक गर्म और संतुलित भोजन शरीर को ठंडी हवाओं से लड़ने में सक्षम बनाता है।
स्वच्छता को लेकर डॉ. श्रीवास्तव विशेष सतर्कता बरतने की सलाह देते हैं। सर्दी-खांसी और फ्लू के वायरस हाथों के माध्यम से तेजी से फैलते हैं, इसलिए साबुन से बार-बार हाथ धोना, भीड़-भाड़ वाले स्थानों से बचना और संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में न आना जरूरी है। ये छोटे- छोटे उपाय बड़े संक्रमण से बचा सकते हैं।वे नियमित दिनचर्या अपनाने पर भी जोर देते हैं। ठंड के मौसम में हल्का व्यायाम, घर के अंदर योग या प्राणायाम और रोजाना 10 से 15 मिनट की धूप लेना शरीर की ऊर्जा और रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। साथ ही पर्याप्त और समय पर नींद लेना बेहदआवश्यक है,क्योंकि नींद के दौरान शरीर स्वयं को ठीक करता है और संक्रमण से लड़ने की ताकत बढ़ाता है।
होम्योपैथिक चिकित्सा के संदर्भ में वे बताते हैं कि प्रत्येक मरीज के लक्षण अलग होते हैं, इसलिए दवाएं भी लक्षणों के अनुरूप दी जाती हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि बिना चिकित्सकीय सलाह के दवा लेना उचित नहीं है। यदि किसी व्यक्ति को तेज बुखार, सांस लेने में परेशानी, सीने में दर्द या लंबे समय तक खांसी बनी रहे, तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए। कुल मिलाकर उनका मानना है कि सही दिनचर्या, संतुलित आहार, स्वच्छता और समय पर उपचार अपनाकर सर्दियों की बीमारियों से काफी हद तक बचाव संभव है।

आगरा से अलीगढ़ तक ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे: एक घंटे में पूरा होगा सफर, इन इलाकों से गुजरेगा हाईवे; जमीनों के दाम बढ़ने तय

आगरा (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। आगरा से अलीगढ़ तक हाथरस के रास्ते प्रस्तावित ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे का निर्माण कार्य अब तेज रफ्तार पकड़ने जा रहा है। करीब 65 किलोमीटर लंबे इस एक्सप्रेसवे के पूरा होने के बाद आगरा से अलीगढ़ का सफर महज एक घंटे में पूरा किया जा सकेगा। परियोजना के चलते आसपास के क्षेत्रों में जमीनों के दाम आसमान छूने की उम्मीद जताई जा रही है।

सर्वे पूरा, निर्माण कार्य शुरू

भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने आगरा–अलीगढ़ ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे का सर्वे कार्य पूरा कर लिया है। सर्वे के बाद अब निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया है। इस एक्सप्रेसवे के निर्माण का लक्ष्य दिसंबर 2027 तक पूरा कर आवागमन शुरू करने का रखा गया है।

ओवरब्रिज और अंडरपास से गांवों को होगा लाभ

सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, एक्सप्रेसवे पर 49 फुट ओवरब्रिज, अंडरपास और रेलवे ओवरब्रिज बनाए जाएंगे। इससे आसपास के गांवों के लोगों को आवागमन में सुविधा मिलेगी और ग्रामीण क्षेत्रों के विकास को नई गति मिलेगी। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस परियोजना से रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।

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दो चरणों में होगा निर्माण कार्य

एनएचएआई के परियोजना निदेशक संदीप यादव ने बताया कि यह ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे कुल 65 किलोमीटर लंबा होगा और इसकी कुल लागत 1536.9 करोड़ रुपये तय की गई है।

पहला चरण: 36.9 किमी, लागत 820.40 करोड़ रुपये

दूसरा चरण: 28 किमी, लागत 716.50 करोड़ रुपये

रियल एस्टेट को मिलेगा बड़ा बूस्ट

एक्सप्रेसवे के निर्माण से आगरा, हाथरस और अलीगढ़ के बीच कनेक्टिविटी मजबूत होगी। बेहतर यातायात सुविधा के चलते इन इलाकों में रियल एस्टेट, उद्योग और व्यापार को बड़ा फायदा मिलने की संभावना है। विशेषज्ञों के अनुसार, एक्सप्रेसवे के आसपास के क्षेत्रों में जमीन और प्रॉपर्टी के दाम तेजी से बढ़ सकते हैं।

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राजधानी एक्सप्रेस की टक्कर से आठ हाथियों की मौत, पांच कोच पटरी से उतरे

होजाई/असम (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। असम के होजाई जिले में शनिवार तड़के एक दर्दनाक रेल हादसा हुआ, जब सैरांग–नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस हाथियों के एक झुंड से टकरा गई। इस दुर्घटना में आठ हाथियों की मौत हो गई, जबकि एक हाथी गंभीर रूप से घायल बताया जा रहा है। हादसे के बाद ट्रेन के पांच डिब्बे और इंजन पटरी से उतर गए, हालांकि राहत की बात यह रही कि किसी भी यात्री के घायल होने की सूचना नहीं है।

तड़के 2:17 बजे हुआ हादसा

पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे (NFR) के प्रवक्ता के अनुसार, यह हादसा शनिवार तड़के करीब 2:17 बजे हुआ। नगांव के डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (DFO) सुहास कदम ने बताया कि घटना होजाई जिले के चांगजुराई इलाके में हुई। हादसे की जानकारी मिलते ही वन विभाग और रेलवे के वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुंच गए।

रेल और वन विभाग मौके पर तैनात

वन अधिकारियों ने बताया कि ट्रेन की चपेट में हाथियों का एक पूरा झुंड आ गया था, जिसमें आठ हाथियों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि एक हाथी घायल अवस्था में मिला है। घायल हाथी के उपचार और स्थिति पर वन विभाग की टीम निगरानी रखे हुए है।

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ट्रेन सेवाएं डायवर्ट, मरम्मत कार्य जारी

रेलवे प्रशासन के अनुसार, जमुनामुख–कांपुर सेक्शन पर ट्रैक क्षतिग्रस्त होने के कारण इस रूट से गुजरने वाली ट्रेनों को वैकल्पिक लाइन से डायवर्ट किया गया है। फिलहाल ट्रैक की मरम्मत और बहाली का कार्य तेजी से चल रहा है।

