Thursday, June 25, 2026
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संस्कार से सिस्टम तक भटकाव: मूल्यों के अभाव में असंतुलित होता समाज

— कैलाश सिंह
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। आज का समाज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां संकट केवल प्रशासनिक व्यवस्था का नहीं, बल्कि संस्कारों के क्षरण का भी है। परिवार से लेकर शासन-प्रशासन तक हर स्तर पर असंतुलन स्पष्ट दिखाई देता है। यह भटकाव अचानक नहीं आया, बल्कि वर्षों से उपेक्षित नैतिक मूल्यों और कमजोर होती सामाजिक चेतना का परिणाम है।

संस्कार: समाज की पहली पाठशाला

संस्कार किसी कानून, आदेश या पाठ्य-पुस्तक से नहीं आते, बल्कि घर के वातावरण में विकसित होते हैं। माता-पिता का आचरण, बड़ों के प्रति सम्मान, परिश्रम, अनुशासन और सत्यनिष्ठा—यही समाज की पहली पाठशाला है।
लेकिन भागदौड़ भरी जिंदगी में परिवारों के बीच संवाद कम हो रहा है। बच्चों को सुविधाएं तो मिल रही हैं, पर संस्कार देने की जिम्मेदारी पीछे छूटती जा रही है। इसका नतीजा आत्मकेंद्रित सोच के रूप में सामने आता है।

संस्कारहीनता का असर सिस्टम पर

जब वही व्यक्ति व्यवस्था का हिस्सा बनता है, तो संस्कारों की कमी सिस्टम में भी झलकने लगती है—

• दफ्तरों में संवेदनहीनता
• प्रशासन में भ्रष्टाचार
• राजनीति में अवसरवाद
• समाज में बढ़ती असहिष्णुता

जब कर्तव्यों से अधिक अधिकारों की बात होती है, तो व्यवस्था कमजोर पड़ती है और जनता का भरोसा टूटने लगता है।

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शिक्षा व्यवस्था भी संकट में

शिक्षा का उद्देश्य आज डिग्री और रोजगार तक सीमित होता जा रहा है। चरित्र निर्माण, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी हाशिये पर हैं। विद्यार्थी आगे बढ़ना चाहते हैं, लेकिन मूल्यों को बोझ समझने लगे हैं। यही सोच आगे चलकर समाज को दिशा देने के बजाय और उलझा देती है।

समाधान: संस्कार और सिस्टम के बीच सेतु

इस भटकाव को रोकने के लिए केवल कानून और नीतियां पर्याप्त नहीं हैं। जरूरी है—

• परिवार अपनी भूमिका को फिर से समझे
• शिक्षा को मूल्यपरक बनाया जाए
• व्यवस्था जवाबदेह हो
• समाज गलत के खिलाफ सक्रिय होकर खड़ा हो

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सेवानिवृत्ति से पहले आदेशों की अनदेखी, वन विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। सोहगीबरवां वन्यजीव प्रभाग में विभागीय अनुशासन और आदेशों के पालन को लेकर एक गंभीर मामला सामने आया है। सेवानिवृत्ति से ठीक पहले जारी सम्बद्धीकरण आदेश का पालन न होना न केवल विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है, बल्कि संबंधित कर्मचारी की सेवानिवृत्ति प्रक्रिया पर भी संकट खड़ा कर सकता है।

मुख्यालय में ज्वाइन नहीं कराया गया

प्रभागीय वनाधिकारी, सोहगीबरवां वन्यजीव प्रभाग, महराजगंज द्वारा पत्र संख्या 3021/16-6 दिनांक 20 दिसंबर 2025 को लक्ष्मीपुर रेंज में तैनात वन दरोगा प्रेमलाल यादव के सम्बद्धीकरण का आदेश जारी किया गया था। प्रेमलाल यादव 31 दिसंबर 2025 को 60 वर्ष की आयु पूर्ण कर सेवानिवृत्त होने वाले हैं।

आदेश के तहत उन्हें तत्काल प्रभाव से लक्ष्मीपुर रेंज से मुख्यालय, महराजगंज कार्यालय में सम्बद्ध किया गया था। आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया था कि—

• सम्बद्धीकरण तत्काल लागू होगा
• किसी प्रकार का यात्रा भत्ता देय नहीं होगा
• दिसंबर माह का वेतन तभी जारी होगा, जब कर्मचारी मुख्यालय में ज्वाइन करेंगे

पांच दिन बाद भी नहीं हुआ अनुपालन

आदेश की प्रतिलिपि मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव, पूर्वी) गोंडा, उप प्रभागीय वनाधिकारी लक्ष्मीपुर और क्षेत्रीय वन अधिकारी लक्ष्मीपुर को भेजी गई थी। इसके बावजूद आदेश जारी होने के पांच दिन बीत जाने के बाद भी न तो संबंधित वन दरोगा को रेंज से अवमुक्त किया गया और न ही उनकी मुख्यालय में ज्वाइनिंग कराई गई।
जबकि सेवानिवृत्ति में अब केवल कुछ ही दिन शेष हैं।

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वेतन और पेंशन प्रक्रिया पर संकट

सूत्रों के अनुसार समय रहते आदेश का अनुपालन न होने से वेतन भुगतान, सेवा अभिलेखों के संधारण और पेंशन संबंधी कार्यों में गंभीर बाधा उत्पन्न हो सकती है। इसे लेकर विभागीय लापरवाही के आरोप भी सामने आ रहे हैं।

DFO ने RFO को किया अवगत

मामले पर जब प्रभागीय वनाधिकारी सुर्वे निरंजन राजेंद्र से संपर्क किया गया तो उन्होंने बताया कि इस संबंध में लक्ष्मीपुर रेंज के क्षेत्रीय वन अधिकारी वेद प्रकाश शर्मा को अवगत करा दिया गया है और शीघ्र अनुपालन सुनिश्चित कराया जाएगा।

अब देखना यह है कि विभाग इस गंभीर लापरवाही पर समय रहते कार्रवाई करता है या फिर आदेश फाइलों तक ही सीमित रह जाते हैं।

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लोकतंत्र केवल शासन-प्रणाली नहीं, बल्कि हर नागरिक का जीवंत दायित्व है

