Friday, June 26, 2026
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मुआवज़ा राजनीतिक फायदे के आधार पर तय कर रही है सरकार: बाबूलाल मरांडी

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रांची (राष्ट्र की परम्परा)। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष एवं नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने झारखंड सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि राज्य में मुआवज़ा अब आपदा या पीड़ा के आधार पर नहीं, बल्कि राजनीतिक फायदे को देखकर तय किया जा रहा है।

बाबूलाल मरांडी ने कहा कि यह अत्यंत दुखद है कि झारखंड में कड़ाके की ठंड के बीच बेघर हुए परिवारों की ओर सरकार की कोई संवेदना नहीं है। रिम्स की भूमि पर अतिक्रमण हटाए जाने के दौरान जिन लोगों के घर तोड़े गए, उनकी पीड़ा सबको दिखाई दी, लेकिन राज्य सरकार ने न तो उन्हें मुआवज़ा दिया और न ही सांत्वना के लिए कोई प्रतिनिधि भेजा।
उन्होंने कहा कि झारखंड में सरकार का कामकाज पूरी तरह हाईकोर्ट के भरोसे चलता दिखाई दे रहा है। छोटे से लेकर बड़े हर मामले में जनता को न्याय के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाना पड़ता है। यहां तक कि हाईकोर्ट के आदेशों को भी सरकार टालने का प्रयास करती है, चाहे मामला पेसा कानून का हो या फिर रिम्स अतिक्रमण का।

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मरांडी ने आरोप लगाया कि हेमंत सरकार की संवेदनहीनता के कारण प्रभावित लोगों को राहत पाने के लिए एक बार फिर कोर्ट की शरण लेनी पड़ी, ताकि सरकारी अधिकारियों के भ्रष्टाचार और मिलीभगत की सज़ा उन गरीब परिवारों को न भुगतनी पड़े, जिनके आशियाने उजड़ गए।
उन्होंने हाईकोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि इस मामले में तत्कालीन अंचल अधिकारी, नक्शा स्वीकृत करने वाले अफसर, रांची नगर निगम के बिल्डिंग प्लान अप्रूवल सेक्शन के अधिकारी, निगरानी में विफल रहे कर्मचारी, साथ ही संलिप्त बिल्डर्स और प्रॉपर्टी डीलर्स पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने यह भी मांग की कि मुआवज़े की राशि संबंधित बिल्डरों और दोषी अधिकारियों से ही वसूली जाए।

अंत में बाबूलाल मरांडी ने कहा कि सरकार से सहयोग की अपेक्षा भले न हो, लेकिन कम से कम जांच और कार्रवाई में कोई बाधा न डाली जाए, ताकि पीड़ितों को न्याय मिल सके।

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शादी और तलाक-पवित्र बंधन से कानूनी संघर्ष तक की यात्रा- फटाफट तलाक-राहत या जल्दबाजी?-

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हजारों दंपति,वर्षों तक अदालतों के चक्कर काटते रहते हैं,रिश्तों की भावनात्मक पीड़ा कानूनी तारीखों, वकीलों की फीस और सामाजिक दबावों में और गहरी हो जाती है- एडवोकेट किशन