सैरांग-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस का रूट

गौरतलब है कि सैरांग–नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस मिजोरम के सैरांग (आइजोल के पास) को दिल्ली के आनंद विहार टर्मिनल से जोड़ती है। इस हादसे ने एक बार फिर रेलवे ट्रैक पर वन्यजीवों की सुरक्षा और हाथी गलियारों में ट्रेन की गति नियंत्रण जैसे मुद्दों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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साहिबगंज अवैध खनन मामला: 100 करोड़ की लूट, CBI की रडार पर नेता और अफसर

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झारखंड (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। झारखंड के साहिबगंज जिले में सामने आया साहिबगंज अवैध खनन मामला अब देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी CBI के लिए गंभीर जांच का विषय बन चुका है। सीबीआइ की प्रारंभिक जांच में नीबू पहाड़ क्षेत्र में करीब 100 करोड़ रुपये के अवैध पत्थर खनन का खुलासा हुआ है। इस मामले में अधिकारियों के साथ-साथ राजनीतिक संरक्षण की भी आशंका जताई जा रही है।

CBI जांच को चुनौती देने वाली राज्य सरकार की याचिका सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज किए जाने के बाद एजेंसी ने जांच की रफ्तार तेज कर दी है। अब इस मामले में जिन-जिन लोगों की भूमिका सामने आ रही है, उन्हें नोटिस भेजकर पूछताछ की तैयारी की जा रही है।

तीन प्रमुख नाम जांच के घेरे में CBI की शुरुआती रिपोर्ट में

पवित्र यादव, विष्णु यादव और अमित यादव की भूमिका को अहम माना गया है। जांच के दौरान यह सामने आया कि इन्हीं लोगों द्वारा नीबू पहाड़ में भारी मशीनों के जरिए अवैध खनन कराया गया। खनन में इस्तेमाल किए गए उपकरणों की लोकेशन ट्रैकिंग से भी नीबू पहाड़ क्षेत्र की पुष्टि हुई है।

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वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर जांच CBI ने मौके पर निरीक्षण के बाद अवैध रूप से निकाले गए पत्थरों और उनके बाजार मूल्य का वैज्ञानिक मूल्यांकन कराया। इसके साथ ही मशीनों की गतिविधि, सैटेलाइट डेटा और अन्य तकनीकी साक्ष्य भी जुटाए गए हैं। इन तथ्यों से यह स्पष्ट हुआ कि साहिबगंज अवैध खनन मामला सुनियोजित तरीके से लंबे समय तक चलाया गया।जांच का दायरा बढ़ा
CBI अब इस घोटाले में शामिल अफसरों और नेताओं की भूमिका की भी गहराई से जांच कर रही है। आने वाले दिनों में इस मामले में बड़े खुलासे और कार्रवाई की संभावना जताई जा रही है।

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सावरकर की प्रतिमा का अनावरण या हिन्दू राष्ट्र के एजेंडे का निरावरण

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बादल सरोज

आजकल के हालचाल में दर्ज किये जाने लायक नई बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छाप तिलक सब छोड़ अनावृत, निरावृत धजा में आने की चाल-ढाल है। राजनीति से अलग-थलग रहने और सांस्कृतिक संगठन होने का दावा करने वाला दुनिया का ‘सबसे बड़ा’ बिना रजिस्ट्रेशन वाला एनजीओ अब खुलकर सत्ता और उसकी पार्टी के साथ आलिंगनबद्ध दिखने में गुरेज नहीं कर रहा। उत्तर से सुदूर दक्षिण तक हर जगह गाँठ बांधे जोड़े में दिखने के लिए आतुर और तत्पर है। लगता है कथा अब लिपे से बाहर जा चुकी है। न शासन के प्रोटोकॉल्स की मर्यादाओं की परवाह है, ना ही दिखावे के लिए ही कुछ दूरी बनाने की सावधानी है। खुला खेल फर्रुखाबादी है। अयोध्या कांड के हाल के दोनों अध्यायों में आर एस एस प्रमुख मोहन भागवत सत्ता के नम्बर वन के साथ आगे-आगे प्रकटायमान थे, तो पिछले सप्ताह अंडमान में नम्बर दो के साथ विराजमान थे।

अपने अतीत के कारनामों के चलते अब तक खुद कुनबे द्वारा एक हाथ की दूरी पर रखे गए संघ के एकदम अंतरंग साथ तक पहुँच जाने की स्थिति में दिखना सिर्फ फोटो फ्रेम में समाने या चेहरा दिखाने भर का प्रसंग नहीं है। यह इसे प्रतिष्ठा और स्वीकार्यता देने का मामला तो है ही, मगर उससे ज्यादा भारतीय इतिहास से वर्तमान तक देश की जनता के विराट बहुमत द्वारा खारिज और अस्वीकार किये गए इसके पूरी तरह अभारतीय और बिलकुल असंवैधानिक एजेंडे को आगे बढ़ाने का और इसी के साथ उसे एक तरह से देश की सरकार का लक्ष्य और ध्येय बनाना है।

12 दिसंबर को अंडमान द्वीप समूह के बेओदनाबाद – श्रीविजयपुरम – में ‘वीर सावरकर इंस्पिरेशन पार्क’ का उदघाटन समारोह इसकी ताज़ी मिसाल है। मजे की बात यह है कि जिनकी प्रतिमा पधराई जा रही थी और प्रेरणा लेने वाला बगीचा उदघाटित किया जा रहा, वे विनायक दामोदर सावरकर जीवन भर जिस पार्टी के नेता रहे उस अखिल भारतीय हिन्दू महासभा का कोई प्रतिनिधि मंच तो छोड़िए, दीर्घा तक में नहीं था। कौन किसके साथ था, इस पचड़े में फंसने की बजाय यह कहना ही पर्याप्त है कि संघ सरसंचालक मोहन भागवत और गृहमंत्री अमित शाह का संग साथ था।

इस अवसर पर जो साथ-साथ कहा गया, वह गौरतलब है। भारत के गृहमंत्री के नाते बोलते हुए अमित शाह ने जहां सावरकर को देश का सबसे महान स्वतन्त्रता सेनानी बताया और कहा कि उनकी प्रतिमा आने वाली पीढ़ियों को उनके त्याग और देशभक्ति की याद दिलाती रहेगी । शाह यह भी बोले कि ‘सावरकर को ‘वीर’ की उपाधि किसी सरकार ने नहीं, बल्कि देश की जनता ने उनके अदम्य साहस के लिए दी है।‘ यह कितना बड़ा झूठ है इसके विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है। इतना ही काफी है कि यह बात अब सिर्फ उनसे असहमत लोग ही नहीं, उनके प्रशंसक, समर्थक और जीवनीकार तथा जिस कितबिया में उन्हें ‘ वीर सावरकर’ संबोधन दिया गया था, उसके प्रकाशक भी मान चुके हैं कि जिसमें ‘वीर सावरकर’ लिखा गया उस किताब के लेखक – चित्रगुप्त – कोई और नहीं, स्वयं सावरकर ही थे।

