Thursday, May 14, 2026
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महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार का राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार, बारामती में उमड़ा जनसैलाब

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बारामती में अंतिम विदाई: भावुक हुए समर्थक, नम आंखों से दी श्रद्धांजलि

बारामती (राष्ट्र की परम्परा डेस्क),।महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार का आज सुबह 11 बजे पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। उनके असामयिक निधन से न केवल महाराष्ट्र बल्कि पूरे देश की राजनीति में शोक की लहर दौड़ गई है। अंतिम संस्कार कार्यक्रम में केंद्रीय और राज्य स्तर के कई वरिष्ठ नेता, अधिकारी और हजारों समर्थक मौजूद रहे।
अजित पवार के पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए बारामती के विद्या प्रतिष्ठान मैदान में रखा गया, जहां सुबह से ही लोगों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। समर्थकों की आंखें नम थीं और माहौल पूरी तरह भावुक बना हुआ था। जैसे ही शव वाहन विद्या प्रतिष्ठान मैदान की ओर बढ़ा, रास्ते के दोनों ओर खड़े लोगों ने अपने प्रिय नेता को अंतिम विदाई दी।

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विमान दुर्घटना में हुआ था निधन
66 वर्षीय अजित पवार का निधन कल सुबह एक चार्टर्ड विमान दुर्घटना में हुआ। वह मुंबई से बारामती जिला पंचायत चुनावों के प्रचार के लिए जा रहे थे, तभी यह दुखद हादसा हुआ। हादसे की खबर मिलते ही राजनीतिक जगत में शोक की लहर फैल गई। राज्य सरकार ने घटना की जांच के आदेश दे दिए हैं।
तीन दिन का राजकीय शोक घोषित
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने अजित पवार के निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए राज्य में तीन दिन के राजकीय शोक और एक दिन के राजकीय अवकाश की घोषणा की। मुख्यमंत्री ने कहा कि अजित पवार का जाना महाराष्ट्र की राजनीति के लिए अपूरणीय क्षति है।

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देश के बड़े नेताओं ने दी श्रद्धांजलि
अजित पवार के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए कई प्रमुख नेता बारामती पहुंचे।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, पीयूष गोयल, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे सहित कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे।
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी सुबह पुणे एयरपोर्ट पहुंचे और सीधे बारामती रवाना हुए। अमित शाह के आगमन को लेकर भी प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए थे। हेलीपैड पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे स्वयं मौजूद रहे।

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समर्थकों का उमड़ा जनसैलाब
अजित पवार के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए बारामती और आसपास के जिलों से हजारों लोग पहुंचे। विद्या प्रतिष्ठान मैदान से लेकर श्मशान घाट तक जनसैलाब दिखाई दिया। समर्थक हाथों में फूल, तस्वीरें और आंखों में आंसू लिए अपने नेता को अंतिम विदाई देने पहुंचे।
परिवार में शोक की लहर
दिवंगत नेता अजित पवार के परिवार में उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार और दो बेटे जय पवार व पार्थ पवार हैं। परिवार के सदस्यों ने गहरे दुख के बीच अंतिम संस्कार की रस्में पूरी कीं।

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पायलट कैप्टन सुमित कपूर से जुड़ी जानकारी
इस दुखद विमान दुर्घटना में विमान के पायलट कैप्टन सुमित कपूर भी शामिल थे। उनके आवास से सामने आई तस्वीरों में परिवार और पड़ोसियों का माहौल बेहद भावुक और तनावपूर्ण नजर आया। प्रशासन द्वारा दुर्घटना के हर पहलू की जांच की जा रही है।
राजनीतिक विरासत और जननेता की पहचान
अजित पवार को एक मजबूत प्रशासक, तेज निर्णय लेने वाले नेता और जमीनी राजनीति से जुड़े जननेता के रूप में जाना जाता था। महाराष्ट्र की राजनीति में उनका योगदान लंबे समय तक याद किया जाएगा।

आजादी के उपेक्षित नायक थे अमिला के पंडित अलगू राय शास्त्री…..

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एक अच्छे साहित्यकार भी थे पंडित अलगू राय शास्त्री

मऊ ( राष्ट्र की परम्परा )

भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के अग्रिम क़तार के नेता पंडित अलगू राय शास्त्री जी का जन्म 29 जनवरी 1900 ईस्वी में अमिला के कोट मुहल्ले तत्कालीन आजमगढ़ जनपद ( वर्तमान में मऊ जनपद में ) उत्तर प्रदेश में हुआ था। इनके पिता द्वारिका राय एक साधारण किसान एवं माता श्रीमती कमला देवी विदुषी एवं धार्मिक महिला थीं। पंडित अलगू राय शास्त्री जी के नामकरण के बारे में बहुचर्चित किवदंती है कि जिस दिन इनका जन्म हुआ उसी दिन इनके घर- द्वार,खेत- खलिहान, धन- संपत्ति का बंटवारा (अलगाव )हुआ, इसी कारण इनके माता-पिता ने इनका नाम अलगू’रखा।

उनकी आरम्भिक शिक्षा…..

प्राथमिक शिक्षा – प्राथमिक पाठशाला अमिला एवं जूनियर हाईस्कूल घोसी में हूई । हाईस्कूल एवं इंटर -हरिश्चंद्र कॉलेज वाराणसी।( गुरु कामेश्वर मिश्र के संरक्षण में ) । उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए वे वाराणसी गये ।

स्नातक तक की शिक्षा काशी विद्यापीठ वाराणसी से प्राप्त की। जब वह स्नातक शिक्षा ग्रहण कर रहे थे उस समय महात्मा गांधी का भारत में आगमन हो गया था और महात्मा गांधी एक बड़े आंदोलन की तैयारी कर रहे थे ।

असहयोग आंदोलन में अलगू जी की भूमिका….

स्नातक में अध्ययन के दौरान 1920 ईस्वी में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी का असहयोग आंदोलन आरंभ हो चुका था अलगू जी एक सच्चे सत्याग्रही की तरह पूरी निष्ठा एवं समर्पण की भावना से इस आंदोलन में कूद पड़े ,जिसके कारण ब्रिटिश शासन ने इन्हें जेल भेज कर बहुत प्रताड़ित किया इस जेल यात्रा से अलगू जी के हृदय में पल रहे देशप्रेम और समाजसेवा के भाव और प्रबल, प्रगाढ़ और मजबूत हो गये। जेल से छूटने के उपरांत 1923 ईस्वी में इन्होंने काशी विद्यापीठ – वाराणसी से शास्त्री की उपाधि हासिल की। 1924 ईस्वी में लाला लाजपत राय द्वारा स्थापित लोक सेवक मंडल ( सर्वेंट आफ पीपुल्स सोसाइटी ,स्थापना- 1921 ईस्वी ) के सक्रिय सदस्य बनें। मां भारती के प्रति सेवाभाव एवं इनकी नेतृत्व क्षमता से प्रभावित होकर इन्हें कार्य क्षेत्र के रूप में मेरठ भेज दिया गया इसी दौरान मेरठ में कुमार आश्रम और गुरुकुल डाबली की स्थापना की गई जहां दलित बच्चों को निःशुल्क एवं बिना भेदभाव के शिक्षा दी जाती थी इसमें अलगू जी ने अध्यापन का कार्य कर अपनी सेवाएं दीं।
1928 ईस्वी में गो बैक साइमन कमीशन,1930 ईस्वी में नमक सत्याग्रह में भी सक्रिय आंदोलनकारी रहे इस दौरान ये कई बार जेल भी गए। 1933 ईस्वी में ऐसा भी समय आया जब अलगू जी के साथ-साथ इनके पूरे परिवार में रामलच्छन राय (भाई),परमेश्वरी देवी (पत्नी), विद्या (बेटी), अरविंद (बेटा) को ब्रिटिश शासन ने जेल भेज कर कठोर यातनाएं दीं।

भारत शासन अधिनियम…

1935 लागू होने के उपरांत 1937 ईस्वी में जब विधानसभाओं के गठन हेतु निर्वाचन की घोषणा हुई तो इनके राजनीतिक सलाहकार रघुवीर सिंह एवं अन्य वरिष्ठ साथियों ने इन्हें मेरठ से चुनाव लड़ने का दबाव बनाया, क्योंकि मेरठ अब इनकी कर्मभूमि बन चुकी थी और यहां वे काफी लोकप्रिय हो चुके थें जबकि इनकी जन्मभूमि (अमिला- आजमगढ़) के लोग भी अपने यहां से चुनाव लड़ने की जिद करने लगे। अलगू जी असमंजस में पड़ गए,काफी राय- मशविरा के बाद अपनी जन्मभूमि वाले निर्वाचन क्षेत्र – सगड़ी- नत्थूपुर से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी से चुनाव लड़ने का फैसला किया। विरोधियों ने आरोप लगाया कि अलगू तो मेरठ में रहते हैं वह बाहरी हैं और नारा भी गढ़ दिया

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“अलगू अलग विलग हो जईहें, जईहें मेरठ सहरिया ना”।
लेकिन अलगू जी बड़े ही सादगी के साथ गांधी जी और नेहरू जी के विचारों को लेकर जनता के बीच में गए और तमाम आरोपों- प्रत्यारोपों के बावजूद अपने प्रतिद्वंद्वी सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार रामनयन शर्मा को 23000 (तेईस हजार)के बड़े अंतर से हराया।
संविधान सभा के सदस्य के रूप में……

