Wednesday, June 24, 2026
Home Blog Page 316

न्यू ईयर सेलिब्रेशन बना मातम: स्विट्ज़रलैंड के क्रांस-मोंटाना बार में भीषण विस्फोट, कई लोगों की मौत


स्विट्ज़रलैंड (राष्ट्र की परम्परा)। स्विट्ज़रलैंड के मशहूर पर्यटन स्थल क्रांस-मोंटाना (Crans-Montana) में नए साल के जश्न के दौरान एक दर्दनाक हादसा हो गया। न्यू ईयर ईव सेलिब्रेशन के बीच एक लोकप्रिय बार में हुए भीषण विस्फोट और आग से इलाके में अफरा-तफरी मच गई। इस हादसे में कई लोगों की मौत की पुष्टि हुई है, जबकि कई अन्य गंभीर रूप से घायल बताए जा रहे हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह हादसा वालेस कैंटन के क्रांस-मोंटाना स्थित ‘ले कॉन्स्टेलेशन’ (Le Constellation) नामक बार में हुआ। पुलिस के मुताबिक, रात करीब 1:30 बजे एक या एक से अधिक धमाके हुए, जिसके बाद बार में आग तेजी से फैल गई। उस समय बार में बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे, जो नए साल का जश्न मना रहे थे।

पुलिस प्रवक्ता का बयान

वालेस कैंटन पुलिस के प्रवक्ता गेटन लाथियन ने समाचार एजेंसी AFP से बातचीत में बताया कि विस्फोट के कारणों का फिलहाल पता नहीं चल पाया है। उन्होंने कहा कि इस घटना में कई लोग घायल हुए हैं और कई मौतों की आधिकारिक पुष्टि की गई है।

ये भी पढ़ें – जमीन खरीदना होगा सुरक्षित, बिहार सरकार ला रही है डिजिटल रजिस्ट्री सिस्टम

हादसे की सूचना मिलते ही राहत और बचाव कार्य शुरू कर दिया गया। मौके पर बड़ी संख्या में एंबुलेंस पहुंचाई गईं, जबकि गंभीर रूप से घायलों को अस्पताल ले जाने के लिए एयर-ग्लेशियर्स हेलीकॉप्टर सेवा का भी इस्तेमाल किया गया। दमकल कर्मियों ने कड़ी मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया।

हेल्पलाइन नंबर जारी

पुलिस ने पीड़ितों और उनके परिजनों की सहायता के लिए हेल्पलाइन नंबर 0848 112 117 जारी किया है। साथ ही इस मामले को लेकर सुबह 10 बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित करने की घोषणा की गई है, जिसमें हादसे से जुड़ी और जानकारी साझा की जाएगी।

फिलहाल पुलिस और जांच एजेंसियां पूरे मामले की गहन जांच में जुटी हैं। फॉरेंसिक टीमें मौके से सबूत इकट्ठा कर रही हैं और बार में मौजूद लोगों से पूछताछ की जा रही है। उल्लेखनीय है कि नए साल के मौके पर क्रांस-मोंटाना में बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचे हुए थे।

ये भी पढ़ें – अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट से पुतिन ड्रोन हमले के दावे पर सवाल

जमीन खरीदना होगा सुरक्षित, बिहार सरकार ला रही है डिजिटल रजिस्ट्री सिस्टम

बिहार में जमीन-फ्लैट रजिस्ट्री का नया युग: फर्जीवाड़े पर लगेगी डिजिटल लगाम

पटना (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)बिहार में जमीन और फ्लैट की खरीद-बिक्री से जुड़े वर्षों पुराने विवादों और फर्जीवाड़े पर अब निर्णायक चोट होने वाली है। राज्य सरकार जमीन, मकान, फ्लैट और व्यावसायिक संपत्तियों की रजिस्ट्री प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल, पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाने की तैयारी में है। इस नई व्यवस्था के लागू होते ही रजिस्ट्री केवल कागजों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि जमीन की वास्तविक स्थिति, सटीक लोकेशन और ऑन-स्पॉट तस्वीर भी सरकारी रिकॉर्ड का हिस्सा बनेगी।

ये भी पढ़ें – मार्निंग वॉकर चेकिंगअभियान : पुलिस का जनसंवाद, सुरक्षा व्यवस्था और सख्त कार्रवाई

मद्य निषेध, उत्पाद एवं निबंधन विभाग द्वारा विकसित किए जा रहे नए सॉफ्टवेयर के तहत किसी भी संपत्ति की रजिस्ट्री से पहले उसकी रीयल-टाइम फोटो अक्षांश-देशांतर (Latitude-Longitude) के साथ सरकारी पोर्टल पर अपलोड करना अनिवार्य होगा। तस्वीर और लोकेशन सत्यापित होने के बाद ही रजिस्ट्री आगे बढ़ सकेगी। इससे जमीन की पहचान स्पष्ट होगी और उसी जमीन को दोबारा बेचने जैसे मामलों पर तुरंत रोक लग सकेगी।

ये भी पढ़ें – दूषित पेयजल बना मौत का कारण, इंदौर में मचा हड़कंप

भू-माफिया पर तकनीकी ब्रेक
अब तक जीपीएस कैमरे से सत्यापन के बावजूद कई बार लोकेशन में एक किलोमीटर तक का अंतर आ जाता था, खासकर ग्रामीण इलाकों में। इससे विवाद की गुंजाइश बनी रहती थी। नया सॉफ्टवेयर इस कमी को दूर करेगा। ऑन-स्पॉट फोटो और सटीक लोकेशन अपलोड होते ही सिस्टम जमीन के मालिकाना हक की जांच करेगा। यदि कोई भू-माफिया या दूसरा व्यक्ति उसी जमीन को दोबारा बेचने की कोशिश करेगा, तो रजिस्ट्री प्रक्रिया वहीं रुक जाएगी।

ये भी पढ़ें – अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट से पुतिन ड्रोन हमले के दावे पर सवाल

खरीदार को मिलेगी पूरी डिजिटल कॉपी
नई तकनीक के तहत रजिस्ट्री पूरी होते ही खरीदार के मोबाइल पर एक एसएमएस लिंक भेजा जाएगा, जिसमें जमीन या फ्लैट की पूरी जानकारी फोटो सहित उपलब्ध होगी। यह डिजिटल दस्तावेज सरकारी रिकॉर्ड के रूप में मान्य होगा। इससे अलग-अलग दफ्तरों के चक्कर लगाने और नकल निकलवाने की परेशानी खत्म हो जाएगी।
दाखिल-खारिज भी होगा तेज
निबंधन विभाग का दावा है कि नई प्रणाली लागू होने के बाद रजिस्ट्री होने वाली करीब 60 प्रतिशत जमीन का दाखिल-खारिज ऑनलाइन हो सकेगा। इससे प्रक्रिया में होने वाली देरी, भ्रष्टाचार और विवादों में बड़ी कमी आएगी। विभाग के अनुसार दरभंगा सहित कई जिलों में इस व्यवस्था का सफल ट्रायल किया जा चुका है। अब इसे पूरे राज्य में लागू करने के लिए कैबिनेट से मंजूरी लेने की तैयारी है।
भरोसेमंद बनेगी जमीन की खरीद-बिक्री
जमीन की वास्तविक तस्वीर और सटीक लोकेशन सिस्टम में दर्ज होने से खरीदार को वही संपत्ति मिलेगी, जिसके लिए उसने भुगतान किया है। गूगल मैप के जरिए लोकेशन जांचना आसान होगा और किसी भी गड़बड़ी की संभावना बेहद कम रह जाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम बिहार में रियल एस्टेट सेक्टर को नई विश्वसनीयता देगा और आम लोगों का भरोसा मजबूत करेगा।
कुल मिलाकर, बिहार जमीन रजिस्ट्री नया नियम न केवल फर्जी बिक्री और दोहरी रजिस्ट्री पर रोक लगाएगा, बल्कि जमीन की खरीद-बिक्री को सुरक्षित, पारदर्शी और भविष्य-उन्मुख बनाएगा।

अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट से पुतिन ड्रोन हमले के दावे पर सवाल