रही उनके ‘महान’ स्वतन्त्रता सेनानी होने की बात, तो कभी-कभी लगता है, जैसे समय-समय पर उनके बारे में इस तरह का दावा ठोककर आरएसएस जानबूझकर देश के स्वतन्त्रता संग्राम में उनकी भूमिका के कृष्ण-पक्ष को पुनि पुनि उजाले में ला देता है और ऐसा करके उनके द्वारा आजीवन की गयी संघ की आलोचनाओं, उसके उड़ाए गए मजाक का बदला लेता है।

दस्तावेजी सबूतों के साथ लिखे गए ग्रंथों के हिमालयी ऊंचाईयों के पहाड़ के पहाड़ मौजूद हैं, जो बताते हैं कि आजादी की लड़ाई में 1909 के बाद वाले सावरकर की भूमिका और योगदान नायक की नहीं, प्रतिनायक की थी। उन्होंने भारतीय जनता के इस महासंग्राम को सिर्फ रूप में नहीं, सार में भी ऐसा अपूरणीय नुकसान पहुंचाया था, जिसकी कोई और दूसरी मिसाल नहीं है। उनकी दो-दो आजीवन कारावासों की कहानी सुनाने वाले यह बात नहीं बताते कि कुल जमा 12 वर्ष के कारावास में असल में वे 10 वर्ष से भी कम समय कालापानी के नाम से कुख्यात उस जेल में रहे, जहां बाकी स्वतन्त्रता सेनानी या तो कभी रिहा ही नहीं हुए थे या आजादी के बाद ही छूट पाए थे।

जहां तक जेल में सावरकर द्वारा भुगती यातनाओं और दूसरी कहानियों की असलियत है, तो उसे उनके समकालीन स्वतंत्रता सेनानी बारीन्द्र नाथ घोष अंडमान की सेलुलर जेल में अपने अनुभवों पर लिखी ‘द्वीपान्तरे कथा’ – द टेल ऑफ माय एक्जाइल – किताब में दर्ज कर देश को बता चुके हैं। सावरकर के जीवन काल में ही बारीन्द्र घोष अपने संस्मरण और बाद के साक्षात्कारों में बताते हैं कि उन्होंने स्वयं कोल्हू से तेल निकालने का काम किया था, लेकिन उन्होंने विनायक दामोदर सावरकर को कभी कोल्हू चलाते हुए नहीं देखा। उनके अनुसार, सावरकर अक्सर जेल की लाइब्रेरी में काम करते थे, किताबें पढ़ते थे और अन्य कैदियों को पढ़ाते थे। मुस्लिम वार्डरों द्वारा हिंदू कैदियों के उत्पीड़न की सावरकर की कहानी को भी बारीन्द्र घोष गलत बताते हुए लिखते हैं कि ‘वार्डरों के हाथों हिंदू और मुस्लिम दोनों ही कैदी समान रूप से प्रताड़ित होते थे।‘

वे बताते हैं कि ‘सावरकर जेल प्रशासन के खिलाफ हुए संघर्षों में भी कभी शामिल नहीं हुए। जब नानी गोपाल जैसे क्रांतिकारियों ने जेल में भूख हड़ताल की थी, तब भी सावरकर भाईयों (विनायक या गणेश) ने इसमें भी हिस्सा नहीं लिया था।‘

उसी अंडमान में जाकर भागवत और शाह द्वारा सावरकर का उन कामों के लिए, जो उन्होंने कभी किये ही नहीं, का गौरवगान करना एक तरह से इस जेल में रहे स्वतन्त्रता सेनानियों का अनादर ही कहा जाएगा।

प्रसंगवश यह याद दिलाना जरूरी है कि काला पानी की सेलुलर जेल से रिहा होने वाले तीन चौथाई – 75% – स्वतंत्रता सेनानी लाल झंडे को थामकर आजादी को उसके अगले चरण – भगतसिंह के सपनों की मंजिल – तक ले जाने की लड़ाई में कूद पड़े थे, जबकि सावरकर बीच गुलामी में ही रत्नागिरी में अंग्रेज सरकार के वजीफाख्वार बनकर 60 रूपये की पेंशन ले रहे थे। यह राशि उस जमाने में कितनी बड़ी थी, इसे समझने के लिए यह बताना काफी होगा कि सावरकर ने उसे बढाने के लिए जब रत्नागिरी कलेक्टर को चिट्ठी लिखी, तो उसने उन्हें जवाब देते हुए कहा कि ‘मैं इसकी सिफारिश करने के योग्य नहीं हूँ, क्योंकि मेरा वेतन आपकी पेंशन से भी कम है।“

12 दिसम्बर को प्रतिमा अनावरण के वक़्त दिए अपने भाषण में मोहन भागवत ने दावा किया कि “सावरकर के खतों से देश के प्रति गहरी भक्ति झलकती थी और वे कहते थे कि अगर सात भाई होते, तो सभी देश के लिए खुशी-खुशी जेल जाते।“ भागवत साहब को सावरकर साहब के किन खतों में देशभक्ति नजर आ गई, ये यह उन्हें बताना चाहिए। अलबत्ता सावरकर जिन चिट्ठियों के लिए विश्वप्रसिद्ध हैं उन 1911, 13, 14, 18 और 1920 की चिट्ठियों में कातर प्रार्थना और इंग्लॅण्ड की रानी से ‘माँ मुझे अपने आंचल में छुपा ले, गले से लगा ले’ के दारुण विलाप और ‘बिगड़े बेटे को सुधरने’, अपनी गोद में जगह देने की मनुहार और बाकी जिन्दगी रानी और ब्रिटिश हुकूमत की सेवा करने तथा कभी राजनीति में भाग न लेने की गुहार के सिवाय कुछ नहीं है । मानना पडेगा कि वे अपनी बात के धनी थे, रानी की कृपा से रिहा होने के बाद उन्होंने जो कहा था, उसे निबाहा भी : अंग्रेजी राज की सेवा में हर तरह से अपना जीवन झोंक दिया।