संविधान सभा के सदस्य के रूप में अलगू जी की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि जब संविधान सभा में भारत की राजभाषा क्या हो ? इस विषय पर चर्चा हो रही थी तो इन्होंने हिंदी भाषा का समर्थन किया। संविधान सभा में हिंदी राजभाषा के लिए अलगू जी द्वारा दिया गया हिंदी में यह ऐतिहासिक भाषण आज भी संविधान सभा के रिकॉर्ड में संरक्षित है। स्वाधीनता उपरांत एक शानदार , ईमानदार, समाज सेवा की उत्कट भावना , विकास की सोच के साथ संवेदनशील जनप्रतिनिधि के रूप में अलगू राय शास्त्री जी ने शानदार भूमिका निभाई ।
स्वतंत्र भारत के प्रथम आमचुनाव……

1952 ईस्वी में अलगू जी अपने गृह क्षेत्र के संसदीय क्षेत्र आजमगढ़ पूर्व से लोकसभा सांसद निर्वाचित हुए। किसानों की समस्याओं से संसद को ध्यान आकृष्ट करने के लिए अलगू जी संसद में गोंठा की भेली, गुड़ और गोबरैला अनाज लेकर व्याख्या करते हुए कहते हैं कि “भारत कृषि प्रधान देश है,अब स्वतंत्र भी हो चुका है लेकिन आज भी मेरे गृहक्षेत्र के किसानों की हालत बदतर है,सिंचाई की समुचित व्यवस्था नहीं है,सिंचाई के संसाधनों के अभाव में भी वे खून पसीना एक कर खेती कर रहे हैं इसका समाधान करें मान्यवर।
अलगू जी के इसी शानदार भाषण और बेहतर संवाद शैली से प्रभावित होकर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जी ने ‘ पटेल आयोग’ का गठन किया। पटेल आयोग के निरीक्षण के उपरांत क्षेत्र के दोहरीघाट में एशिया की पहली पंप कैनाल स्थापित हुई जो इनके कर्मठ एवं संवेदनशील नेतृत्व की आज भी पहचान है। अलगू जी जीवनपर्यंत सामाजिक, राजनीतिक भागीदारी एवं देशसेवा में समर्पित रहे। 12 फरवरी 1967ईस्वी को अलगू जी का निधन हो गया।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, संविधान सभा के सदस्य, शिक्षाविद् , कानूनविद् ,एवं क्षेत्र से प्रथम लोकसभा का सांसद होने के बावजूद पंडित अलगू राय शास्त्री जी उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं।

बस स्टेशन….

बस स्टेशन मऊ के परिसर में अलगू जी की एक छोटी सी प्रतिमा है। आज वह भी उपेक्षा का शिकार है जनपद मऊ में उनके नाम से ना कोई पार्क है, ना कोई संग्रहालय है,ना कोई कॉलेज है,ना कोई पुस्तकालय है, ना कोई सड़क है जो शासन और प्रशासन की उदासीनता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। स्वामी सहजानंद सरस्वती और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस से सीधा संवाद करने वाले अलगू राय शास्त्री के नाम कोई न कोई प्रतिष्ठान स्थापित किया जाना चाहिए ।

बहाना यूजीसी, इरादा मनु की प्रेतसिद्धि

लेखक— बादल सरोज


बीते कुछ दिनों से एक संगठित कुनबा पूरी तेजी के साथ समाज में उबाल पैदा करने की कोशिश में लगा है। वही पुराना तरीका अपनाया जा रहा है—अधूरी जानकारी में तड़का, अफवाहों का प्रसार और व्हाट्सऐप विश्वविद्यालय से उपजा अज्ञान। जाति-श्रेष्ठता के वायरस को संक्रामक बनाकर पहले से ही कमजोर समाज को और बीमार किया जा रहा है। मकसद भी वही पुराना है: सामाजिक न्याय के किसी भी आधे-अधूरे प्रयास को “हिंदू समाज के लिए खतरा” बताना और सदियों पुराने वर्चस्वकारी, अमानवीय जातिगत उत्पीड़न को “शास्त्रसम्मत परंपरा” घोषित करना।
इस बार बहाना बना है यूजीसी के नए नियम। कुछ कथित बुद्धिजीवी इन्हें सवर्ण समुदाय के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बताकर उन्माद फैला रहे हैं, और संयोग से जाति विशेष में जन्मे कुछ भोले लोग इस शोरगुल के पीछे छिपी चाल को समझे बिना उसी जाल में उलझते जा रहे हैं।

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नफरती भाषणों के लिए कुख्यात चेहरे, जो कभी गांधी से लेकर एपीजे अब्दुल कलाम तक पर अपशब्दों की बौछार कर चुके हैं, आज यूजीसी के नियमों को “डेथ वारंट” कह रहे हैं। कुछ कवि, अफसर और छुटभैये नेता अपने-अपने मंचों से इस आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। इस्तीफों की घोषणाएँ, उग्र पोस्टर और तुलना रोलेट एक्ट से—यह सब उसी प्रायोजित व्यथा का हिस्सा है।
इस शोर को समझने के लिए जरूरी है कि पहले यह जाना जाए कि ये नियम वास्तव में हैं क्या, क्यों लाए गए और किस प्रक्रिया से बने।
क्या हैं यूजीसी के नए नियम?
13 जनवरी 2026 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने नियमावली के नियम 3(सी) में संशोधन करते हुए “उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता के संवर्धन संबंधी नियम, 2026” अधिसूचित किए, जो 15 जनवरी से लागू हैं। यह कोई पहली पहल नहीं है। वर्ष 2012 में भी ऐसे नियम बने थे, लेकिन उनकी लगभग पूरी तरह विफलता के कारण इन्हें प्रभावी बनाने के लिए नए प्रावधान जोड़े गए।
इन नियमों के तहत प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान में इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर, संस्थान प्रमुख की अध्यक्षता में इक्विटी कमेटी, साल में दो बार सार्वजनिक रिपोर्ट, 24×7 हेल्पलाइन, छात्रावासों और विभागों में इक्विटी स्क्वाड, त्वरित शिकायत निस्तारण और एक स्वतंत्र ओम्बुड्समैन की व्यवस्था अनिवार्य की गई है। साथ ही जाति, धर्म, लिंग, विकलांगता और जन्मस्थान के आधार पर होने वाले भेदभाव को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है।

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क्यों लाने पड़े ये नियम?
ये नियम किसी सरकार की सदाशयता का परिणाम नहीं हैं, बल्कि दलित, आदिवासी और वंचित समुदायों के छात्रों के खिलाफ बढ़ते जातिगत उत्पीड़न और आत्महत्याओं की भयावह श्रृंखला की पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का नतीजा हैं।
रोहित वेमुला, पायल तड़वी, दर्शन सोलंकी और आईआईटी व अन्य संस्थानों के कई छात्रों की आत्महत्याएँ इस अमानवीय व्यवस्था का कड़वा सच हैं। यूजीसी ने स्वयं सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार किया कि पिछले पांच वर्षों में जातिगत भेदभाव की शिकायतों में 118 प्रतिशत से अधिक वृद्धि हुई है, जबकि लंबित मामलों में यह आंकड़ा 500 प्रतिशत तक पहुँचा है।
कैसे बने ये नियम?
सुप्रीम कोर्ट ने 2025 में स्पष्ट निर्देश दिया कि 2012 के नियमों की विफलता को देखते हुए एक प्रभावी ढाँचागत व्यवस्था बनाई जाए। इसके बाद यूजीसी ने मसौदा जारी कर सार्वजनिक सुझाव लिए, संसदीय स्थायी समिति ने समीक्षा की और अंततः 13 जनवरी 2026 को इन्हें लागू किया गया।

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साफ़ छुपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं
85 प्रतिशत से अधिक आबादी से जुड़े छात्रों के लिए बनाए गए इन न्यूनतम सुरक्षा उपायों पर इतना कोहराम इस बात का प्रमाण है कि असल डर समानता से है। यह वर्णाश्रम की उस मानसिकता का आर्तनाद है, जो किसी भी सुधार को अपने प्रभुत्व पर खतरा मानती है। खुलकर जाति-श्रेष्ठता का समर्थन नहीं कर पाने के कारण, झूठी अफवाहों के सहारे सवर्ण एकता का भ्रम रचा जा रहा है।
यही है ‘हिंदू राष्ट्र’ का असली चेहरा
जिसे पहले धर्म कहा गया, फिर सनातन और अब खुले तौर पर वर्णाधारित ब्राह्मणवादी व्यवस्था के रूप में स्थापित करने की कोशिश हो रही है। यह वही सोच है जिसने हर सामाजिक सुधार का विरोध किया और आज तक अपने ऐतिहासिक अन्यायों के लिए माफी नहीं मांगी।

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खेल की असलियत और जनता की भूमिका
जो लोग रोजगार, शिक्षा और सार्वजनिक संसाधनों के विनाश पर चुप रहे, वे आज समानता के नियमों को “डेथ वारंट” बता रहे हैं। सवाल यह है कि भारत किस दिशा में जाएगा—संविधान की राह पर या मनुस्मृति की परछाईं में। तटस्थ रहना अब विकल्प नहीं है, क्योंकि जैसा कहा गया है, तटस्थता भी अपराध बन जाती है।