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— चंद्रकांत सी. पूजारी, गुजरात

लोकतंत्र को अक्सर एक राजनीतिक व्यवस्था के रूप में देखा जाता है—जहां चुनाव होते हैं, सरकारें बनती हैं और संविधान के अनुसार शासन चलता है। लेकिन लोकतंत्र की वास्तविक आत्मा इन औपचारिक प्रक्रियाओं से कहीं आगे है। लोकतंत्र केवल शासन-प्रणाली नहीं, बल्कि हर नागरिक का निरंतर, नैतिक और सक्रिय दायित्व है, जिसे रोजमर्रा के जीवन में निभाया जाना चाहिए।

लोकतंत्र की असली शक्ति: मत से आगे सहभागिता

लोकतंत्र की ताकत मतपेटी में डाले गए वोट से शुरू जरूर होती है, लेकिन वहीं समाप्त नहीं होती। यह विचारों की स्वतंत्रता, असहमति के सम्मान, सवाल पूछने के साहस और सत्ता से जवाबदेही की मांग में लगातार प्रवाहित होती रहती है।

यदि नागरिक निष्क्रिय हो जाएं, सवाल उठाना छोड़ दें और अन्याय पर चुप्पी साध लें, तो लोकतंत्र केवल कागजी ढांचा बनकर रह जाता है।
इतिहास साक्षी है कि जहां नागरिक सजग और सहभागी रहे, वहां लोकतंत्र मजबूत हुआ; और जहां उदासीनता बढ़ी, वहां लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर पड़ीं।

जन-भागीदारी से ही जीवित रहता है लोकतंत्र

लोकतंत्र की आत्मा निरंतर जन-भागीदारी में निहित है। यदि नागरिक केवल चुनाव के समय सक्रिय हों और शेष समय मौन रहें, तो व्यवस्था खोखली हो जाती है।

चुप्पी और उदासीनता लोकतंत्र के सबसे बड़े शत्रु हैं, क्योंकि इससे सत्ता निरंकुश होने लगती है और नागरिक अधिकार कमजोर पड़ते हैं।

अधिकारों से आगे कर्तव्यों का लोकतंत्र

लोकतंत्र हमें अधिकार देता है—

• अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

• समानता और न्याय की गारंटी

लेकिन हर अधिकार के साथ कर्तव्य भी जुड़ा है—

• सत्य की पड़ताल करने का कर्तव्य

• सत्ता से साहसपूर्वक प्रश्न पूछने की जिम्मेदारी

• अल्पमत और असहमति की रक्षा

• सामाजिक सद्भाव और संवेदनशीलता बनाए रखना

यदि हम केवल अधिकारों पर जोर दें और कर्तव्यों से पीछे हटें, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगता है।

दृष्टांत: नदी किनारे का गांव

धारापुर गांव की नदी लोकतंत्र का प्रतीक है। प्रतिनिधि सरकार की तरह चुना गया, लेकिन नागरिकों ने जिम्मेदारी छोड़ दी। परिणामस्वरूप नदी प्रदूषित हुई और आपदा आई।

जब नागरिक फिर से सजग हुए, निगरानी की और सवाल उठाए—तभी नदी जीवनदायिनी बनी।

संदेश स्पष्ट है:

लोकतंत्र तभी सुरक्षित है जब नागरिक केवल प्रतिनिधि न चुनें, बल्कि सतर्क प्रहरी भी बनें।

वास्तविक उदाहरण: सूचना का अधिकार (RTI) आंदोलन

भारत में आरटीआई आंदोलन नागरिक भागीदारी का उत्कृष्ट उदाहरण है। राजस्थान में मजदूरों के हक के लिए शुरू हुआ संघर्ष 2005 में सूचना का अधिकार कानून बनने तक पहुंचा।

इस कानून ने पारदर्शिता बढ़ाई और साबित किया कि साधारण नागरिक भी सत्ता को जवाबदेह बना सकते हैं।

लोकतंत्र को जीवंत रखने की जिम्मेदारी

लोकतंत्र को मजबूत बनाए रखने के लिए जरूरी है कि—

• अफवाहों की जगह तथ्यों पर भरोसा करें
• मतभेद को दुश्मनी न बनने दें
• सवाल उठाने को देशद्रोह न समझें
• सोशल मीडिया और सार्वजनिक संवाद में जिम्मेदारी निभाएं

लोकतंत्र केवल संसद में नहीं, बल्कि स्कूलों की बहसों, सड़कों की संवेदनशीलता, सोशल मीडिया की जिम्मेदारी और घरेलू संवादों में भी जीवित रहता है।

मनरेगा का खात्मा संविधान के नीति-निर्देशक सिद्धांतों पर बुलडोजर

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बृन्दा करात/ संजय पराते

केंद्र सरकार ने संसद में अपने बहुमत का इस्तेमाल करके महात्मा गांधी ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को खत्म कर दिया है। इसकी जगह जो नया कानून लाया गया है, वह पूरी तरह से “अधिकार चोरी” वाला कानून है। इसने मनरेगा के मूल स्वरूप को ही बदल दिया है। यह ग्रामीण गरीब मज़दूरों के अधिकारों पर सीधा हमला है और इसे भारत के संविधान पर हमले के रूप में देखा जाना चाहिए।

भारत के संविधान के अनुच्छेद 41 में कहा गया है : “राज्य अपनी आर्थिक क्षमता और विकास की सीमाओं के भीतर, काम के अधिकार को सुरक्षित करने के लिए प्रभावी प्रावधान करेगा…”। संविधान सभा में समाजवादी आदर्शों से प्रभावित लोग काम के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में शामिल करना चाहते थे और मज़बूत पूंजीवादी लॉबी इसका विरोध कर रही थी। दोनों के बीच विचारों में गहरा मतभेद था। आखिरकार इसे संविधान के नीति-निर्देशक सिद्धांतों में शामिल किया गया। अंबेडकर ने इसे एक “नई विशेषता” बताया था, यह कहते हुए कि हालांकि ये नीति-निर्देशक सिद्धांत न्याय नहीं करते, फिर भी इन्हें कानून बनाने वालों के लिए “निर्देश के साधन” माना जाना चाहिए और ये “आर्थिक लोकतंत्र के लिए ज़रूरी” है। समाजवाद-समर्थक सदस्य के.टी. शाह ने तब इसे “पवित्र इच्छाएं” बताया था। शाह के शब्द इन सालों के पूंजीवादी “विकास” के दौरान बेरोज़गारों और काम के अवसरों से उनके वंचित होने के जीवंत अनुभवों में आज भी गूंजते हैं।