सीआईए आकलन से रूसी दावे कमजोर: पुतिन के आवास पर ड्रोन हमले का कोई सबूत नहीं


वाशिंगटन (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के ताज़ा आकलन ने रूस के उस दावे पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसमें कहा गया था कि यूक्रेन ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के एक आवास को ड्रोन हमले से निशाना बनाया। सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (CIA) से मिली जानकारी के आधार पर तैयार इस मूल्यांकन में स्पष्ट किया गया है कि पुतिन या उनके किसी भी आधिकारिक अथवा निजी आवास पर हमले का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला है।

ये भी पढ़ें – 2026 का संकल्प: बात सीधी है, पेट से जुड़ी है

रिपोर्ट के मुताबिक, यह निष्कर्ष सबसे पहले वॉल स्ट्रीट जर्नल ने प्रकाशित किया, जिसकी पुष्टि बाद में अमेरिकी अधिकारियों ने भी की। सीआईए के निदेशक जॉन रैटक्लिफ ने यह आकलन सीधे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को अवगत कराया। इसके बाद यह स्पष्ट हुआ कि उत्तरी रूस, विशेषकर नोवगोरोड क्षेत्र में कथित ड्रोन हमले की कहानी तथ्यात्मक रूप से कमजोर है।

ये भी पढ़ें – ऊर्जा संरक्षण आज की आवश्यकता, कल की सुरक्षा: भविष्य बचाने का संकल्प

रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने हाल ही में दावा किया था कि यूक्रेन ने पुतिन के नोवगोरोड स्थित आवास की ओर दर्जनों ड्रोन दागे थे और इस घटना के बाद मॉस्को अपनी कूटनीतिक रणनीति पर पुनर्विचार करेगा। वहीं रूसी रक्षा मंत्रालय ने एक वीडियो जारी कर गिरे हुए ड्रोन के अवशेष दिखाए और दावा किया कि 91 ड्रोनों को रास्ते में ही निष्क्रिय कर दिया गया।

ये भी पढ़ें – बिना प्रशिक्षण के शिक्षक, अधूरी शिक्षा: क्या दांव पर है बच्चों का भविष्य?

हालांकि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का कहना है कि उपलब्ध सूचनाओं, सैटेलाइट डेटा और अन्य तकनीकी इनपुट्स में ऐसा कोई संकेत नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि यूक्रेन ने जानबूझकर पुतिन के आवास को लक्ष्य बनाया हो। विशेषज्ञों के अनुसार, यह मामला सूचना युद्ध और राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है।

ये भी पढ़ें – नया बर्ष पर सशक्त और समृद्ध महाराजगंज का संकल्प

इस आकलन के सामने आने के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रूस के आरोपों की विश्वसनीयता पर नई बहस छिड़ गई है, जबकि यूक्रेन ने पहले ही ऐसे किसी हमले से इनकार किया था।

दूषित पेयजल बना मौत का कारण, इंदौर में मचा हड़कंप

इंदौर में दूषित पानी से मौत का कहर: 13 की जान गई, सीएम मोहन यादव के आदेश पर नगर निगम के 3 अधिकारी सस्पेंड-बर्खास्त

इंदौर (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पेयजल से फैले उल्टी-दस्त के प्रकोप ने भयावह रूप ले लिया है। इंदौर दूषित पानी से मौत के इस मामले में अब तक 13 लोगों की जान जा चुकी है, जिनमें एक छह माह का मासूम बच्चा और छह महिलाएं शामिल हैं। घटना के बाद मध्य प्रदेश सरकार ने इसे गंभीर प्रशासनिक लापरवाही मानते हुए कड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देश पर नगर निगम के दो अधिकारियों को निलंबित किया गया है, जबकि एक प्रभारी सब इंजीनियर को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया है।

ये भी पढ़ें – आत्ममंथन का समय: क्या सरकारी योजनाएं हकदारों तक पहुँच रही हैं या अपात्रों की ढाल बन चुकी हैं?

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इस पूरे घटनाक्रम को “आपात स्थिति जैसी” बताते हुए स्पष्ट किया कि प्रदेश सरकार किसी भी प्रकार की लापरवाही को बर्दाश्त नहीं करेगी। उन्होंने बुधवार को इंदौर के विभिन्न अस्पतालों का दौरा कर मरीजों से मुलाकात की और उपचार व्यवस्थाओं का जायजा लिया। इसके बाद उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक कर अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए गए।

ये भी पढ़ें – महादेव देसाई: गांधी के शब्द, संघर्ष की आत्मा और राष्ट्रवाद वाहक

स्थानीय लोगों का आरोप है कि भागीरथपुरा क्षेत्र में लंबे समय से दूषित पानी की आपूर्ति हो रही थी, लेकिन शिकायतों के बावजूद समय रहते कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि जलापूर्ति की मुख्य पाइपलाइन में उस स्थान पर लीकेज था, जिसके ऊपर शौचालय बना हुआ था। इसी कारण सीवर का गंदा पानी पेयजल लाइन में मिल गया और यह जानलेवा स्थिति पैदा हुई।

ये भी पढ़ें – सरकारी शिक्षा व्यवस्था : अब सिर्फ सुधार नहीं, निर्णायक कार्रवाई की जरूरत

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भागीरथपुरा इलाके में लगभग 40 हजार लोगों की स्वास्थ्य जांच की गई, जिसमें 2,456 लोग उल्टी-दस्त के संदिग्ध मरीज पाए गए। इनमें से 212 लोगों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा, जबकि 50 मरीजों को स्वस्थ होने के बाद छुट्टी दी जा चुकी है। फिलहाल 162 मरीज विभिन्न अस्पतालों में भर्ती हैं और लगभग सभी की हालत स्थिर बताई जा रही है।
मुख्यमंत्री ने बताया कि शुरुआती जांच के आधार पर नगर निगम के एक जोनल अधिकारी और एक सहायक यंत्री को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया है। वहीं, प्रभारी सब इंजीनियर की सेवाएं समाप्त कर दी गई हैं। उन्होंने कहा कि विस्तृत जांच के लिए भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारी की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति गठित की गई है, जो पूरे मामले की गहन जांच कर रिपोर्ट सौंपेगी।

ये भी पढ़ें – जब धर्म स्वयं मनुष्य के हृदय में अवतरित हो

सीएम मोहन यादव ने यह भी घोषणा की कि नगर निगम में स्टाफ की कमी को जल्द दूर किया जाएगा और पेयजल व सीवर लाइनों की नियमित जांच के लिए विशेष अभियान चलाया जाएगा, ताकि भविष्य में इंदौर दूषित पानी से मौत जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
यह घटना न केवल इंदौर बल्कि पूरे प्रदेश के शहरी प्रशासन के लिए चेतावनी है कि बुनियादी सुविधाओं में लापरवाही सीधे आमजन की जान पर भारी पड़ सकती है। सरकार की सख्त कार्रवाई से उम्मीद की जा रही है कि जिम्मेदार अधिकारियों पर जवाबदेही तय होगी और पीड़ित परिवारों को न्याय मिलेगा।

मार्निंग वॉकर चेकिंगअभियान : पुलिस का जनसंवाद, सुरक्षा व्यवस्था और सख्त कार्रवाई


देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)।जनपद देवरिया में कानून व्यवस्था को और अधिक मजबूत करने तथा आम नागरिकों में सुरक्षा की भावना बढ़ाने के उद्देश्य से पुलिस अधीक्षक देवरिया संजीव सुमन के निर्देशन में शुक्रवार की सुबह “मार्निंग वॉकर चेकिंग अभियान” सफलतापूर्वक चलाया गया। यह अभियान प्रातः 05:00 बजे से 08:00 बजे तक जनपद के विभिन्न इलाकों में संचालित किया गया।

ये भी पढ़ें – हर थाने में बनेगी साइबर क्राइम डेस्क, डीजीपी राजीव कृष्ण का ऐलान

अभियान के दौरान जनपद के सभी थाना प्रभारियों एवं थानाध्यक्षों ने मॉर्निंग वॉक पर निकले नागरिकों से प्रत्यक्ष संवाद स्थापित किया। पुलिस अधिकारियों ने लोगों की समस्याएं सुनीं, सुरक्षा से जुड़े सुझाव लिए और यह भरोसा दिलाया कि जनपद पुलिस उनकी सुरक्षा के लिए हर समय तत्पर है। यह पहल मित्र पुलिसिंग और सामुदायिक सहभागिता को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