भजनों की सुरधारा में डूबे श्रोता, अनूप जलोटा की स्वर-लहरियों ने बांधा समां

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मगहर/संत कबीर नगर (राष्ट्र की परम्परा)। मगहर महोत्सव के पहले दिन की संध्या पूरी तरह भक्ति संगीत के नाम रही। भजन सम्राट अनूप जलोटा की प्रस्तुति ने पंडाल को सुर, श्रद्धा और भक्ति की सुरधारा में डुबो दिया। उनके भजनों पर श्रोता भाव-विभोर होकर झूमते नजर आए।
कार्यक्रम की शुरुआत अनूप जलोटा ने लोकप्रिय भजन “ऐसी लागी लगन, मीरा हो गई मगन…” से की। पहले ही भजन ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। इसके बाद “मेरी झोपड़ी के भाग आज खुल जाएंगे, राम आएंगे…” की प्रस्तुति पर पूरा पंडाल सुर में सुर मिलाते हुए गुनगुनाने लगा।

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“इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कम न हो” सुनाकर उन्होंने श्रोताओं में नई ऊर्जा भर दी। इसके बाद “काशी बदली, अयोध्या बदली, अब मथुरा की बारी है, राम खड़े लिए धनुष, अब बंशी बजने वाली” और “बोलो राम बोलो” जैसे भजनों के जरिए उन्होंने श्रद्धालुओं को भक्ति के सागर में डुबो दिया।

भजनों के इस कारवां के बाद अनूप जलोटा ने ग़ज़लों की ओर रुख किया। “तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो, क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो” की प्रस्तुति पर जमकर तालियां बजीं। वहीं “होंठों को छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर लो…” पर भी दर्शकों ने खुलकर सराहना की। “दमादम मस्त कलंदर” से लेकर “छाप तिलक सब छीनी” तक की प्रस्तुति ने पूरे पंडाल को बांधे रखा।

करीब दो घंटे तक चले इस संगीतमय कार्यक्रम में अनूप जलोटा ने भक्ति, ग़ज़ल और सूफियाना रंग का ऐसा समां बांधा कि दर्शक पूरे कार्यक्रम के दौरान अपनी जगह से हिले तक नहीं। महोत्सव का पहला दिन इस यादगार संध्या के साथ खास बन गया।

इस अवसर पर धनघटा विधायक गणेश चौहान, जिलाधिकारी आलोक कुमार, एसडीएम अरुण कुमार, सीओ अमित सिंह, यातायात प्रभारी परमहंस, ईओ वैभव सिंह, पूर्व चेयरमैन नूरुज्जमा अंसारी, कोतवाली प्रभारी पंकज पांडेय सहित बड़ी संख्या में गणमान्य लोग और संगीत प्रेमी मौजूद रहे।

इंटरलॉकिंग सड़क बनी गंदगी का अड्डा

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लार/देवरिया(राष्ट्र की परम्परा) वार्डवासियों में आक्रोश
लार नगर पंचायत क्षेत्र के तिवारी टोला में बुधवार को इंटरलॉकिंग सड़क पर भारी गंदगी जमा होने से स्थानीय लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। सड़क पर फैली गंदगी के कारण क्षेत्र में दुर्गंध फैल रही है, जिससे संक्रामक बीमारियों के फैलने का खतरा बढ़ गया है।

यूजीसी समानता विनियम 2026: सामाजिक न्याय बनाम संवैधानिक संतुलन पर गंभीर बहस

स्थानीय निवासियों का कहना है कि नगर पंचायत द्वारा नियमित साफ-सफाई नहीं कराए जाने के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई है। वार्डवासियों ने आरोप लगाया कि कई बार शिकायत के बावजूद भी सफाई व्यवस्था पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
वार्ड निवासी संतोष तिवारी, योगेश तिवारी और विनोद मिश्रा सहित अन्य लोगों ने बताया कि यह इंटरलॉकिंग सड़क स्वर्गीय पशुपति तिवारी के आवास तक जाती है, लेकिन इसके बावजूद नगर प्रशासन की लापरवाही के चलते यहां सफाई नहीं हो पा रही है।
स्थानीय लोगों ने नगर पंचायत प्रशासन से मांग की है कि जल्द से जल्द क्षेत्र में साफ-सफाई कराई जाए और स्वच्छता व्यवस्था को नियमित किया जाए, ताकि वार्डवासियों को गंदगी और बीमारी के खतरे से राहत मिल सके।

डुहा गांव में पारिवारिक विवाद बना हिंसा की वजह

नशे में चूर चाचा की दबंगई से खूनी बवाल, डुहा गांव में कुदाल से सिर पर वार, नाबालिग शामिल


बलिया (राष्ट्र की परम्परा)। बलिया जिले के सिकंदरपुर थाना क्षेत्र अंतर्गत डुहा गांव में बुधवार तड़के एक घरेलू विवाद ने अचानक हिंसक और खूनी रूप ले लिया। नशे में धुत चाचा की कथित दबंगई, गाली-गलौज और उग्र व्यवहार ने पूरे परिवार को दहशत में डाल दिया। हालात इतने बिगड़ गए कि आत्मरक्षा में किए गए कुदाल के वार से एक व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हो गया। इस घटना के बाद गांव में तनाव और भय का माहौल बना हुआ है।

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प्राप्त जानकारी के अनुसार, डुहा गांव निवासी अनिल कुमार प्रजापति (40 वर्ष), पुत्र रामकिशन प्रजापति, जो ऋषिकेश में राजमिस्त्री का कार्य करता है, दो दिन पहले ही अपने घर लौटा था। आरोप है कि बुधवार सुबह लगभग 3 बजे वह शराब के नशे में अपनी भाभी के दरवाजे पर पहुंचा और जोर-जोर से गाली-गलौज करने लगा। परिजनों ने उसे शांत कराने का प्रयास किया, लेकिन नशे में चूर अनिल और अधिक आक्रामक होता चला गया।
हंगामे की आवाज सुनकर परिवार के अन्य सदस्य भी जाग गए। इसी दौरान घर का 16 वर्षीय नाबालिग भतीजा बीच-बचाव के लिए आगे आया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, विवाद बढ़ते-बढ़ते हाथापाई में बदल गया। हालात बेकाबू होते देख घबराए किशोर ने पास में रखी खेतिहर औजार कुदाल उठा ली और आत्मरक्षा में वार कर दिया।

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कुदाल का वार अनिल कुमार के सिर पर लगा, जिससे वह मौके पर ही लहूलुहान होकर गिर पड़ा। सिर में गंभीर चोट लगने के कारण काफी मात्रा में खून बहने लगा। घटना के बाद घर और गांव में अफरा-तफरी मच गई। आनन-फानन में परिजन और ग्रामीण घायल को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सिकंदरपुर ले गए, जहां डॉक्टरों ने प्राथमिक उपचार के बाद उसकी हालत गंभीर बताई। सिर में गहरी चोट होने के कारण उसे निगरानी में रखा गया है।
घटना को लेकर दोनों पक्षों की ओर से अलग-अलग दावे सामने आए हैं। घायल पक्ष का आरोप है कि नाबालिग और उसकी मां ने मिलकर जान से मारने की नीयत से हमला किया। वहीं दूसरे पक्ष का कहना है कि अनिल कुमार लगातार शराब के नशे में गाली-गलौज कर रहा था और परिवार की सुरक्षा के लिए आत्मरक्षा में यह कदम उठाना पड़ा।

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इस पूरे मामले में प्रभारी निरीक्षक सिकंदरपुर मूलचंद चौरसिया ने बताया कि घायल के मेडिकल परीक्षण के आधार पर मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। पुलिस मामले की गहन जांच कर रही है। नाबालिग की संलिप्तता को देखते हुए किशोर न्याय अधिनियम के तहत आवश्यक विधिक प्रक्रिया अपनाई जा रही है। गांव में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस लगातार निगरानी कर रही है।
यह घटना एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती है कि नशा किस तरह पारिवारिक रिश्तों को तोड़कर हिंसा में बदल देता है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते नशे पर नियंत्रण और पारिवारिक विवादों का समाधान किया जाए, तो ऐसे हादसों से बचा जा सकता है।

यूजीसी समानता विनियम 2026: सामाजिक न्याय बनाम संवैधानिक संतुलन पर गंभीर बहस

यदि झूठी शिकायतों पर दंड का प्रावधान नहीं जोड़ा गया, तो यह नियम सामाजिक न्याय के बजाय सामाजिक विभाजन का कारण बन सकते हैं?