1857 की महान लड़ाई — जिसे उसी वर्ष अमरीका के अखबारों के लिए अपने लेखों में कार्ल मार्क्स ने भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम कहा था – में हिंदू-मुस्लिम की साझी बहादुरी और कुर्बानियों से हासिल कौमी एकता, (जिसकी सराहना स्वयं सावरकर ने 1909 में लिखी अपनी अन्यथा अच्छी किताब इंडियन वार ऑफ़ इंडिपेंडेंस 1857 में भी की थी) को छिन्न-भिन्न करने और अपनी ही किताब में लिखी बातों के खिलाफ आचरण करने में पूरा शक्ति लगा दी। नमाज के समय मस्जिदों के सामने बैंड बाजे बजाकर दंगे करवाने का प्रयोग सबसे पहले इन्ही की अगुआई में रत्नागिरी में हुआ, जिसे बाद में संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार ने अपनी नित्य की जाने वाली क्रिया का हिस्सा बनाया ।

इन दिनों कुनबे की प्रचार भुजाएं भारत विभाजन की जिम्मेदारियों की टोपियां पहनाने में लगी हैं। ऐसा करते में वे बेचारे सावरकर को उनके ‘महान’ योगदान से महरूम कर देती हैं। सावरकर वे पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने भारत के बंटवारे की आधारशिला रखी थी।

हिंदुत्व शब्द भले 1892 में चंद्रनाथ बसु ने उपयोग में लाया था, मगर उसे साम्प्रदायिक हथियार के रूप में सावरकर ने ही तराशा और धारदार बनाकर प्रस्तुत किया। अपनी कितबिया हिंदुत्व (एसेंसियल ऑफ हिंदुत्व) में उन्होंने 1922 में ही हिन्दू और मुसलमानों के दो अलग-अलग राष्ट्र की अवधारणा दे दी थी। शेष जीवन में इसे अमल में लाने का ही काम किया। यह सावरकर ही थे, जिहोने 1937 के हिंदू महासभा के अहमदाबाद अधिवेशन में दो राष्ट्रों की आवश्यकता पर एक प्रस्ताव पारित कराया। जब कोई तीन वर्ष बाद 1940 में हुए मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन में, जिन्ना के नेतृत्व में, दो राष्ट्रों के लिए प्रस्ताव पारित किया गया, तब सबसे पहले उसके स्वागत और अभिनंदन में जिन्ना को बधाई पत्र लिखने वाले भी सावरकर ही थे।

उनकी ही अगुआई वाली हिंदू महासभा थी, जिसने बाद में बंगाल, एनडब्ल्यूएफपी और सिंध विधानसभाओं में मुस्लिम लीग के साथ मिलकर गठबंधन सरकारें बनाईं। भाजपा के पितृपुरुष, इसके पूर्ववर्ती संस्करण जनसंघ के संस्थापक पंडित श्यामाप्रसाद मुखर्जी बंगाल में सुहरावर्दी के प्रधानमंत्रित्व वाली ऐसी ही सरकार में उपप्रधानमंत्री बने और सब कुछ के बाद भी बने ही रहे। गाँठ इतनी मजबूत थी कि जब सिंध – जिसे कुछ दिन पहले राजनाथ सिंह भारत का हिस्सा बनाने की ऊंची फेंक रहे थे, उसकी — विधानसभा में, जीएम सैयद ने पाकिस्तान के लिए प्रस्ताव रखा, तब भी हिंदू महासभा इन सरकारों का हिस्सा बनी रही।

स्वतंत्र और संप्रभु भारत के वे कितने महान पक्षधर थे, यह हिन्दू महासभा अध्यक्ष के रूप में उनके दौरों में 1937 से 1940 तक उनके साथ रहे सहयोगी भिड़े ने अपनी डायरी में दर्ज किया है। सावरकर के हवाले से वे लिखते हैं कि ‘यदि मजबूरी में अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना भी पड़े, तो इस देश की सत्ता नेपाल के महाराजा को सौंपकर जाना चाहिये।‘ वे लिखते हैं कि ‘ब्रिटेन को भी यह ज़्यादा सम्मानजनक लगेगा कि भारतीय साम्राज्य की सत्ता, अगर कभी उसके हाथ से निकलती है, तो उसे नेपाल के राजा जैसे ब्रिटेन के बराबर और स्वतंत्र सहयोगी को सौंपा जाए।

ऐसे अनेक तथ्य गिनाये जा सकते हैं, जो यह बताते हैं कि जेल से रिहा होने के बाद सावरकर अंग्रेजों के एजेंट की तरह काम कर रहे थे, मगर फिलहाल सिर्फ दो ही ले लेते हैं। भागवत अपने भाषण में अंडमान को सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिन्द फ़ौज द्वारा मुक्त कराया गया पहला भू-भाग बता रहे थे, मगर यह नहीं बता रहे थे कि जिनकी प्रतिमा लगाते समय वे यह बात कह रहे हैं, उन साहब ने नेताजी सुभाष बोस की आजाद हिन्द फ़ौज के खिलाफ लड़ने के लिए, हिन्दू नौजवानों को अंग्रेजों की सेना में भर्ती होने के लिए बाकायदा अभियान चलाया था। बाद में लिखे अपने लेखों में उन्होंने दावा किया था कि उनकी इस मुहिम से प्रेरित होकर लाखों युवा ब्रिटिश आर्मी में शामिल हुए थे।

आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों को सार रूप में फ़ायदा पहुंचाने का जो काम सावरकर ने किया, वह हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए काम करने वाली ताक़तों को कमज़ोर करने का था। पूरी लड़ाई में वे काँग्रेस और कम्युनिस्टों के ख़िलाफ़ रहे, गांधी को सबसे बड़ा दुश्मन मानते रहे। गांधी की हत्या – जिसे कुनबा गांधी वध कहता है — एकदम ताजे-ताजे आजाद हुए देश के सबसे महान नायक को मारकर अराजकता और विखंडन पैदा करने की साजिश थी।

जिन सरदार पटेल को इन दिनों ये अपना पुरखा बताने पर तुले हैं, उन्होंने भारत के गृहमंत्री के नाते प्रधानमंत्री नेहरू को 27 फरवरी 1948 और श्यामा प्रसाद मुखर्जी को 18 जुलाई 1948 को लिखी चिट्ठी में साफ़ तौर से इस हत्या का जिम्मेदार सावरकर और आरएसएस को बताया था । नेहरू को लिखी चिट्ठी में उन्होंने बताया कि “हत्या की साजिश हिन्दू महासभा में सावरकर के प्रत्यक्ष नेतृत्व वाली कट्टरपंथी शाखा ने रची और इसे अंजाम दिया।“ गांधी की हत्या में उनकी लिप्तता, संदेह के आधार पर उनके बरी हो जाने से ख़त्म नहीं हो जाती। उनके सहयोगियों, अनुयायियों ने बाद में अपनी किताबों में जो ब्यौरा दिया, वह यदि उस समय आ जाता, तो उन्हें शर्तिया कम-से-कम आजीवन कारावास तो होता ही।