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत में शादी भारतीय समाज में केवल दो व्यक्तियों का नहीं,बल्कि दो परिवारों, दो संस्कृतियों और दो जीवन-दृष्टियों का पवित्र मिलन मानी जाती रही है। इसे सात जन्मों का बंधन,संस्कार और धर्म से जोड़कर देखा गया है।इसी कारण तलाक शब्द आज भी भारतीय सामाजिक मानस में दुख,असफलता और विघटन का प्रतीक माना जाता है।परंतु मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि आधुनिक जीवन की जटिलताओं,बदलती सामाजिक संरचना और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बढ़ती चेतना ने इस पवित्र संस्था की परिभाषा को चुनौती दी है। आज तलाक केवल व्यक्तिगत संबंधों का अंत नहीं,बल्कि एक लंबी, थकाने वाली और मानसिक रूप से पीड़ादायक कानूनी प्रक्रिया बन चुका है, विशेषकर तब जब मामला फैमिली कोर्ट के लंबे चक्रव्यूह में फँस जाता है।
साथियों बात अगर हम भारतीय फैमिली,सुप्रीम और हाई कोर्ट, जहाँ रिश्ते फाइलों में बदल जाते हैं इसको समझने की करें तो, भारत में फैमिली कोर्ट की स्थापना का उद्देश्य वैवाहिक विवादों का त्वरित,संवेदनशील और सुलह- आधारित समाधान था। लेकिन व्यावहारिक स्थिति यह है कि हजारों दंपति वर्षों तक अदालतों के चक्कर काटते रहते हैं। रिश्तों की भावनात्मक पीड़ा कानूनी तारीखों, वकीलों की फीस और सामाजिक दबावों में और गहरी हो जाती है। तलाक की प्रक्रिया कई बार उस पीड़ा को बढ़ा देती है, जिससे निकलने के लिए पक्ष अदालत पहुँचे होते हैं। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या कानून वास्तव में टूट चुके रिश्तों को जोड़ने का माध्यम बन रहा है या केवल समय की औपचारिकता निभा रहा है।न्यायिक दृष्टिकोण में बदलाव-सुप्रीम कोर्ट से हाई कोर्ट तक पिछले कुछ वर्षों में भारतीय न्यायपालिका ने वैवाहिक विवादों को देखने के अपने दृष्टिकोण में एक उल्लेखनीय परिवर्तन किया है।सुप्रीम कोर्ट ने यह स्वीकार किया है कि हर विवाह को बचाया जाना न तो संभव है और न ही आवश्यक।यदि विवाह भावनात्मक मानसिक या सामाजिक रूप से पूरी तरह टूट चुका है, तो उसे कृत्रिम रूप से जीवित रखना दोनों पक्षों के साथ अन्याय हो सकता है।इसी क्रम में 17 दिसंबर को दिल्ली हाईकोर्ट का शिक्षा कुमारी बनाम संतोष कुमार निर्णय एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर बनकर उभरा है।दिल्ली हाई कोर्ट का ऐतिहासिक स्पष्टिकरण-दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत म्यूचुअल कंसेंट डिवोर्स के लिए एक वर्ष तक अलग रहने की शर्त अनिवार्य नहीं है, यदि दोनों पक्ष पूर्ण सहमति में हों। कोर्ट ने कहा कि यह शर्त कानून की आत्मा नहीं, बल्कि प्रक्रिया का एक हिस्सा है,जिसे उपयुक्त मामलों में वेव किया जा सकता है। यह निर्णय केवल एक कानूनी तकनीकी स्पष्टिकरण नहीं, बल्कि वैवाहिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत गरिमा की दिशा में एक बड़ा कदम है।
साथियों बात अगर हम फटाफट तलाक- राहत या जल्दबाजी ? इसको समझने की करें तो फटाफट तलाक शब्द सुनते ही समाज में मिश्रित प्रतिक्रियाएँ सामने आती हैं। कुछ इसे विवाह संस्था के पतन के रूप में देखते हैं, जबकि कुछ के लिए यह जीवन में नई शुरुआत का अवसर है। विशेष रूप से वे लोग जो टॉक्सिक,हिंसक या मानसिक रूप से दमनकारी रिश्तों में फँसे होते हैं, उनके लिए लंबे कानूनी इंतजार किसी अतिरिक्त सजा से कम नहीं होता। ऐसे मामलों में एक साल अलग रहने और फिर छह महीने के कूलिंग-ऑफ पीरियड की अनिवार्यता पीड़ितों के लिए राहत नहीं, बल्कि पीड़ा को लंबा करने का साधन बन जाती है।
साथियों बात अगर हम बच्चों के दृष्टिकोण से तलाक की प्रक्रिया को समझने की करें तो, जब दंपति के बीच विवाद में बच्चे शामिल होते हैं, तब मामला और भी संवेदनशील हो जाता है। लंबे समय तक चलने वाली कोर्ट- कचहरी बच्चों के मानसिक विकास पर गहरा प्रभाव डालती है। घरेलू तनाव, माता-पिता के बीच टकराव और अनिश्चित भविष्य बच्चों में असुरक्षा की भावना पैदा करता है। ऐसे में यदि आपसी सहमति से तलाक जल्दी और सम्मानजनक तरीके से हो जाए, तो बच्चों को उस संघर्ष से बचाया जा सकता है। इस दृष्टि से फटाफट तलाक कई परिवारों के लिए व्यावहारिक समाधान बनकर उभरता है।
साथियों बात अगर हम म्यूचुअल कंसेंट डिवोर्स,कानून क्या कहता है इसको समझने की करें तो, हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13B के अंतर्गत म्यूचुअल कंसेंट डिवोर्स का प्रावधान किया गया है। इसके तहत दोनों पति-पत्नी यदि यह मानते हैं कि वे साथ नहीं रह सकते, तो आपसी सहमति से तलाक ले सकते हैं। धारा 13B (2) में पहले एक वर्ष अलग- अलग रहने की शर्त और उसके बाद छह महीने का कूलिंग-ऑफ पीरियड निर्धारित किया गया है। इसका उद्देश्य यह था कि जल्दबाजी में लिया गया कोई फैसला भविष्य में पछतावे का कारण न बने और पक्षों को पुनर्विचार का अवसर मिले।कूलिंग-ऑफ पीरियड: उद्देश्य और वास्तविकता सिद्धांत रूप में कूलिंग-ऑफ पीरियड एक सकारात्मक अवधारणा है। यह माना गया कि समय मिलने पर पति- पत्नी अपने गुस्से, भावनात्मक उथल-पुथल से बाहर आकर सुलह कर सकते हैं। लेकिन व्यवहार में यह अवधि कई मामलों में केवल औपचारिकता बनकर रह गई। जिन दंपतियों ने वर्षों तक संघर्ष झेला होता है, उनके लिए छह महीने का अतिरिक्त इंतजार किसी समाधान की बजाय मानसिक बोझ बन जाता है। यही कारण है कि अदालतों ने इस अवधि की अनिवार्यता पर पुनर्विचार शुरू किया। सुप्रीम कोर्ट का 2017 का ऐतिहासिक फैसलाअमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर (2017) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 13B (2)का छह महीने का कूलिंग -ऑफ पीरियड मैंडेटरी नहीं, बल्कि डायरेक्टरी है। यदि अदालत को यह प्रतीत होता है कि विवाह पूरी तरह टूट चुका है, सुलह की कोई संभावना नहीं बची है और दोनों पक्ष सभी मुद्दों, जैसे गुजारा भत्ता, बच्चों की कस्टडी पर सहमत हैं, तो यह अवधि माफ की जा सकती है। यह निर्णय न्यायपालिका की मानवीय दृष्टि और व्यावहारिक समझ को दर्शाता है।
साथियों बात अगर हम अनुच्छेद 142 और न्यायिक विवेक इसको समझने की करें तो,सुप्रीम कोर्ट ने यहशक्ति अनुच्छेद 142 के तहत प्रयोग की, जो उसे पूर्ण न्याय करने का अधिकार देता है। इस अनुच्छेद के माध्यम से कोर्ट कानून की कठोरता से ऊपर उठकर न्याय की भावना को प्राथमिकता देता है। तलाक के मामलों में इसका प्रयोग यह दर्शाता है कि अदालतें अब विवाह को केवल एक कानूनी अनुबंध नहीं, बल्कि एक जीवंत मानवीय संबंध मानकर देख रही हैं, जिसकी मृत्यु को भी सम्मान और संवेदनशीलता के साथ स्वीकार किया जाना चाहिए।
साथियों बात अगर हम दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला- सुप्रीम कोर्ट की सोच का विस्तार इसको समझने की करें तो, दिल्ली हाई कोर्ट का 17 दिसंबर का निर्णय सुप्रीम कोर्ट की इसी न्यायिक सोच का विस्तार है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि दोनों पक्ष आपसी सहमति से तलाक चाहते हैं, तो एक वर्ष अलग रहने की शर्त को भी माफ किया जा सकता है। यह फैसला न केवल कानून की व्याख्या को स्पष्ट करता है, बल्कि फैमिली कोर्ट्स के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत भी प्रस्तुत करता है।
साथियों बात कर हम इस संपूर्ण विषय को वैश्विक परिप्रेक्ष्यमें क़ि दुनियाँ तलाक को कैसे देखती है इसको समझने की करें तो, अंतरराष्ट्रीय स्तरपर देखें तो कई विकसित देशों में नो-फॉल्ट डिवोर्स की अवधारणा लागू है। अमेरिका,कनाडा,ऑस्ट्रेलिया और कई यूरोपीय देशों में यदि दोनों पक्ष सहमत हों,तो तलाक की प्रक्रिया अपेक्षाकृत सरल और त्वरित होती है। वहाँ अदालतें यह मानती हैं कि यदि दो वयस्क व्यक्ति साथ नहीं रहना चाहते, तो राज्य को उन्हें जबरन बाँधकर रखने का अधिकार नहीं है। भारत में हालिया न्यायिक रुझान इसी वैश्विक सोच के अनुरूप दिखाई देता है।संविधान व्यक्तिगत स्वतंत्रता और विवाह, भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर इसकी व्याख्या करते हुए इसमें गरिमा के साथ जीने काअधिकार जोड़ा है। यदि कोई विवाह व्यक्ति की गरिमा, मानसिक शांति और आत्मसम्मान को नष्ट कर रहा है, तो उससे बाहर निकलने का अधिकार भी इसी अनुच्छेद की आत्मा से जुड़ा हुआ है। म्यूचुअल डिवोर्स को सरल बनाना इसी संवैधानिक दृष्टिकोण का व्यावहारिक रूप है।क्या फटाफट तलाक से विवाह संस्था कमजोर होगी? यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। आलोचकों का तर्क है कि तलाक को आसान बनाने से लोग विवाह को हल्के में लेने लगेंगे। लेकिन इसके विपरीत तर्क यह है कि मजबूरी में निभाए जा रहे रिश्ते विवाह संस्था को मजबूत नहीं, बल्कि खोखला बनाते हैं। सम्मानपूर्वक अलग होने की सुविधा विवाह को डर का नहीं, बल्कि विकल्प का संबंध बनाती है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि मानवीय कानून की ओर बढ़ता भारत, दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय यह संकेत देते हैं कि भारतीय न्यायपालिका अब वैवाहिक विवादों को केवल कानूनी तकनीक से नहीं,बल्कि मानवीय संवेदना और संवैधानिक मूल्यों के साथ देख रही है। फटाफट तलाक का अर्थ विवाह के प्रति उदासीनता नहीं, बल्कि टूट चुके रिश्तों को सम्मानजनक अंत देने की कोशिश है। यदि यह प्रवृत्ति संतुलन और विवेक के साथ आगे बढ़ती है,तो यह न केवल पीड़ितों के लिए राहत बनेगी, बल्कि न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता को भी सुदृढ़ करेगी।