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर दुनियाँ के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में दिनांक 28 जनवरी 2026 को संसद के बजट सत्र के प्रथम दिन  माननीय राष्ट्रपति ने संसद के सभी सदनों को संबोधित करते हुए कहा 2014 की शुरुआत में सामाजिक सुरक्षा योजनाएं केवल 25 करोड़ नागरिकों तक ही पहुंच पा रही थीं। मेरी सरकार के निरंतर प्रयासों से आज लगभग 95 करोड़ भारतीयों को सामाजिक सुरक्षा का लाभ मिल रहा है,तो दूसरी ओर शिक्षा क्षेत्र में सामाजिक सुरक्षा के लिए सवर्णो का आंदोलन छिड़ाहुआ है।हम जानते हैं कि वैश्विक स्तरपर भारत का उच्च शिक्षा तंत्र केवल ज्ञान का केंद्र नहीं है,बल्कि यह सामाजिक न्याय, समानता और संवैधानिक मूल्यों का संवाहक भीहै।विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) इस पूरे ढांचे का नियामक स्तंभ है,जिसके नियम देश के लाखों छात्रों, शिक्षकों और प्रशासकों के जीवन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। 13 जनवरी 2026 को यूजीसी द्वारा अधिसूचित और 15 जनवरी से प्रभावी किए गए उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना विनियम, 2026 इसी परंपरा का हिस्सा हैं। इन नियमों का घोषित उद्देश्य एससी,एसटी और अब पहली बार ओबीसी समुदायों के छात्रों व शिक्षकों को जातिगत भेदभाव से सुरक्षा प्रदान करना है। उद्देश्य निस्संदेह संवैधानिक है,किंतु जिस प्रकार से दो महत्वपूर्ण संशोधन किए गए हैं,मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि उन्होंने पूरे देश में गंभीर संवैधानिक, कानूनी और नैतिक बहस को जन्म दे दिया है।इन नियमों के लागू होते ही बिहार,उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश,राजस्थान सहित कई राज्यों में सवर्ण समाज के संगठनों द्वारा विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। विरोध का कारण आरक्षण नहीं, बल्कि कानूनी प्रक्रिया में असमानता और झूठी शिकायतों पर दंड के प्रावधान का पूर्ण अभाव है।आलोचकों का कहना है कि ये नियम सामाजिक न्याय के नाम पर संविधान के अनुच्छेद 21 तथा 14 (समानता का अधिकार) और नेचुरल जस्टिस (प्राकृतिक न्याय) की मूल भावना को कमजोर करते हैं। 

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साथियों बात अगर हम यूजीसी का अधिकार क्षेत्र और उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी को समझने की करें तो यूजीसी जिसे अंग्रेज़ी में यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन कहा जाता है,देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था का केंद्रीय नियामक निकाय है। 12वीं के बाद स्नातक, स्नातकोत्तर, पीएचडी या शोध, हर स्तर पर छात्र-छात्राएं किसी न किसी रूप में यूजीसी के नियमों के अधीन आते हैं। यूजीसी का दायित्व केवल फंडिंग या मान्यता देना नहीं है,बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि शिक्षा प्रणाली संवैधानिक मूल्यों, न्याय, समानता और मानव गरिमा के अनुरूप संचालित हो।इसी दायित्व के तहत पहले एससी-एसटी अत्याचार निवारण कानून,आंतरिक शिकायत समितियां और समान अवसर केंद्र बनाए गए। अब 2026 के विनियमों में दो बड़े संशोधन किए गए हैं,पहला ओबीसी समुदाय को भी औपचारिक रूप से जातिगत भेदभाव के दायरे में शामिल किया गया है,यह एक ऐतिहासिक कदम है परंतु दूसरा झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायत पाए जाने पर शिकायतकर्ता के विरुद्ध कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी,यह इसके क्रियान्वयन में संतुलन की कमी गंभीर चिंता का विषय बन गई है। बस इसी बात पर सारे देश में स्वर्ण संगठन आंदोलन कर रहे हैं और हंगामा आगे और बढ़ाने की संभावना ज़ोरो से व्यक्ति के जारी है। 

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साथियों बात अगर हम इन संशोधनों को गहराई से समझने की करें तोपहला संशोधित प्रावधान:ओबीसी को जातिगत भेदभाव की परिभाषा में शामिल करना,यूजीसी द्वारा किया गया पहला बड़ा संशोधन यह है कि अब अन्य पिछड़ा वर्ग(ओबीसी) के छात्र और शिक्षक भी उसी तरह जातिगत भेदभाव के संरक्षण दायरे में आ गए हैं,जैसे एससी और एसटी समुदाय पहले से थे। यह निर्णय सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, क्योंकि ओबीसी समुदाय की बड़ी आबादी आज भी शिक्षा संस्थानों में सूक्ष्म और अप्रत्यक्ष भेदभाव का सामना करती है।हालांकि, आलोचना यह नहीं है कि ओबीसी को सुरक्षा क्यों दी गई, बल्कि यह है कि सुरक्षा का दायरा एकतरफा बना दिया गया है। यदि किसी सामान्य (जनरल कैटेगरी) वर्ग केछात्र या शिक्षक पर ओबीसी, एससी या एसटी से जुड़े किसी व्यक्ति द्वारा जातिगत भेदभाव का आरोप लगाया जाता है,तो उस पर कठोर संस्थागत प्रक्रिया शुरू हो जाती है जांच, निलंबन, प्रशासनिक कार्रवाई और सामाजिक बदनामी,ये सभी उस व्यक्ति के जीवन को अपूरणीय क्षति पहुँचा सकते हैं।समस्या तब और गहरी हो जाती है जब अंततः शिकायत झूठी सिद्ध हो जाए। नियमों में ऐसी स्थिति में शिकायतकर्ता के खिलाफ किसी भी प्रकार की कार्रवाई का कोई प्रावधान नहीं है। यह एकतरफा संरचना न केवल असंतुलित है, बल्कि संविधान की आत्मा के विरुद्ध भी है। दूसरा संशोधित प्रावधान:-झूठी शिकायतों पर दंड कापूर्ण अभाव,यूजीसी विनियम 2026 का दूसरा और सबसे विवादास्पद संशोधन यह है कि झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायत पाए जाने पर शिकायतकर्ता के विरुद्ध कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी। पहले के नियमों और कई विश्वविद्यालयीय कोड ऑफ कंडक्ट में कम से कम अनुशासनात्मक कार्रवाई का विकल्प खुला रहता था। अब उसे पूरी तरह हटा दिया गया है। यह प्रावधान आलोचकों के अनुसार कानूनी दुरुपयोग को संस्थागत वैधता देता है। किसी भी जनरल कैटेगरी के व्यक्ति के खिलाफ यदि जातिगत भेदभाव का आरोप लगता है, तो वह दोषी सिद्ध होने से पहले ही सामाजिक रूप से अपराधी मान लिया जाता है। उसकी नौकरी, शोध, पदोन्नति और सामाजिक प्रतिष्ठा सब कुछ दांव पर लग जाता है। लेकिन यदि वर्षों बाद वह निर्दोष साबित होता है, तब भी न्याय अधूरा रह जाता है, क्योंकि जिसने झूठा आरोप लगाया, उस पर कोई जवाबदेही नहीं होती। 

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साथियों बात अगर हम नेचुरल जस्टिस और अनुच्छेद 14 का उल्लंघन इसको समझने की करें तो,भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानून के समान संरक्षण की गारंटी देता है। नेचुरल जस्टिस का मूल सिद्धांत है,कोई भी व्यक्ति बिना सुनवाई के दोषी नहीं ठहराया जाएगा और दोष सिद्ध होने पर ही दंड मिलेगा। यूजीसी के नए विनियम इन दोनों सिद्धांतों को कमजोर करते प्रतीत होते हैं।जब एक वर्ग को पूर्ण संरक्षण और दूसरे वर्ग को केवल दंड का सामना करना पड़े, तो यह समानता नहीं, बल्कि संरक्षित असमानता बन जाती है। न्यायपालिका ने भी कई फैसलों में कहा है कि सामाजिक न्याय का अर्थ प्रतिशोध नहीं, बल्कि संतुलन है। यदि झूठी शिकायतों पर कोई अंकुश नहीं होगा,तो यह व्यवस्था अंततः उसी सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुँचाएगी, जिसे बचाने के लिए यह नियम बनाए गएहैं। 

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साथियों बात अगर हम संशोधन की स्थिति के बाद शिक्षा क़े माहौल और सामाजिक ध्रुवीकरण को समझने की करें तो,इन संशोधित नियमों का सबसे बड़ा प्रभाव विश्वविद्यालय परिसरों के शैक्षणिक वातावरण पर पड़ेगा। शिक्षक और प्रशासक निर्णय लेने से डरेंगे, छात्र खुलकर संवाद करने से हिचकेंगे और हर असहमति को जातिगत चश्मे से देखा जाने लगेगा। इससे विश्वास का संकट पैदा होगा, जो किसी भी ज्ञान- आधारित संस्थान के लिए घातक है।साथ ही, सवर्ण और आरक्षित वर्गों के बीच पहले से मौजूद सामाजिक तनाव और गहरा हो सकता है। यदि न्याय एकतरफा प्रतीत होगा,तो प्रतिक्रिया भी सामाजिक स्तर पर असंतुलित होगी। यह स्थिति अंततः उसी सामाजिक न्याय के उद्देश्य को कमजोर कर देगी, जिसके लिए ये नियम बनाए गए हैं। 