ये भी पढ़ें – CHC हॉस्पिटल की NOC रद्द होने पर सियासी घमासान, बसपा विधायक उमाशंकर सिंह का बड़ा आरोप – “विकास रोकना ही इनका एजेंडा”

चेकिंग अभियान के दौरान संदिग्ध व्यक्तियों और वाहनों की गहन जांच की गई। पुलिस ने चोरी की वाहनों की पहचान, तीन सवारी, मॉडिफाइड साइलेंसर लगे दोपहिया वाहन, नाबालिगों द्वारा वाहन चलाने तथा यातायात नियमों के उल्लंघन पर विशेष नजर रखी। साथ ही अवैध असलहा, मादक पदार्थों एवं अन्य आपराधिक गतिविधियों पर भी कड़ी निगरानी रखी गई।

ये भी पढ़ें – पद्मविभूषण सत्येन्द्रनाथ बोस: जब भारतीय मेधा ने विश्व भौतिकी की दिशा बदली

पुलिस आंकड़ों के अनुसार, जनपद में कुल 27 स्थानों पर चेकिंग की गई, जिसमें 413 व्यक्तियों और 249 वाहनों की जांच हुई। नियमों का उल्लंघन करने वाले 03 वाहनों का चालान किया गया।
मॉर्निंग वॉकरों एवं स्थानीय नागरिकों ने पुलिस की इस सक्रिय पहल की सराहना की और सुरक्षा व्यवस्था पर संतोष व्यक्त किया।
जनपदीय पुलिस ने स्पष्ट किया कि ऐसे मार्निंग वॉकर चेकिंग अभियान भविष्य में भी नियमित रूप से जारी रहेंगे, ताकि जनसुरक्षा, शांति और विश्वास को और अधिक सुदृढ़ किया जा सके।

नया बर्ष पर सशक्त और समृद्ध महाराजगंज का संकल्प


महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)।नववर्ष 2026 के शुभ अवसर पर जनपद महाराजगंज के शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों—जिलाधिकारी संतोष कुमार शर्मा, पुलिस अधीक्षक सोमेंद्र मीना एवं मुख्य विकास अधिकारी महेंद्र कुमार सिंह—ने समस्त जनपदवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं और मंगलकामनाएं प्रेषित कीं। तीनों अधिकारियों ने एक स्वर में जनसहयोग को विकास की सबसे बड़ी शक्ति बताते हुए समृद्ध, सुरक्षित और आत्मनिर्भर महाराजगंज के निर्माण का आह्वान किया।
जिलाधिकारी संतोष कुमार शर्मा ने अपने संदेश में कहा कि नया वर्ष नागरिकों के जीवन में सुख, स्वास्थ्य और समृद्धि लेकर आए। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, सामाजिक सौहार्द और पारदर्शी प्रशासन को विकास की आधारशिला बताते हुए कहा कि वर्ष 2047 तक विकसित उत्तर प्रदेश के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए जिला प्रशासन पूरी प्रतिबद्धता से कार्य कर रहा है। जनभागीदारी से ही योजनाओं का वास्तविक लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाया जा सकता है।

ये भी पढ़ें – सरकारी शिक्षा व्यवस्था : अब सिर्फ सुधार नहीं, निर्णायक कार्रवाई की जरूरत

पुलिस अधीक्षक सोमेंद्र मीना ने नववर्ष को शांति, सुरक्षा और विश्वास का प्रतीक बताते हुए कहा कि अपराधमुक्त और शांतिपूर्ण जनपद के लिए पुलिस और नागरिकों के बीच सहयोग अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कानून-व्यवस्था सुदृढ़ रखने, यातायात नियमों के पालन और सामाजिक जिम्मेदारी निभाने की अपील की।

ये भी पढ़ें – जब धर्म स्वयं मनुष्य के हृदय में अवतरित हो

मुख्य विकास अधिकारी महेंद्र कुमार सिंह ने कहा कि नववर्ष जनपद के विकास को नई दिशा और गति देगा। सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन, रोजगार सृजन और बुनियादी ढांचे के विस्तार से महाराजगंज विकास की नई ऊंचाइयों को छुएगा। उन्होंने विश्वास जताया कि प्रत्येक नागरिक की सहभागिता से सपनों का महाराजगंज साकार होगा।

बिना प्रशिक्षण के शिक्षक, अधूरी शिक्षा: क्या दांव पर है बच्चों का भविष्य?

0

डिजिटल शिक्षा और बदलती शिक्षा व्यवस्था

✍️ सोमनाथ मिश्रा, (राष्ट्र की परम्परा)

देश की शिक्षा व्यवस्था तेजी से डिजिटल युग में प्रवेश कर चुकी है। स्मार्ट क्लासरूम, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, ई-कंटेंट और वर्चुअल पढ़ाई अब शिक्षा का अहम हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन इस डिजिटल बदलाव के बीच एक गंभीर सवाल उभरकर सामने आ रहा है—क्या बिना समुचित प्रशिक्षण के पढ़ा रहे शिक्षक बच्चों के भविष्य के साथ न्याय कर पा रहे हैं?

ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के अनेक स्कूलों में आज भी शिक्षक डिजिटल तकनीक के प्रभावी उपयोग में सक्षम नहीं हैं। न उन्हें आधुनिक डिजिटल टूल्स का पर्याप्त प्रशिक्षण मिला है और न ही नई शिक्षण पद्धतियों की गहरी समझ। ऐसे में डिजिटल शिक्षा कई जगह अवसर से ज्यादा चुनौती बनती जा रही है।

प्रशिक्षण की कमी से गिरती शिक्षा की गुणवत्ता

शिक्षक किसी भी शिक्षा प्रणाली की रीढ़ होते हैं। जब वही शिक्षक आधुनिक शिक्षण तकनीकों, डिजिटल बोर्ड, ऑनलाइन असाइनमेंट और बदले हुए पाठ्यक्रम ढांचे से अनजान हों, तो शिक्षा की गुणवत्ता पर असर पड़ना तय है।

कई स्कूलों में पढ़ाई केवल औपचारिकता बनकर रह गई है, जबकि आज के बच्चों को समझ-आधारित, कौशल-उन्मुख और व्यवहारिक शिक्षा की आवश्यकता है।

डिजिटल कक्षाओं के दौरान तकनीकी समस्याओं का समाधान न हो पाने से बच्चे भ्रमित होते हैं। इसका सीधा असर उनकी बुनियादी समझ, आत्मविश्वास और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी पर पड़ता है।

डिजिटल शिक्षा: सुविधा या नया बोझ?

डिजिटल शिक्षा का उद्देश्य पढ़ाई को सरल, रोचक और प्रभावी बनाना था, लेकिन प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी के कारण यह कई बार छात्रों के लिए बोझ साबित हो रही है।

तकनीकी समस्या आने पर कक्षा बाधित हो जाती है, शिक्षक समाधान नहीं दे पाते और बच्चों का भरोसा शिक्षा व्यवस्था से धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल साक्षरता केवल छात्रों के लिए नहीं, बल्कि शिक्षकों के लिए भी उतनी ही जरूरी है।

ये भी पढ़ें – ऊर्जा संरक्षण आज की आवश्यकता, कल की सुरक्षा: भविष्य बचाने का संकल्प

समाधान क्या हो सकता है?

इस गंभीर समस्या का समाधान केवल स्कूलों में तकनीक उपलब्ध कराने से नहीं होगा। इसके लिए सरकार और शिक्षा विभाग को ठोस कदम उठाने होंगे, जैसे—

• शिक्षकों के लिए नियमित और अनिवार्य प्रशिक्षण कार्यक्रम

• डिजिटल टूल्स और आधुनिक शिक्षण पद्धतियों पर वर्कशॉप

• ग्रामीण स्कूलों में विशेष टेक्निकल सपोर्ट सिस्टम

• शिक्षक चयन प्रक्रिया में प्रशिक्षण और दक्षता को प्राथमिकता

यदि शिक्षक प्रशिक्षित नहीं होंगे, तो डिजिटल शिक्षा का सपना अधूरा ही रह जाएगा। बच्चों का भविष्य केवल पाठ्यक्रम से नहीं, बल्कि उसे पढ़ाने वाले शिक्षक की क्षमता और समझ से तय होता है।

समय रहते यदि इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो एक पूरी पीढ़ी अधूरी शिक्षा की शिकार हो सकती है।

अब सवाल यह नहीं है कि डिजिटल शिक्षा जरूरी है या नहीं, असली सवाल यह है—क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था इसके लिए पूरी तरह तैयार है?

