देवरिया(राष्ट्र की परम्परा)जनपद में शांति, सुरक्षा एवं कानून व्यवस्था को सुदृढ़ बनाए रखने के उद्देश्य से पुलिस अधीक्षक देवरिया संजीव सुमन के निर्देशन में शुक्रवार को “मार्निंग वॉकर चेकिंग अभियान” चलाया गया। यह अभियान प्रातः 5 बजे से 8 बजे तक जनपद के विभिन्न थाना क्षेत्रों में संचालित किया गया।अभियान के दौरान सभी थाना प्रभारी व थानाध्यक्षों ने मॉर्निंग वॉक पर निकले नागरिकों से सीधे संवाद स्थापित कर उन्हें सुरक्षा का भरोसा दिलाया। साथ ही सामुदायिक सहभागिता को बढ़ावा देते हुए छोटे-मोटे विवादों का मौके पर समाधान किया गया और मित्र पुलिसिंग की भावना को मजबूत किया गया।पुलिस द्वारा संदिग्ध व्यक्तियों व वाहनों की सघन चेकिंग की गई। इस दौरान चोरी की गाड़ियों की बरामदगी, तीन सवारी के विरुद्ध कार्रवाई, मोडिफाइड साइलेंसर लगे दोपहिया वाहनों का चालान, नाबालिगों द्वारा वाहन चलाने तथा अवैध गतिविधियों पर प्रभावी निगरानी रखी गई। साथ ही अवैध असलहा व मादक पदार्थों के विरुद्ध भी सख्ती बरती गई।संवाद के दौरान पुलिस ने आमजन को मॉर्निंग वॉकर चेकिंग अभियान के उद्देश्य व लाभों से अवगत कराया। नागरिकों ने पुलिस की इस पहल की सराहना करते हुए मॉर्निंग वॉक के दौरान सुरक्षा व्यवस्था पर संतोष व्यक्त किया।जनपदीय पुलिस द्वारा कुल 17 स्थानों पर चेकिंग अभियान चलाते हुए 333 व्यक्तियों एवं 197 वाहनों की जांच की गई। पुलिस प्रशासन ने स्पष्ट किया कि आमजन की सुरक्षा, शांति एवं विश्वास बनाए रखने के लिए ऐसे अभियान आगे भी निरंतर जारी रहेंगे।
सड़क सुरक्षा को लेकर प्रशासन सख्त, ड्राइवरों को तीन चरणों में मिलेगा प्रशिक्षण
शहर से गांव तक लगेंगी बड़ी होर्डिंग, ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर लगेगी रोक
बलिया(राष्ट्र की परम्परा)
जनपद में बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं पर प्रभावी नियंत्रण और आमजन को यातायात नियमों के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से जिला सड़क सुरक्षा समिति की महत्वपूर्ण बैठक शनिवार को कलेक्ट्रेट सभागार में आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता जिलाधिकारी मंगला प्रसाद सिंह ने की। इस दौरान सड़क सुरक्षा को लेकर प्रशासन की सख्ती साफ नजर आई और कई ठोस निर्णय लिए गए। जिलाधिकारी ने आरटीओ को निर्देशित किया कि सरकारी ड्राइवरों के साथ-साथ टेंपो, टैक्सी और बस चालकों को तीन चरणों में विशेष प्रशिक्षण दिया जाए, ताकि वे ट्रैफिक नियमों का पालन करते हुए सुरक्षित वाहन संचालन कर सकें। उन्होंने कहा कि सड़क सुरक्षा के लिए जागरूकता सबसे अहम है, इसलिए शहर से लेकर गांव तक प्रमुख स्थानों पर बड़ी-बड़ी होर्डिंग लगाई जाएं। इसके तहत कलेक्ट्रेट, विकास भवन, सभी तहसील व ब्लॉक कार्यालय, थाने, कोतवाली, जिला अस्पताल, नगर पालिकाएं और प्रमुख चौराहे चिन्हित किए गए हैं। बैठक में सड़कों पर रुकावट, गड्ढों और ठोकर जैसी समस्याओं को दूर करने, अनियंत्रित खड़े भारी वाहनों पर रोक लगाने तथा निर्धारित पार्किंग स्थलों का कड़ाई से पालन कराने के निर्देश भी दिए गए। साथ ही रोड इंजीनियरिंग के तहत सड़कों की तकनीकी जांच कराकर आवश्यक सुधार कराने पर जोर दिया गया। जिलाधिकारी ने बताया कि 1 से 10 जनवरी के बीच गंगा बहुउद्देशीय सभागार में सड़क सुरक्षा को लेकर भव्य जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इसके लिए 15 मिनट की एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म तैयार कराई जाएगी, जिसमें सड़क दुर्घटना से बचे लोगों के अनुभव, ड्राइविंग लाइसेंस प्रक्रिया, वाहन फिटनेस, हेलमेट व सीट बेल्ट का महत्व, दुर्घटनाओं के कारण और उनसे बचाव के उपायों को शामिल किया जाएगा। स्कूली बच्चों को भी इस अभियान से जोड़ने के निर्देश दिए गए। जिला विद्यालय निरीक्षक को कहा गया कि विद्यालयों में ट्रैफिक नियमों पर आधारित कार्यक्रम आयोजित कराए जाएं। ग्राम पंचायत स्तर पर निबंध, चित्रकला व अन्य प्रतियोगिताएं होंगी, जिनके विजेता बच्चों को जनपद स्तर पर सम्मानित किया जाएगा। इसके अलावा हजारों पंपलेट छपवाकर ग्राम प्रधानों के माध्यम से वितरित किए जाएंगे। जिले के 2246 सरकारी व गैर-सरकारी विद्यालयों में कक्षा 1 से 12 तक चार गुणा छह साइज की सड़क सुरक्षा होर्डिंग लगाने का आदेश भी दिया गया। बैठक में सीडीओ ओजस्वी, अपर पुलिस अधीक्षक कृपाशंकर, आरटीओ अरुण कुमार राय सहित अन्य अधिकारी उपस्थित रहे।
वीर बाल दिवस पर साहस और संस्कार का संदेश, बच्चों का हुआ सम्मान
संत कबीर नगर (राष्ट्र की परम्परा)। वीर बाल दिवस के उपलक्ष में कलेक्ट्रेट सभागार में आयोजित कार्यक्रम में विधायक धनघटा गणेश चंद्र चौहान, जिलाधिकारी आलोक कुमार एवं मुख्य विकास अधिकारी जयकेश त्रिपाठी ने प्रतिभाग किया।
कार्यक्रम के प्रारंभ में भारत मंडपम, नई दिल्ली से वीर बाल दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री के संबोधन का सजीव प्रसारण कलेक्ट्रेट सभागार में दिखाया गया, जिसे उपस्थित अधिकारियों, कर्मचारियों तथा छात्र-छात्राओं ने देखा और सुना। इस अवसर पर सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह के साहबजादों जोरावर सिंह एवं फतेह सिंह के अदम्य साहस, वीरता और बलिदान को स्मरण किया गया।
विधायक गणेश चौहान ने बच्चों को संस्कारवान, निडर एवं साहसी बनने के लिए प्रेरित किया तथा उत्कृष्ट कार्य करने वाले बच्चों के माता-पिता के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि वीर बाल दिवस हमें कम उम्र में भी राष्ट्र, धर्म और सत्य के लिए बलिदान देने की प्रेरणा देता है।
प्रधानमंत्री के संबोधन के उपरांत विधायक धनघटा, जिलाधिकारी एवं मुख्य विकास अधिकारी द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य करने वाले बच्चों को प्रमाण पत्र एवं उपहार प्रदान कर सम्मानित किया गया।
माध्यमिक शिक्षा विभाग से श्रेया सिंह, अनीशा, चंदन, अंशिका राय एवं प्रगति सिंह को खेल में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए सम्मानित किया गया। वहीं बेसिक शिक्षा विभाग से अनूप कुमार (साहस एवं खेल), अपेक्षा चौधरी (गणित ओलंपियाड प्रतियोगिता), रोशनी (लोकनृत्य), नीलू (गोला क्षेपण) एवं शिल्पा (आविष्कार) को सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त कार्यक्रम में उपस्थित अन्य 40 बच्चों को भी उपहार प्रदान किए गए।