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साथियों बात अगर हम यूजीसी समानता विनियम, 2026:- सुप्रीम कोर्ट में संभावित चुनौती क़े संक्षिप्त ढांचे को समझने की करें तो (1)अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन, यूजीसी के नए विनियम जाति-आधारित भेदभाव की शिकायतों में एकतरफा संरक्षण प्रदान करते हैं। एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के शिकायतकर्ताओं को पूर्ण सुरक्षा दी गई है, जबकि जनरल कैटेगरी के आरोपी व्यक्ति को समान कानूनी संरक्षण नहीं मिलता। झूठी शिकायत सिद्ध होने पर भी शिकायतकर्ता के खिलाफ कोई दंडात्मक प्रावधान न होना, कानून के समक्ष समानता और समान संरक्षण के सिद्धांत का सीधा उल्लंघन है।(2) नेचुरल जस्टिस (प्राकृतिक न्याय) का हनन,विनियमों में आरोपी के लिए प्रभावी सेफगार्ड्स का अभाव है। बिना प्रारंभिक जांच के कठोर संस्थागत कार्रवाई, तथा अंततः शिकायत झूठी पाए जाने पर भी शिकायतकर्ता की जवाबदेही न तय करना, (3) आधार केवल शिकायतकर्ता की जाति और आरोपी की सामाजिक श्रेणी है, न कि कृत्य की गंभीरता या प्रमाण। सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांत के अनुसार, कोई भी वर्गीकरण,बुद्धिसंगत आधार और उद्देश्य से तार्किक संबंध पर खरा उतरना चाहिए। यह विनियम इस कसौटी पर विफल होते हैं। (4) न्यायिक समीक्षा से बचने का प्रयास,झूठी शिकायतों पर दंड हटाना संस्थागत दुरुपयोग को बढ़ावा देता है और न्यायिक हस्तक्षेप को अप्रभावी बनाता है। यह रूल ऑफ़ लॉ और डयू प्रोसेस की अवधारणा को कमजोर करता है।(5) अनुपातहीनता का सिद्धांत, भेदभाव रोकने के उद्देश्य से बनाए गए उपाय अत्यधिक कठोर हैं और कम दखल वाले विकल्प उपलब्ध होने के बावजूद उन्हें नहीं अपनाया गया। इससे अधिकारों पर अनावश्यक और अनुपातहीन प्रतिबंध लगता है। 

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साथियों बात अगर हम इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के संदर्भ से समझने की करें तो यदि हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखें,तो संयुक्त राष्ट्र की यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स और इंटरनेशनल कोवनेंट ऑन सिविल एंड पॉलिटिकल राइट्स दोनों ही यह स्पष्ट करते हैं कि न्याय प्रक्रिया निष्पक्ष,संतुलित और जवाबदेह होनी चाहिए। किसी भी एंटी-डिस्क्रिमिनेशन कानून में फ्रिवोलस या मैलिशियस शिकायतों के खिलाफ सुरक्षा तंत्र मौजूद होता है। यूरोप अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी नस्लीय या जातीय भेदभाव के खिलाफ सख्त कानून हैं, लेकिन वहाँ झूठे आरोपों पर दंड का स्पष्ट प्रावधान होता है। भारत में यदि यूजीसी के नियम इस संतुलन को नहीं अपनाते, तो यह अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी सवाल खड़े कर सकता है कि क्या भारत का उच्च शिक्षा तंत्र निष्पक्षता के वैश्विक मानकों पर खरा उतरता है। 

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अतः अगर हम अपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि यूजीसी के समानता विनियम, 2026 का उद्देश्य सही है,जातिगत भेदभावका अंत और सुरक्षित शैक्षणिक वातावरण लेकिन उद्देश्य की पवित्रता, साधनों की त्रुटियों को नहीं ढकसकती ओबीसी को सुरक्षा देना जरूरी है,लेकिन उसी के साथ न्यायिक संतुलन,उत्तरदायित्व और समानता भी उतनी हीआवश्यक है।यदि झूठी शिकायतों पर दंड का प्रावधान नहीं जोड़ा गया, तो यह नियम सामाजिक न्याय के बजाय सामाजिक विभाजन का कारण बन सकते हैं। संविधान का अनुच्छेद 14 और नेचुरल जस्टिस केवल कानूनी शब्द नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा हैं। यूजीसी और सरकार की जिम्मेदारी है कि वे इस आत्मा का सम्मान करें और नियमों में आवश्यक संशोधन कर न्याय को संतुलित, निष्पक्ष और विश्वसनीय बनाएं।

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संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

मगहर महोत्सव 2026 में गूंजेगी 1857 की क्रांति की दास्तान

‘दास्तानगोई: अज़ीज़नबाई’ में इतिहास, संगीत और रंगमंच का संगम

मगहर/संत कबीर नगर (राष्ट्र की परम्परा)। संत कबीर मगहर महोत्सव-2026 के सांस्कृतिक मंच पर स्वतंत्रता आंदोलन की अनसुनी दास्तान जीवंत होने जा रही है। 1857 की क्रांति की पृष्ठभूमि पर आधारित म्यूजिकल ड्रामा ‘दास्तानगोई: अज़ीज़नबाई’ के माध्यम से लखनऊ की तहज़ीब, तवायफों की दुनिया और आज़ादी के संघर्ष को दास्तानगोई की पारंपरिक शैली में प्रस्तुत किया जाएगा।
सृजन वेलफेयर सोसायटी द्वारा प्रस्तुत इस नाट्य कृति की लेखिका अरशाना अजमत हैं, जबकि इसका संपूर्ण निर्देशन रंगमंच कलाकार एवं फिल्म अभिनेत्री डॉ. सीमा मोदी ने किया है। मंच पर किस्सागो के रूप में सौम्या आदित्री और सीमा मोदी स्वयं मौजूद रहेंगी। किस्सागोई के साथ नाट्य दृश्यों, संगीत और नृत्य का संयोजन इस प्रस्तुति को एक प्रभावशाली म्यूजिकल ड्रामा का रूप देता है।
नाटक में 1857 के गदर, क्रांतिकारी तात्या टोपे, सामाजिक बदलाव और उस दौर के संघर्ष को संवेदनशीलता के साथ पिरोया गया है। देशभक्ति और स्वतंत्रता आंदोलन की भावना से ओतप्रोत यह प्रस्तुति दर्शकों को इतिहास से जोड़ते हुए भावनात्मक अनुभव प्रदान करेगी।

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यह सांस्कृतिक कार्यक्रम 29 जनवरी 2026 को शाम 5 बजे से मगहर महोत्सव परिसर के मुख्य मंच पर आयोजित होगा। प्रस्तुति में डॉ. सीमा मोदी, सौम्या आदित्री, कैफ़ अली, आयुषी गुप्ता, मनु आनंद, सुब्रत त्रिपाठी, सत्यम सिंह राजपूत, प्रांजल और अभिषेक शर्मा की सहभागिता रहेगी। सृजन शक्ति वेलफेयर सोसाइटी, लखनऊ द्वारा प्रस्तुत यह कार्यक्रम मगहर महोत्सव का एक प्रमुख आकर्षण होगा।

अखंड ज्योति का संदेश: आत्मिक प्रकाश से सामाजिक परिवर्तन तक

अखंड ज्योति: अंधकार के युग में मानव चेतना को प्रकाशित करने वाली शाश्वत लौ

कैलाश सिंह

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)।आज का समय बाहरी चकाचौंध और तकनीकी प्रगति से भरा हुआ है, लेकिन इसके समानांतर मानव मन के भीतर का अंधकार भी गहराता जा रहा है। सुविधाएँ बढ़ी हैं, पर संवेदनाएँ सिमटती जा रही हैं। इसी पृष्ठभूमि में अखंड ज्योति केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि मानव चेतना को जाग्रत करने वाली वह शाश्वत लौ है, जो हर काल में समाज को दिशा देती रही है।
अखंड ज्योति का वास्तविक अर्थ केवल दीपक की निरंतर जलती लौ तक सीमित नहीं है। यह जीवन में निरंतर सत्य, संयम, करुणा और आत्मबोध को जीवित रखने का प्रतीक है। जब मनुष्य स्वार्थ, हिंसा, लालच और वैमनस्य के अंधकार में घिर जाता है, तब अखंड ज्योति उसे यह स्मरण कराती है कि सच्चा प्रकाश बाहरी नहीं, बल्कि भीतर से उत्पन्न होता है।

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मानव इतिहास इस तथ्य का साक्षी रहा है कि जब-जब समाज अज्ञान और अधर्म की ओर बढ़ा, तब-तब अखंड ज्योति किसी न किसी रूप में प्रज्वलित हुई। कभी ऋषि-मुनियों की तपस्या में, कभी संतों के वचनों में, तो कभी समाज सुधारकों के विचारों और आंदोलनों में यह ज्योति मानवता का मार्गदर्शन करती रही। यही ज्योति बताती है कि धर्म का वास्तविक स्वरूप कर्मकांड नहीं, बल्कि सेवा, सद्भाव और सत्यनिष्ठ आचरण है।
आज की युवा पीढ़ी मानसिक तनाव, दिशाहीनता और नैतिक भ्रम से जूझ रही है। सोशल मीडिया और प्रतिस्पर्धा के इस दौर में आत्मिक संतुलन तेजी से खो रहा है। ऐसे समय में अखंड ज्योति का संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। यह युवाओं को आत्मनिरीक्षण, संयम और उद्देश्यपूर्ण जीवन की ओर प्रेरित करती है। अखंड ज्योति सिखाती है कि सफलता केवल धन या पद नहीं, बल्कि एक सजग, संवेदनशील और जिम्मेदार मनुष्य बनना है।

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समाज के स्तर पर भी अखंड ज्योति की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। बढ़ती असहिष्णुता, सामाजिक विभाजन और मानवीय मूल्यों के क्षरण के बीच यह शाश्वत लौ समाज को जोड़ने का कार्य करती है। यह याद दिलाती है कि जब प्रकाश साझा किया जाता है, तो वह कम नहीं होता, बल्कि और अधिक उज्ज्वल बनता है। एक व्यक्ति की सकारात्मक चेतना पूरे समाज में परिवर्तन की लहर उत्पन्न कर सकती है।
अखंड ज्योति एक साथ चेतावनी भी है और आशा भी। चेतावनी इस बात की कि यदि आत्मिक प्रकाश बुझ गया, तो समाज दिशाहीन हो जाएगा। और आशा इस विश्वास की कि जब तक एक भी ज्योति जलती रहेगी, तब तक अंधकार की पराजय निश्चित है। यही विश्वास मानव सभ्यता को संकट के समय में भी आगे बढ़ने की शक्ति देता है।