ये भी पढ़ें – सरकारी शिक्षा व्यवस्था : अब सिर्फ सुधार नहीं, निर्णायक कार्रवाई की जरूरत

ऊर्जा संरक्षण आज की आवश्यकता, कल की सुरक्षा: भविष्य बचाने का संकल्प

कैलाश सिंह

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। ऊर्जा आधुनिक जीवन की रीढ़ है। बिजली, ईंधन और अन्य ऊर्जा स्रोतों के बिना विकास, उद्योग, कृषि और आम जनजीवन की कल्पना भी अधूरी है। लेकिन बढ़ती जनसंख्या, तेज़ी से हो रहा शहरीकरण और उपभोग की बढ़ती प्रवृत्ति ने ऊर्जा संसाधनों पर गंभीर दबाव बना दिया है। ऐसे में ऊर्जा संरक्षण अब विकल्प नहीं, बल्कि समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुका है।

भारत जैसे विकासशील देश में ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है। कोयला, पेट्रोलियम और गैस जैसे पारंपरिक ऊर्जा स्रोत सीमित हैं, जबकि इनके अत्यधिक उपयोग से पर्यावरण प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। यदि आज ऊर्जा के विवेकपूर्ण उपयोग पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाला समय ऊर्जा संकट से जूझ सकता है।

ऊर्जा संरक्षण का अर्थ केवल ऊर्जा की खपत कम करना नहीं, बल्कि ऊर्जा का स्मार्ट और कुशल उपयोग करना है। अनावश्यक बिजली खर्च, पुराने ऊर्जा-अपव्ययी उपकरणों का प्रयोग और ईंधन की बर्बादी भविष्य के लिए खतरा बन रही है। वहीं, छोटी-छोटी आदतें—जैसे बेवजह लाइट बंद रखना, ऊर्जा दक्ष उपकरण अपनाना और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग—बड़े स्तर पर सकारात्मक बदलाव ला सकती हैं।

ये भी पढ़ें – महादेव देसाई: गांधी के शब्द, संघर्ष की आत्मा और राष्ट्रवाद वाहक

सरकार द्वारा सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और जैव ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों को बढ़ावा देने के प्रयास सराहनीय हैं। ये न केवल पर्यावरण के अनुकूल हैं, बल्कि देश को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर भी ले जा रहे हैं। हालांकि, केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। जब तक आम नागरिक ऊर्जा संरक्षण को अपनी जिम्मेदारी नहीं बनाएगा, तब तक लक्ष्य हासिल नहीं हो सकता।

ग्रामीण क्षेत्रों में सौर ऊर्जा और बायोगैस योजनाएं आत्मनिर्भरता का माध्यम बन सकती हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में ऊर्जा दक्ष भवन और स्मार्ट ऊर्जा प्रबंधन को प्राथमिकता देना आवश्यक है। साथ ही उद्योगों को भी उत्पादन के साथ-साथ ऊर्जा बचत को अपनी नीति का हिस्सा बनाना होगा।

ऊर्जा संरक्षण आज इसलिए जरूरी है क्योंकि यही कल की सुरक्षा की गारंटी है। यह आर्थिक मजबूती, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की नींव रखता है। अब समय आ गया है कि ऊर्जा को केवल संसाधन नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की धरोहर समझा जाए।
ऊर्जा बचेगी, तभी भविष्य सुरक्षित रहेगा और विकास की रोशनी हर घर तक पहुंचेगी।

ये भी पढ़ें – सरकारी शिक्षा व्यवस्था : अब सिर्फ सुधार नहीं, निर्णायक कार्रवाई की जरूरत

2026 का संकल्प: बात सीधी है, पेट से जुड़ी है

नया साल आया है, तो फिर वही बातें शुरू हो गई हैं। संकल्प, वादे और बड़े-बड़े दावे। लेकिन गाँव, कस्बे और शहर की गली में खड़ा आदमी आज भी एक ही सवाल पूछ रहा है। काम मिलेगा या नहीं, पढ़ाई सुधरेगी या नहीं, और इलाज सस्ता होगा या नहीं। 2026 काग़ज़ पर नया है, मगर ज़िंदगी वहीं अटकी हुई है।
सबसे पहले बात जवाबदेही की। योजना बनती है, फोटो खिंचती है, फिर फाइल बंद हो जाती है। 2026 का संकल्प यह होना चाहिए कि नाम नहीं, काम दिखे।
दूसरी बात आपस की है। पहले लोग दुख-सुख में साथ खड़े होते थे, अब जाति, धर्म और पार्टी देखकर बात होती है। सच्चाई यह है कि लड़ाने से किसी का चूल्हा नहीं जलता। 2026 में अगर समझदारी नहीं आई, तो नुकसान सबका होगा।
तीसरी और सबसे बड़ी बात नौजवानों की है। पढ़-लिख कर भी हाथ खाली हैं। डिग्री है, पर नौकरी नहीं। कहा जाता है कि खुद का काम करो, स्टार्टअप बनाओ। सवाल ये है कि पैसा कहाँ से आए, रास्ता कौन दिखाए? 2026 में अगर ईमानदार भर्ती और पक्की नौकरी नहीं बनी, तो नाराज़गी बढ़ेगी।
चौथी बात पढ़ाई की। बच्चों के हाथ में मोबाइल है, पर सही पढ़ाने वाला नहीं। ऑनलाइन के भरोसे पढ़ाई नहीं चलती। बिना गुरु, बिना बराबरी के साधन, शिक्षा कैसे मजबूत होगी? 2026 में पढ़ाई को मज़ाक नहीं, ज़िम्मेदारी समझना होगा।
पाँचवीं बात पानी, खेत और हवा की। नल सूख रहे हैं, खेत दम तोड़ रहे हैं और हवा भारी होती जा रही है। अगर विकास ऐसा हो कि जीने लायक कुछ बचे ही नहीं, तो तरक़्क़ी किस काम की?
आख़िर में बात साफ़ है, 2026 का संकल्प भाषण का नहीं, ज़मीन का होना चाहिए। नेता सच बोलें, अफसर ईमानदारी से काम करें और जनता सवाल पूछे। जब तक आम आदमी बोलेगा नहीं, तब तक हर साल नया आएगा, हालात पुराने ही रहेंगे।