मेहनतकश लोगों के संघर्षों और बड़े राजनीतिक बदलावों को साढ़े पांच दशक लगे, ताकि नीतियों में एक ऐसा बदलाव हो सके, जो नीति-निर्देशक सिद्धांतों के कुछ ज़्यादा करीब हो और खास तौर पर काम के अधिकार को सुनिश्चित करे। 2004 के लोकसभा चुनावों में, कांग्रेस के नेतृत्व वाले संप्रग से भाजपा हार गई थी, लेकिन कांग्रेस को भी बहुमत नहीं मिला, जिससे ऐसी स्थिति बनी कि पहली बार केंद्र सरकार वामपंथी पार्टियों के समर्थन पर निर्भर थी।

महत्वपूर्ण बात यह थी कि माकपा के नेतृत्व वाली वामपंथी पार्टियों ने अपने कार्यक्रम और ताकत के दम पर स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ा था। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम इसी राजनीतिक स्थिति के कारण संभव हो पाया था। वामपंथी पार्टियों ने 2005 में संसद द्वारा सर्वसम्मति से अपनाए गए अंतिम कानून को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

यह कानून काम के अधिकार को आंशिक रूप से मान्यता देता है और राज्य की इस ज़िम्मेदारी को स्वीकार करता है कि वह न्यूनतम मज़दूरी पर काम देने के लिए राष्ट्रीय संसाधनों में ज़्यादा हिस्सा सुनिश्चित करे। यह कानून ग्रामीण परिवारों को पूरे साल में कम से कम 100 दिन के काम की गारंटी देता है और यह सार्वभौमिक है, जो सभी वयस्क पुरुषों और महिलाओं के लिए खुला है, जो स्वेच्छा से शारीरिक श्रम का काम करते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह कानून काम की मांग को पूरा करने पर आधारित है, जो स्थिर नहीं है और ग्रामीण परिवारों की ज़रूरत के अनुसार बढ़ या घट सकती है। इसमें एक गहरी लोकतांत्रिक भावना है। यदि किसी परिवार के पास रोज़गार के बेहतर विकल्प हैं, तो उसे मनरेगा द्वारा प्रदान किए गए अधिकार को बनाए रखते हुए उस विकल्प का प्रयोग करने का अधिकार है। यह कानून पुरुषों और महिलाओं को समान मज़दूरी की गारंटी देता है, जिसका पूरा भुगतान केंद्र सरकार द्वारा किया जाएगा।

इस कानून के तहत राज्य सरकारें लगभग 10 प्रतिशत की कुछ वित्तीय ज़िम्मेदारी उठाती हैं और उन्हें राज्य की ज़रूरतों के अनुसार, योजनाओं की रूपरेखा बनाने और उनके क्रियान्वयन में अपनी बात रखने का अधिकार है। पंचायतों को अपने अधिकार क्षेत्र के तहत आने वाले क्षेत्रों में आवश्यक परियोजनाओं की पहचान करने और उन्हें डिज़ाइन करने का अधिकार और ज़िम्मेदारी दोनों हैं। यह मांग आधारित सार्वभौमिक रूप से लागू होने वाला कानून शायद पूंजीवादी दुनिया में अपनी तरह का पहला कानून था।

मोदी सरकार ने अपने ढोलकबाज सहयोगियों टीडीपी और जेडी (यू) के साथ मिलकर इस कानून की सभी बुनियादी विशेषताओं को खत्म कर दिया है। यह अब मांग से संचालित नहीं होगा, बल्कि केंद्र सरकार द्वारा तय किए गए “मानक वित्तीय आबंटन” के आधार पर तय होगा। अगर खर्च इस आबंटन से ज़्यादा होता है, तो केंद्र पर कानूनी तौर पर कोई ज़िम्मेदारी नहीं होगी। राज्य, जो पहले से ही केंद्रीय कर राजस्व में अपने हिस्से से वंचित होने के कारण वित्तीय संकट में हैं, उन पर 40 प्रतिशत लागत का बोझ डाला जा रहा है। ऐसे माहौल में काम के दिनों को बढ़ाकर 125 दिन करना एक मज़ाक है। यह बहुत ज़्यादा केंद्रीकृत है और परियोजना की रूपरेखा से लेकर डिजिटलाइज़्ड अंकेक्षण तक सब कुछ केंद्र सरकार द्वारा नियंत्रित किया जाएगा। ये विशेषताएं संविधान के संघीय स्वरूप पर सीधा हमला हैं।

ग्रामीण अमीरों के पक्ष में वर्गीय भेदभाव इस कानून की धाराओं में साफ तौर पर दिखता है, जो सघन-खेती के मौसम में प्रस्तावित कानून के तहत किसी भी काम पर रोक लगाता है। खेती में मशीनीकरण बढ़ने से काम के दिन बहुत कम हो गए हैं। मनरेगा का काम का पैटर्न दिखाता है कि जब खेती का काम नहीं होता और जब दी जाने वाली मज़दूरी मनरेगा की तुलना में कम होती है, तभी मज़दूर सघन-कृषि मौसम में मनरेगा को चुनते हैं। यह रोक ग्रामीण मज़दूरों की मोलभाव करने की क्षमता को कम कर देगी, जो मनरेगा की गैर-मौजूदगी में बड़े ज़मींदारों द्वारा तय की गई शर्तों और नियमों को मानने के लिए मजबूर होंगे।

इसका असर खासकर महिलाओं पर पड़ेगा, जिन्हें खेती में पुरुषों से कम मज़दूरी मिलती है। यह कानून आधार कार्ड को लिंक करने, ऑनलाइन डिजिटल रूप से रिकॉर्ड की गई हाज़िरी को योग्यता और मज़दूरी भुगतान की शर्त के तौर पर कानूनी बनाता है। यह सब इस बात के काफी सबूत होने के बावजूद किया जा रहा है कि खराब कनेक्टिविटी जैसी स्थितियों ने मज़दूरों को काफी परेशान किया है।