लेखक -किशन सनमुखदास भावनानी
क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी)

23 दिसंबर को सर्किट हाउस में पीड़ित महिलाओं की समस्याएं सुनेंगी राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष डॉ. बबीता सिंह चौहान

आगरा (राष्ट्र की परम्परा)। उत्तर प्रदेश में महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा और उन्हें त्वरित न्याय दिलाने की दिशा में एक अहम पहल के तहत उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष डॉ. बबीता सिंह चौहान 23 दिसंबर 2025 को आगरा जनपद के भ्रमण पर रहेंगी। इस दौरान सर्किट हाउस सभागार में पूर्वाह्न 11:30 बजे महिला जनसुनवाई का आयोजन किया जाएगा।

इस महिला जनसुनवाई का मुख्य उद्देश्य जनपद में महिला उत्पीड़न की रोकथाम, लंबित मामलों की समीक्षा और पीड़ित महिलाओं को न्यायिक व प्रशासनिक सहायता उपलब्ध कराना है। जनसुनवाई में महिलाएं अपनी समस्याएं सीधे आयोग की अध्यक्ष के समक्ष रख सकेंगी, जिससे उनके प्रकरणों का त्वरित निस्तारण सुनिश्चित किया जा सके।

कार्यक्रम के दौरान महिला कल्याण, बाल विकास एवं पुष्टाहार, समाज कल्याण, स्वास्थ्य, बेसिक व माध्यमिक शिक्षा, पिछड़ा वर्ग कल्याण, दिव्यांगजन सशक्तिकरण, अल्पसंख्यक कल्याण, उद्योग विभाग, राष्ट्रीय आजीविका मिशन, पंचायती राज, कौशल विकास तथा मातृ-शिशु एवं परिवार कल्याण विभाग द्वारा संचालित महिलाओं से जुड़ी योजनाओं की समीक्षा बैठक भी आयोजित की जाएगी।

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इसके साथ ही महिला उत्पीड़न से संबंधित मामलों की समीक्षा वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक या उनके द्वारा नामित वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, महिला थानाध्यक्ष एवं संबंधित क्षेत्राधिकारियों की उपस्थिति में की जाएगी। सभी संबंधित विभागों के अधिकारी आवश्यक सूचनाओं के साथ जनसुनवाई में उपस्थित रहेंगे, ताकि प्राप्त आवेदनों पर मौके पर ही प्रभावी कार्रवाई की जा सके।

प्रशासन ने जनपद की पीड़ित महिलाओं से अपील की है कि वे अधिक से अधिक संख्या में पहुंचकर इस जनसुनवाई का लाभ उठाएं और अपनी समस्याओं के समाधान की दिशा में एक मजबूत कदम बढ़ाएं।

ग्रामीण युवाओं को डिजिटल शिक्षा की सौगात, आगरा की 104 पंचायतों में खुलेंगी डिजिटल लाइब्रेरी

आगरा (राष्ट्र की परम्परा)। ग्रामीण भारत में शिक्षा की पहुँच को सशक्त और समान बनाने की दिशा में उत्तर प्रदेश सरकार ने एक और दूरदर्शी पहल शुरू की है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में पंचायती राज विभाग द्वारा आगरा जनपद की 104 ग्राम पंचायतों में आधुनिक डिजिटल लाइब्रेरी स्थापित की जा रही हैं। यह योजना ग्रामीण युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं और डिजिटल शिक्षा के लिए मजबूत मंच उपलब्ध कराएगी।

आधुनिक संसाधनों से सुसज्जित होंगी लाइब्रेरी

इन डिजिटल लाइब्रेरी में पारंपरिक पुस्तकों के साथ-साथ कंप्यूटर, हाई-स्पीड इंटरनेट, ई-बुक्स, वीडियो लेक्चर, ऑडियो कंटेंट और ऑनलाइन क्विज जैसी सुविधाएँ उपलब्ध होंगी। ग्रामीण छात्र अब शहरों की महंगी कोचिंग या दूरस्थ लाइब्रेरी पर निर्भर नहीं रहेंगे। आगरा डिजिटल लाइब्रेरी पंचायत योजना ग्रामीण क्षेत्र के छात्रों के लिए शिक्षा में क्रांतिकारी बदलाव लाने का कार्य करेगी।