जब धर्म स्वयं मनुष्य के हृदय में अवतरित हो

“ईश्वर जब रूप नहीं, विवेक बनकर उतरते हैं”
भूमिका : मौन से आगे, चेतना का अवतरण

हमने देखा कि जब मनुष्य मौन में सही के साथ खड़ा होता है, तब वही मौन शंखनाद बन जाता है।
उससे एक कदम आगे जाता है।यह कथा केवल भगवान विष्णु के अवतारों की नहीं, बल्कि उस क्षण की है जब ईश्वर स्वयं मनुष्य के भीतर धर्म, विवेक और करुणा बनकर प्रकट होते हैं।
शास्त्र कहते हैं —
“धर्मो रक्षति रक्षितः”
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
परंतु प्रश्न यह है—
जब अधर्म इतना सूक्ष्म हो कि वह सत्ता, सुविधा और चुप्पी के आवरण में छिप जाए, तब विष्णु कैसे अवतरित होते हैं?
उत्तर यही है—
तब विष्णु किसी एक शरीर में नहीं, अनेक सजग हृदयों में उतरते हैं।
शास्त्रोक्त आधार : विष्णु का तत्त्व, न कि केवल रूप
विष्णु पुराण के अनुसार—
“विष्णु: सर्वगत: प्रोक्तः”
अर्थात विष्णु सर्वत्र व्याप्त हैं।
विष्णु केवल शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करने वाला देवता नहीं हैं।
वे पालन, संतुलन और धर्म की सतत चेतना हैं।
जब-जब सृष्टि संतुलन खोती है—
कभी अत्याचार से
कभी अन्यायपूर्ण मौन से
कभी सत्य के सुविधाजनक त्याग से
तब विष्णु अवतार लेते हैं।
लेकिन हर बार देह में नहीं,
कभी-कभी दृष्टि में,
कभी विवेक में,
और कभी एक साधारण मनुष्य के साहस में।
कथा : धर्मग्राम और मौन का अधर्म
शास्त्रोक्त परंपरा में एक अल्पज्ञात कथा आती है।
धर्मग्राम की कथा, जिसका उल्लेख स्कंद पुराण के उत्तर खंड में सांकेतिक रूप से मिलता है।
धर्मग्राम एक ऐसा राज्य था जहाँ
कोई युद्ध नहीं था
कोई अकाल नहीं था
मंदिरों में दीप जलते थे
शास्त्रों का पाठ होता था
परंतु एक दोष था—
अन्याय के सामने मौन।
राजा स्वयं अत्याचारी नहीं था,
पर वह अन्याय करने वालों को रोकता भी नहीं था।
प्रजा दुखी थी, पर डर से चुप थी।
धर्म बाहरी रूप में जीवित था,
पर अंतरात्मा में मृतप्राय।
प्रजा की पुकार और विष्णु का उत्तर
प्रजा ने यज्ञ किया, स्तुति की—
“हे नारायण! अवतार लो।”
पर कोई सिंह नहीं आया,
कोई बाण नहीं चला,
कोई चक्र नहीं घूमा।
बल्कि एक रात,
राजा को स्वप्न आया।
स्वप्न में विष्णु बोले—
“मैं आ चुका हूँ।”
राजा चौंका—
“पर प्रभु, मुझे तो कोई अवतार दिखाई नहीं दिया।”
विष्णु ने कहा—
“जिस दिन तुम्हारे राज्य में कोई निर्बल के पक्ष में खड़ा होगा,
बिना लाभ की इच्छा के,
बिना भय के—
वही मेरा अवतार होगा।”
शास्त्रोक्त संदेश : अवतार की नई परिभाषा
भगवद्गीता (4.7) कहती है—
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत…”
धर्म की ग्लानि केवल तब नहीं होती जब रावण या कंस पैदा होते हैं,
धर्म की ग्लानि तब भी होती है जब सही जानते हुए भी लोग चुप रहते हैं।
केंद्रीय भाव यही है—
“ईश्वर हर बार युद्ध नहीं करते,
कभी वे हमें ही युद्धभूमि बना देते हैं—
जहाँ निर्णय लेना ही धर्म होता है।”
विष्णु की महिमा : पालन का सबसे कठिन मार्ग
ब्रह्मा सृजन करते हैं—
यह उत्सव है।
शिव संहार करते हैं—
यह परिवर्तन है।
पर विष्णु पालन करते हैं—
और पालन सबसे कठिन है।
पालन का अर्थ है—
अन्याय को सहन न करना
पर हिंसा से नहीं, विवेक से
शक्ति से नहीं, स्थिरता से
आज का युग विष्णु युग है—
जहाँ सबसे बड़ा धर्म है संतुलन बनाए रखना।
आधुनिक संदर्भ : आज का अवतार कौन?
जब कोई पत्रकार सच लिखता है,
जब कोई शिक्षक डर के बिना सही सिखाता है,
जब कोई अधिकारी नियम से समझौता नहीं करता,
जब कोई आम नागरिक अन्याय देखकर खड़ा होता है—
वहीं विष्णु की लीला चल रही होती है।
शास्त्र स्पष्ट कहते हैं—
“नारायणो नरसहितः”
नारायण मनुष्य के साथ चलते हैं।
निष्कर्ष : जब ईश्वर हमें योग्य समझते हैं
हमें यह नहीं सिखाता कि ईश्वर आएँगे और सब ठीक करेंगे।
यह हमें बताता है—
“जब हम धर्म के योग्य बनते हैं,
तब ईश्वर हमें ही अपना माध्यम बना लेते हैं।”
और यही विष्णु की सबसे गहन,
सबसे मौन,
सबसे शक्तिशाली लीला है।

सरकारी शिक्षा व्यवस्था : अब सिर्फ सुधार नहीं, निर्णायक कार्रवाई की जरूरत

डॉ. सतीश पाण्डेय
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। देश की रीढ़ कही जाने वाली सरकारी शिक्षा व्यवस्था आज गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। कागजों में करोड़ों के बजट, योजनाओं की लंबी फेहरिस्त और सरकारी मंचों से किए जा रहे दावे अपनी जगह हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन सबके उलटा तस्वीर पेश करती है। सवाल यह नहीं है कि योजनाएं क्यों बनीं, बल्कि यह है कि उनका असर आखिर कहां और किस पर दिखाई दे रहा है?
ग्रामीण अंचलों से लेकर कस्बों तक ऐसे सरकारी विद्यालयों की संख्या कम नहीं, जहां शिक्षक कम और ताले ज्यादा नजर आते हैं। कहीं भवन है पर शिक्षक नहीं, कहीं शिक्षक हैं तो बच्चे नहीं, और जहां बच्चे हैं वहां पढ़ाने का जुनून गायब है। स्मार्ट क्लास, डिजिटल बोर्ड और टैबलेट जैसे शब्द सरकारी फाइलों में जरूर चमकते हैं, लेकिन कक्षाओं में आज भी टूटी कुर्सियां, जर्जर छतें और खामोश ब्लैकबोर्ड सच्चाई बयान करते हैं।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि शिक्षा को सेवा नहीं, योजना बना दिया गया है। मध्यान्ह भोजन, यूनिफॉर्म और छात्रवृत्ति जैसी सुविधाएं मौजूद हैं, लेकिन गुणवत्ता का सवाल लगातार हाशिए पर जा रहा है। हालात इतने खराब हैं कि कई स्थानों पर पांचवीं कक्षा का छात्र दूसरी कक्षा की किताब भी सहजता से नहीं पढ़ पाता। यह स्थिति केवल व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि देश के भविष्य के साथ किया जा रहा खतरनाक प्रयोग है।
शिक्षकों की नियुक्ति, प्रशिक्षण और स्थानांतरण की प्रक्रिया में राजनीति और भ्रष्टाचार ने शिक्षा व्यवस्था को अंदर से खोखला कर दिया है। निरीक्षण व्यवस्था औपचारिक बन चुकी है और जवाबदेही लगभग समाप्त हो गई है। जब जिम्मेदारी तय नहीं होगी, तो सुधार के सभी दावे केवल कागजी साबित होंगे।
अब समय आ गया है कि शिक्षा को फिर से राष्ट्र निर्माण का आधार माना जाए। इसके लिए स्कूलों की नियमित निगरानी, योग्य और प्रतिबद्ध शिक्षकों की पारदर्शी नियुक्ति, स्थानीय समाज की भागीदारी और कठोर जवाबदेही व्यवस्था लागू करना अनिवार्य है। बिना इन कदमों के शिक्षा सुधार की बात केवल भाषणों तक ही सीमित रहेगी।
यदि अब भी सरकारी शिक्षा व्यवस्था को नहीं संभाला गया, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। शिक्षा सिर्फ किताबों का विषय नहीं, बल्कि देश के भविष्य की बुनियाद है। सरकार, प्रशासन और समाज—तीनों को मिलकर अब निर्णायक कदम उठाने होंगे, वरना “सब पढ़े, सब बढ़े” महज एक नारा बनकर रह जाएगा।

महादेव देसाई: गांधी के शब्द, संघर्ष की आत्मा और राष्ट्रवाद वाहक

0

✍️ पुनीत मिश्र

महादेव देसाई भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन अनन्य सिपाहियों में थे, जिनका योगदान मंच से कम और संघर्ष की अंतर्धारा में अधिक दिखाई देता है। वे केवल एक स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं, बल्कि प्रखर राष्ट्रवादी लेखक, अनुवादक, संपादक और लगभग पच्चीस वर्षों तक महात्मा गांधी जी के सबसे विश्वसनीय सचिव व सहयोगी रहे। गांधी जी के विचार, पत्र, डायरी और आंदोलनों की जीवंत धड़कन यदि आज उपलब्ध है, तो उसके पीछे महादेव देसाई की अथक साधना और लेखन-निष्ठा प्रमुख आधार है।