कानून के नाम के तौर पर जी राम जी के संक्षिप्त नाम का इस्तेमाल करना, राम को मानने वालों को लुभाने के लिए एक घटिया चाल है। लेकिन जब करोड़ों लोग इस कानून के खिलाफ जी-राम-जी मुर्दाबाद चिल्लाएंगे, तो इससे भावनाएं आहत हो सकती हैं और यह सरकार पर उल्टा पड़ सकता है।

हममें से वे लोग, जो मनरेगा मज़दूरों के साथ मिलकर काम करते हैं, वे जानते हैं कि लोग कितनी कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं। कुछ मामलों में महिलाओं को उत्पादकता का मापदंड पूरा करने के लिए एक दिन में 3000 किलो तक मिट्टी उठानी पड़ती है, और इसके बावजूद अगर ज़्यादातर राज्यों में मनरेगा मज़दूरों में 50 प्रतिशत से ज़्यादा महिलाएं हैं, तो यह निश्चित रूप से खेती-बाड़ी की गहरे संकट और बेहतर विकल्प की कमी को दिखाता है। आदिवासियों की आबादी लगभग 8.6 प्रतिशत है। लेकिन पिछले साल के आंकड़ों के अनुसार मनरेगा मज़दूरों में उनका अनुपात 18 प्रतिशत तक है और अनुसूचित जाति के लोगों का 19 प्रतिशत हैं। चूंकि दो-तिहाई से ज़्यादा मज़दूर संविधान द्वारा संरक्षित सामाजिक श्रेणियों से आते हैं, उनके अधिकारों में कोई भी बदलाव संविधान पर हमला है।

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लेकिन नए कानून में शिकायत निवारण/सलाहकार परिषदों में भी उनका प्रतिनिधित्व खत्म कर दिया गया है। 2014 से, मोदी सरकार ने मनरेगा को कमजोर किया है और इसके वित्त-पोषण में कटौती कर दी है, जबकि उसने कॉर्पोरेट्स को करों में छूट दी है और उनकी कर्ज माफी में काफी बढ़ोतरी हुई है। जहाँ शुरुआती दिनों में मनरेगा मजदूरों की संख्या लगभग दो करोड़ थी, अब बढ़कर 7.7 करोड़ से ज़्यादा हो गई है, वहीं खर्च स्थिर रहा है या कम हुआ है और वह कभी भी जीडीपी के 0.2 प्रतिशत से ज़्यादा नहीं हुआ है। 2024-25 में, 8.9 करोड़ मजदूरों ने काम माँगा, लेकिन सिर्फ़ 7.9 करोड़ मजदूरों को काम मिला— 99 लाख से ज्यादा मजदूरों को काम नहीं दिया गया और उन्हें वापस भेज दिया गया।

मज़दूरी का बकाया बढ़ता गया है — कभी-कभी 8000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। परिवारों को 100 दिनों के बजाय औसतन 50 दिनों से भी कम काम मिला है। प्रस्तावित ड्राफ्ट में 125 दिनों का वादा करना जले पर नमक छिड़कने जैसा है। लेकिन अगर लोग मनरेगा स्थलों पर आते रहते हैं, तो इसका कारण यह है कि उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है — भारत के ग्रामीण गरीबों के जीवन में इतनी ज़्यादा निराशा और अस्थिरता है।

वह जीवन रेखा, मज़बूत करने के बजाय अब काट दी गई है। संविधान के नीति निर्देशक सिद्धांतों को बुलडोज़र से कुचला जा रहा है। इस सरकार पर शर्म आती है।

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शहीद निर्मल महतो के बलिदान से आजसू को मिली संघर्ष की दिशा: सुदेश महतो


रांची (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। झारखंड आंदोलन के प्रखर योद्धा और शहीद निर्मल महतो की जयंती पर आजसू पार्टी प्रमुख एवं झारखंड के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुदेश महतो ने सिल्ली स्थित झारखंड मोड़ पर स्थापित उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित की। इस अवसर पर उन्होंने शहीद निर्मल महतो के बलिदान और संघर्ष को झारखंड राज्य गठन की आधारशिला बताते हुए उन्हें नमन किया।

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सुदेश महतो ने कहा कि शहीद निर्मल महतो ने आजसू पार्टी की स्थापना कर झारखंड आंदोलन को न केवल दिशा दी, बल्कि उसे व्यापक जनसमर्थन भी दिलाया। उनके नेतृत्व और बलिदान ने आंदोलन में नई चेतना का संचार किया, जिससे आदिवासी-मूलवासी समाज को अपने अधिकारों के लिए संगठित होने की प्रेरणा मिली। उन्होंने कहा कि निर्मल महतो के साहसिक संघर्ष ने आजसू को उग्र आंदोलन के रास्ते पर आगे बढ़ने का संबल दिया, जिसके परिणामस्वरूप केंद्र सरकार को वर्ष 1989 में आजसू से वार्ता करनी पड़ी।

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पूर्व उपमुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि आजसू पार्टी आज भी शहीद निर्मल महतो के विचारों और आदर्शों पर चल रही है। उन्होंने कहा कि पार्टी का लक्ष्य निर्मल महतो के सपनों का झारखंड बनाना है, जहां सामाजिक न्याय, समान अधिकार और क्षेत्रीय अस्मिता को सर्वोच्च प्राथमिकता मिले। सुदेश महतो ने कार्यकर्ताओं से आह्वान किया कि वे शहीद के विचारों को जन-जन तक पहुंचाएं और झारखंड के विकास के लिए संगठित संघर्ष जारी रखें।

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इस श्रद्धांजलि कार्यक्रम में पार्टी के वरिष्ठ नेता जयपाल सिंह, सुनील सिंह, संजय सिद्धार्थ सहित कई कार्यकर्ता और स्थानीय लोग मौजूद रहे। सभी ने शहीद निर्मल महतो के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उनके योगदान को याद किया।