12 दिसम्बर को भागवत और शाह ने अपने भाषणों में जब “सावरकर जी का चरित्र देखते हैं तो उनके चरित्र में पूर्णता मिलती है। वर्णन बहुत हुआ है, सब प्रकार की प्रतिभा सावरकर जी के पास थी।“ की अतिशयोक्तियों का वाचन भी किया। सार की बात वह थी, जिसे भागवत ने रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि “राष्ट्र क्या है इसकी स्पष्ट कल्पना सावरकर जी ने दी है। उन्होंने उसको हिंदू राष्ट्र कहा है। हिंदू की व्याख्या भी बताई है।“ धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, गणराज्य के गृह मंत्री अमित शाह ने इसे और आगे बढाते हुए कहा कि “सावरकर ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की नींव रखने वाले क्रांतिकारी थे, जिनकी विचारधारा आज भी देश का मार्गदर्शन कर रही है।“ इस तरह अंडमान के तमाशे का असली मकसद सावरकर के बहाने भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने के धतकरम को आगे बढ़ाने का ही था। यही वह ‘प्रतिभा’ है, जिस पर लहालोट होकर कुनबा सावरकर–सावरकर का जाप कर रहा है।

सावरकर का हिन्दू राष्ट्र क्या है?

हिंदुत्व को परिभाषित करते हुए सावरकर पहले ही साफ़-साफ़ कह चुके थे कि उनका जो हिंदुत्व है, उसका हिन्दू धर्म या उसकी परम्पराओं से कोई संबध नहीं है, यह राज काज चलाने वाली एक राजनीतिक धारणा है। इसका लक्ष्य “राष्ट्र का हिन्दूकरण, हिन्दुओं का सैनिकीकरण” है। उनके मुताबिक़ ऐसा करने के बाद जैसा भारत बनाया जाएगा, उसका मूल मनुस्मृति होगी। जिन सावरकर को अमित शाह ‘सामाजिक बुराइयों को खत्म करने के उनके प्रयासों के लिए वह पहचान नहीं मिली, जो उन्हें मिलनी चाहिए थी।‘ वाला बता रहे थे, उनका मनुस्मृति को वेदों के बाद सबसे पवित्र और पूजनीय ग्रंथ बताया जाना उनके ‘सुधारक’ के असली रूप को सामने ला देता है।

महिलाओं के प्रति उनकी ‘उदारता’ कितनी थी, यह इटली के फासिस्ट हत्यारे मुसोलिनी की पत्नी की तारीफ़ में लिखे उनके आप्त-वचन साफ़ कर देते हैं। राशेल मुसोलिनी की आरती-सी उतारते हुए उन्होंने लिखा था कि वे इसलिए महान हैं, क्योंकि वे ‘एक ऐसी सीधी-सादी गृहिणी हैं, जो घर की चौखट के बाहर पाँव तक नहीं रखती।‘ इसी में नारी के प्रमुख कर्तव्य गिनाते हुए उन्होंने कहा कि ‘घर के काम, बच्चे पैदा करना, पति की सेवा करना, परिवार एवं घर के नौकर-चाकरों का परिपालन ही अच्छी नारी के काम हैं।“
अंडमान में आरएसएस और भाजपा सरकार की युति ठीक इसी तरह के हिन्दू राष्ट्र की कायमी के एजेंडे को साधने के लिए सावरकर की तारीफ़ के पुलिंदे बाँध रही थी, उन्हें प्रेरणास्रोत बता रही थी। संविधान की शपथ लेकर बने गृह मंत्री सावरकर के ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ को सीढ़ी बना उस पर चढ़कर नट जैसे करतब दिखा रहे थे।