महादेव देसाई का जन्म 1 जनवरी 1892 को सूरत (गुजरात) में हुआ। शिक्षा के दौरान ही उनमें साहित्य, भाषा और सार्वजनिक जीवन के प्रति गहरी रुचि विकसित हो गई थी। उन्होंने कानून की पढ़ाई की, किंतु उनका वास्तविक रुझान राष्ट्रसेवा की ओर था। 1917 में उनका जीवन निर्णायक मोड़ पर आया, जब वे गांधी जी के संपर्क में आए। यहीं से उनका जीवन व्यक्तिगत उन्नति से निकलकर राष्ट्रीय संघर्ष का अविभाज्य हिस्सा बन गया।

गांधी जी के साथ महादेव देसाई का संबंध केवल सचिव और नेता का नहीं था, बल्कि विचारों की साझेदारी, विश्वास और तपस्या का संबंध था। वे गांधी जी के दैनिक पत्र-व्यवहार, भाषणों, यात्राओं और आंदोलनों के साक्षी ही नहीं, बल्कि उनके दस्तावेजी इतिहासकार भी थे। गांधी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ का अंग्रेज़ी अनुवाद हो या ‘हरिजन’ और ‘यंग इंडिया’ जैसे पत्रों का संपादन-महादेव देसाई की भूमिका केंद्रीय रही। उन्होंने गांधी के विचारों को विश्व-भाषा में पहुंचाया, बिना उनके नैतिक स्वर को क्षीण किए।

महादेव देसाई का लेखन राष्ट्रवादी चेतना से ओतप्रोत था। उन्होंने जेल-डायरी, यात्रा-वृत्तांत और वैचारिक टिप्पणियों के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन की आंतरिक दुनिया को शब्द दिए। उनकी ‘जेल डायरी’ केवल व्यक्तिगत अनुभव नहीं, बल्कि औपनिवेशिक दमन के बीच भारतीय आत्मसम्मान की गवाही है। वे भाषा के शिल्पी थे, सरल, स्पष्ट और प्रभावी। अनुवाद करते समय वे मूल भाव को जीवित रखते थे, जिससे गांधी का नैतिक आग्रह पाठक तक उसी तीव्रता से पहुंचता।

ये भी पढ़ें – आत्ममंथन का समय: क्या सरकारी योजनाएं हकदारों तक पहुँच रही हैं या अपात्रों की ढाल बन चुकी हैं?

स्वतंत्रता आंदोलन के कठिन दौर में महादेव देसाई ने कई बार कारावास भी झेला। किंतु न जेल की दीवारें उनकी कलम रोक सकीं, न थकान उनकी निष्ठा डिगा सकी। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान, पुणे के आगा खान पैलेस में गांधी के साथ नजरबंदी के समय 15 अगस्त 1942 को उनका निधन हुआ। ठीक उसी दिन जब गांधी ने ‘करो या मरो’ का आह्वान किया था। यह संयोग नहीं, बल्कि उस जीवन की नियति थी जो अंतिम सांस तक संघर्ष से जुड़ा रहा।

महादेव देसाई का मूल्यांकन किसी पद या प्रसिद्धि से नहीं, बल्कि उस विरासत से होना चाहिए जिसे उन्होंने सहेजा। वे गांधी जी के विचारों के संरक्षक थे। एक ऐसे सेतु, जिसने सत्य, अहिंसा और नैतिक राजनीति को समय और भाषा की सीमाओं से परे पहुंचाया। स्वतंत्र भारत के बौद्धिक इतिहास में उनका स्थान इसलिए अद्वितीय है, क्योंकि उन्होंने स्वयं को केंद्र में रखे बिना इतिहास को सुरक्षित रखा।

ये भी पढ़ें – पद्मविभूषण सत्येन्द्रनाथ बोस: जब भारतीय मेधा ने विश्व भौतिकी की दिशा बदली

आज जब सार्वजनिक जीवन में शब्दों की विश्वसनीयता और नैतिकता दोनों संकट में हैं, महादेव देसाई का जीवन यह याद दिलाता है कि लेखन केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है। वे स्वतंत्रता संग्राम के उन मौन नायकों में थे, जिनके बिना इतिहास अधूरा है और जिनकी छाया में खड़े होकर विचार आज भी रोशनी पाते हैं।

आत्ममंथन का समय: क्या सरकारी योजनाएं हकदारों तक पहुँच रही हैं या अपात्रों की ढाल बन चुकी हैं?

राहत या राजनीति?- क्या सरकारी राहत वास्तव में पात्रों तक पहुँच रही है?या राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में व्यवस्था खोखली हो रही है?

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर नव वर्ष 2026 केवल कैलेंडर का परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह केंद्र और राज्य सरकारों के लिए आत्मविश्लेषण,आत्मस्वीकार और आत्मसुधार का ऐतिहासिक अवसर भी है। लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन जितना महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है सत्ता में रहते हुए अपनी कमियों, खामियों और नीतिगत
असंतुलनों को स्वीकारकर उन्हें सुधारने का संकल्प,आज भारत ही नहीं, बल्कि विश्व केअधिकांश लोकतांत्रिक देश इसी प्रश्न से जूझ रहे हैं कि क्या उनकी सरकारें वास्तविक जरूरतमंदों तक सहायता पहुंचाने में सफल हो पा रही हैं या नहीं।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि वर्तमान प्रतिस्पर्धी राजनीतिक युग में सरकारों और राजनीतिक दलों द्वारा मुफ्त या रियायती सुविधाएँ, नकद हस्तांतरण सब्सिडी, और विशेष छूटें लोकतांत्रिक विमर्श का केन्द्रीय विषय बन चुकी हैं।चुनावी लोकतंत्र में राहत योजनाएँ अबकेवल सामाजिक न्याय का औज़ार नहीं रहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का प्रभावी हथियार बन गई हैं। भारत ही नहीं, विश्व के अनेक लोकतांत्रिक देशों में यह प्रश्न गंभीरता से उठ रहा है कि क्या ये राहतें वास्तव में उनके वास्तविक हकदारों तक पहुँच पा रही हैं या फिर व्यवस्था की खामियों का लाभ अपात्र वर्ग बड़े पैमाने पर उठा रहा है। यह स्थिति न केवल सार्वजनिक संसाधनों के दुरुपयोग की ओर संकेत करती है, बल्कि शासन की नैतिकता और वित्तीय स्थिरता पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।

ये भी पढ़ें – बिजली संकट: रात दो बजे से ठप आपूर्ति, कड़ाके की ठंड में बढ़ी लोगों की परेशानी

साथियों बात अगर हम नव वर्ष 2026 में सरकारों को अपनी कमियों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता को समझने की करें तो, लोकतंत्र में सरकारें त्रुटिहीन नहींहोतीं नीति निर्माण से लेकर क्रियान्वयन तक अनेक स्तरों पर खामियां स्वाभाविक हैं, परंतु समस्या तब उत्पन्न होती है जब इन खामियों को स्वीकार करने के बजाय उन्हें राजनीतिक सफलता का आवरण दे दिया जाता है। भारत में केंद्र और राज्य सरकारों के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे योजनाओं की संख्या बढ़ाने केबजाय उनकी गुणवत्ता,पारदर्शिता और प्रभावशीलता पर ध्यान दें।अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखें तो ओईसीडी देशों स्कैंडिनेवियाई राष्ट्रों और पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं में शासन सुधार का मूल मंत्र पालिसी रिव्यु एंड कोर्स करेक्शन रहा है।भारत में भी नव वर्ष 2026 को सरकारों को यह स्वीकार करना होगा कि कई योजनाएं लक्ष्य से भटक चुकी हैं,कई सब्सिडी अपात्रों तक पहुंच रही हैं और कई सेवाओं में असमानता बढ़ रही है।प्रतिस्पर्धी राजनीति और ‘रेवड़ी संस्कृति’ का विस्तार वर्तमान राजनीतिक युग में चुनावी प्रतिस्पर्धा ने लोक कल्याण को लोकलुभावन वाद में बदल दिया है।मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, मुफ्त यात्रा, नकद हस्तांतरण और विविध प्रकार की रियायतें- इनका उद्देश्य सामाजिक सुरक्षा कम और राजनीतिक लाभ अधिक प्रतीत होने लगा है।अंतरराष्ट्रीय अनुभव बताता है कि लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और दक्षिण एशिया के कई देशों में पॉपुलिस्ट वेलफेयर ने दीर्घकालिक आर्थिक असंतुलन पैदा किया है। भारत में भी यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक है कि क्या मुफ्त सुविधाएं वास्तव में उन लोगों तक पहुंच रही हैं जिनके लिए वे बनाई गई थीं, या फिर मध्यम और उच्च वर्ग भी उनका अनुचित लाभ उठा रहा है।