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आज आवश्यकता है कि हम अखंड ज्योति को केवल मंदिरों, अनुष्ठानों या प्रतीकों तक सीमित न रखें। इसे अपने विचारों, व्यवहार, सामाजिक दायित्वों और दैनिक जीवन में उतारें। जब हमारे शब्द सत्य से, कर्म करुणा से और निर्णय विवेक से संचालित होंगे, तभी यह ज्योति वास्तव में अखंड रहेगी।
अंततः अखंड ज्योति मानव चेतना का वह प्रकाश है, जो अंधकार को कोसने के बजाय स्वयं प्रकाश बनकर मार्ग दिखाता है। यही शाश्वत लौ भविष्य की दिशा तय करती है और मानवता को उसके मूल उद्देश्य की याद दिलाती है।

भव सगरा पोखरा: पांडवों की तपोभूमि से जुड़ी लोकआस्थाएं

महाभारत काल से जुड़ा भव सगरा पोखरा: आस्था, इतिहास और संस्कृति का जीवंत संगम

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)।उत्तर प्रदेश के जनपद महराजगंज में परतावल क्षेत्र के समीप स्थित भव सगरा पोखरा केवल एक प्राचीन जलस्रोत नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता, धार्मिक आस्था और पौराणिक इतिहास का अमूल्य प्रतीक माना जाता है। यह स्थल लोकमान्यताओं के अनुसार महाभारत काल से जुड़ा हुआ है, जिससे इसकी ऐतिहासिक और धार्मिक महत्ता और अधिक बढ़ जाती है। आज भी यह पोखरा ग्रामीण जनमानस में श्रद्धा, विश्वास और सांस्कृतिक चेतना का केंद्र बना हुआ है।
महाभारत काल से जुड़ी लोककथाएं
स्थानीय जनश्रुतियों और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही कथाओं के अनुसार, अज्ञातवास के समय पांडवों ने भव सगरा पोखरा के समीप कुछ समय व्यतीत किया था। बताया जाता है कि पांडवों ने अपने दैनिक स्नान, जल उपयोग, यज्ञ-अनुष्ठान और साधना के लिए इसी पोखरे के पवित्र जल का उपयोग किया। आसपास के वन क्षेत्र को तपोभूमि माना जाता है, जहां ऋषि-मुनियों और साधकों का आवागमन रहा।

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भव सगरा नाम का आध्यात्मिक अर्थ
भव सगरा नाम को लेकर भी कई धार्मिक और दार्शनिक मान्यताएं प्रचलित हैं। ग्रामीणों के अनुसार ‘भव’ का अर्थ संसारिक कष्टों और जन्म-मरण के बंधन से है, जबकि ‘सगरा’ का अर्थ विशाल सागर से है। इस प्रकार भव सगरा पोखरा संसारिक दुखों से मुक्ति और आत्मिक शुद्धता का प्रतीक माना जाता है। इसी आस्था के कारण श्रद्धालु यहां स्नान, पूजा और मनोकामना पूर्ति के लिए दूर-दूर से आते हैं।
धार्मिक अनुष्ठानों का प्रमुख केंद्र
प्राचीन काल से ही भव सगरा पोखरा धार्मिक गतिविधियों का केंद्र रहा है। अमावस्या, पूर्णिमा, मकर संक्रांति, कार्तिक स्नान और अन्य पावन तिथियों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां एकत्र होकर पूजा-अर्चना करते हैं। मान्यता है कि यहां स्नान करने से पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-शांति की प्राप्ति होती है।

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ऐतिहासिकता के संकेत और संभावनाएं
हालांकि महाभारत काल से जुड़े ठोस लिखित प्रमाण सीमित हैं, लेकिन लोक परंपराएं, सामाजिक स्मृति, पोखरे की प्राचीन बनावट और आसपास के स्थल इसकी प्राचीनता की ओर स्पष्ट संकेत करते हैं। ग्रामीणों के अनुसार समय-समय पर साफ-सफाई या सीमित खुदाई के दौरान पुराने अवशेष मिलने की चर्चाएं सामने आती रही हैं। यदि इस स्थल पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से पुरातात्विक खुदाई और शोध कराया जाए, तो इसके ऐतिहासिक महत्व से जुड़े महत्वपूर्ण प्रमाण सामने आ सकते हैं।

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सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का केंद्र
वर्तमान समय में भव सगरा पोखरा केवल धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण का केंद्र भी बन चुका है। यहां आयोजित धार्मिक अनुष्ठान, सामूहिक पूजा और छोटे मेलों के माध्यम से ग्रामीणों में आपसी भाईचारा और सांस्कृतिक जुड़ाव मजबूत होता है।
संरक्षण और पर्यटन की आवश्यकता
आज के समय में भव सगरा पोखरा जैसे ऐतिहासिक और आस्थावान स्थलों के संरक्षण और सौंदर्यीकरण की अत्यंत आवश्यकता है। यदि प्रशासन, स्थानीय जनप्रतिनिधि और जनसहभागिता के माध्यम से इसके संरक्षण की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं, तो यह स्थल धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन के रूप में विकसित हो सकता है। इससे न केवल स्थानीय पहचान मजबूत होगी, बल्कि रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलेगा।

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आस्था, इतिहास और संस्कृति का संगम
भव सगरा पोखरा अतीत की गौरवशाली परंपराओं का साक्षी है, जो आज भी अपनी पवित्रता और महत्ता को बनाए हुए है। यह स्थल आने वाली पीढ़ियों को भारतीय संस्कृति, धार्मिक आस्था और पौराणिक इतिहास से जोड़ने का कार्य करता रहेगा।

Colombia Plane Crash: Satena विमान हादसे में सांसद समेत 15 की मौत

Colombia Plane Crash News:
कोलंबिया और वेनेजुएला की सीमा से सटे नॉर्टे डे सैंटेंडर प्रांत में बुधवार को एक बड़ा विमान हादसा हो गया। Satena एयरलाइन का व्यावसायिक विमान Beechcraft 1900D टेकऑफ के कुछ ही मिनट बाद दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें सवार सभी 15 लोगों की मौत हो गई। मृतकों में एक मौजूदा सांसद और एक चुनावी उम्मीदवार भी शामिल हैं।

टेकऑफ के बाद टूटा एयर ट्रैफिक कंट्रोल से संपर्क

Satena फ्लाइट 8895 ने कोलंबिया के कुकूटा शहर से उड़ान भरी थी और इसे ओकाना एयरपोर्ट पर लैंड करना था। उड़ान के दौरान अचानक विमान का एयर ट्रैफिक कंट्रोल (ATC) से संपर्क टूट गया। काफी देर तक कोई सिग्नल न मिलने पर प्रशासन ने तत्काल सर्च ऑपरेशन शुरू किया।

पहाड़ी इलाके में मिला मलबा

कुछ घंटों की तलाश के बाद विमान का मलबा एक दुर्गम और पहाड़ी क्षेत्र में मिला, जो वेनेजुएला सीमा के पास स्थित है। अधिकारियों ने पुष्टि की कि विमान में सवार सभी 13 यात्री और 2 क्रू मेंबर्स की मौके पर ही मौत हो गई।

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सांसद और चुनावी उम्मीदवार की भी मौत

इस हादसे में कोलंबिया की चैंबर ऑफ डेप्युटीज के सदस्य डियोजेनेस क्विंटेरो और आगामी चुनावों में हिस्सा ले रहे विधायी उम्मीदवार कार्लोस साल्सेडो की भी जान चली गई। दोनों अपने राजनीतिक दलों की टीम के साथ यात्रा कर रहे थे। हादसे की खबर मिलते ही देशभर में शोक की लहर दौड़ गई।

मौसम और जंगल बने राहत कार्य में बाधा

दुर्घटना स्थल घने जंगल और पहाड़ी क्षेत्र में होने के कारण राहत एवं बचाव कार्य में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। बदलते मौसम और खराब भौगोलिक परिस्थितियों ने मलबे तक पहुंचने में समय लगाया।

हादसे की जांच जारी

फिलहाल विमान हादसे के कारणों को लेकर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। कोलंबियाई विमानन एजेंसियां और सुरक्षा अधिकारी मामले की गहन जांच में जुटे हुए हैं।

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भागलपुर में गैस सिलेंडर फटने से मचा हड़कंप, झोपड़ी जलकर राख

🔥 भागलपुर में सिलेंडर ब्लास्ट: चाय बनाते समय झोपड़ी में लगी आग, बाल-बाल बचे परिजन


देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)भागलपुर सिलेंडर ब्लास्ट की एक बड़ी घटना बुधवार को सामने आई, जब देवरिया जनपद के मईल थाना क्षेत्र अंतर्गत भागलपुर पुलिस चौकी से महज 500 मीटर की दूरी पर एक झोपड़ी में गैस सिलेंडर फट गया। इस हादसे में झोपड़ी पूरी तरह जलकर खाक हो गई, हालांकि राहत की बात यह रही कि किसी प्रकार की जनहानि नहीं हुई।
चाय बनाते समय हुआ हादसा
मिली जानकारी के अनुसार, भागलपुर के दक्षिण टोला स्थित चौरसिया ढाबा के समीप दूधनाथ यादव अपने घोठा (झोपड़ी) में चाय बना रहे थे। इसी दौरान अचानक गैस सिलेंडर की पाइप में आग लग गई। कुछ ही पलों में आग ने झोपड़ी को अपनी चपेट में ले लिया। आग की लपटें देखकर घर में मौजूद लोग घबरा गए और जान बचाकर बाहर निकल आए।
जोरदार धमाके से दहला इलाका
आग की तीव्रता बढ़ने के कारण झोपड़ी में रखा छोटा घरेलू गैस सिलेंडर अचानक तेज धमाके के साथ फट गया। भागलपुर सिलेंडर ब्लास्ट की आवाज इतनी तेज थी कि आसपास के लोग सहम गए और इलाके में अफरातफरी मच गई। झोपड़ी कच्ची होने के कारण आग ने तेजी से फैलकर घर में रखा अनाज, कपड़े, बर्तन और दैनिक उपयोग का सारा सामान जला दिया।
ग्रामीणों ने किया आग बुझाने का प्रयास
धमाके की आवाज सुनकर आसपास के ग्रामीण मौके पर पहुंचे और अपने स्तर से आग बुझाने का प्रयास किया। हालांकि तब तक झोपड़ी पूरी तरह जल चुकी थी। समय रहते लोग बाहर निकल गए, नहीं तो यह भागलपुर सिलेंडर ब्लास्ट एक बड़ी जनहानि का कारण बन सकता था।
पुलिस चौकी की नजदीकी पर उठे सवाल
घटना को लेकर स्थानीय लोगों में चर्चा रही कि यह गंभीर हादसा भागलपुर पुलिस चौकी से मात्र 500 मीटर की दूरी पर हुआ। लोगों का कहना है कि यदि आग पर काबू पाने में थोड़ी भी देरी होती, तो आसपास की अन्य झोपड़ियां भी इसकी चपेट में आ सकती थीं। प्रशासनिक सतर्कता और अग्नि सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
कोई जनहानि नहीं, लेकिन बड़ा नुकसान
इस भागलपुर सिलेंडर ब्लास्ट में किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है, लेकिन पीड़ित परिवार का भारी नुकसान हुआ है। झोपड़ी में रखा सारा घरेलू सामान जलकर राख हो गया। पीड़ित परिवार ने प्रशासन से मदद की गुहार लगाई है।

मध्यस्थता अभियान 2.0 से न्यायिक प्रक्रिया होगी और अधिक सरल

आगरा,(राष्ट्र की परम्परा)l न्यायिक प्रक्रिया को सरल, त्वरित और जनहितकारी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के तहत राष्ट्र के लिए मध्यस्थता अभियान 2.0 को प्रभावी रूप से लागू करने के उद्देश्य से बुधवार को जनपद आगरा में एक महत्वपूर्ण समीक्षा बैठक आयोजित की गई। यह बैठक मा. जनपद न्यायाधीश एवं अध्यक्ष, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, आगरा संजय कुमार मलिक की अध्यक्षता में संपन्न हुई, जिसमें जनपद के समस्त न्यायिक अधिकारीगण उपस्थित रहे।
यह अभियान राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण, नई दिल्ली एवं उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, लखनऊ के दिशा-निर्देशों के क्रम में संचालित किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य न्यायालयों में लंबित मामलों का सुलह-समझौते के माध्यम से त्वरित निस्तारण कर आम जनता को शीघ्र न्याय उपलब्ध कराना है।
मध्यस्थता को प्राथमिकता देने के निर्देश
समीक्षा बैठक के दौरान मा. जनपद न्यायाधीश संजय कुमार मलिक ने सभी न्यायिक अधिकारियों को निर्देशित किया कि वे ऐसे मामलों को चिन्हित करें, जिनका निस्तारण मध्यस्थता (Mediation) के माध्यम से संभव है। उन्होंने कहा कि मध्यस्थता न केवल न्यायालयों पर भार कम करती है, बल्कि वादकारियों के समय, धन और मानसिक तनाव की भी बचत करती है।
उन्होंने स्पष्ट रूप से निर्देश दिए कि अधिक से अधिक उपयुक्त पत्रावलियों को मध्यस्थता हेतु संदर्भित किया जाए तथा मध्यस्थों को भी यह सुनिश्चित करने के लिए प्रेरित किया जाए कि वे त्वरित, निष्पक्ष और प्रभावी मध्यस्थता कर अधिकाधिक मामलों का समाधान करें।
पूर्व अभियान की सफलता से मिली प्रेरणा
बैठक में विनीता सिंह प्रथम, सचिव (पूर्णकालिक), जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, आगरा ने जानकारी देते हुए बताया कि पूर्व वर्ष राष्ट्र के लिए मध्यस्थता अभियान के अंतर्गत बड़ी संख्या में ऐसे वाद चिन्हित किए गए थे, जिनका निस्तारण सुलह-समझौते के माध्यम से सफलतापूर्वक किया गया।
उन्होंने बताया कि पिछले अभियान में पारिवारिक विवाद, वैवाहिक मामले, धन वसूली, आपसी विवाद जैसे अनेक प्रकरणों का समाधान बिना लंबी न्यायिक प्रक्रिया के किया गया, जिससे वादकारियों को शीघ्र राहत मिली और अभियान अत्यंत सफल सिद्ध हुआ।
अभियान 2.0 में अधिक व्यापक स्तर पर कार्य
इसी सफलता को दृष्टिगत रखते हुए राष्ट्र के लिए मध्यस्थता अभियान 2.0 को और अधिक व्यापक रूप में संचालित किया जा रहा है। इस चरण में अधिक से अधिक मामलों को चिन्हित कर उन्हें मध्यस्थता के लिए भेजा जा रहा है, ताकि न्यायिक प्रणाली को अधिक प्रभावी और जन-अनुकूल बनाया जा सके।
विनीता सिंह प्रथम ने कहा कि यह अभियान न केवल न्यायालयों के लिए बल्कि आम नागरिकों के लिए भी अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगा, क्योंकि इससे वर्षों से लंबित मामलों का समाधान आपसी सहमति से संभव हो सकेगा।
मीडिया से सहयोग की अपील
सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, आगरा द्वारा जनपद की प्रिंट मीडिया एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से भी अपील की गई कि वे राष्ट्र के लिए मध्यस्थता अभियान 2.0 का अधिक से अधिक प्रचार-प्रसार करें, जिससे आम जनता को इस अभियान की जानकारी मिल सके और वे अपने लंबित मामलों के निस्तारण के लिए मध्यस्थता का लाभ उठा सकें।
उन्होंने कहा कि मीडिया की सकारात्मक भूमिका से आम नागरिकों में विधिक जागरूकता बढ़ेगी और न्याय तक पहुंच और अधिक सरल होगी।
जिला कारागार आगरा में विधिक जागरूकता शिविर का आयोजन
इसी क्रम में दिनांक 28 जनवरी 2026 को जिला कारागार, आगरा के महिला बैरक में विधिक जागरूकता शिविर का आयोजन किया गया। इस शिविर का उद्देश्य निरुद्ध महिला बंदियों को उनके विधिक अधिकारों से अवगत कराना एवं उन्हें निःशुल्क विधिक सहायता की जानकारी देना रहा।
शिविर में नागेश सिंह (कारापाल), मेघा राजपूत, अंजनी सिंह (डिप्टी जेलर/उप कारापाल) सहित अन्य अधिकारी उपस्थित रहे।
महिला बंदियों को दी गई विधिक अधिकारों की जानकारी
शिविर के दौरान महिला बंदियों को निःशुल्क विधिक सहायता, जेल लोक अदालत, चश्मा वार्निंग, जमानत संबंधी अधिकार, अपील प्रक्रिया एवं अन्य संवैधानिक अधिकारों के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई। बंदियों को बताया गया कि वे जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के माध्यम से बिना किसी शुल्क के विधिक सहायता प्राप्त कर सकती हैं।
पुरुष बैरकों का भी किया गया निरीक्षण
इसके अतिरिक्त जिला कारागार के समस्त पुरुष बैरकों का निरीक्षण भी किया गया। निरीक्षण के दौरान निरुद्ध बंदियों से जातिगत भेदभाव, साफ-सफाई एवं अन्य मूलभूत सुविधाओं को लेकर जानकारी ली गई। किसी भी बंदी द्वारा किसी प्रकार की समस्या व्यक्त नहीं की गई।
फिर भी निरीक्षण के दौरान उपस्थित कारापाल को निर्देशित किया गया कि जेल परिसर में स्वच्छता, मानवीय व्यवहार तथा किसी भी प्रकार के जातिगत भेदभाव से पूर्णतः मुक्त वातावरण सुनिश्चित किया जाए।
न्याय को जन-जन तक पहुंचाने की दिशा में सशक्त पहल
राष्ट्र के लिए मध्यस्थता अभियान 2.0 और कारागारों में विधिक जागरूकता शिविर जैसे कार्यक्रम यह दर्शाते हैं कि न्यायपालिका एवं विधिक सेवा प्राधिकरण आम नागरिकों को त्वरित, सुलभ और सस्ता न्याय उपलब्ध कराने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। यह पहल न केवल न्यायिक सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण है, बल्कि समाज में विश्वास और समरसता को भी मजबूत करती है।

बाबा कालीचरण फुटबॉल प्रतियोगिता के फाइनल में गाजीपुर ने सिवान को हराकर जीती ट्रॉफी