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी होगी आसान

डिजिटल लाइब्रेरी का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण युवाओं को UPSC, PCS, SSC, बैंकिंग, रेलवे और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में सहयोग देना है। यहाँ प्रसिद्ध लेखकों की प्रमाणिक पुस्तकें और लगभग 20 हजार डिजिटल शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध कराई जाएगी, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर प्रतिभाशाली छात्र भी आगे बढ़ सकें।

प्रति लाइब्रेरी 4 लाख रुपये का बजट

मुख्य विकास अधिकारी प्रतिभा सिंह के अनुसार, प्रत्येक डिजिटल लाइब्रेरी पर लगभग 4 लाख रुपये खर्च किए जाएंगे। इसमें 2 लाख रुपये पुस्तकों पर, 1.30 लाख रुपये आईटी उपकरणों पर और लगभग 7 हजार रुपये आधुनिक फर्नीचर पर व्यय किए जाएंगे। लाइब्रेरी का संचालन ग्राम प्रधान और ग्राम सचिव के माध्यम से किया जाएगा, जबकि नियमित निगरानी सहायक अधिकारियों द्वारा की जाएगी।

यूपी डेस्को से होगी पारदर्शी खरीद

पुस्तकों और उपकरणों की खरीदारी यूपी डेस्को के माध्यम से की जाएगी। चयन समिति द्वारा पुस्तकों की सूची पहले ही तैयार कर ली गई है, जिससे गुणवत्ता और पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके।

ग्रामीण युवाओं को मिलेगा समान अवसर

यह योजना न केवल शिक्षा बल्कि रोजगार और आत्मनिर्भरता की दिशा में भी मील का पत्थर साबित होगी। डिजिटल लाइब्रेरी ग्रामीण युवाओं को शहरी छात्रों के समान प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण प्रदान करेंगी और डिजिटल इंडिया के लक्ष्य को जमीनी स्तर पर साकार करेंगी।

देवरिया के डॉ. निखिल गुप्ता को केजीएमयू दीक्षांत समारोह में एमडी मेडिसिन गोल्ड मेडल, जनपद का नाम रोशन

देवरिया (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। जनपद देवरिया के लिए यह गौरवपूर्ण क्षण है कि जिले के होनहार चिकित्सक डॉ. निखिल गुप्ता को किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) लखनऊ के दीक्षांत समारोह में एमडी मेडिसिन में गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उन्हें महामहिम राज्यपाल आनंदीबेन पटेल के कर-कमलों द्वारा प्रदान किया गया।

इस भव्य दीक्षांत समारोह में देश के प्रतिष्ठित नेताओं की उपस्थिति रही, जिनमें भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा, उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री बृजेश पाठक तथा भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी प्रमुख रूप से शामिल थे।

डॉ. निखिल गुप्ता, प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. जे.पी. गुप्ता के सुपुत्र हैं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा जनपद देवरिया में हुई। इसके पश्चात उन्होंने एमबीबीएस की पढ़ाई एम्स भोपाल से तथा एमडी मेडिसिन की पढ़ाई केजीएमयू लखनऊ से पूर्ण की। उनकी इस ऐतिहासिक उपलब्धि से पूरे जिले में हर्ष का माहौल है।

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इस उपलब्धि के उपलक्ष्य में जिला शिक्षक प्रकोष्ठ देवरिया के जिला संयोजक नरेंद्र तिवारी के आवास पर शिक्षकों व बुद्धिजीवियों की एक बैठक आयोजित की गई, जिसमें डॉ. निखिल गुप्ता की सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त की गई और एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर खुशी साझा की गई।

डॉ. निखिल ने अपनी इस सफलता का श्रेय अपने माता-पिता, गुरुजनों एवं मार्गदर्शकों को दिया। उनके परिवार में सेवा और चिकित्सा की मजबूत परंपरा है—एक भाई देवरिया मेडिकल कॉलेज में चिकित्सक हैं, दूसरे भाई भारतीय सेना में मेजर के पद पर कार्यरत हैं, जबकि उनकी भाभी प्रसिद्ध स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं।

मुख्य रूप से नरेंद्र तिवारी, डॉक्टर जेपी गुप्ता, डॉक्टर जेपी राय चंद्रकांत मणि अंकित मणि,अखिलेश मिश्रा, नरेंद्र सिंह, राजेश सिंह श्रीनेत,बजरंगी मणि त्रिपाठी, रणजीत सिंह अनिरुद्ध मिश्रा, अतुल मणि त्रिपाठी आदि सभी लोग मौजूद थे।

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बैठक में यह कामना की गई कि भविष्य में डॉ. निखिल गुप्ता डीएम मेडिसिन कर देश और विशेष रूप से देवरिया जिले के लोगों को उच्चस्तरीय चिकित्सा सेवा प्रदान करेंगे।

देवरिया के सत्यम कुमार तिवारी ने यूपीएससी 2023 में हासिल की बड़ी सफलता, बने जिला यूथ ऑफिसर

देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद के लिए यह क्षण अत्यंत गौरव और सम्मान का है।अहिर परसिया निवासी सत्यम कुमार तिवारी ने यूपीएससी 2023 परीक्षा में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त करते हुए जिला यूथ ऑफिसर/असिस्टेंट डायरेक्टर पद पर चयनित होकर जिले का नाम राष्ट्रीय स्तर पर रोशन किया है। उनका चयन माय भारत योजना के अंतर्गत युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय (Ministry of Youth and Sports Affairs), भारत सरकार में हुआ है।

सत्यम कुमार तिवारी वर्तमान में सब इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत हैं। कड़ी मेहनत, अनुशासन और सतत अध्ययन के बल पर उन्होंने यह उपलब्धि हासिल की है, जो जिले के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बनेगी। उनकी इस सफलता से देवरिया सहित पूरे पूर्वांचल में खुशी की लहर है।
इस गौरवपूर्ण उपलब्धि पर जिला शिक्षक प्रकोष्ठ भाजपा, देवरिया की ओर से प्रसन्नता व्यक्त की गई। संगठन द्वारा आयोजित बैठक में सभी सदस्यों ने सत्यम कुमार तिवारी के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए ईश्वर से प्रार्थना की कि वे निरंतर प्रगति करें और मां भारती की सेवा निष्काम भाव से करते रहें।