ये भी पढ़ें – हर थाने में बनेगी साइबर क्राइम डेस्क, डीजीपी राजीव कृष्ण का ऐलान

साथियों बात अगर हम हकदार बनाम अपात्र: कल्याण योजनाओं की सबसे बड़ी चुनौती इसको समझने की करें तो, सरकारी योजनाओं का मूल सिद्धांत टारगेटड डिलीवरी होता है, परंतु व्यवहार में यह सिद्धांत कमजोर पड़ता दिख रहा है। अनेक रिपोर्ट्स और सामाजिक ऑडिट यह संकेत देते हैं कि अपात्र लोग अनेक सरकारी रियायतों का लाभ उठा रहे हैं, जबकि वास्तविक जरूरतमंद या तो वंचित रह जाते हैं या आंशिक लाभ ही प्राप्त कर पाते हैं।यह स्थिति न केवल संसाधनों की बर्बादी है, बल्कि सामाजिक न्याय के सिद्धांत का भी उल्लंघन है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वर्ल्ड बैंक और आईएमफ ने बार-बार कहा है कि लीकेज इन वेलफेयर स्कीमस विकासशील देशों की सबसे बड़ी समस्या है, और भारत इससे अछूता नहीं है।बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा और परिवहन,ये सेवाएं किसी भी आधुनिक राज्य की रीढ़ होती हैं। भारत में सरकारें इन सेवाओं में राहत देने का दावा करती हैं,परंतु जमीनी हकीकत यह है कि शहरी -ग्रामीण,अमीर-गरीब और संगठित -असंगठित वर्गों के बीच असमानता बनी हुई है।अंतरराष्ट्रीय तुलना में देखें तो यूरोप में यूनिवर्सल बेसिक सर्विसेज का मॉडल अपनाया गया है, जहां सेवाएं सस्ती हैं पर मुफ्त नहीं। भारत में मुफ्त सेवाओं की घोषणा तो होती है, लेकिन गुणवत्ता, निरंतरता और समान पहुंच सुनिश्चित नहीं हो पाती।
साथियों बात अगर हम अपात्र लाभार्थियों द्वारा सरकारी सेवाओं का दुरुपयोग:ऑडिट की अनिवार्यता इसको समझने की करें तो,नव वर्ष 2026 में सबसे तात्कालिक आवश्यकता है, सार्वजनिक योजनाओं और सेवाओं का व्यापक, निष्पक्ष और तकनीक-आधारित ऑडिट। अनेक अपात्र लोग एक साथ कई योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं -यह स्थिति न केवल वित्तीय नुकसान पहुंचाती है,बल्कि जनता के विश्वास को भी कमजोर करती है।अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोशल ऑडिट आउटकम ऑडिट और परफॉरमेंस रिव्यु को शासन सुधार का अनिवार्य हिस्सा माना जाता है।भारत में भी कैग,राज्य लेखा परीक्षक और स्वतंत्र संस्थाओं को और अधिक सशक्त बनाना होगा।रेलवे सहित अनेक सरकारी विभागों में कर्मचारियों को उनके सेवा क्षेत्र में मुफ्त या बिना टिकट सुविधाएं दी जाती हैं। यह व्यवस्था ऐतिहासिक और सेवा -शर्तों का हिस्सा रही है, परंतु बदलते समय में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या ये सुविधाएं आज भी न्यायसंगत हैं?जब एक आम नागरिक हर सेवा के लिए भुगतान करता है, तब सरकारी कर्मचारियों को असीमित मुफ्त सेवाएं देना सामाजिक असंतुलन को जन्म देता है। कई विकसित देशों में सरकारी कर्मचारियों को वेतन तो प्रतिस्पर्धी दिया जाता है, परंतु मुफ्त सार्वजनिक सेवाओं की परंपरा सीमित है।
साथियों बात अगर हम मुफ्त सुविधाएं बनाम जवाबदेह राज्य :वैश्विक दृष्टिकोण को समझने की करें तो विश्व के सफल लोकतंत्रों ने यह सिद्ध किया है कि मुफ्त सुविधाएं स्थायी समाधान नहीं हैं।जर्मनी, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में यूजर पेस प्रिंसिपल को सामाजिक सुरक्षा के साथ संतुलित किया गया है। भारत को भी इसी दिशा में सोचने की आवश्यकता है।नव वर्ष 2026 में यह तय करना होगा कि क्या हम एक ऐसा राज्य चाहते हैं जो अल्पकालिक लोकप्रियता के लिए संसाधन बांटे, या एक ऐसा राज्य जो दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता और जिम्मेदार नागरिकता को बढ़ावा दे।..भारत के पास आज आधार, डीबीटी, और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना जैसी मजबूत प्रणालियां हैं। इसके बावजूद यदि अपात्र लाभार्थी योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं, तो यह प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी को दर्शाता है।अंतरराष्ट्रीय अनुभव बताता है कि डेटा इंटेग्रेशन और रियल – टाइम मॉनिटरिंग से कल्याण योजनाओं की प्रभावशीलता कई गुना बढ़ाई जा सकती है। नव वर्ष 2026 को सरकारों को इस दिशा में निर्णायक कदम उठाने होंगे।
साथियों बात अगर हम राजनीतिक दलों की भूमिका : आत्मसंयम और नीति-आधारित राजनीति को समझने की करें तो, केवल सरकारें ही नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों को भी यह समझना होगा कि रेवड़ी संस्कृति लोकतंत्र को कमजोर करती है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत एक जिम्मेदार लोकतंत्र के रूप में उभर रहा है, ऐसे में आंतरिक नीति-निर्माण में भी उसी परिपक्वता की आवश्यकता है।चुनाव घोषणापत्रों में मुफ्त सुविधाओं के बजाय शिक्षा, कौशल, स्वास्थ्य और रोजगार सृजन जैसे ठोस एजेंडे होने चाहिए।
अतः अगर हम अपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि नव वर्ष 2026 – आत्मावलोकन से सुधार तक,नव वर्ष 2026 भारत के लिए केवल विकास का नहीं, बल्कि शासन की गुणवत्ता सुधारने का वर्ष होना चाहिए। केंद्र और राज्य सरकारों को अपनी कमियों को स्वीकार कर, रेवड़ी संस्कृति पर पुनर्विचार कर, अपात्र लाभार्थियों पर लगाम लगाकर और शासकीय विशेषाधिकारों की समीक्षा कर एक संतुलित, न्यायसंगत और जवाबदेह शासन मॉडल की ओर बढ़ना होगा।यही वह मार्ग है जो भारत को न केवल एक मजबूत अर्थव्यवस्था, बल्कि एक वैश्विक स्तर पर आदर्श लोकतंत्र बना सकता है।

-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

पद्मविभूषण सत्येन्द्रनाथ बोस: जब भारतीय मेधा ने विश्व भौतिकी की दिशा बदली

0

✍️ नवनीत मिश्र

भारतीय विज्ञान के इतिहास में सत्येन्द्रनाथ बोस का स्थान एक ऐसे वैज्ञानिक का है, जिसने सीमित साधनों और औपनिवेशिक दौर की बाधाओं के बीच भी विश्व-विज्ञान को नई भाषा दी। बोस-आइंस्टीन स्टेटेस्टिक्स के माध्यम से उन्होंने न केवल क्वांटम भौतिकी को नई समझ दी, बल्कि यह भी सिद्ध किया कि मौलिक चिंतन किसी भी भौगोलिक सीमा का मोहताज नहीं होता।