भागलपुर/देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी श्री श्री 1008 बाबा कालीचरण फुटबॉल प्रतियोगिता का भव्य आयोजन किया गया। गाजीपुर और सिवान की टीमों के बीच हुए फाइनल मुकाबले में जब जज्बा, कौशल और अनुशासन एक साथ मैदान पर उतरे तो खेल प्रेमियों को यादगार मुकाबला देखने को मिला। बाबा कालीचरण स्पोर्टिंग फुटबॉल क्लब द्वारा आयोजित इस महामुकाबले में गाजीपुर (मिस्टर इंडिया) की टीम ने सिवान (यूनाइटेड क्लब/IFC) को पराजित कर चमचमाती ट्रॉफी अपने नाम कर ली।
मैच के दौरान दोनों टीमों के बीच कड़ी टक्कर देखने को मिली और दर्शकों की सांसें अंत तक थमी रहीं। निर्णायक क्षणों में गाजीपुर के खिलाड़ी सरफराज अहमद (जर्सी नंबर 11) ने शानदार गोल दागकर मैच का रुख अपनी टीम की ओर मोड़ दिया। सिवान की टीम ने बराबरी के लिए पूरा जोर लगाया, लेकिन गाजीपुर की मजबूत रक्षापंक्ति के सामने उनके प्रयास सफल नहीं हो सके। अंततः गाजीपुर विजेता और सिवान उप-विजेता रही।
मैच के रोमांच को और भी खास बना दिया मशहूर कमेंटेटर फिरोज खान उर्फ बुलेट की जोशीली और प्रभावशाली कमेंट्री ने। उनके अंदाज-ए-बयां ने पूरे स्टेडियम को उत्साह से भर दिया, जिसकी चर्चा दर्शकों के बीच खूब रही।
खेल के साथ-साथ आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने भी माहौल को रंगीन बना दिया। मुरली सिंह प्रेमी, अवनीश प्रेमी तथा गोल्डन लाइफ चिल्ड्रन एकेडमी के नन्हे बच्चों की प्रस्तुतियों ने उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया। एकेडमी के प्रबंधक संतोष सैनी और शिक्षकों के मार्गदर्शन में दी गई प्रस्तुतियों की अतिथियों ने सराहना की।
फाइनल मुकाबले में क्षेत्र की कई जानी-मानी हस्तियों की उपस्थिति रही। समाजसेवी अभय मिश्रा, पूर्व विधायक स्वामीनाथ यादव, पूर्व फुटबॉलर रामराज यादव सहित रोशन यादव, विजय जायसवाल, सुशील चौरसिया, अभिषेक सिंह, अनुपम मिश्रा, हिमांशु सिंह, आदिल अंसारी और विकास ने कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई।
प्रतियोगिता के अध्यक्ष और समाजसेवी अजय यादव के नेतृत्व में ग्रामीण युवाओं ने आयोजन को सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई। मैच का संचालन मुख्य रेफरी अजीजुल हसन और शब्बीर अहमद ने किया, जबकि लाइनमैन के रूप में मज्जबर रहमान और रिंकू ने सटीक निर्णय दिए।
विजेता गाजीपुर टीम के कप्तान बरकतउल्लाह रहे, जबकि कोच की भूमिका अमानुल्लाह ने निभाई। टीम में उबैद, मोनू, अफजल, बालाजी, अमीर आजम, मोहम्मद अलकमा, अबू बकर, भोलू, नजीर, खोजेमा, इब्राहिम, शाहिद और हाशिम शामिल रहे।
उप-विजेता सिवान (IFC) टीम की कप्तानी सोनू यादव ने की। टीम में आरिफ, अर्सलान, सोनू, अप, विवेक, बृजेश, हसन, राजू, रत्नेश्वर, हर्ष, अर्जुन और जाहिद शामिल रहे।
आयोजन के समापन पर वक्ताओं ने कहा कि खेल एकता, अनुशासन और भाईचारे का संदेश देता है, और इस प्रतियोगिता ने ग्रामीण क्षेत्र में खेल प्रतिभाओं को मंच प्रदान करने का कार्य किया है।

आगरा में गुजरात के युवाओं ने बिखेरी संस्कृति और भाईचारे की मिसाल

आगरा, (राष्ट्र की परम्परा)l युवाओं को राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक समरसता और नेतृत्व क्षमता से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में इंटरस्टेट यूथ एक्सचेंज प्रोग्राम 2026 का सफल समापन मंगलवार को यूथ होस्टल, संजय पैलेस, आगरा में किया गया। यह कार्यक्रम मेरा युवा भारत, आगरा द्वारा युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय, भारत सरकार के मार्गदर्शन में आयोजित किया गया, जिसमें गुजरात राज्य से आए युवाओं ने सक्रिय सहभागिता की।
कार्यक्रम का उद्देश्य देश के विभिन्न राज्यों के युवाओं को एक-दूसरे की संस्कृति, परंपरा, भाषा और जीवन शैली से परिचित कराना तथा उनमें राष्ट्रीय एकता और भाईचारे की भावना को मजबूत करना रहा। समापन समारोह पूरे दिन अनुशासन, सकारात्मक ऊर्जा और प्रेरणादायी वातावरण में संपन्न हुआ।
योग और ध्यान सत्र से हुई समापन समारोह की शुरुआत

समापन कार्यक्रम की शुरुआत गुजरात से आए युवाओं के लिए विशेष रूप से आयोजित योग एवं ध्यान सत्र से की गई। इस सत्र का उद्देश्य युवाओं को मानसिक शांति, आत्मसंयम, सकारात्मक सोच और स्वस्थ जीवनशैली के प्रति जागरूक करना था। प्रशिक्षकों ने योग को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाने पर बल देते हुए कहा कि स्वस्थ शरीर और शांत मन ही सफलता की कुंजी है।
गरिमामयी अतिथियों की उपस्थिति ने बढ़ाई कार्यक्रम की शोभा
समापन समारोह में जिला सूचना अधिकारी शैलेन्द्र कुमार शर्मा, जिला पंचायती राज अधिकारी आगरा मनीष कुमार तथा जिला युवा अधिकारी आगरा डॉ. श्रवण कुमार सहगल की गरिमामयी उपस्थिति रही। मंचासीन अतिथियों का पारंपरिक तरीके से माल्यार्पण एवं अंगवस्त्र (पटका) पहनाकर स्वागत किया गया तथा स्मृति-चिह्न भेंट कर सम्मानित किया गया।
राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने का सशक्त माध्यम: शैलेन्द्र शर्मा
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जिला सूचना अधिकारी शैलेन्द्र कुमार शर्मा ने कहा कि भारत सरकार द्वारा आयोजित इस प्रकार के इंटरस्टेट यूथ एक्सचेंज प्रोग्राम युवाओं को एक-दूसरे से जोड़ने का सशक्त माध्यम हैं। उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक, खेल एवं शैक्षिक गतिविधियों के माध्यम से युवाओं को विभिन्न राज्यों की परंपराओं, ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों से परिचित कराया जाता है, जिससे आपसी समझ और राष्ट्रीय एकता को बल मिलता है।
उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे ऐसे कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर भाग लें और देश की एकता एवं अखंडता को मजबूत करने में अपनी भूमिका निभाएं।
युवा ही राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति: डॉ. श्रवण कुमार सहगल
जिला युवा अधिकारी आगरा डॉ. श्रवण कुमार सहगल ने अपने संबोधन में कहा कि आज का युवा भारत की सबसे बड़ी शक्ति है। यदि युवा अपनी ऊर्जा को सही दिशा में लगाएं तो राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को और तेज किया जा सकता है। उन्होंने अनुशासन, सकारात्मक सोच और निरंतर परिश्रम को सफलता का मूल मंत्र बताते हुए कहा कि स्पष्ट लक्ष्य और आत्मविश्वास के साथ कोई भी उपलब्धि असंभव नहीं है।
संकल्प और आत्मविश्वास से ही भविष्य का निर्माण: मनीष कुमार
जिला पंचायती राज अधिकारी आगरा मनीष कुमार ने युवाओं को जीवन में स्पष्ट संकल्प लेने और आने वाली चुनौतियों का आत्मविश्वास के साथ सामना करने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे कार्यक्रम युवाओं को नेतृत्व, सहयोग और सामाजिक जिम्मेदारी का बोध कराते हैं।
गुजरात के युवाओं की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने मोहा मन
समारोह के दौरान गुजरात के सुरेंद्रनगर, सूरत, राजकोट, अहमदाबाद सहित विभिन्न जिलों से आए 38 सदस्यीय युवा प्रतिनिधिमंडल ने अपनी समृद्ध संस्कृति और परंपराओं को दर्शाते हुए आकर्षक सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ दीं। देशभक्ति गीतों, लोकनृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने पूरे वातावरण को उल्लासपूर्ण बना दिया। दर्शकों ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ युवाओं का उत्साहवर्धन किया।
प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र और स्मृति उपहार
कार्यक्रम के अंत में अतिथियों एवं जिला युवा अधिकारी आगरा द्वारा सभी प्रतिभागी युवाओं को प्रमाण-पत्र एवं स्मृति-उपहार प्रदान किए गए। आयोजकों ने युवाओं के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए उन्हें भविष्य में भी इस प्रकार के कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया।
सहयोगियों का रहा अहम योगदान
इस सफल आयोजन को व्यवस्थित एवं प्रभावी बनाने में राजेन्द्र शर्मा, अंकित, आशु रानी शर्मा, अमन, दीक्षा, रविकांत सहित अन्य सहयोगियों का विशेष योगदान रहा। उनके सामूहिक प्रयासों से कार्यक्रम पूरी तरह सफल रहा।