बैठक में प्रमुख रूप से नरेंद्र तिवारी (जिला संयोजक), संजय कुमार मिश्रा (सह संयोजक), राजेश कुमार मिश्रा (सह संयोजक), कमलेश कुमार मिश्रा, जयप्रकाश बड़ी, विनोद कुमार मिश्रा (कोषाध्यक्ष), शरद कुमार मिश्रा (जिला उपाध्यक्ष), अतुल कुमार सिंह सहित कई कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

सत्यम कुमार तिवारी की यह सफलता न केवल उनके परिवार बल्कि पूरे देवरिया जनपद के लिए गौरव का विषय है और युवाओं को सिविल सेवा की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेगी।

बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार: हिंसा थमी, लेकिन अल्पसंख्यकों पर खतरा बरकरार, भारत-नेपाल में उभरा आक्रोश

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। बांग्लादेश में हालिया सांप्रदायिक हिंसा भले ही फिलहाल शांत होती दिख रही हो, लेकिन बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार की घटनाओं ने पूरे दक्षिण एशिया में चिंता और आक्रोश को जन्म दे दिया है। कट्टरपंथी तत्वों द्वारा अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय को लगातार निशाना बनाए जाने के आरोप लग रहे हैं। घरों को जलाना, मंदिरों में तोड़फोड़ और निर्दोष लोगों पर जानलेवा हमले इस संकट की भयावह तस्वीर पेश करते हैं।

ढाका में हिंदू युवक दीपू दास की कथित रूप से पीट-पीटकर हत्या और उसके बाद शव को आग लगाने की घटना ने हालात को और गंभीर बना दिया। इस अमानवीय घटना के विरोध में बांग्लादेश की राजधानी ढाका में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय ने मौन प्रदर्शन किया। ढाकेश्वरी मंदिर में श्रद्धांजलि सभा आयोजित कर न्याय की मांग की गई। यह शांत विरोध उस व्यवस्था के खिलाफ था, जिस पर धर्म के आधार पर भेदभाव और हिंसा रोकने में विफल रहने के आरोप लग रहे हैं।

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बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार के खिलाफ भारत में भी व्यापक आक्रोश देखने को मिला। झारखंड के जमशेदपुर में भाजपा और हिंदू संगठनों ने प्रदर्शन करते हुए बांग्लादेश सरकार के सलाहकार मोहम्मद यूनुस का पुतला दहन किया। दिल्ली में बांग्लादेशी दूतावास के बाहर प्रदर्शन की कोशिश की गई, हालांकि पुलिस ने स्थिति को नियंत्रित कर लिया। असम के सीमावर्ती जिलों, त्रिपुरा और सिलचर में भी सड़कों पर उतरकर विरोध दर्ज कराया गया और अल्पसंख्यक हिंदुओं की सुरक्षा की मांग उठी।

इसका असर नेपाल तक पहुंच गया है। नेपाल के आठ जिलों में हिंदू संगठनों और नागरिकों ने प्रदर्शन कर बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार पर कड़ा विरोध जताया। प्रदर्शनकारियों ने अपनी सरकार से बांग्लादेशी दूतावास को हटाने और राजनयिकों को वापस भेजने तक की मांग की।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बांग्लादेश में कट्टरपंथी ताकतें न सिर्फ हिंदू समुदाय, बल्कि पूर्व सत्तारूढ़ अवामी लीग से जुड़े कार्यकर्ताओं को भी निशाना बना रही हैं। हालात यह संकेत दे रहे हैं कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो क्षेत्रीय स्थिरता पर गंभीर असर पड़ सकता है।

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बिहार में भूमि सुधार की दिशा में बड़ा कदम, जमीन विवादों के समाधान को मिलेगी रफ्तार

पटना (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। बिहार सरकार ने भूमि सुधार और राजस्व व्यवस्था को पारदर्शी, जवाबदेह और जनहितैषी बनाने की दिशा में एक अहम पहल की है। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग द्वारा मुजफ्फरपुर में ‘भूमि सुधार जन कल्याण संवाद’ का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें उपमुख्यमंत्री सह राजस्व मंत्री विजय कुमार सिन्हा स्वयं जमीन से जुड़े विवादों और शिकायतों को सुनेंगे। यह संवाद डॉ. भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय परिसर स्थित श्रीकृष्ण सिंह प्रेक्षागृह में आयोजित होगा।

इस पहल को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि आमतौर पर भूमि विवादों में रैयतों और राजस्व अधिकारियों के बीच सीधा संवाद नहीं हो पाता। पहली पाली में पीड़ित रैयतों के सामने ही अंचलाधिकारी और राजस्व कर्मचारी मौजूद रहेंगे, जहां मौके पर ही शिकायतों पर चर्चा कर समाधान का प्रयास किया जाएगा। इससे वर्षों से लंबित दाखिल-खारिज, जमाबंदी और सीमांकन जैसे मामलों को गति मिलने की उम्मीद है।
जन कल्याण संवाद के दौरान परिमार्जन प्लस पोर्टल पर लंबित आवेदनों, ई-मापी सेवाओं की स्थिति और अभियान बसेरा-2 के तहत भूमिहीनों को जमीन उपलब्ध कराने की प्रगति की भी समीक्षा होगी।

साथ ही ऑनलाइन सेवाओं में आ रही तकनीकी समस्याओं को लेकर आम नागरिकों से सीधा फीडबैक लिया जाएगा, ताकि डिजिटल व्यवस्था को और बेहतर बनाया जा सके। सरकार ने जमाबंदी सुधार को लेकर सख्त समय-सीमा तय कर दी है। लिपिकीय या टाइपिंग जैसी छोटी त्रुटियों का निपटारा 15 कार्य दिवस में, तकनीकी राजस्व संबंधी मामलों का 35 दिनों में और जटिल मामलों का अधिकतम 75 कार्य दिवस में निस्तारण अनिवार्य किया गया है। तय समय-सीमा में कार्य नहीं होने पर संबंधित अधिकारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है।