गोरखपुर में देश का पहला ‘रिवर सेल’, नदी संरक्षण और शहरी विकास को मिलेगी नई दिशा

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। पर्यावरण संरक्षण और नदी प्रबंधन के क्षेत्र में गोरखपुर अब एक नई मिसाल कायम करने की ओर बढ़ रहा है। नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा ने यहां देश का पहला ‘रिवर सेल’ गठित करने के प्रस्ताव को स्वीकृति दे दी है। यह पहल न केवल पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रमुख नदियों के संरक्षण में अहम भूमिका निभाएगी, बल्कि अन्य शहरों के लिए भी एक आदर्श मॉडल बनेगी।
मुख्यमंत्री की प्राथमिक योजनाओं में शामिल इस परियोजना का उद्देश्य नदियों के प्राकृतिक अस्तित्व को सुरक्षित रखते हुए शहरी विकास को संतुलित और टिकाऊ बनाना है।
रिवर सेल एक विशेषीकृत इकाई होगी, जिसका मुख्य कार्य नदियों को प्रदूषण से मुक्त रखना, उनके प्राकृतिक प्रवाह को बनाए रखना और बाढ़ व जलभराव जैसी समस्याओं के वैज्ञानिक समाधान तैयार करना है। यह नगर निगम, सिंचाई विभाग और जल निगम जैसे विभिन्न विभागों के बीच समन्वय स्थापित करेगा, जिससे नदी से जुड़ी सभी योजनाओं का क्रियान्वयन एकीकृत रूप से हो सके।
इस इकाई में जल विज्ञान और पर्यावरण से जुड़े विशेषज्ञ शामिल होंगे, जो सैटेलाइट मैपिंग और आधुनिक डेटा विश्लेषण के माध्यम से नदियों की सेहत पर लगातार नजर रखेंगे। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होगा कि बिना शोधन का अपशिष्ट जल किसी भी स्थिति में नदियों में न पहुंचे।
रिवर सेल एक स्वतंत्र और उच्च तकनीकी क्षमता वाली इकाई के रूप में कार्य करेगा। इसमें प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ जल विज्ञान, पर्यावरण इंजीनियरिंग और रिमोट सेंसिंग के विशेषज्ञों की टीम तैनात रहेगी।
इस सेल की एक प्रमुख जिम्मेदारी नदियों से जुड़े आंकड़ों का एक समग्र डिजिटल डेटाबेस तैयार करना होगी। आधुनिक तकनीक और सैटेलाइट इमेजरी की मदद से नदी के स्वरूप, जलस्तर में होने वाले बदलाव और जलीय जीवन की स्थिति की चौबीसों घंटे निगरानी की जाएगी, ताकि भविष्य की चुनौतियों से वैज्ञानिक तरीके से निपटा जा सके।
इस योजना का मुख्य लक्ष्य राप्ती, रोहिन और आमी जैसी नदियों को स्वच्छ बनाना है। रिवर सेल यह सुनिश्चित करेगा कि शहर के नालों का गंदा पानी शोधन के बिना नदियों में न जाए।
इसके तहत मौजूदा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स की नियमित निगरानी की जाएगी और आवश्यकता अनुसार नए बायो-डाइजेस्टर तथा प्राकृतिक फिल्ट्रेशन प्रणालियां विकसित की जाएंगी। नदियों के किनारे बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण और बफर जोन तैयार किए जाएंगे, जिससे मिट्टी के कटाव पर नियंत्रण और जल गुणवत्ता में सुधार हो सके।
गोरखपुर में जलभराव लंबे समय से एक गंभीर समस्या रहा है। रिवर सेल शहर के ड्रेनेज सिस्टम और नदियों के बीच समन्वय स्थापित कर वैज्ञानिक समाधान लागू करेगा। इसके तहत कैचमेंट क्षेत्रों की पहचान कर अतिक्रमण हटाने और पारंपरिक जल निकासी मार्गों को पुनर्जीवित करने की योजना बनाई जाएगी।
इससे मानसून के दौरान जल निकासी बेहतर होगी और राप्ती नदी के बढ़ते जलस्तर से होने वाले जोखिमों को समय रहते कम किया जा सकेगा। साथ ही बाढ़ की पूर्व चेतावनी व्यवस्था को भी और मजबूत किया जाएगा।
नदी संरक्षण के साथ यह परियोजना गोरखपुर की पर्यटन और सांस्कृतिक संभावनाओं को भी नई दिशा देगी। रिवर सेल के मार्गदर्शन में नदी तटों पर घाटों का विकास, रिवर फ्रंट पार्क और आधुनिक नौकायन सुविधाएं तैयार की जाएंगी।
रामगढ़ ताल की तर्ज पर अन्य नदी किनारों को भी पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा। इससे स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर मिलेंगे और नदियों के प्रति जन-जागरूकता बढ़ेगी। केंद्र सरकार से अंतिम वित्तीय स्वीकृति मिलने के बाद इस महत्वाकांक्षी योजना पर धरातल पर काम शुरू होगा, जो गोरखपुर के भविष्य को नई पहचान देगा।

रॉयल्टी व प्रदूषण नियमों की अनदेखी पर प्रशासन सख्त

कई ईंट भट्टों पर छापेमारी कर कड़ी कार्रवाई

कांट/शाहजहांपुर(राष्ट्र की परम्परा)
जनपद में रॉयल्टी जमा न करने और प्रदूषण नियंत्रण नियमों का उल्लंघन कर संचालित हो रहे ईंट भट्टों के खिलाफ जिला प्रशासन ने सख्त रुख अपनाया है। अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) अरविंद कुमार के नेतृत्व में खनन विभाग एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की संयुक्त टीम ने कांट क्षेत्र सहित विभिन्न स्थानों पर छापेमारी कर कार्रवाई की।
छापेमारी दल में जिला खनन अधिकारी सत्येंद्र कटियार, तहसीलदार सदर तथा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड बरेली के क्षेत्रीय अधिकारी शामिल रहे। टीम ने ईंट भट्टों पर पहुंचकर अभिलेखों, रॉयल्टी भुगतान और प्रदूषण से संबंधित अनुमतियों की गहन जांच की।
निरीक्षण के दौरान मां वैष्णो ईंट भट्टा उद्योग, पृथ्वीपुर (कांट) पर रॉयल्टी व प्रदूषण संबंधी आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं पाए गए। इस पर प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए लगभग 5 हजार से अधिक भरी ईंटों को ट्रैक्टर चलवाकर नष्ट करा दिया तथा भट्टे का संचालन अग्रिम आदेश तक बंद कर दिया।
इंडिया ब्रिक फील्ड, डूंगरपुर में भी नियमों के उल्लंघन पर करीब 5 हजार से अधिक कच्ची ईंटों को नष्ट कराया गया। वहीं खान ईंट उद्योग, डूंगरपुर में बिना अनुमति नए निर्माण की तैयारी पाए जाने पर भट्टे का कार्यालय सील कर दिया गया।
इसके अतिरिक्त अन्य ईंट भट्टों की भी जांच की गई। जिन भट्टों की रॉयल्टी लंबित पाई गई, उन्हें दो दिन के भीतर रॉयल्टी जमा करने और सभी वैध दस्तावेज प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए।
अपर जिलाधिकारी अरविंद कुमार ने बताया कि जनपद में 200 से अधिक ईंट भट्टे संचालित हैं, जिनमें से इस वर्ष अब तक 48 भट्टों को बंद किया जा चुका है। वर्तमान में 30 से 35 भट्टों की रॉयल्टी अब भी लंबित है। तय समय में रॉयल्टी व दस्तावेज जमा न करने पर कठोर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
प्रशासन की इस कार्रवाई को पर्यावरण संरक्षण और राजस्व वसूली की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।

Bangladesh में हिंसा के बीच भारत का कड़ा एक्शन, 35 बांग्लादेशी नागरिक गिरफ्तार

बांग्लादेश (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। Bangladesh Violence के बीच भारत ने समुद्री सीमा पर सख्ती दिखाते हुए बड़ा कदम उठाया है। बांग्लादेश में लगातार जारी हिंसक प्रदर्शनों, आगजनी और राजनीतिक अस्थिरता के बीच भारत ने अपनी सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत कर दिया है। इसी कड़ी में भारतीय तटरक्षक बल (Indian Coast Guard) ने उत्तरी बंगाल की खाड़ी में बड़ी कार्रवाई करते हुए दो बांग्लादेशी मछली पकड़ने वाली नावों को जब्त किया और उनमें सवार 35 लोगों को गिरफ्तार किया है।

तटरक्षक बल के अनुसार, ये दोनों नावें भारत के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन (EEZ) में अवैध रूप से मछली पकड़ रही थीं। गश्त पर तैनात इंडियन कोस्ट गार्ड के जहाज अनमोल ने संदिग्ध गतिविधि के आधार पर इन्हें रोका। जांच में सामने आया कि नावों से 500 किलोग्राम से अधिक अवैध रूप से पकड़ी गई मछलियां भी बरामद की गई हैं। इसके बाद जब्त नावों और चालक दल को पश्चिम बंगाल के फ्रेजरगंज में मरीन पुलिस को सौंप दिया गया, जहां आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी है।