हत्या के प्रयास का वांछित आरोपी गिरफ्तार, चिलुआताल पुलिस की बड़ी कार्रवाई

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। जनपद में अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण और वांछित अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए चलाए जा रहे अभियान के तहत थाना चिलुआताल पुलिस को बड़ी सफलता मिली है। पुलिस ने हत्या के प्रयास के मामले में वांछित चल रहे एक अभियुक्त को गिरफ्तार कर लिया है।

कौन है गिरफ्तार आरोपी

थाना चिलुआताल में दर्ज मुकदमा संख्या 828/25 (धारा 109, 115(2), 351(3), 324(4) बीएनएस) के तहत वांछित अभियुक्त
मिथलेश उर्फ मिठाईलाल पुत्र धुरई, निवासी परमेश्वपुर टोला कृतपुरा, थाना चिलुआताल, जनपद गोरखपुर को पुलिस ने गिरफ्तार किया है।

यह गिरफ्तारी उप निरीक्षक आशीष सिंह के नेतृत्व में की गई। पुलिस द्वारा अभियुक्त के खिलाफ अग्रिम विधिक कार्रवाई की जा रही है।

घटना का विवरण

पुलिस के अनुसार अभियुक्त ने वादी के नाती पर जान से मारने की नीयत से हमला किया था। आरोप है कि उसने गला दबाकर मारपीट की और जान से मारने की धमकी देकर मौके से फरार हो गया था। पीड़ित की तहरीर पर थाना चिलुआताल में मामला दर्ज किया गया था, तभी से आरोपी फरार चल रहा था।

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गंभीर आपराधिक इतिहास

गिरफ्तार अभियुक्त मिथलेश उर्फ मिठाईलाल का आपराधिक इतिहास गंभीर बताया जा रहा है। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार उसके खिलाफ पहले से हत्या, अपहरण, दुष्कर्म, पॉक्सो एक्ट, एनडीपीएस एक्ट और एससी/एसटी एक्ट सहित कई गंभीर मामलों में मुकदमे दर्ज हैं। वर्ष 2023, 2024 और 2025 में भी उस पर संगीन आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं।

पुलिस का बयान

पुलिस अधिकारियों ने कहा है कि अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई लगातार जारी रहेगी और कानून-व्यवस्था से खिलवाड़ करने वालों को किसी भी हाल में बख्शा नहीं जाएगा। इस गिरफ्तारी से क्षेत्र में सुरक्षा और कानून-व्यवस्था मजबूत होने की उम्मीद जताई जा रही है।

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हत्या के प्रयास मामले में 4 आरोपी गिरफ्तार, 2 बाल अपचारी हिरासत में, दो चाकू बरामद

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। जनपद में अपराध पर प्रभावी नियंत्रण के लिए चलाए जा रहे अभियान के तहत थाना गगहा पुलिस को बड़ी सफलता मिली है। हत्या के प्रयास के एक गंभीर मामले में पुलिस ने 04 वांछित अभियुक्तों को गिरफ्तार किया है, जबकि 02 बाल अपचारियों को हिरासत में लिया गया है। आरोपियों के कब्जे से घटना में प्रयुक्त दो चाकू भी बरामद किए गए हैं।

किन आरोपियों की हुई गिरफ्तारी

थाना गगहा में दर्ज मुकदमा संख्या 701/2025 (धारा 191(1), 191(2), 191(3), 109, 190, 126(2), 352, 115(2) बीएनएस) के तहत वांछित अभियुक्तों में शामिल हैं—

• सूर्यांश यादव पुत्र राजकुमार यादव, निवासी ग्राम धस्का, थाना बांसगांव

• राज कन्नौजिया पुत्र राजेश, निवासी धस्का, थाना बांसगांव

• अभिनव राय उर्फ गोलू पुत्र अनिल राय, निवासी महुज पकड़ी, थाना गगहा

• अंकित यादव पुत्र जनार्दन यादव, निवासी ग्राम डाड़िया बुजुर्ग, थाना बांसगांव

इसके साथ ही 02 बाल अपचारियों को भी पुलिस हिरासत में लिया गया है।

कैसे हुई गिरफ्तारी

पुलिस के अनुसार यह कार्रवाई उप निरीक्षक विकास सिंह के नेतृत्व में की गई। गिरफ्तारी के दौरान आरोपियों के पास से दो अदद चाकू बरामद हुए। सभी के खिलाफ अग्रिम विधिक कार्रवाई की जा रही है।

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घटना का विवरण

पुलिस के मुताबिक 22 दिसंबर 2025 को सभी अभियुक्तों ने एकराय होकर वादी के भतीजे पर चाकू से हमला कर दिया था, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया। पीड़ित की तहरीर पर थाना गगहा में मामला दर्ज किया गया था। तभी से आरोपी फरार चल रहे थे।

आपराधिक इतिहास

पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार गिरफ्तार कुछ अभियुक्तों के खिलाफ पहले से मारपीट, हत्या के प्रयास, पॉक्सो एक्ट सहित अन्य गंभीर मामलों में मुकदमे दर्ज हैं, जबकि अन्य के विरुद्ध वर्तमान मुकदमा पंजीकृत है।
पुलिस अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि जिले में अपराधियों के खिलाफ अभियान लगातार जारी रहेगा, जिससे क्षेत्र में कानून-व्यवस्था और अधिक सुदृढ़ होगी।

क्रिटिकल मिनरल्स की तलाश तेज करेगी झारखंड सरकार

रांची (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)झारखंड सरकार राज्य में खनिज संसाधनों की खोज और वैज्ञानिक अन्वेषण को गति देने के लिए एक बड़ा कदम उठाने जा रही है। इसके तहत स्टेट मिनरल एक्सप्लोरेशन ट्रस्ट (SMET) का गठन किया जाएगा, जिसे गैर-लाभकारी संस्था के रूप में स्थापित किया जाएगा। यह ट्रस्ट केंद्र सरकार के नेशनल मिनरल एक्सप्लोरेशन ट्रस्ट (NMET) की तर्ज पर काम करेगा और राज्य में खनिजों की क्षेत्रीय एवं विस्तृत खोज को सुदृढ़ करेगा।
राज्य सरकार द्वारा एसएमइटी के लिए एक अलग एसएमइटी कोष तैयार किया जाएगा। इस कोष में खनन पट्टा या अन्वेषण लाइसेंस सह खनन पट्टा धारकों से एमएमडीआर अधिनियम की दूसरी अनुसूची के तहत भुगतान की गई रॉयल्टी का एक निश्चित प्रतिशत लिया जाएगा। प्रस्तावित तौर पर यह राशि 1 से 2 प्रतिशत के बीच हो सकती है, जिस पर अंतिम निर्णय विचार-विमर्श के बाद लिया जाएगा।