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राज्य में अब तक करीब 4.50 करोड़ जमाबंदियों का डिजिटलीकरण हो चुका है। इस प्रक्रिया में सामने आई विसंगतियों को दूर करने के लिए परिमार्जन प्लस पोर्टल को पहले से अधिक यूजर-फ्रेंडली बनाया गया है। सरकार का स्पष्ट संदेश है कि अब किसी भी रैयत को अपनी ही जमीन के रिकॉर्ड के लिए भटकना नहीं पड़ेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि आमने-सामने संवाद, डिजिटल प्लेटफॉर्म और तय समय-सीमा से न सिर्फ जमीन विवादों में कमी आएगी, बल्कि प्रशासन पर जनता का भरोसा भी मजबूत होगा।

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कोहरे में सतर्कता: महराजगंज यातायात पुलिस ने चलाया अभियान

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाने और आमजन को यातायात नियमों के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से महराजगंज पुलिस द्वारा व्यापक यातायात जागरूकता अभियान चलाया गया। पुलिस अधीक्षक महराजगंज सोमेन्द्र मीणा के निर्देशन में और अपर पुलिस अधीक्षक सिद्धार्थ के मार्गदर्शन में यह अभियान जनपद के विभिन्न क्षेत्रों में संचालित किया गया।

इसी क्रम में यातायात पुलिस ने थाना ठूठीबारी क्षेत्र अंतर्गत गड़ौरा चीनी मिल परिसर में विशेष जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया। कार्यक्रम में चीनी मिल के महाप्रबंधक की उपस्थिति में ट्रैक्टर–ट्रॉली से गन्ना लेकर आने वाले किसानों एवं वाहन चालकों को सड़क सुरक्षा के प्रति जागरूक किया गया।

यातायात पुलिस ने बताया कि वर्तमान समय में घना कोहरा और धुंध के कारण दृश्यता कम हो जाती है, जिससे सड़क दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ जाती है। ऐसे में किसी भी प्रकार की लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती है। पुलिस ने सभी ट्रैक्टर–ट्रॉली चालकों को अपने वाहनों में फॉग लाइट और रिफ्लेक्टर अनिवार्य रूप से लगाने के निर्देश दिए।

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इसके साथ ही गन्ना लदी ट्रॉलियों के आगे और पीछे रिफ्लेक्टर लगाने, ट्रॉली के पीछे एक मीटर लंबा लाल कपड़ा बांधकर उसमें रिफ्लेक्टर लगाने पर विशेष जोर दिया गया। चालकों को वाहन धीमी गति से चलाने, आगे चल रहे वाहन से उचित दूरी बनाए रखने और किसी भी स्थिति में सड़क पर वाहन खड़ा न करने की सख्त हिदायत दी गई।

यातायात पुलिस अधिकारियों ने कहा कि यातायात नियमों का पालन करने से न केवल चालक स्वयं सुरक्षित रहते हैं, बल्कि अन्य राहगीरों और वाहन चालकों की जान भी सुरक्षित रहती है। सड़क सुरक्षा सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है और थोड़ी-सी सावधानी बड़े हादसों को रोक सकती है।

अभियान के दौरान किसानों और वाहन चालकों ने यातायात नियमों का पालन करने तथा दूसरों को भी जागरूक करने का संकल्प लिया। प्रशासन की इस पहल की क्षेत्रवासियों ने सराहना की और ऐसे जागरूकता अभियानों को लगातार चलाए जाने की आवश्यकता बताई।

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बिहार में रेल सुरक्षा पर सवाल, सीमांचल एक्सप्रेस पर चली गोलियां

बिहार में सीमांचल एक्सप्रेस पर फायरिंग और पथराव, यात्रियों में दहशत

पटना (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। बिहार में रेल सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। दिल्ली-हावड़ा मेन रेल लाइन पर देर रात सीमांचल एक्सप्रेस पर अज्ञात उपद्रवियों ने फायरिंग और पत्थरबाजी की घटना को अंजाम दिया। यह वारदात आरा के पास चालीसवां पुल और जमीरा हॉल्ट के बीच उस वक्त हुई, जब ट्रेन कोहरे के कारण पहले से ही देरी से चल रही थी।

जानकारी के अनुसार, उपद्रवियों ने चेन पुलिंग कर ट्रेन को रोक दिया। इसके बाद जैसे ही ट्रेन में तैनात एस्कॉर्ट पार्टी के जवान ने टॉर्च जलाकर बाहर झांकने की कोशिश की, तभी अचानक पत्थरबाजी शुरू हो गई। इसी दौरान फायरिंग की भी आवाज सुनाई दी, जिससे यात्रियों में अफरा-तफरी मच गई। जनरल बोगी का शीशा टूट गया और लोग अपनी जान बचाने के लिए सीटों के नीचे दुबकने को मजबूर हो गए।

हालांकि राहत की बात यह रही कि इस घटना में किसी भी यात्री के घायल होने की सूचना नहीं है। फायरिंग की खबर मिलते ही आरपीएफ, जीआरपी और मुफस्सिल थाना पुलिस मौके पर पहुंची। आरा सदर एसडीपीओ वन राज कुमार साह और रेल डीएसपी कंचन राज के नेतृत्व में पुलिस टीम ने घटनास्थल का मुआयना किया। मौके से खोखे भी बरामद किए गए हैं, जिससे फायरिंग की पुष्टि होती है।

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सीमांचल एक्सप्रेस में तैनात एस्कॉर्ट पार्टी के जवान संजीव कुमार के बयान के आधार पर अज्ञात लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर ली गई है। पुलिस इस घटना को शराब तस्करी और अवैध धंधों से जोड़कर भी जांच कर रही है। इस वारदात के बाद आसपास के इलाकों में भय का माहौल है और रेल यात्रियों की सुरक्षा पर एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं। फिलहाल पुलिस पूरे मामले की गहन जांच में जुटी हुई है।

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महंगाई और आम जनजीवन: नीति की सबसे बड़ी परीक्षा