जिलाधिकारी आलोक कुमार ने बच्चों को उनके उत्कृष्ट कार्यों के लिए हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की। उन्होंने बच्चों से महान व्यक्तित्वों के जीवन, उनके कार्यों एवं पुस्तकों को पढ़ने और आत्मसात करने का आह्वान किया तथा कहा कि महापुरुषों की जीवनी से चरित्र निर्माण और जीवन मूल्यों को समझने में सहायता मिलती है।
कार्यक्रम में जिला विद्यालय निरीक्षक हरिश्चंद्र नाथ, जिला पिछड़ा वर्ग कल्याण अधिकारी, जिला प्रोबेशन अधिकारी सतीश चंद्र, शिक्षकगण, सीडीपीओ मेहदावल, सुपरवाइजर, आंगनबाड़ी कार्यकत्रियां, बाल कल्याण समिति सदस्य अजय पांडेय, डिस्ट्रिक्ट मिशन कोऑर्डिनेटर मोनिका शुक्ला, वन स्टॉप सेंटर से ऋतुका दूबे, जिला बाल संरक्षण इकाई से संरक्षण अधिकारी महेश गुप्ता, सूचना अधिकारी सुरेश कुमार सरोज सहित अन्य संबंधित अधिकारी उपस्थित रहे।
सत्ता, संगठन और संदेश: महराजगंज में बदली राजनीति की दिशा
महाराजगंज(राष्ट्र की परम्परा)। जनपद की राजनीति को यदि केवल सीमावर्ती जिला कहकर समझा जाए, तो यह एक अधूरा आकलन होगा। वास्तव में यह जिला लंबे समय से राजनीतिक प्रयोगों, सामाजिक समीकरणों और प्रशासनिक चुनौतियों की प्रयोगशाला रहा है। वर्ष 2020 से 2025 के बीच भाजपा का कार्यकाल इसी दृष्टि से महत्त्वपूर्ण माना जा सकता है, क्योंकि इस दौर में न केवल सत्ता का संचालन हुआ, बल्कि राजनीति की भाषा, प्राथमिकताएं और संरचना भी बदली।
इन पांच वर्षों में सबसे स्पष्ट तथ्य यह रहा कि राजनीतिक स्थिरता भाजपा के पक्ष में गई। सत्ता और संगठन के बीच तालमेल ने यह सुनिश्चित किया कि सरकार केवल फाइलों में नहीं, बल्कि ज़मीन पर दिखाई दे। इसके उलटा विपक्ष लगातार नेतृत्व संकट, आपसी खींचतान और स्पष्ट वैचारिक दिशा के अभाव से जूझता रहा। परिणामस्वरूप जन असंतोष के स्वर तो उभरे, लेकिन वे किसी ठोस राजनीतिक विकल्प का रूप नहीं ले सके।
भाजपा ने महराजगंज में विकास को राजनीति की मुख्य भाषा बनाया। आवास, राशन, उज्ज्वला, किसान सम्मान निधि जैसी योजनाएं यहां महज कल्याणकारी घोषणाएं नहीं रहीं, बल्कि सरकार और नागरिकों के बीच संवाद का माध्यम बनीं। यह पहली बार देखने को मिला कि बड़ी संख्या में मतदाताओं ने शासन के समर्थन को किसी जातीय या भावनात्मक आधार पर नहीं, बल्कि सरकार दिख रही है जैसे अनुभवजन्य तर्कों पर रखा।
यह बदलाव इस ओर भी संकेत करता है कि जिले की राजनीति में जातीय समीकरणों का एकाधिकार धीरे-धीरे कमजोर हुआ है। भाजपा ने जातीय ढाँचे को पूरी तरह नकारा नहीं, लेकिन उसके समानांतर एक नया लाभार्थी वर्ग तैयार किया। योजनाओं का लाभ पाने वाला नागरिक स्वयं को केवल किसी सामाजिक समूह का हिस्सा नहीं, बल्कि सरकारी नीति का हितधारक मानने लगा। यही परिवर्तन भाजपा की राजनीतिक रणनीति की केन्द्रीय धुरी रहा।
संगठनात्मक दृष्टि से भी यह दौर उल्लेखनीय रहा। बूथ स्तर तक सक्रिय कार्यकर्ताओं की उपस्थिति, योजनाओं की निगरानी और निरंतर जनसंपर्क ने चुनावी राजनीति को स्थायी अभियान में बदल दिया। विपक्ष जहां चुनाव के समय सक्रिय हुआ, वहीं भाजपा हर समय जनता के बीच मौजूद दिखाई दी। यह अंतर ही चुनावी नतीजों में निर्णायक बनता गया।
सीमावर्ती जिला होने के कारण महराजगंज में सुरक्षा और राष्ट्रवाद का प्रश्न सदैव संवेदनशील रहा है। तस्करी पर नियंत्रण, प्रशासनिक सख्ती और सीमा सुरक्षा को लेकर सरकार की सक्रियता ने यह संदेश दिया कि राज्य केवल कल्याणकारी नहीं, बल्कि संरक्षक की भूमिका में भी है। इससे ग्रामीण और शहरी—दोनों क्षेत्रों में शासन के प्रति भरोसा मजबूत हुआ। हालांकि, यह भी उतना ही सच है कि इस कार्यकाल में महंगाई, बेरोजगारी और स्थानीय समस्याओं को लेकर असंतोष पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। लेकिन यह असंतोष राजनीतिक विकल्प में बदल सके, इतनी संगठित शक्ति विपक्ष के पास नहीं दिखी। यह स्थिति भाजपा के लिए राहतकारी तो रही, पर भविष्य के लिए चेतावनी भी है।
राजनीति में उपलब्धियों की उम्र सीमित होती है। विकास और सुरक्षा की राजनीति निरंतरता, संवाद और संवेदनशीलता की मांग करती है। यदि योजनाओं के क्रियान्वयन में ढिलाई या जनता से संवाद में दूरी बढ़ी, तो वही लाभार्थी वर्ग सवाल पूछने से भी पीछे नहीं रहेगा। कुल मिलाकर, 2020 से 2025 का दौर महराजगंज में भाजपा के लिए केवल सत्ता का अध्याय नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति की सफलता का उदाहरण है। यह संकेत भी है कि अब जिला स्तर की राजनीति बड़े नारों से नहीं, बल्कि ठोस अनुभव, भरोसे और जमीनी उपस्थिति से तय होगी। यही इस कार्यकाल की सबसे बड़ी राजनीतिक सीख है।
पूर्व एयरफोर्सकर्मी की गोली मारकर हत्या, एंबुलेंस नहीं मिली तो छोटे हाथी में ले जाया गया शव
गाजियाबाद (राष्ट्र की परम्परा)। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले में अपराधियों के हौसले बुलंद नजर आए, जब थाना लोनी क्षेत्र में अज्ञात बदमाशों ने एक पूर्व एयर फोर्सकर्मी की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी। वारदात के बाद आरोपी मौके से फरार हो गए। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है और अज्ञात हत्यारों की तलाश शुरू कर दी गई है।
घर और पुलिस चौकी से चंद दूरी पर हुई वारदात
मृतक की पहचान योगेश कुमार के रूप में हुई है, जो गाजियाबाद के लोनी थाना क्षेत्र स्थित अशोक विहार कॉलोनी में रहते थे। योगेश कुमार करीब छह महीने पहले ही भारतीय वायुसेना (Air Force) से सेवानिवृत्त हुए थे।
घटना गुरुवार (26 दिसंबर) दोपहर करीब 1 बजे की है, जब योगेश कुमार घर से कुछ दूरी पर पैदल जा रहे थे। इसी दौरान अज्ञात हमलावरों ने उनके सिर में गोली मार दी, जिससे मौके पर ही उनकी मौत हो गई।
हैरानी की बात यह है कि जहां यह हत्या हुई, वहां से मृतक का घर महज 100 मीटर और स्थानीय पुलिस चौकी करीब 150 मीटर की दूरी पर स्थित है।
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पोस्टमार्टम रिपोर्ट से खुलेगा गोलीकांड का राज