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एसएमइटी का मुख्य उद्देश्य गहरे या छिपे हुए खनिज भंडारों की पहचान, उनका वैज्ञानिक आकलन, माइंस प्लान तैयार करना और खनन को अधिक प्रभावी बनाने के लिए विशेष अध्ययन एवं परियोजनाओं को वित्तीय सहायता देना होगा। इसके साथ ही सतत खनन, आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों के उपयोग, धातु विज्ञान से जुड़े अध्ययन और खनिज निष्कर्षण को बेहतर बनाने पर भी जोर दिया जाएगा।

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ट्रस्ट के अध्यक्ष राज्य के खान मंत्री होंगे, जबकि समिति में खान सचिव, खान निदेशक, भूतत्व निदेशक सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी शामिल रहेंगे। रणनीतिक और महत्वपूर्ण खनिजों की खोज को प्राथमिकता दी जाएगी, साथ ही खनिज अन्वेषण से जुड़े कर्मियों की क्षमता वृद्धि पर भी काम किया जाएगा।

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बताया गया है कि केंद्रीय कोयला मंत्री जी किशन रेड्डी के साथ हुई बैठक में इस विषय को प्रमुखता से उठाया गया था। उन्होंने राज्य सरकार से एसएमइटी का शीघ्र गठन करने का आग्रह करते हुए इसे क्रिटिकल मिनरल्स की खोज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।

रांची अपार्टमेंट फायर: धुएं से घुटन, लोग घर छोड़कर भागे

रांची के पुराना अरगोड़ा स्थित अपार्टमेंट में भीषण आग, ऊपरी मंज़िल पर मचा हड़कं


रांची (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) झारखंड की राजधानी रांची में शुक्रवार सुबह उस समय अफरा-तफरी मच गई, जब पुराना अरगोड़ा चौक से कटहल मोड़ जाने वाले मुख्य मार्ग पर स्थित एक बहुमंजिला अपार्टमेंट में अचानक भीषण आग लग गई। आग अपार्टमेंट के सबसे ऊपरी फ्लोर पर लगी, जिससे कुछ ही मिनटों में घना धुआं पूरे परिसर में फैल गया।

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प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, सुबह के समय लोगों ने ऊपरी मंज़िल से धुआं निकलते देखा, जिसके बाद अपार्टमेंट में रह रहे लोगों में दहशत फैल गई। कई परिवार आनन-फानन में अपने घर छोड़कर बाहर निकल आए। आग की सूचना मिलते ही स्थानीय लोगों ने फायर ब्रिगेड और पुलिस को इसकी जानकारी दी।

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सूचना पाकर दमकल विभाग की कई गाड़ियां मौके पर पहुंचीं और आग बुझाने का अभियान शुरू किया गया। काफी मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया गया। राहत की बात यह रही कि इस घटना में अब तक किसी के हताहत होने की पुष्टि नहीं हुई है, हालांकि कुछ लोगों को धुएं के कारण सांस लेने में दिक्कत की शिकायत हुई, जिन्हें प्राथमिक उपचार दिया गया।

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प्रारंभिक जांच में आग लगने का कारण शॉर्ट सर्किट बताया जा रहा है, हालांकि प्रशासन की ओर से इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं की गई है। पुलिस और फायर विभाग की टीम मौके पर मौजूद रहकर नुकसान का आकलन कर रही है।

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इस घटना ने एक बार फिर शहरी इलाकों में अग्नि सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि अपार्टमेंट में फायर सेफ्टी के पर्याप्त इंतज़ाम नहीं थे। प्रशासन ने मामले की जांच के आदेश दे दिए हैं।

बम की अफवाह से पटना एयरपोर्ट पर सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट

दिल्ली–पटना स्पाइसजेट फ्लाइट को बम से उड़ाने की धमकी, पटना एयरपोर्ट पर हाई अलर्ट, जांच के बाद हालात सामान्य

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)दिल्ली से पटना आने वाली स्पाइसजेट की एक फ्लाइट को बम से उड़ाने की धमकी मिलने के बाद पटना एयरपोर्ट पर कुछ देर के लिए हड़कंप मच गया। यह धमकी स्पाइसजेट की दिल्ली स्थित आधिकारिक ईमेल आईडी पर भेजी गई थी, जिसमें केवल इतना लिखा था कि दिल्ली से पटना जा रही एक फ्लाइट में बम रखा गया है। हालांकि, ईमेल में किसी खास विमान का उल्लेख नहीं किया गया था, जिससे सुरक्षा एजेंसियों की चिंता और बढ़ गई।

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धमकी भरा मेल मिलते ही स्पाइसजेट प्रबंधन ने तुरंत पटना एयरपोर्ट प्रशासन को इसकी सूचना दी। इसके बाद एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (AAI), केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF), बम निरोधक दस्ता और अन्य सुरक्षा एजेंसियों को अलर्ट कर दिया गया। सभी निर्धारित सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत संदिग्ध विमानों, यात्रियों के सामान और एयरपोर्ट परिसर की गहन जांच शुरू की गई।

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कई घंटों तक चली सघन तलाशी अभियान के दौरान कहीं भी कोई संदिग्ध वस्तु या विस्फोटक सामग्री नहीं मिली। जांच पूरी होने के बाद प्रशासन ने स्थिति को पूरी तरह सामान्य घोषित कर दिया, जिसके बाद यात्रियों और एयरपोर्ट स्टाफ ने राहत की सांस ली।
इस मामले में स्पाइसजेट के कर्मचारी शाहनवाज बख्त के लिखित आवेदन पर पटना के एयरपोर्ट थाने में अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। प्राथमिकी में बताया गया है कि धमकी Bhulijanm856@gmail.com नामक ईमेल आईडी से भेजी गई थी। केस दर्ज होते ही पुलिस और साइबर सेल सक्रिय हो गई है। ईमेल के आईपी एड्रेस का पता लगाया जा रहा है और जीमेल से तकनीकी जानकारियां मांगी गई हैं।