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कैलाश सिंह

महराजगंज(राष्ट्र की परम्परा)।देश में बढ़ती महंगाई आज सिर्फ एक आर्थिक शब्द नहीं रह गई है, बल्कि यह आम जनजीवन की सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है। रसोई से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और आवास तक—हर क्षेत्र में कीमतों की लगातार बढ़ोतरी ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। सीमित आय में गुजर-बसर करने वाले परिवारों के लिए महीने का बजट अब कागज पर नहीं, चिंता की लकीरों में बदल चुका है।
सबसे अधिक असर दैनिक जरूरतों की वस्तुओं पर पड़ा है। आटा, दाल, चावल, तेल, सब्जी और दूध जैसी बुनियादी चीजें लगातार महंगी हो रही हैं। रसोई का खर्च दोगुना हो गया है, जबकि आमदनी लगभग स्थिर है। मध्यम वर्ग जहां खर्चों में कटौती कर किसी तरह संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है, वहीं दिहाड़ी मजदूर और निम्न आय वर्ग के लिए दो वक्त की रोटी भी चुनौती बनती जा रही है।
महंगाई का असर शिक्षा और स्वास्थ्य पर भी साफ दिखाई दे रहा है। निजी स्कूलों की फीस, किताबें, कॉपियां और यूनिफॉर्म महंगी होने से अभिभावक बच्चों की पढ़ाई को लेकर असमंजस में हैं। इलाज की लागत बढ़ने से गरीब परिवार अस्पताल जाने से पहले कई बार सोचने को मजबूर हैं। ऐसे में महंगाई सिर्फ जेब पर नहीं, बल्कि समाज के भविष्य पर भी असर डाल रही है।
ईंधन की बढ़ती कीमतों ने परिवहन खर्च को बढ़ा दिया है, जिसका सीधा असर हर वस्तु की कीमत पर पड़ता है। पेट्रोल-डीजल महंगे होते ही महंगाई की श्रृंखला पूरे बाजार में फैल जाती है। किराया, माल-भाड़ा और सेवाएं सभी महंगी हो जाती हैं, जिससे आम आदमी के लिए राहत की गुंजाइश और कम हो जाती है। महंगाई को नियंत्रित करना किसी भी सरकार की आर्थिक नीति की सबसे बड़ी परीक्षा मानी जाती है। केवल आंकड़ों में गिरावट दिखाना पर्याप्त नहीं, जरूरी है कि उसका असर आम जनता की जिंदगी में महसूस हो। जमाखोरी पर सख्ती, आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना, सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत करना और रोजगार व आय बढ़ाने के ठोस कदम उठाना समय की मांग है।
स्पष्ट है कि महंगाई पर काबू पाने के लिए नीतियों में संवेदनशीलता और जमीन पर सख्त अमल दोनों जरूरी हैं। जब तक आम आदमी की थाली सस्ती नहीं होगी और जीवन का बोझ हल्का नहीं पड़ेगा, तब तक महंगाई सरकार और व्यवस्था दोनों के लिए सबसे बड़ी कसौटी बनी रहेगी।

विश्वास के धागे में बंधा मनुष्य और परमात्मा

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डॉ.सतीश पाण्डेय

महराजगंज(राष्ट्र की परम्परा)। मनुष्य और परमात्मा का संबंध किसी लिखित अनुबंध या दृश्य प्रमाण पर नहीं, बल्कि विश्वास के उस सूक्ष्म धागे पर टिका है, जो दिखाई नहीं देता पर जीवन को संभाले रखता है। जब परिस्थितियां अनुकूल होती हैं, तब मनुष्य अपने सामर्थ्य पर गर्व करता है, पर जैसे ही संकट आता है, वही मनुष्य अदृश्य शक्ति की ओर निहारने लगता है। यही विश्वास मनुष्य को यह अनुभूति कराता है कि वह अकेला नहीं है, उसके साथ कोई शक्ति है जो उसे देख रही है, संभाल रही है और सही मार्ग की ओर ले जा रही है।
विश्वास ही वह सेतु है, जो सीमित मनुष्य को असीम परमात्मा से जोड़ता है। विज्ञान, तर्क और तकनीक ने मनुष्य को सुविधाएं दी हैं, परंतु जीवन की पीड़ा, भय और अनिश्चितता का समाधान आज भी विश्वास से ही मिलता है। जब मनुष्य अपने सामर्थ्य की सीमा पहचान लेता है, तब वह परमात्मा पर भरोसा करता है। यह भरोसा उसे धैर्य देता है, टूटने से बचाता है और फिर से उठ खड़े होने की शक्ति प्रदान करता है।
परमात्मा पर विश्वास का अर्थ केवल पूजा-पाठ या कर्मकांड नहीं है, बल्कि जीवन मूल्यों को अपनाना है। सत्य, करुणा, सेवा और सद्भाव—यही विश्वास के व्यावहारिक रूप हैं। जो व्यक्ति ईश्वर में विश्वास करता है, वह दूसरों के दुःख को अपना समझता है, अन्याय के विरुद्ध खड़ा होता है और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाता है। इस प्रकार विश्वास केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का भी आधार बनता है।
आज के भौतिक और प्रतिस्पर्धात्मक युग में विश्वास कमजोर पड़ता दिख रहा है। मनुष्य ईश्वर पर कम और साधनों पर अधिक भरोसा करने लगा है। परिणामस्वरूप तनाव, अकेलापन और असंतोष बढ़ रहा है। ऐसे समय में आवश्यकता है कि मनुष्य पुनः उस विश्वास के धागे को थामे, जो उसे आत्मिक शांति और नैतिक बल देता है।
अंततः मनुष्य और परमात्मा का संबंध आस्था का है, अनुभव का है। जब विश्वास सच्चा होता है, तब जीवन की हर कठिन राह भी साधना बन जाती है। यही विश्वास मनुष्य को अंधकार में आशा का दीपक देता है और उसे मानवता के पथ पर निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

जागरूकता मोटरसाइकिल रैली का आयोजन, सम्मेलन को लेकर लोगों से जुड़ने की पहल

सलेमपुर/देवरिया(राष्ट्र की परम्परा)आगामी हिंदू सम्मेलन के निमित्त जन-जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से एक जागरूकता मोटरसाइकिल रैली का आयोजन किया गया। यह रैली बापू इण्टर कॉलेज विद्यालय के खेल मैदान से प्रारंभ होगी।
रैली में बड़ी संख्या में युवाओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं हिंदू समाज के लोगों के शामिल हुए मोटरसाइकिल रैली नगर व आसपास के क्षेत्रों से होकर गुजरी, जिसके माध्यम से आगामी हिंदू सम्मेलन की जानकारी आमजन तक पहुंचाई गई और लोगों से अधिक से अधिक संख्या में सम्मेलन में सहभागिता करने की अपील की जाएगी।
आयोजकों ने बताया कि रैली का मुख्य उद्देश्य समाज में एकता, जागरूकता और सांस्कृतिक मूल्यों को मजबूत करना है। इस दौरान प्रतिभागी हाथों में बैनर, झंडे और संदेश लिखी तख्तियां लेकर सम्मेलन के उद्देश्यों को जन-जन तक पहुंचाया। साथ ही अनुशासन और यातायात नियमों का पालन करते हुए शांतिपूर्ण ढंग से रैली निकाली।
आयोजन समिति ने क्षेत्रवासियों से अपील सम्मेलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें और आगामी हिंदू सम्मेलन को सफल बनाने में अपना सहयोग प्रदान करें।