लोनी एसीपी सिद्धार्थ गौतम ने बताया कि योगेश कुमार को कितनी गोलियां मारी गईं, इसका खुलासा पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद होगा। फिलहाल यह भी स्पष्ट नहीं हो पाया है कि हमलावर कितने थे और किस वाहन से आए थे।
पुलिस ने इस सनसनीखेज हत्याकांड के खुलासे के लिए कई टीमें गठित कर दी हैं और आसपास के सीसीटीवी कैमरों की जांच की जा रही है।
एंबुलेंस न मिलने से उठे सवाल
इस मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि हत्या के बाद पूर्व सैनिक को एंबुलेंस तक नसीब नहीं हुई। देश की सीमाओं पर सेवा देने वाले योगेश कुमार के शव को मजबूरी में छोटे हाथी (लोडिंग वाहन) में रखकर ले जाया गया।
इस घटना ने न सिर्फ कानून-व्यवस्था, बल्कि आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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केवल एक प्रदेश नहीं, भारतीय राजनीति का विश्वविद्यालय
कैलाश सिंह
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। यदि भारत की राजनीति को गहराई से समझना हो, तो उत्तर प्रदेश को पढ़ना अनिवार्य है। यह प्रदेश केवल भौगोलिक दृष्टि से ही देश का सबसे बड़ा राज्य नहीं, बल्कि राजनीतिक चेतना, प्रयोगों और संघर्षों की सबसे बड़ी प्रयोगशाला भी है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था तक, उत्तर प्रदेश ने राजनीति को दिशा दी है, नेतृत्व गढ़ा है और सत्ता की धुरी को लगातार प्रभावित किया है। इसी कारण इसे भारतीय राजनीति का विश्वविद्यालय कहा जाता है।
प्रधानमंत्री देने वाला सबसे बड़ा प्रदेश
उत्तर प्रदेश ने देश को सर्वाधिक प्रधानमंत्री दिए हैं— पंडित जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, वी.पी. सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी। यह महज संयोग नहीं, बल्कि प्रदेश की राजनीतिक परिपक्वता और निर्णायक जनमत का प्रमाण है।
यहां का जनादेश केवल सरकारें नहीं बनाता, बल्कि विचारधाराओं को वैधता और नेताओं को राष्ट्रीय पहचान देता है।
आंदोलन, विचारधाराएं और सामाजिक न्याय
किसान आंदोलन, समाजवादी चिंतन, दलित राजनीति और सामाजिक न्याय—इन सभी धाराओं का प्रभाव उत्तर प्रदेश की राजनीति में स्पष्ट दिखाई देता है।
डॉ. राममनोहर लोहिया की समाजवादी सोच, कांशीराम और मायावती के नेतृत्व में दलित राजनीति का उभार और किसानों के आंदोलनों ने देशव्यापी राजनीति को दिशा दी। यहां सामाजिक न्याय केवल नारा नहीं, बल्कि सत्ता-साझेदारी का व्यावहारिक मॉडल बना।
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जाति, वर्ग और क्षेत्र: जटिल लेकिन निर्णायक
उत्तर प्रदेश की राजनीति की जटिलता ही उसकी पहचान है। जाति, वर्ग, क्षेत्र और धर्म—इन चारों का संतुलन साधना यहां सफल राजनीति की कसौटी है।
पूर्वांचल, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, अवध और बुंदेलखंड—हर क्षेत्र की अपनी राजनीतिक भाषा और अपेक्षाएं हैं। जो दल या नेता इस विविधता को समझ लेता है, वही सत्ता के शिखर तक पहुंचता है।
चुनाव: उत्सव भी, परीक्षा भी
उत्तर प्रदेश में चुनाव केवल मतदान की प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतंत्र का उत्सव और परीक्षा दोनों होते हैं। बूथ स्तर की रणनीति, गठबंधन की गणित और जनभावनाओं की नब्ज—यहीं से राष्ट्रीय राजनीति के सूत्र निकलते हैं।
2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों ने साबित कर दिया कि दिल्ली की सत्ता की चाबी लखनऊ की गलियों से होकर गुजरती है।
बदलती राजनीति, नया पाठ्यक्रम
आज विकास, कानून-व्यवस्था, रोजगार और पहचान की राजनीति साथ-साथ चल रही है। डिजिटल राजनीति, सोशल मीडिया और युवा मतदाता की बढ़ती भूमिका इस बात का संकेत है कि राजनीति का यह विश्वविद्यालय समय के साथ अपने पाठ्यक्रम को अपडेट कर रहा है।
उत्तर प्रदेश को केवल एक राज्य मानना उसकी ऐतिहासिक और राजनीतिक भूमिका को कम आंकना होगा। यह प्रदेश नेताओं की नर्सरी, आंदोलनों की प्रयोगशाला और सत्ता की पाठशाला है।
जो उत्तर प्रदेश की राजनीति को समझ गया, उसने भारत की राजनीति की डिग्री हासिल कर ली।
इसीलिए— उत्तर प्रदेश केवल एक प्रदेश नहीं, भारतीय राजनीति का विश्वविद्यालय है।
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पूर्वांचल में बदला मौसम का मिजाज, सर्द हवाओं और बादलों से बढ़ी ठिठुरन, जनजीवन प्रभावित
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। पूर्वांचल में बीते 24 घंटे के दौरान मौसम ने अचानक करवट ले ली है। सुबह से ही आसमान में घने बादल छाए रहे, जबकि ठंडी हवाओं के चलने से तापमान में तेज गिरावट दर्ज की गई। मौसम के इस बदलाव से जनजीवन प्रभावित हुआ है और दिन के समय भी ठंड का अहसास बना रहा।
तापमान में 3 से 4 डिग्री की गिरावट
मौसम विभाग के अनुसार, पश्चिमी विक्षोभ के प्रभाव से क्षेत्र में बादल छाए रहने और ठंडी हवाएं चलने की स्थिति बनी हुई है। न्यूनतम तापमान में 3 से 4 डिग्री सेल्सियस की गिरावट दर्ज की गई है, वहीं अधिकतम तापमान भी सामान्य से नीचे चला गया है।
मौसम विभाग ने सुबह और देर शाम कोहरे की संभावना भी जताई है।
बाजारों में रौनक घटी, अलाव का सहारा
अचानक बढ़ी ठंड का सबसे अधिक असर बुजुर्गों, बच्चों और दिहाड़ी मजदूरों पर देखा जा रहा है। बाजारों में दिनभर रौनक कम रही, जबकि ग्रामीण इलाकों में लोग अलाव जलाकर ठंड से बचाव करते नजर आए। ठंड के कारण सुबह के समय स्कूल जाने वाले बच्चों को भी काफी परेशानी का सामना करना पड़ा।
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किसानों के लिए मिला-जुला असर
मौसम में आए बदलाव का असर खेती पर भी दिख रहा है। ठंड बढ़ने से गेहूं और सरसों की फसलों को लाभ मिलने की उम्मीद है, लेकिन अधिक नमी और संभावित कोहरे के कारण सब्जी की फसलों को नुकसान की आशंका जताई जा रही है।
स्वास्थ्य विभाग की सलाह
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने मौसम परिवर्तन को देखते हुए लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी है। सर्दी-जुकाम, खांसी और वायरल संक्रमण के मामलों में बढ़ोतरी की संभावना जताई गई है।
डॉक्टरों का कहना है कि लोग गर्म कपड़े पहनें, गर्म पेय पदार्थों का सेवन करें और सुबह-शाम बाहर निकलते समय विशेष सावधानी बरतें।
अगले कुछ दिनों तक राहत नहीं