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पुलिस सूत्रों के अनुसार, शुरुआती जांच में यह किसी शरारती तत्व की हरकत लग रही है, लेकिन सुरक्षा को देखते हुए सभी संभावित पहलुओं से जांच जारी है।

गुजरात के कच्छ जिले में भूकंप, सुबह 4.30 बजे हिली धरती, घरों से बाहर निकले लोग

कच्छ/गुजरात (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। गुजरात के कच्छ जिले में शुक्रवार तड़के भूकंप के झटकों से धरती कांप उठी। भूकंप सुबह करीब 4:30 बजे महसूस किया गया, जिसकी तीव्रता रिक्टर स्केल पर 4.4 मापी गई। झटके लगते ही लोग नींद से जाग गए और दहशत में घरों से बाहर निकल आए।

प्रारंभिक जानकारी के अनुसार भूकंप के झटके हल्के थे और राहत की बात यह रही कि किसी तरह के जान-माल के नुकसान की सूचना नहीं है।

10 किलोमीटर नीचे था भूकंप का केंद्र

भूकंप का केंद्र कच्छ की धरती से लगभग 10 किलोमीटर नीचे दर्ज किया गया। झटके कुछ ही सेकंड तक महसूस किए गए, लेकिन इतने समय में ही लोगों में अफरा-तफरी मच गई। कई लोगों ने पंखे, बिस्तर और हल्की वस्तुओं के हिलने की बात भी कही।

5 दिन पहले भरूच में भी आया था भूकंप

इससे पहले 20 दिसंबर को गुजरात के भरूच जिले में भी सुबह 4:56 बजे भूकंप के हल्के झटके महसूस किए गए थे। उस समय भूकंप का केंद्र जंबूसर के पास, भरूच से करीब 45 किलोमीटर दूर बताया गया था।

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भूकंप के लिहाज से संवेदनशील है कच्छ

गुजरात राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (GSDMA) के अनुसार, बीते 200 वर्षों में गुजरात में 9 बड़े भूकंप आ चुके हैं, जिनमें से कई कच्छ क्षेत्र में दर्ज किए गए। कच्छ एक एक्टिव सीस्मिक जोन में स्थित होने के कारण इसे भूकंप के लिहाज से संवेदनशील माना जाता है।

2001 का कच्छ भूकंप आज भी डराता है

साल 2001 में भचाऊ के पास आया 6.9 तीव्रता का भूकंप देश के सबसे विनाशकारी भूकंपों में शामिल था। उस आपदा में करीब 13,800 लोगों की जान गई थी, जबकि 1.67 लाख से ज्यादा लोग घायल हुए थे। भुज भूकंप की यादें आज भी लोगों को सहमा देती हैं।

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विवाहिता पर हमला, ससुरालियों पर धारदार हथियार से कान काटने का आरोप, FIR दर्ज

आगरा (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। उत्तर प्रदेश के आगरा जिले से घरेलू हिंसा का गंभीर मामला सामने आया है। थाना सदर क्षेत्र में एक विवाहिता ने अपने जेठ, जेठानी, देवर और ससुर पर मारपीट कर धारदार हथियार से कान काटने का आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। घटना के बाद पीड़िता को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।

सबमर्सिबल चलाने को लेकर हुआ विवाद

नई आबादी नंदपुरा देवरी रोड निवासी पीड़िता ममता ने पुलिस को बताया कि बुधवार सुबह करीब 7 बजे सबमर्सिबल चलाने को लेकर परिवार में विवाद हो गया। आरोप है कि इसी बात पर जेठ प्रदीप, देवर रोहित, जेठानी रेखा और ससुर गीताराम ने एकजुट होकर उसे कमरे में बंद कर मारपीट की।

धारदार हथियार से किया गया हमला

पीड़िता का आरोप है कि हमले के दौरान धारदार हथियार से उसका कान काट दिया गया। शोर सुनकर जब उसकी छोटी बहन बचाने पहुंची, तो उसके साथ भी मारपीट की गई।

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मेडिकल के बाद जांच में जुटी पुलिस

थाना सदर पुलिस ने मामले में प्राथमिकी दर्ज कर ली है और पीड़िता का मेडिकल परीक्षण कराया गया है। पुलिस का कहना है कि सभी आरोपों की जांच की जा रही है और जांच के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

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4 साल की मासूम से दरिंदगी, बकरी चरा रहे किशोर ने किया दुष्कर्म; आरोपी परिवार समेत फरार

आगरा (राष्ट्र की परम्परा)। उत्तर प्रदेश के आगरा जिले से मानवता को शर्मसार कर देने वाली घटना सामने आई है। खंदौली थाना क्षेत्र के एक गांव में 4 साल की मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म का मामला प्रकाश में आया है। इस घिनौनी वारदात को गांव के ही एक 15 वर्षीय किशोर ने अंजाम दिया। घटना के बाद से आरोपी और उसका परिवार घर में ताला डालकर फरार है।

​जंगल में शौच के लिए गई थी मासूम

​पुलिस के अनुसार, यह घटना करीब तीन दिन पुरानी है। मासूम बच्ची अपने घर के पीछे जंगल में शौच के लिए गई थी। वहीं पर गांव का एक 15 वर्षीय किशोर अपनी बकरियां चरा रहा था। सूना मौका पाकर उसने बच्ची के साथ हैवानियत की।

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​परिजनों को सुनाई आपबीती

​बच्ची जब रोते हुए घर पहुंची, तो उसने अपने माता-पिता को पूरी घटना की जानकारी दी। मासूम का दर्द सुनकर परिजनों के पैरों तले जमीन खिसक गई। पीड़ित परिवार तुरंत बच्ची को लेकर थाने पहुंचा और पुलिस को शिकायत दर्ज कराई।

​पुलिस की कार्रवाई और फरार आरोपी

​मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने तत्काल बच्ची का मेडिकल कराया और आरोपी किशोर के खिलाफ POCSO एक्ट व अन्य गंभीर धाराओं में प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर ली है।