बचपन से ही विज्ञान की ओर झुकाव

1 जनवरी 1894 को कोलकाता में जन्मे सत्येन्द्रनाथ बोस की प्रतिभा प्रारंभ से ही असाधारण थी। गणित और भौतिकी के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें प्रेसीडेंसी कॉलेज तक पहुंचाया, जहाँ उन्होंने अपनी बौद्धिक क्षमता का स्पष्ट परिचय दिया। यह वही समय था जब भारत में आधुनिक विज्ञान अभी प्रारंभिक अवस्था में था, लेकिन बोस की सोच पहले से ही अंतरराष्ट्रीय स्तर की थी।

शोधपत्र जिसने इतिहास रच दिया

1924 में लिखा गया बोस का शोधपत्र उनके जीवन की दिशा ही नहीं, बल्कि विश्व भौतिकी की धारा भी बदलने वाला सिद्ध हुआ। इस शोध में उन्होंने प्रकाश कणों की व्याख्या के लिए सांख्यिकी की एक बिल्कुल नई पद्धति प्रस्तुत की। जब यह शोध पत्र प्रकाशित होने में कठिनाई आई, तो बोस ने इसे सीधे अल्बर्ट आइंस्टीन को भेज दिया।
आइंस्टीन ने इसकी महत्ता को तुरंत समझा, स्वयं अनुवाद किया और प्रकाशित कराया। यही से बोस-आइंस्टीन स्टेटेस्टिक्स और आगे चलकर बोस-आइंस्टीन संघनन जैसी क्रांतिकारी अवधारणाओं का जन्म हुआ। आधुनिक भौतिकी में “बोसॉन” शब्द का प्रचलन इस बात का प्रमाण है कि बोस का योगदान कितना मूलभूत और स्थायी है।

प्रयोगशाला से कक्षा तक वैज्ञानिक चेतना

सत्येन्द्रनाथ बोस केवल प्रयोगशाला तक सीमित वैज्ञानिक नहीं थे। ढाका विश्वविद्यालय और कलकत्ता विश्वविद्यालय में अध्यापन के दौरान उन्होंने विज्ञान को जीवंत विषय के रूप में प्रस्तुत किया। वे छात्रों को सूत्र याद कराने के बजाय प्रश्न पूछने और तर्क करने के लिए प्रेरित करते थे।
उनका मानना था कि विज्ञान तभी समाज में जड़ें जमाता है, जब वह आम भाषा और सामान्य जीवन से जुड़ता है। इसी सोच के तहत उन्होंने मातृभाषा में विज्ञान शिक्षा और वैज्ञानिक शब्दावली के विकास पर विशेष बल दिया।

ये भी पढ़ें – CHC हॉस्पिटल की NOC रद्द होने पर सियासी घमासान, बसपा विधायक उमाशंकर सिंह का बड़ा आरोप – “विकास रोकना ही इनका एजेंडा”

सम्मान से बड़ी विरासत

भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया। भले ही उन्हें नोबेल पुरस्कार नहीं मिला, लेकिन उनका वैज्ञानिक प्रभाव किसी भी औपचारिक सम्मान से कहीं अधिक व्यापक रहा। आज क्वांटम भौतिकी, लेज़र तकनीक, सुपरफ्लूडिटी और आधुनिक अनुसंधानों में बोस का नाम निरंतर जीवित है।

भारतीय विज्ञान का आत्मविश्वास

सत्येन्द्रनाथ बोस का जीवन इस बात का प्रतीक है कि वैज्ञानिक क्रांति केवल बड़े संस्थानों या संसाधनों से नहीं, बल्कि स्वतंत्र सोच और बौद्धिक साहस से जन्म लेती है। उन्होंने भारतीय विज्ञान को आत्मविश्वास दिया और यह संदेश छोड़ा कि मौलिक विचार कहीं से भी जन्म ले सकते हैं।
आज भी, जब भारत विज्ञान और तकनीक के नए युग में प्रवेश कर रहा है, सत्येन्द्रनाथ बोस की वैचारिक विरासत आने वाली पीढ़ियों को दिशा दिखाती रहेगी।

CHC हॉस्पिटल की NOC रद्द होने पर सियासी घमासान, बसपा विधायक उमाशंकर सिंह का बड़ा आरोप – “विकास रोकना ही इनका एजेंडा”

बलिया (राष्ट्र की परम्परा)। रसड़ा विधानसभा क्षेत्र में प्रस्तावित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) हॉस्पिटल का निर्माण शुरू होने से पहले ही अटक गया है। अस्पताल के लिए जारी की गई अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) को निरस्त किए जाने के बाद जिले की राजनीति गरमा गई है। बसपा विधायक उमाशंकर सिंह ने इसे खुली राजनीतिक साज़िश बताते हुए कुछ “माननीय नेताओं” पर विकास विरोधी मानसिकता का गंभीर आरोप लगाया है।

विधायक उमाशंकर सिंह ने तीखे शब्दों में कहा कि बलिया में कुछ ऐसे नेता हैं, जो खुद विकास का कोई काम नहीं करते, बल्कि जो विकास करना चाहता है, उसका रास्ता रोकने में लगे रहते हैं। उन्होंने कहा कि “रसड़ा की जनता के साथ यह सरासर अन्याय है। स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधा को राजनीति की भेंट चढ़ा दिया गया है।”

राजनीतिक दबाव में रोकी गई स्वास्थ्य परियोजना

विधायक का आरोप है कि CHC हॉस्पिटल के लिए सभी आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी कर ली गई थीं। जमीन, नक्शा और अन्य औपचारिकताएं तय मानकों के अनुरूप थीं, इसके बावजूद राजनीतिक दबाव बनाकर NOC रद्द कराई गई। इससे हजारों लोगों को मिलने वाली सस्ती और सुलभ स्वास्थ्य सेवाओं पर रोक लग गई है। उन्होंने इसे केवल प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि रसड़ा की जनता के अधिकारों पर सीधा हमला बताया।

पहले से ही बदहाल है स्वास्थ्य व्यवस्था

रसड़ा क्षेत्र पहले से ही स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से जूझ रहा है। गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए लोगों को बलिया या वाराणसी तक जाना पड़ता है। ऐसे में CHC हॉस्पिटल खुलने से स्थानीय लोगों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद थी, लेकिन योजना रुकने से आम जनता में गहरा आक्रोश और निराशा देखी जा रही है।

ये भी पढ़ें – हर थाने में बनेगी साइबर क्राइम डेस्क, डीजीपी राजीव कृष्ण का ऐलान

जनता की सेहत या राजनीतिक द्वेष?

CHC हॉस्पिटल की NOC रद्द होने के बाद कई सवाल खड़े हो रहे हैं। क्या जनता की सेहत से ज्यादा अहम राजनीतिक द्वेष है? क्या विकास योजनाएं अब राजनीतिक खींचतान की भेंट चढ़ती रहेंगी? स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं भी राजनीति की शिकार होंगी, तो आम आदमी का भरोसा व्यवस्था से उठ जाएगा।

जिम्मेदार कौन?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर वह कौन सा “माननीय” है, जिसके हस्तक्षेप से रसड़ा की जनता को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा से वंचित किया गया। विधायक उमाशंकर सिंह के बयान के बाद यह मामला केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जनभावनाओं से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन गया है।

उबाल पर रसड़ा

विधायक के आरोपों के बाद रसड़ा विधानसभा क्षेत्र में चर्चाएं तेज हो गई हैं। लोग खुलकर सवाल पूछ रहे हैं कि यदि अस्पताल जैसी जनहित की योजनाएं भी राजनीति की भेंट चढ़ती रहीं, तो विकास का सपना कैसे साकार होगा। अब सभी की निगाहें प्रशासन और सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं।

ये भी पढ़ें – बिजली संकट: रात दो बजे से ठप आपूर्ति, कड़ाके की ठंड में बढ़ी लोगों की परेशानी