मौसम विभाग ने अनुमान जताया है कि अगले दो से तीन दिनों तक ठंडी हवाएं और बादल बने रहेंगे। ऐसे में लोगों को ठंड के लिए पूरी तरह तैयार रहने की जरूरत है, क्योंकि मौसम का यह बदला मिजाज फिलहाल राहत देने के संकेत नहीं दे रहा है।
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सनातन संस्कृति पिंड–प्रकृति का आधार, 21वीं सदी में भारत बनेगा विश्वगुरु
महाराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। सदर खंड के रमपुरवा स्थित शिवशंकर सिंह उच्चतर माध्यमिक विद्यालय परिसर में आयोजित विराट हिन्दू सम्मेलन में सनातन संस्कृति, राष्ट्र चेतना और सामाजिक एकता का सशक्त संदेश दिया गया। सम्मेलन को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि सिद्धपीठ हनुमानगढ़ी, अयोध्या के महंत महामंडलेश्वर डॉ. महेश योगी ने कहा कि सनातन संस्कृति पिंड और प्रकृति का आधार है। यह सम्पूर्ण जीवन का संबल, सभी धर्मों का केंद्र तथा गरिमामय और अनुशासित जीवन की रक्षक है।
डॉ. योगी ने कहा कि सनातन संस्कृति केवल आस्था नहीं, बल्कि जीवन-पद्धति है, जिसे जन-जन तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है। उन्होंने राष्ट्र के विखंडन की साजिशों से सावधान रहने का आह्वान करते हुए कहा कि राष्ट्रविरोधी गतिविधियों और घुसपैठ के विरुद्ध समाज को एकजुट होकर करारा जवाब देना होगा। 1200 वर्षों की गुलामी के बाद मिली स्वतंत्रता को संजोए रखने और कुटुंब से समाज तक राष्ट्र चेतना अपनाने पर उन्होंने विशेष बल दिया।
मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, गोरक्ष प्रांत के बौद्धिक शिक्षण प्रमुख एवं शिवपति पीजी कॉलेज शोहरतगढ़ के प्राचार्य प्रो. अरविंद सिंह ने कहा कि 21वीं सदी का भारत विश्वगुरु बनेगा। उन्होंने राष्ट्र निर्माण में मातृशक्ति की निर्णायक भूमिका रेखांकित करते हुए समाज के संगठित प्रयासों की आवश्यकता बताई। उनके अनुसार सनातन संस्कृति के मूल्यों पर आधारित हिंदू और हिंदुत्व देश व राष्ट्र की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं और संघ इस दायित्व को निरंतर निभाता रहेगा।
वक्ताओं ने संतवाणी और धर्म-संस्कृति की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत संतों और धर्म की भूमि है। जब-जब अधर्म बढ़ा है, तब-तब धर्म का उत्थान हुआ है। सनातन संस्कृति को भारत की आत्मा बताते हुए इसके संरक्षण और प्रचार-प्रसार पर बल दिया गया।
कार्यक्रम का शुभारम्भ गणेश वंदना तथा महाभारत के दृश्य गीत से मनोज गुप्ता और सत्यप्रकाश द्वारा किया गया। मुख्य वक्ता एवं अतिथियों का स्वागत पुष्प वर्षा, शंखनाद और तिलक के साथ हुआ। सम्मेलन की अध्यक्षता पीजी कॉलेज के प्रबंधक डॉ. बलराम भट्ट ने की। उन्होंने सकल हिन्दू समाज की एकता पर जोर देते हुए हर परिस्थिति में एकजुट रहने का आह्वान किया। कार्यक्रम का संचालन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खंड कार्यवाह सुनील मिश्र ने किया।
इस अवसर पर विमल पांडेय, कृष्ण गोपाल जायसवाल, डॉ. शान्ति शरण मिश्र, दलजीत सिंह, बलदाऊ सिंह, रामप्रीत गुप्ता, नरेंद्र कुमार खरवार, विजय सिंह चौधरी, जयराम तिवारी, ओमप्रकाश पांडेय, शैलेश मिश्रा, पशुपतिनाथ तिवारी, मयंक मणि त्रिपाठी, अनिल राय, साधु शरण शर्मा, अटल खरबार सहित बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक और श्रद्धालु उपस्थित रहे।
विराट हिन्दू सम्मेलन ने सनातन संस्कृति, राष्ट्रभक्ति और सामाजिक एकजुटता का संदेश देते हुए क्षेत्र में नई चेतना का संचार किया।
भारतीय संस्कृति और जनभाषा की आत्मा: पाणिनी के सूत्रों में छिपा भारत
कैलाश सिंह
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। यदि भारतीय संस्कृति की आत्मा को समझना हो, उसकी वैचारिक जड़ों तक पहुँचना हो और आमजन की बोलचाल की भाषा में छिपे संस्कारों को पहचानना हो, तो आधुनिक भाषाविज्ञान से अधिक आचार्य पाणिनी के सूत्रों की शरण लेनी होगी। पाणिनी केवल संस्कृत के महान व्याकरणाचार्य नहीं थे, बल्कि वे भारतीय सभ्यता के मौन इतिहासकार थे, जिन्होंने भाषा के माध्यम से समाज, संस्कृति और चेतना को सूत्रबद्ध किया।
आज की हिंदी, अवधी, भोजपुरी, ब्रज, मगही, मराठी, गुजराती और यहां तक कि आधुनिक बोलचाल के शब्द भी कहीं न कहीं पाणिनीय परंपरा की छाया में विकसित हुए हैं। पाणिनी की अष्टाध्यायी केवल व्याकरण के नियमों का ग्रंथ नहीं, बल्कि भारत की सोचने, बोलने और समझने की पद्धति का दर्पण है। पाणिनी की भाषा केवल भाषा नहीं, बल्कि जीवन पद्धति है।
भाषा को समाज से जोड़ने वाले आचार्य पाणिनी
पाणिनी ने भाषा को किसी मंदिर की स्थिर मूर्ति नहीं बनाया, बल्कि उसे जीवंत समाज से जोड़ा। उनके सूत्र बताते हैं कि भाषा कैसे बदलती है, कैसे सरल होती है और कैसे जनसामान्य के अनुकूल ढलती है। यही कारण है कि भारतीय भाषाओं में शुद्धता के साथ-साथ स्वाभाविकता भी दिखाई देती है।
जब गांव का किसान सहजता से कहता है— “काम हो गया”— या मां बच्चे को पुकारती है— “इधर आ जा”— तो वहां व्याकरण का बोझ नहीं, बल्कि संस्कृति की सहज आत्मा बोलती है। यह सहजता पाणिनीय दृष्टि की ही देन है।
सूत्रों में बंधा लोकतंत्र
पाणिनी के सूत्र आकार में छोटे, लेकिन अर्थ में विराट हैं। वे यह सिखाते हैं कि भाषा किसी एक वर्ग की बपौती नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा धरोहर है। यही कारण है कि भारतीय भाषाएं अभिजात्य और जनसामान्य के बीच पुल बनती हैं, दीवार नहीं।
आज जब भाषा को लेकर विवाद और संकीर्णता बढ़ रही है, तब पाणिनी यह याद दिलाते हैं कि भाषा जोड़ने का माध्यम है, तोड़ने का नहीं।
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आधुनिक भारत और पाणिनी
कंप्यूटर साइंस से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तक, आज पूरी दुनिया पाणिनी के सूत्रों की तार्किक और संरचनात्मक शक्ति को स्वीकार कर रही है। यह केवल वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय बौद्धिक परंपरा की वैश्विक स्वीकृति है। विडंबना यह है कि जिस पाणिनी को पश्चिम गंभीरता से पढ़ रहा है, हम उन्हें केवल पाठ्यक्रम तक सीमित कर चुके हैं।