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यह कार्रवाई Maritime Zones of India Act, 1981 के तहत की गई है, जिसके अनुसार विदेशी जहाज बिना अनुमति भारतीय समुद्री सीमा में मछली नहीं पकड़ सकते। अधिकारियों का कहना है कि यह कोई पहली घटना नहीं है। बीते तीन महीनों में भारतीय तटरक्षक बल आठ बांग्लादेशी नावों को पकड़ चुका है, जिनमें 170 से अधिक लोग हिरासत में लिए गए थे।

सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि बार-बार हो रही इस तरह की घुसपैठ केवल मछली पकड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समुद्री सीमाओं की जांच करने की एक सुनियोजित कोशिश भी हो सकती है। ऐसे में Bangladesh Violence India Action के तहत भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और समुद्री संसाधनों की रक्षा से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

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भारत का EEZ समुद्र तट से लगभग 370 किलोमीटर तक फैला है, जहां देश को समुद्री संसाधनों पर विशेष अधिकार प्राप्त हैं। अवैध मछली पकड़ना न केवल भारतीय मछुआरों को आर्थिक नुकसान पहुंचाता है, बल्कि समुद्री पर्यावरण के लिए भी खतरा बनता है।

WHO Global Summit: पीएम मोदी ने योग और आयुष को बताया वैश्विक स्वास्थ्य का आधार

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के Global Summit on Traditional Medicine के समापन अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने योग और आयुष प्रणालियों की वैश्विक भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत आज पारंपरिक चिकित्सा को आधुनिक विज्ञान से जोड़कर दुनिया को स्वास्थ्य का समग्र मार्ग दिखा रहा है।

इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने आयुष क्षेत्र को डिजिटल रूप से सशक्त बनाने के लिए माई आयुष इंटीग्रेटेड सर्विसेज पोर्टल (MAISP) का शुभारंभ किया और आयुष मार्क का अनावरण किया, जिसे आयुष उत्पादों व सेवाओं की गुणवत्ता के लिए अंतरराष्ट्रीय मानक के रूप में विकसित किया गया है।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि बीते तीन दिनों में आयोजित इस वैश्विक सम्मेलन में दुनिया भर के विशेषज्ञों ने पारंपरिक चिकित्सा, अनुसंधान, डिजिटल तकनीक और नियामक ढांचे पर गहन चर्चा की। भारत का जामनगर अब WHO के पारंपरिक चिकित्सा के वैश्विक केंद्र के रूप में उभर चुका है, जो देश के लिए गर्व का विषय है। उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन पारंपरिक और आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों के संगम का मजबूत मंच बना है।

योग को पारंपरिक चिकित्सा का अहम स्तंभ बताते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि योग ने विश्व को संतुलन, स्वास्थ्य और सामंजस्य का मार्ग दिखाया है। भारत के प्रयासों से 175 से अधिक देशों के सहयोग से 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया गया, जो आज वैश्विक जन-आंदोलन बन चुका है।

उन्होंने यह भी कहा कि बदलती जीवनशैली और तकनीकी सुविधाओं के कारण मानव स्वास्थ्य के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। ऐसे में आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा में संतुलन की अवधारणा भविष्य की स्वास्थ्य आवश्यकताओं को पूरा करने में अहम भूमिका निभाएगी। अश्वगंधा जैसे उदाहरणों का उल्लेख करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि भारत साक्ष्य-आधारित अनुसंधान के जरिए पारंपरिक औषधियों को वैश्विक स्तर पर प्रमाणिक बना रहा है।

जब शिक्षा ही चुनौती बन जाए: दिव्यांग छात्रों के लिए कितनी समावेशी है हमारी शिक्षा व्यवस्था?

शिक्षा डेस्क- राष्ट्र की परम्परा लेखक – सोमनाथ मिश्र

शिक्षा को सामाजिक समानता औरआत्मनिर्भरता का सबसे सशक्त माध्यम माना जाता है। लेकिन भारत जैसे देश में, जहाँ “सबके लिए शिक्षा” को नीति और नारे दोनों स्तरों पर स्वीकार किया गया है, वहीं दिव्यांग छात्रों के लिए शिक्षा आज भी संघर्ष का दूसरा नाम बनी हुई है। काग़ज़ों में मौजूद योजनाएँ, अधिकार कानून और सरकारी घोषणाएँ ज़मीनी स्तर पर अक्सर अधूरी दिखाई देती हैं। सवाल यही है—क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था वास्तव में दिव्यांग छात्रों की ज़रूरतों के अनुरूप समावेशी बन पाई है?

क़ानून और नीतियाँ: मौजूद हैं, पर प्रभाव सीमित

भारत में दिव्यांग छात्रों के अधिकारों को लेकर दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016, समग्र शिक्षा अभियान और उच्च शिक्षा में आरक्षण जैसे प्रावधान मौजूद हैं। इनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि शारीरिक, दृष्टि, श्रवण या बौद्धिक दिव्यांगता से जूझ रहे छात्र भी मुख्यधारा की शिक्षा से जुड़ सकें। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि इन नीतियों का लाभ सभी तक समान रूप से नहीं पहुँच पाता।

कई स्कूलों और कॉलेजों में आज भी बुनियादी ढाँचागत सुविधाओं की भारी कमी है। रैम्प, लिफ्ट, सुलभ शौचालय और व्हीलचेयर-अनुकूल कक्षाएँ अब भी अपवाद हैं, जबकि इन्हें सामान्य मानक होना चाहिए।

भौतिक अवसंरचना: प्रवेश ही सबसे बड़ी बाधा

शारीरिक रूप से दिव्यांग छात्रों के लिए शिक्षा संस्थानों तक पहुँचना ही सबसे पहला संघर्ष है। ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में स्थित सरकारी स्कूलों की इमारतें अक्सर पुरानी हैं, जिनमें दिव्यांग-अनुकूल निर्माण पर ध्यान नहीं दिया गया। परिणामस्वरूप कई छात्र नियमित रूप से स्कूल नहीं जा पाते या बीच में पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं।

उच्च शिक्षा संस्थानों में स्थिति थोड़ी बेहतर दिखती है, लेकिन वहाँ भी सभी विभागों और हॉस्टलों में समान सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं।