​पुलिस ने बताया कि जैसे ही किशोर के परिवार को पुलिस की कार्रवाई की भनक लगी, वे घर पर ताला लगाकर फरार हो गए। फिलहाल पुलिस की टीमें आरोपी की तलाश में दबिश दे रही हैं।

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UPPSC Recruitment 2025: यूपी में ग्रुप A और B के 2158 पदों पर भर्ती, मेडिकल और स्वास्थ्य विभाग में सुनहरा मौका

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लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) ने ग्रुप A और ग्रुप B श्रेणी के विभिन्न पदों पर 2158 रिक्तियों के लिए भर्ती अधिसूचना जारी की है। यह भर्ती अभियान खासतौर पर मेडिकल, आयुष और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े अभ्यर्थियों के लिए बड़ा अवसर लेकर आया है।

इस भर्ती के तहत मेडिकल ऑफिसर, पशु चिकित्सा अधिकारी, डेंटल सर्जन, होम्योपैथिक मेडिकल ऑफिसर, स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी सहित कई महत्वपूर्ण पदों को भरा जाएगा।

आवेदन प्रक्रिया

इच्छुक और योग्य उम्मीदवार UPPSC की आधिकारिक वेबसाइट http://uppsc.up.nic.in पर जाकर ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। आयोग ने स्पष्ट किया है कि केवल OTR (वन टाइम रजिस्ट्रेशन) आधारित ऑनलाइन आवेदन ही मान्य होंगे। किसी भी अन्य माध्यम से भेजे गए आवेदन स्वीकार नहीं किए जाएंगे।

जरूरी तिथियां

• ऑनलाइन आवेदन शुरू: 22 दिसंबर 2025

• आवेदन की अंतिम तिथि: 29 जनवरी 2026

• शुल्क भुगतान की अंतिम तिथि: 29 जनवरी 2026

• आवेदन में संशोधन की अंतिम तिथि: 29 जनवरी 2026

आयु सीमा

• न्यूनतम आयु: 21 वर्ष

• अधिकतम आयु: 40 वर्ष

• आरक्षित वर्गों को सरकारी नियमों के अनुसार आयु में छूट दी जाएगी।

आवेदन शुल्क

सामान्य / ओबीसी / ईडब्ल्यूएस: 105 रुपये

एससी / एसटी: 65 रुपये

पूर्व सैनिक: 65 रुपये

दिव्यांग अभ्यर्थी: 25 रुपये

चयन प्रक्रिया और वेतन

उम्मीदवारों का चयन लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के आधार पर किया जाएगा। चयनित अभ्यर्थियों को पद के अनुसार ₹56,100 से ₹1,77,500 प्रतिमाह तक वेतन मिलेगा।

विभागवार पदों का विवरण

  1. पशुधन विभाग: पशु चिकित्सा अधिकारी – 404 पद
  2. परिवार कल्याण महानिदेशालय: स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी – 221 पद
  3. चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग: डेंटल सर्जन – 157 पद
  4. खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन: औषधि निरीक्षक – 26 पद
  5. आयुर्वेद निदेशालय: चिकित्सा अधिकारी (आयुर्वेद) – 168 पद
  6. चिकित्सा अधिकारी सामुदायिक स्वास्थ्य (आयुर्वेद/यूनानी) – 884 पद
  7. यूनानी निदेशालय: चिकित्सा अधिकारी (यूनानी) – 25 पद
  8. श्रम विभाग: चिकित्सा अधिकारी (होम्योपैथिक) – 7 पद
  9. होम्योपैथी निदेशालय: होम्योपैथिक चिकित्सा अधिकारी – 265 पद
  10. विधायी विभाग: विधिक्षण अधिकारी – 1 पद

UPPSC की यह भर्ती स्वास्थ्य और चिकित्सा क्षेत्र में सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए एक बड़ा अवसर मानी जा रही है। उम्मीदवारों को सलाह दी जाती है कि वे अंतिम तिथि से पहले आवेदन प्रक्रिया पूरी कर लें।

ढाई करोड़ की चरस के साथ नेपाली तस्कर गिरफ्तार, STF और बर्रा पुलिस की बड़ी कार्रवाई

कानपुर (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। बर्रा पुलिस और एसटीएफ ने गुरुवार को नशे के कारोबार के खिलाफ बड़ी सफलता हासिल करते हुए 13.2 किलो चरस के साथ एक नेपाली नागरिक को गिरफ्तार किया है। बरामद चरस की अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत करीब 2.6 करोड़ रुपये आंकी गई है।

गिरफ्तार आरोपी की पहचान प्रदीप कुमार कर्ण (निवासी नेपाल) के रूप में हुई है। आरोपी नेपाल से चरस की तस्करी कर कानपुर लाया था और इसे सचेंडी, काकादेव सहित अन्य इलाकों में सप्लाई करने की तैयारी में था।

हाईवे अंडरपास से दबोचा गया तस्कर

डीसीपी साउथ दीपेंद्र नाथ चौधरी ने बताया कि प्रदीप झकरकटी बस अड्डे पर उतरने के बाद ऑटो से बर्रा बाईपास पहुंचा था। वह भोलेश्वर मंदिर के पास किसी युवक को चरस सौंपने जा रहा था। इसी दौरान पीछे लगी एसटीएफ और बर्रा पुलिस की टीम ने उसे हाईवे अंडरपास के पास दबोच लिया।

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दो झोलों में छोटे-छोटे पैकेट

आरोपी के पास मौजूद दो झोलों से ब्राउन टेप से पैक किए गए छोटे-छोटे पैकेट बरामद हुए। मौके पर तराजू मंगवाकर वजन कराया गया, जिसमें कुल 13.2 किलो चरस पाई गई। पूछताछ में आरोपी ने तस्करी की बात स्वीकार कर ली है।

ट्रैफिक रोका गया, जुटी भीड़

गिरफ्तारी के दौरान शाम करीब 4:30 बजे अंडरपास के दोनों छोर पर ट्रैफिक रोक दिया गया, जिससे लोगों की भीड़ जमा हो गई। पुलिस ने कार्रवाई का वीडियो भी रिकॉर्ड किया है।

फिलहाल आरोपी के खिलाफ NDPS एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया है और पुलिस नेटवर्क से जुड़े अन्य तस्करों की तलाश में जुटी है।

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