भारतीय संस्कृति को समझने के लिए केवल इतिहास पढ़ना पर्याप्त नहीं, भाषा को जीना पड़ता है। और भाषा को समझने की सबसे सशक्त चाबी पाणिनी के सूत्रों में छिपी है। आज के शोर, जल्दबाजी और सतही संवाद के दौर में पाणिनी हमें सिखाते हैं—
कम शब्दों में अधिक अर्थ, और भाषा में संस्कृति।
यदि भारत को समझना है, तो पाणिनी को केवल पढ़ना नहीं, समझना होगा— क्योंकि पाणिनी के सूत्रों में ही भारत बोलता है।
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27% ओबीसी आरक्षण लागू न होने से निकाय चुनाव और नौकरियों में नुकसान
रांची (राष्ट्र की परम्परा)। प्रदेश राजद प्रवक्ता एवं झारखंड ओबीसी आरक्षण मंच के केंद्रीय अध्यक्ष कैलाश यादव ने कहा कि राज्य में ओबीसी आरक्षण 27 प्रतिशत लागू न होने के कारण नगर निकाय, नगर परिषद, पंचायत चुनावों और सरकारी नौकरियों में पिछड़ा, अति पिछड़ा तथा अनुसूचित जाति वर्ग को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
उन्होंने बताया कि 15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य निर्माण के समय एकीकृत बिहार से मिले प्रावधानों के तहत राज्य में कुल 50 प्रतिशत आरक्षण व्यवस्था लागू थी, जिसमें ओबीसी को 27 प्रतिशत, अनुसूचित जाति को 15 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति को 7.5 प्रतिशत आरक्षण मिलता था। इससे इन वर्गों को आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से सीधा लाभ प्राप्त हो रहा था।
कैलाश यादव ने कहा कि वर्ष 2002 में तत्कालीन एनडीए सरकार के दौरान आरक्षण व्यवस्था में कटौती की गई। इस निर्णय के तहत ओबीसी आरक्षण 27 से घटाकर 14 प्रतिशत, अनुसूचित जाति का 15 से घटाकर 10 प्रतिशत कर दिया गया, जबकि अनुसूचित जनजाति का आरक्षण बढ़ाकर लगभग 26 प्रतिशत कर दिया गया। इस बदलाव से ओबीसी आरक्षण और अनुसूचित जाति समुदायों को संवैधानिक अधिकारों से वंचित होना पड़ा।
उन्होंने कहा कि झारखंड राज्य बने 26 वर्ष बीत जाने के बाद भी ओबीसी और अनुसूचित जाति वर्ग के साथ भेदभाव जारी है। आरक्षण में कटौती का सीधा असर स्थानीय निकाय चुनावों और रोजगार के अवसरों पर पड़ा है, जिससे सामाजिक न्याय की भावना कमजोर हुई है।
राजद नेता ने राज्य की महागठबंधन सरकार और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से आग्रह किया कि जैसे पेसा नियमावली को स्वीकृति देकर जनजातीय समुदायों को स्वशासन का अधिकार दिया गया, उसी तरह ओबीसी आरक्षण को 27 प्रतिशत और अनुसूचित जाति आरक्षण को 15 प्रतिशत तक बढ़ाकर कानूनी रूप दिया जाए।
उन्होंने यह भी कहा कि देश में लंबे समय तक एससी, एसटी और ओबीसी के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा लागू रही है। वर्ष 2014 के बाद केंद्र सरकार द्वारा सामान्य वर्ग को अतिरिक्त 10 प्रतिशत आरक्षण दिया गया। वहीं तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में 50 प्रतिशत की सीमा से आगे बढ़कर आरक्षण लागू किया जा रहा है, ऐसे में झारखंड में भी सामाजिक संतुलन के लिए आवश्यक निर्णय लिया जाना चाहिए।
इतिहास के पन्नों में अमर व्यक्तित्वों की गाथा
इतिहास के पन्नों में 27 दिसंबर: वे अमर नाम, जिनका निधन बन गया युग का मौन अध्याय
इतिहास केवल तिथियों का संग्रह नहीं होता, बल्कि उन व्यक्तित्वों की स्मृति भी होता है जिन्होंने अपने कर्म, विचार और प्रतिभा से समाज को दिशा दी। 27 दिसंबर ऐसी ही एक तारीख है, जब भारत ने कला, संस्कृति, सिनेमा और राजनीति के तीन महान स्तंभों को खोया। आइए, इन विभूतियों के जीवन, जन्मस्थल और राष्ट्रहित में उनके योगदान को स्मरण करें।
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सुनील कोठारी (निधन: 27 दिसंबर 2020)
सुनील कोठारी भारत के सबसे प्रतिष्ठित नृत्य इतिहासकार, आलोचक और विद्वान थे। उनका जन्म महाराष्ट्र राज्य, भारत में हुआ। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन भारतीय शास्त्रीय नृत्य—विशेषकर कथक, भरतनाट्यम, ओडिसी और मणिपुरी—के संरक्षण और प्रचार को समर्पित कर दिया।सुनील कोठारी केवल आलोचक नहीं थे, बल्कि वे नृत्य को समाज से जोड़ने वाले सेतु थे। उन्होंने अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लेखन किया और कई महत्वपूर्ण पुस्तकों के माध्यम से भारतीय नृत्य परंपरा को वैश्विक पहचान दिलाई। पद्म श्री और पद्म भूषण जैसे सम्मानों से अलंकृत कोठारी जी ने युवा कलाकारों को मार्गदर्शन देकर सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाया। उनका निधन भारतीय कला जगत के लिए अपूरणीय क्षति रहा।
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फ़ारुख़ शेख़ (निधन: 27 दिसंबर 2013)
फ़ारुख़ शेख़ हिंदी सिनेमा के उन अभिनेताओं में से थे, जिन्होंने संवेदनशील और यथार्थवादी अभिनय से दर्शकों के दिलों में स्थायी स्थान बनाया। उनका जन्म वडोदरा, गुजरात, भारत में हुआ।
उन्होंने ‘चश्मे बद्दूर’, ‘साथ-साथ’, ‘उमराव जान’ और ‘ये जवानी है दीवानी’ जैसी फिल्मों में अपने सहज अभिनय से अलग पहचान बनाई। फ़ारुख़ शेख़ ने मुख्यधारा सिनेमा के साथ-साथ समानांतर सिनेमा को भी मजबूती दी। अभिनय के अतिरिक्त उन्होंने दूरदर्शन पर चर्चित कार्यक्रम ‘जीना इसी का नाम है’ का संचालन कर सामाजिक संवाद को नई दिशा दी। उनका योगदान भारतीय सिनेमा को संवेदनशीलता और गरिमा प्रदान करने में अमूल्य रहा।
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मैरेम्बम कोइरंग सिंह (निधन: 27 दिसंबर 1994)
मैरेम्बम कोइरंग सिंह का नाम मणिपुर के राजनीतिक इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। उनका जन्म मणिपुर राज्य, भारत में हुआ और वे राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री बने।
कोइरंग सिंह ने स्वतंत्रता के बाद मणिपुर को प्रशासनिक स्थिरता देने में निर्णायक भूमिका निभाई। उन्होंने लोकतांत्रिक संस्थाओं की नींव मजबूत की और सामाजिक समरसता को बढ़ावा दिया। सीमांत राज्य होने के कारण मणिपुर के समक्ष अनेक चुनौतियाँ थीं, जिनका उन्होंने दूरदर्शिता से सामना किया। उनका नेतृत्व मणिपुर के भारत में पूर्ण एकीकरण की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ। उनका निधन पूर्वोत्तर भारत की राजनीति के लिए एक युगांतकारी क्षण था।
स्नान पर्वों पर नहीं होगा कोई VIP प्रोटोकॉल, CM योगी ने की हाई लेवल मीटिंग
लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा)। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने माघ मेला-2026 को लेकर स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि प्रमुख स्नान पर्वों पर किसी भी प्रकार का VIP प्रोटोकॉल लागू नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि माघ मेला केवल आस्था का आयोजन नहीं, बल्कि भारत की सनातन परंपरा, सामाजिक अनुशासन और प्रशासनिक दक्षता का जीवंत उदाहरण है।
शुक्रवार को लखनऊ स्थित अपने सरकारी आवास पर आयोजित उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री ने प्रयागराज में होने वाले माघ मेला-2026 की तैयारियों की विस्तार से समीक्षा की।
श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सुविधा सर्वोच्च प्राथमिकता
सीएम योगी ने कहा कि देश-विदेश से आने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं को सुरक्षित, स्वच्छ और सुव्यवस्थित वातावरण उपलब्ध कराना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि संगम पर कल्पवास, स्नान और साधना की परंपरा भारतीय सांस्कृतिक चेतना की आत्मा है। इस वर्ष 15 से 25 लाख श्रद्धालु केवल कल्पवासी होंगे।
महाकुंभ के बाद माघ मेले को लेकर देश-दुनिया में उत्साह
राज्य सरकार की ओर से जारी बयान में कहा गया कि महाकुंभ के सफल और सुव्यवस्थित आयोजन के बाद माघ मेला-2026 को लेकर देश और दुनिया में विशेष उत्साह है। मुख्यमंत्री ने सभी विभागों को आपसी समन्वय के साथ समयबद्ध तरीके से कार्य पूर्ण करने के निर्देश दिए, ताकि यह आयोजन आस्था, सुरक्षा, स्वच्छता, नवाचार और संवेदनशील प्रशासन का संतुलित उदाहरण बन सके।
स्नान पर्वों पर VIP व्यवस्था नहीं
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि माघ मेले की व्यवस्थाओं में आध्यात्मिक गरिमा बनी रहे, लेकिन किसी भी स्तर पर अव्यवस्था या असुविधा न हो।
उन्होंने गृह विभाग को स्पष्ट निर्देश दिए कि प्रमुख स्नान पर्वों पर किसी भी प्रकार का VIP प्रोटोकॉल न लागू किया जाए, और इस संबंध में आवश्यक दिशा-निर्देश सार्वजनिक किए जाएं।
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12 से 15 करोड़ श्रद्धालुओं के आने का अनुमान
बैठक में प्रयागराज की मंडलायुक्त ने जानकारी दी कि माघ मेला-2026 का आयोजन 3 जनवरी से 15 फरवरी 2026 तक कुल 44 दिनों का होगा। इस दौरान पौष पूर्णिमा, मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या, बसंत पंचमी, माघी पूर्णिमा और महाशिवरात्रि जैसे प्रमुख स्नान पर्व पड़ेंगे।
पूरे मेला काल में 12 से 15 करोड़ श्रद्धालुओं के आने का अनुमान है, जबकि मौनी अमावस्या जैसे प्रमुख पर्व पर एक ही दिन में 3.5 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं के संगम स्नान की संभावना को देखते हुए व्यवस्थाएं की जा रही हैं।
मेला क्षेत्र का विस्तार, सेक्टरों की संख्या बढ़ी
अधिकारियों ने बताया कि इस बार मेला क्षेत्र का विस्तार बढ़ाकर लगभग 800 हेक्टेयर कर दिया गया है। साथ ही सेक्टरों की संख्या 5 से बढ़ाकर 7 कर दी गई है। स्नान घाटों की कुल लंबाई में पिछले माघ मेले की तुलना में करीब 50 प्रतिशत की वृद्धि की गई है।
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बिहार के रोहतास में बड़ा हादसा टला, ट्रायल के दौरान ध्वस्त हुआ नवनिर्मित रोपवे
बिहार (राष्ट्र की परम्परा)। बिहार के रोहतास जिले में शुक्रवार को एक बड़ा हादसा टल गया। सासाराम के पास रोहतासगढ़ किला और रोहितेश्वर धाम को जोड़ने के लिए बनाए जा रहे नवनिर्मित रोपवे का ट्रायल चल रहा था, तभी यह अचानक ध्वस्त हो गया। गनीमत रही कि इस घटना में कोई जनहानि नहीं हुई।
ट्रायल के दौरान क्षतिग्रस्त हुआ टावर, चार ट्रॉलियां टूटीं
अधिकारियों के अनुसार, रोपवे के ट्रायल के दौरान इससे जुड़ा एक टावर क्षतिग्रस्त हो गया, जबकि ट्रायल में इस्तेमाल की जा रही चार ट्रॉलियां भी टूट गईं। मौके पर मौजूद मजदूरों ने समय रहते सतर्कता दिखाई और खुद को सुरक्षित बचा लिया, जिससे एक बड़ी दुर्घटना टल गई।
निर्माण गुणवत्ता पर उठे सवाल
हादसे के बाद रोपवे परियोजना की निर्माण गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
बिहार राज्य पुल निर्माण निगम लिमिटेड के वरिष्ठ अभियंता खुर्शीद करीम ने बताया कि रोपवे का ट्रायल जारी था और लोड बढ़ाने के दौरान एक तार फंस गया, जिसके कारण यह दुर्घटना हुई। उन्होंने कहा कि परियोजना का अभी काफी काम बाकी है और इसे चरणबद्ध तरीके से पूरा किया जा रहा है।
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कोलकाता से विशेषज्ञ टीम करेगी जांच
करीम ने जानकारी दी कि घटना की तकनीकी जांच के लिए कोलकाता से विशेषज्ञों की टीम बुलाई जा रही है। सभी ट्रायल सफल होने और अधिकारियों की पूरी संतुष्टि के बाद ही रोपवे को आम लोगों के लिए शुरू किया जाएगा।
कांग्रेस ने सरकार पर लगाए गंभीर आरोप
इस घटना को लेकर राजनीति भी गरमा गई है। कांग्रेस की बिहार इकाई के अध्यक्ष राजेश राम ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि रोहतासगढ़ रोपवे परियोजना कमीशनखोरी की भेंट चढ़ गई है।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब टावर चार ट्रॉलियों का भार नहीं झेल सका, तो भविष्य में यात्रियों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी। कांग्रेस ने मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने और निर्माण कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने की मांग की है।
बांग्लादेश में मशहूर सिंगर जेम्स के कॉन्सर्ट पर हमला, पत्थरबाजी के बाद शो रद्द
Bangladesh Singer James Concert Attack: बांग्लादेश में कलाकारों और सांस्कृतिक संस्थानों पर बढ़ते हमलों के बीच मशहूर रॉक सिंगर जेम्स का कॉन्सर्ट रद्द करना पड़ा। यह घटना ढाका से करीब 120 किलोमीटर दूर फरीदपुर की है, जहां शुक्रवार रात एक स्कूल की वर्षगांठ के अवसर पर जेम्स का लाइव शो आयोजित किया जाना था।
स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कार्यक्रम स्थल पर कुछ उपद्रवियों ने जबरन घुसने की कोशिश की और भीड़ पर ईंट-पत्थर फेंकने शुरू कर दिए। हालात बिगड़ते देख मौके पर मौजूद छात्रों और आयोजकों ने विरोध किया, लेकिन स्थानीय प्रशासन के निर्देश पर सुरक्षा कारणों से कॉन्सर्ट को कैंसिल कर दिया गया।