शैक्षणिक सामग्री और सहायक सुविधाओं की कमी

दृष्टिबाधित छात्रों के लिए ब्रेल पुस्तकें, ऑडियो कंटेंट और स्क्रीन रीडर जैसी तकनीक बेहद आवश्यक है। श्रवण बाधित छात्रों को साइन लैंग्वेज दुभाषियों और सबटाइटल आधारित सामग्री की ज़रूरत होती है। लेकिन अधिकतर शैक्षणिक संस्थानों में ये सुविधाएँ सीमित हैं।

परीक्षाओं में अतिरिक्त समय, लेखक (स्क्राइब) या डिजिटल सहायक जैसे प्रावधान कानून में तो शामिल हैं, लेकिन व्यवहार में इन्हें हासिल करना आसान नहीं। छात्रों को प्रमाणपत्र, आवेदन और अनुमति की लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, जो मानसिक दबाव भी बढ़ाती है।

शिक्षक प्रशिक्षण और मानसिकता का सवाल

समावेशी शिक्षा की सफलता में शिक्षकों की भूमिका सबसे अहम होती है। दुर्भाग्य से, अधिकांश शिक्षक दिव्यांगता से जुड़े विशेष प्रशिक्षण से वंचित रहते हैं। नतीजतन, कई बार वे छात्रों की क्षमताओं को समझने के बजाय उन्हें कमजोर या बोझ समझ लेते हैं।

यह सोच छात्रों के आत्मविश्वास और सीखने की गति दोनों को प्रभावित करती है। ज़रूरत है कि शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों में समावेशी शिक्षा को अनिवार्य बनाया जाए, ताकि कक्षा का माहौल सभी के लिए समान और सम्मानजनक हो।

डिजिटल शिक्षा: अवसर भी, बाधा भी

कोविड-19 के बाद डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा मिला, लेकिन अधिकांश ऑनलाइन प्लेटफॉर्म दिव्यांग-अनुकूल नहीं हैं। वेबसाइट्स पर स्क्रीन रीडर सपोर्ट, कैप्शन, आसान नेविगेशन जैसी सुविधाओं का अभाव है। ऐसे में तकनीक, जो समावेशन का साधन बन सकती थी, कई दिव्यांग छात्रों के लिए नई बाधा बन गई।

छात्रवृत्तियाँ और सरकारी सहायता: जानकारी का अभाव

सरकार द्वारा दिव्यांग छात्रों के लिए कई छात्रवृत्ति योजनाएँ चलाई जा रही हैं, लेकिन जागरूकता की कमी और जटिल प्रक्रियाओं के कारण अनेक जरूरतमंद छात्र इनका लाभ नहीं उठा पाते। स्कूल और कॉलेज स्तर पर परामर्श और मार्गदर्शन की व्यवस्था मज़बूत की जानी चाहिए, ताकि कोई भी छात्र सिर्फ जानकारी के अभाव में पीछे न रह जाए।

सहानुभूति नहीं, अधिकार आधारित व्यवस्था

दिव्यांग छात्रों के लिए समावेशी शिक्षा सहानुभूति का विषय नहीं, बल्कि अधिकार और सम्मान का सवाल है। जब तक नीतियाँ काग़ज़ों से निकलकर कक्षाओं, परीक्षाओं और डिजिटल प्लेटफॉर्म तक नहीं पहुँचेंगी, तब तक “सबके लिए शिक्षा” केवल एक नारा ही बना रहेगा।

समावेशी अवसंरचना, प्रशिक्षित शिक्षक, सुलभ तकनीक और सरल प्रक्रियाएँ—इन चार स्तंभों पर ही एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था खड़ी हो सकती है, जहाँ दिव्यांग छात्र भी बिना बाधा अपने सपनों को आकार दे सकें।

मॉर्निंग वॉक के दौरान पुलिस की सख्ती, अपराधियों पर बढ़ा शिकंजा

देवरिया में मॉर्निंग वॉकर चेकिंग अभियान से मजबूत हुई सुरक्षा व्यवस्था, पुलिस-जन संवाद ने बढ़ाया भरोसा

देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)।जनपद देवरिया में कानून व्यवस्था को और अधिक प्रभावी बनाने और आम नागरिकों में सुरक्षा का विश्वास पैदा करने के उद्देश्य से शनिवार सुबह एक विशेष ‘मार्निंग वॉकर चेकिंग अभियान’ चलाया गया। यह अभियान पुलिस अधीक्षक देवरिया संजीव सुमन के निर्देश पर प्रातः 5 बजे से 8 बजे तक जिले के विभिन्न थाना क्षेत्रों में एक साथ संचालित किया गया।

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इस व्यापक अभियान के दौरान सभी थाना प्रभारी और थानाध्यक्ष स्वयं सड़कों पर मौजूद रहे और मॉर्निंग वॉक पर निकले नागरिकों से सीधा संवाद स्थापित किया। पुलिस अधिकारियों ने लोगों की समस्याएं सुनीं, सुरक्षा को लेकर आश्वस्त किया और मित्र पुलिसिंग की अवधारणा को व्यवहार में उतारने का प्रयास किया। कई स्थानों पर छोटे विवादों को मौके पर ही शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाया गया, जिससे लोगों में पुलिस के प्रति सकारात्मक भावना देखने को मिली।

अभियान का मुख्य उद्देश्य असामाजिक तत्वों पर नियंत्रण, संदिग्ध गतिविधियों की निगरानी और जनता के बीच विश्वास का माहौल बनाना रहा। चेकिंग के दौरान चोरी के वाहनों की पहचान, तीन सवारी चलाने वालों पर कार्रवाई, मोडिफाइड साइलेंसर वाले दोपहिया वाहनों का चालान, नाबालिगों द्वारा वाहन संचालन पर रोक तथा अवैध हथियार और मादक पदार्थों की रोकथाम को लेकर सघन जांच की गई।

पुलिस ने नागरिकों को इस अभियान के लाभों की जानकारी भी दी, जिससे लोगों ने इस पहल की सराहना की। अभियान के दौरान जनपद के 18 प्रमुख स्थानों पर चेकिंग करते हुए 252 व्यक्तियों और 174 वाहनों की जांच की गई।

देवरिया पुलिस ने स्पष्ट किया है कि इस प्रकार के अभियान भविष्य में भी नियमित रूप से चलाए जाएंगे, ताकि जिले में शांति, सुरक्षा और कानून व्यवस्था को और अधिक मजबूत किया जा सके। यह पहल पुलिस और जनता के बीच भरोसे की कड़ी को और सशक्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।