फायरिंग के बाद पुलिस का जवाबी एक्शन, एक आरोपी घायल

देवरिया में गौ तस्करी के खिलाफ पुलिस का बड़ा एक्शन, मुठभेड़ में एक तस्कर घायल, तीन गिरफ्तार

देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)।जनपद देवरिया में अपराध और अपराधियों के विरुद्ध चलाए जा रहे सघन अभियान के तहत सलेमपुर पुलिस को बड़ी सफलता हाथ लगी है। गौ तस्करी में लिप्त अभियुक्तों के साथ हुई मुठभेड़ में पुलिस ने तीन अभियुक्तों को गिरफ्तार किया है, जिनमें एक अभियुक्त गोली लगने से घायल हुआ है। यह कार्रवाई पुलिस अधीक्षक देवरिया के निर्देश पर की गई, जिसका उद्देश्य जनपद में अवैध गतिविधियों पर प्रभावी अंकुश लगाना है।

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प्राप्त जानकारी के अनुसार थाना सलेमपुर पुलिस टीम सोहनाग–बरठा मुख्य मार्ग पर ग्राम धनौती राय के पास संदिग्ध व्यक्तियों और वाहनों की चेकिंग कर रही थी। इसी दौरान एक टाटा मैजिक वाहन (UP55T4297) को रोका गया, जिसमें तीन गोवंशीय पशु—एक गाय, एक बछिया और एक बछड़ा—अवैध रूप से लदे हुए पाए गए। पुलिस द्वारा रोकने पर वाहन सवार अभियुक्तों ने जान से मारने की नीयत से फायरिंग शुरू कर दी।

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पुलिस ने आत्मरक्षा में जवाबी कार्रवाई की, जिसमें एक अभियुक्त भोलू यादव (26 वर्ष) पुत्र रामायन यादव, निवासी लक्ष्मीपुर, थाना सुरौली, जनपद देवरिया के दाहिने पैर में गोली लगी। घायल अभियुक्त को तत्काल इलाज के लिए अस्पताल भेजा गया। वहीं, मौके से दो अन्य अभियुक्त—राज यादव (20 वर्ष) पुत्र नारायण यादव, निवासी मनिहारी, थाना सलेमपुर तथा नागेन्द्र कुमार (29 वर्ष) पुत्र केदार, निवासी देवबारी, थाना बरहज—को गिरफ्तार कर लिया गया।

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घायल अभियुक्त भोलू यादव के पास से एक अवैध देशी तमंचा .315 बोर, एक जिंदा कारतूस और एक खोखा कारतूस बरामद किया गया। पुलिस ने वाहन सहित तीनों गोवंशीय पशुओं को सुरक्षित कब्जे में ले लिया है। इस संबंध में थाना सलेमपुर पर मु0अ0सं0 388/2025 के तहत गोवध निवारण अधिनियम, बीएनएस और आर्म्स एक्ट की सुसंगत धाराओं में मुकदमा दर्ज कर विधिक कार्रवाई की जा रही है।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि गौ तस्करी और अवैध हथियारों के खिलाफ अभियान आगे भी लगातार जारी रहेगा। इस कार्रवाई से क्षेत्र में सक्रिय तस्करों में भय का माहौल है और आमजन में पुलिस की सख्ती को लेकर भरोसा मजबूत हुआ है।

अपराध बेलगाम: मुख्य मार्गों पर खुलेआम हथियार

देवरिया में खुलेआम पिस्टल लेकर घूमना: क्या पुलिस का खौफ खत्म हो गया है?

देवरिया (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) जनपद में अपराध की बढ़ती घटनाएं अब केवल कानून-व्यवस्था की चुनौती नहीं रहीं, बल्कि आम नागरिकों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। देवरिया–रुद्रपुर मुख्य मार्ग पर स्थित मगरू चौराहा, जो शहर के प्रमुख मार्गों में गिना जाता है, वहां दिनदहाड़े बिना किसी डर के पिस्टल लेकर यात्रा करना किसी बड़े और गंभीर अपराध को न्योता देने जैसा है। यह मार्ग आगे जाकर पूरी तरह सुनसान हो जाता है, जिससे किसी भी अप्रिय घटना की आशंका और बढ़ जाती है।

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सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस तरह की गतिविधियों पर न तो समय रहते पुलिस की सख्ती दिखाई देती है और न ही नियमित चेकिंग या निगरानी का प्रभाव। इससे यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या देवरिया में पुलिस का खौफ शून्य हो गया है, या अपराधी पुलिस को खुली चुनौती देने लगे हैं। विगत महीनों में चटनी गढ़ही क्षेत्र में चली गोली और साकेत नगर (खड़जरवा) में हुई बड़ी चोरी की घटना पर 12 दिन बीतने के बाद भी पुलिस का हाथ पर हाथ धरे रहना अभी तक कोई प्रगति नहीं होना जैसी घटनाएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि अपराध का ग्राफ लगातार ऊपर जा रहा है।

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स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि सोशल मीडिया पर ऐसी घटनाओं के वीडियो वायरल न हों, तो कई मामले दबकर रह जाते हैं और पुलिस के लिए अपराधी “दुधारू गाय” बन जाते है पीड़ित अनदेखे कर दिए जाते हैं। यह स्थिति न केवल पुलिस की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न लगाती है, बल्कि समाज में पनप रहे आधुनिक अपराध, बेरोजगारी और असंवेदनशीलता की ओर भी संकेत करती है।

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जरूरत है कि देवरिया पुलिस ऐसे संवेदनशील मार्गों पर नियमित गश्त, सख्त चेकिंग और त्वरित कार्रवाई करे, ताकि आम जनता में सुरक्षा का भरोसा कायम हो सके। अन्यथा, ऐसी लापरवाही किसी बड़े हादसे में तब्दील हो सकती है, जिसकी जिम्मेदारी तय करना मुश्किल होगा। जब की इस वायरल वीडियो का पुष्टि राष्ट्र की परम्परा नहीं करता है।