तस्लीमा नसरीन ने की कड़ी निंदा
घटना को लेकर मशहूर लेखिका तस्लीमा नसरीन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लिखा कि बांग्लादेश में सांस्कृतिक संस्थानों और कलाकारों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है।
तस्लीमा नसरीन ने आरोप लगाया कि पहले छायानाट सांस्कृतिक केंद्र को जलाया गया और अब जिहादी तत्वों ने प्रसिद्ध गायक जेम्स को मंच पर परफॉर्म करने से रोक दिया।
सिराज अली खान और अरमान खान ने भी ठुकराया न्योता
तस्लीमा नसरीन ने बताया कि कुछ दिन पहले सिराज अली खान, जो विश्व प्रसिद्ध उस्ताद अलाउद्दीन खान के परिवार से आते हैं और मैहर घराने के प्रतिष्ठित कलाकार हैं, ढाका आए जरूर लेकिन सुरक्षा चिंताओं के चलते बिना कार्यक्रम किए भारत लौट गए।
इसी तरह, उस्ताद राशिद खान के बेटे अरमान खान ने भी ढाका में प्रस्तुति देने से इनकार कर दिया और साफ कहा कि वे ऐसे माहौल में कदम नहीं रखना चाहते, जहां संगीत और कलाकार असुरक्षित हों।
बांग्लादेश में बेहद लोकप्रिय हैं जेम्स
गौरतलब है कि जेम्स बांग्लादेश के सबसे लोकप्रिय सिंगर-गीतकार और गिटारवादक हैं। वे मशहूर रॉक बैंड ‘नगर बाउल’ के मुख्य गायक हैं। भारत में भी उन्होंने कई सुपरहिट गाने दिए हैं, जिनमें फिल्म ‘गैंगस्टर’ का ‘भीगी भीगी’ और ‘लाइफ इन ए मेट्रो’ का ‘अलविदा’ शामिल है।
जेम्स के कॉन्सर्ट पर हुए हमले ने एक बार फिर बांग्लादेश में सांस्कृतिक स्वतंत्रता और कलाकारों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
छत्तीसगढ़ के प्रवासी मजदूर की केरल में संघी गिरोह द्वारा भीड़-हत्या-संजय पराते
केरल के पलक्कड़ जिले में वलयार नामक जगह पर छत्तीसगढ़ के प्रवासी मज़दूर राम नारायण बघेल की हत्या की देशव्यापी गूंज हुई है। केरल में माकपा के नेतृत्व में वामपंथी सरकार है, जबकि छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार है। चूंकि यह भीड़-हत्या केरल में हुई है, इसलिए गोदी मीडिया और भाजपा शुरू में केरल सरकार पर हमलावर थी। लेकिन जैसे ही मामले की जांच आगे बढ़ी, इस भीड़-हत्या में आरएसएस-भाजपा के लोगों का हाथ सामने आया, जिन्होंने रामनारायण पर अवैध ‘बांग्लादेशी’ होने का आरोप लगाकर हमला किया था। इस तथ्य का खुलासा होते ही गोदी मीडिया किसी बिल में दुबक गया है और संघी गिरोह चुप्पी साधे हुए हैं।
रामनारायण बघेल छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले का रहने वाला था। खेत मजदूर था और उसके पास जमीन का जो टुकड़ा है, उसके सहारे अपने परिवार का पेट पालने में असमर्थ था। सो, खेती के मौसम के बाद पलायन करना उसकी मजबूरी थी। केरल जैसे सबसे दूर के राज्य को उसने इसलिए चुना कि वहां शेष भारत की तुलना में मजदूरी बहुत ज्यादा है और प्रवासी मजदूरों का सम्मान भी।
दूसरे गांव वालों की तरह ही उसने साल 2018 में कांग्रेस को वोट दिया था। भूपेश बघेल उसके लिए हीरो थे, तो इस बार उसने बघेल और कांग्रेस से असंतुष्ट होकर भाजपा को वोट दिया था। शायद गोदी मीडिया के इस प्रचार से वह प्रभावित था कि छत्तीसगढ़ की सरकार “डबल इंजन सरकार” होगी, तो उसकी जिंदगी में कुछ सुधार आएगा। अन्य ग्रामीणों की तरह उसे भी यह ज्ञान नहीं था कि मजदूरों और किसानों की जिंदगी में बदलाव तवे में रोटी की तरह पार्टी-पलट से नहीं आता, जन विरोधी नीतियों को बदलने से आता है। सो, कांग्रेस की जगह भाजपा के आने से रामनारायण की जिंदगी न बदलनी थी, न बदली। अच्छे रोजगार की खोज में उसने फिर पलायन किया और अपने सम्मान के लिए केरल को चुना।
लेकिन एक प्रवासी कृषि मजदूर के लिए सम्मान पाना इतना आसान नहीं है, क्योंकि जिन ताकतों के कारण वह छत्तीसगढ़ छोड़ने के लिए मजबूर हुआ, वे ताकतें तो केरल में भी है। छत्तीसगढ़ में सत्ता में है, तो केरल में नफ़रती राजनीति और गोदी मीडिया के दुष्प्रचार के जरिए सत्ता में आने की वर्षों से जी-तोड़ कोशिश कर रही हैं, लेकिन वहां की जनता संघी गिरोह को घास डालने के लिए तैयार नहीं है। हां, नफरत फैलाने के लिए इस गिरोह के पास बहानों की कमी नहीं है और वह जब-तब इन बहानों से अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश करती है।
बांग्लादेशी का मुद्दा भाजपा की नफ़रती राजनीति के लिए काफी मुफीद है। इस कार्ड को उसने झारखंड और बिहार के चुनावों में खेला है, पश्चिम बंगाल के चुनाव में भी खेल रही है। चुनावी नतीजे चाहे जो भी हो, समाज को हिंदू-मुस्लिम में बांटकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने के लिए यह बहुत मौजूं मुद्दा है। संघी गिरोह को आशा है कि आज नहीं, तो कल, इसके जहरीले फलों से उसको बढ़त मिलेगी। लेकिन केरल जैसे दूरस्थ राज्य में, जिसकी सीमाएं बांग्लादेश को छूती भी नहीं है, इस मुद्दे को आजमाया जाएगा, किसी ने सोचा भी नहीं था। लेकिन आजमाया गया, वह भी छत्तीसगढ़ के मजदूर रामनारायण बघेल पर, जो हिंदू था, भाजपा का ही वोटर था और बंगाली नहीं था, बंगला भाषा उसे बोलना भी नहीं आता था, लेकिन ‘अवैध बांग्लादेशी’ के रूप में उसे लिंचिंग का शिकार बनाया गया। यह तब है, जब जिस चुनाव आयोग को इस मुहिम के लिए साधा गया है, पूरे देश में चल रहे एसआईआर के बाद भी वह यह बताने की स्थिति में नहीं है कि कितने विदेशी नागरिकों, और खास तौर पर बांग्लादेशियों की उसने शिनाख्त कर ली है।
केरल की माकपा और वाम मोर्चा सरकार को निशाना बनाने वालों को तब निराशा हुई, जब केरल सरकार ने आरोपियों को तुरंत अपनी गिरफ्त में लिया और उनके आपराधिक इतिहास को उजागर किया। हमले का नेतृत्व करने वाले लोग भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े वे कार्यकर्ता और समर्थक ही निकले, जिन्होंने हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा के लिए सक्रिय रूप से प्रचार किया था। वे हिस्ट्री-शीटर हैं और उन पर हत्या के प्रयास सहित कई मामले पहले से ही दर्ज हैं।
केरल सरकार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, पहले आरोपी अनु पिता अप्पुन्नी पर वलयार पुलिस स्टेशन में 9 आपराधिक मामले (एफआईआर क्रमांक : 30/2007, 002/2009, 106/2012, 364/2012, 569/2012, 829/2013, 336/2015, 419/2015, 04/2023) दर्ज हैं, जिनमें सांघातिक हमला और हत्या के प्रयास जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं। ये सभी मामले वलयार टाउन नॉर्थ और कासाबा पुलिस स्टेशनों में दर्ज हैं। एक अन्य आरोपी, प्रसाद पिता चंद्रन पर 2 मामले (एफआईआर क्रमांक : 996/2014, 821/2015) और मुरली पिता चाथू पर 3 मामले (एफआईआर क्रमांक : 2/2009, 106/2012, 569/2012) दर्ज हैं। हालांकि संघी गिरोह ने अपनी आदत के अनुसार, इन हमलावरों के अपने से जुड़े होने से इंकार किया है, लेकिन कोर्ट की कार्यवाही के दौरान, एक स्थानीय भाजपा नेता आर जिनेश, जो एक अन्य हत्या के मामले में आरोपी हैं, ने उनकी पूरी मदद की है।
संघी गिरोह मॉब लिंचिंग को एक राजनैतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। यह ध्यान देने की बात है कि इसी साल जुलाई अंत में केरल के एक चर्च से जुड़ी दो ननों पर छत्तीसगढ़ के दुर्ग रेलवे स्टेशन में पुलिस की मौजूदगी में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने धर्मांतरण का आरोप लगाते हुए हमला किया था। भाजपा सरकार ने इन ननों के खिलाफ बस्तर की तीन वयस्क आदिवासी महिलाओं की मानव तस्करी का झूठा मामला भी बनाया था। ये तीनों आदिवासी महिलाएं पीढ़ियों से ईसाई धर्म की अनुयायी हैं। इस मामले में हुई देशव्यापी प्रतिक्रिया के बाद पूरे संघी गिरोह को बैकफुट में आना पड़ा था। केरल भाजपा के राज्य अध्यक्ष को सार्वजनिक रूप से इन ननों पर हुए हमलों के लिए केरल की जनता से माफी मांगनी पड़ी थी। बाद में इन ननों को एनआईए कोर्ट ने जमानत दे दी थी। तीनों आदिवासी महिलाओं ने राज्य महिला आयोग में संघी गिरोह के खिलाफ शिकायत भी दर्ज की थी। आयोग में भी उन्हें तरह-तरह से परेशान किया गया और ननों के खिलाफ बयान देने के लिए दबाव डाला गया था।
साफ है कि नफ़रती संघी चिंटूओ के निशाने पर केवल ईसाई और मुस्लिम ही नहीं, आदिवासी और हिंदू भी हैं। कहीं धर्मांतरण का बहाना है, तो कहीं लव-जिहाद का, और कुछ न मिला, तो हिंदुओं को ही बांग्लादेशी बना दो। नफरत का व्यापार फलता-फूलता रहना चाहिए, इससे वोटों की अच्छी फसल कटती है। तिरुअनंतपुरम नगर निगम चुनाव में शशि थरूर और दूसरे कांग्रेसियों की मदद से सबसे बड़े ब्लॉक के रूप में उभरने के बाद संघी गिरोह की यह सुनियोजित रणनीति है कि चाहे जिस तरह से हो, इसी नफरत की राजनीति को आगे बढ़ाना है।
पूरे भारत में ईसाई और मुस्लिम अल्पसंख्यकों पर बड़े पैमाने पर हमले हो रहे हैं। पूरे देश में संघी गिरोह ने क्रिसमस समारोहों को अपने हमले का निशाना बनाया है। कहीं क्रिसमस के त्योहार पर पहनी जाने वाली लाल टोपी बेचने वाले मजदूर पर हमला हुआ है, तो कहीं उनकी प्रार्थना सभाओं पर हमला हुआ है और चर्च पर पथराव। पूरे देश में नफ़रती चिंटूओ ने सांताक्लॉज़ के पुतले फूंके हैं और उन पर जूते बरसाये हैं!! भाजपा शासित छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में क्रिसमस की सजावट के लिए न केवल मॉल पर हमला किया है बल्कि नाम पूछ-पूछकर ईसाई समुदाय के लोगों की पिटाई की है। हर साल क्रिसमस के दिनों में स्कूलों में छुट्टी दी जाती है। इस साल भाजपा शासित राज्यों में बहुत-सी जगहों पर यह छुट्टी रद्द कर दी गई या कटौती कर दी गई। यह आने वाले सालों में सरकारी कार्यालयों में इस दिन दी जाने वाली छुट्टी को चुपचाप हटाने की तैयारी का भी संकेत है।
यूनाइटेड क्रिश्चियन फोरम के अनुसार, 2024 में ही पूरे भारत में ईसाइयों के खिलाफ अपराध की 843 घटनाएँ हुईं थीं, यानी हर महीने 70 हिंसक घटनाएँ। 2025 में नवंबर तक ऐसी 706 घटनाएँ दर्ज की जा चुकी हैं। यह दोगलापन संघ-भाजपा में ही दिख सकता है कि एक ओर, जहां क्रिसमस के आगे-पीछे कैरोल गाने वाले बच्चों के बैंड पर संघी गिरोह हमले कर रहे थे, इन छोटे-छोटे बच्चों पर लाठी-डंडों से हमला करके उनके बैंड-बाजे तोड़ रहे थे ; वहीं दूसरी ओर, प्रधानमंत्री मोदी कैथेड्रल चर्च में जाकर फोटो-खिंचाऊं सेशन कर रहे थे, ताकि केरल में अपने घृणित हिंदुत्व की मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए ईसाई समुदाय के कुछ वोट बटोर सके।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह द्वारा चुनावी फायदे के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के उद्देश्य से शुरू किया गया नफ़रत भरा अभियान ही ऐसे माहौल के लिए ज़िम्मेदार है, जहां अवैध “बांग्लादेशी घुसपैठियों” का झूठा डर फैलाकर मॉब लिंचिंग की जा रही है। पूरी दुनिया भाजपा राज में भारत में बढ़ते उस हिंदुत्व आतंकवाद को देख रही है, जहां ईसाई और मुस्लिम समुदाय को हाशिए पर डाला जा रहा है और उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक बनाया जा रहा है।
बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यक हैं और उन पर मुस्लिम तत्ववादी हमले कर रहे हैं, वहां वे हिंदू समुदाय के खिलाफ नफरत फैला रहे हैं। इधर भारत में ईसाई और मुस्लिम समुदाय अल्पसंख्यक हैं और हिंदुत्व की ताकतें उन पर हमले कर रही है। देश की जनता को समझना होगा कि इधर हो या उधर, सांप्रदायिक ताकतों का चरित्र एक ही होता है। वे नफरत की राजनीति करती है, सत्ता पर कब्जा करती है और अपने लिए पैसे बनाती है और अपने पूंजीवादी कॉर्पोरेट मित्रों के लिए गैर-कानूनी ढंग से तिजोरी भरने के रास्ते खोलती है।
रामनारायण बघेल की संघी गिरोह द्वारा मॉब लिंचिंग के बाद केरल सरकार ने न केवल आरोपियों को तुरंत गिरफ्तार किया है, बल्कि उसने मृतक के परिवार को 30 लाख रुपये का मुआवज़ा भी दिया है और सभी ज़रूरी इंतज़ाम किए हैं। भाजपा की डबल इंजन सरकार के बावजूद जिस राज्य से उसे पलायन करने के लिए विवश होना पड़ा, उसने 5 लाख रुपए मुआवजे की घोषणा कर इतिश्री कर ली है और अभी तक मृतक परिवार की कोई सुध नहीं ली है। भाजपा सरकार को यह बताना होगा कि उसके “सु-(विष्णु)शासन” में रोजी-रोटी के लिए गरीबों को पलायन क्यों करना पड़ रहा है और प्रवासी मजदूरों को संघी गिरोह के उत्पीड़न का शिकार क्यों होना पड़ रहा है? संघी गिरोह जानता है कि वास्तव में वे कर क्या रहे हैं, इसलिए इन्हें कभी क्षमा करने की भी प्रार्थना प्रभु से नहीं की जा सकती।
