दिसंबर की
इस अंतिम शाम ने पूछा
क्या बात है
इतने उदास क्यों हो!
लेखा जोखा है
हमारे पास
गुजरे हुए साल का
तीन सौ पैंसठ दिनों का
उनमें भी चौबीस घंटे का
चौबीस घंटों में एक एक मिनट का
गुजरे हुए हर सेकंड का।
लेखा जोखा है
क्षण प्रति क्षण
मन में उठे उल्लास का
शहनाई, ढोल के बजने से
मदमस्त होने वाली धुनों के बीच
आह्लादित करने वाली
सतरंगी ध्वनियों के मायाजाल का।
लेखा जोखा है
दुनिया में चल रहे युद्धों का
युद्धों और
जैविक युद्धों की आशंका
से भयाक्रांत मन का;
उथल पुथल और
आशंकाओं के बीच
शांति की तलाश का
लेखा जोखा है।
लेखा जोखा है
मोहल्ले में चुनावी ऐलानों के बीच से
निकलने वाले अपनेपन का
जो परिणामों के बाद
एक नीरव शून्यता में समा जाती हैं।
लेखा जोखा है
घनश्याम चाट वाले की मृत्यु का
जो ठेले पर लगाता था
चाट की दुकान।
जहां घमंजे सी
गुजर जाती थी जिंदगी।
इधर
राम नाम सत्य है
की धुन से कई अपनों के
परलोक चले जाने की पीड़ा
मन को सालती है।
राम नाम के चक्र में
गुजरती हुई जिंदगी को
कल सुबह की है प्रतीक्षा।
एक नए वर्ष की प्रतीक्षा
जनवरी की पहली तारीख
जिसमें है नव जीवन का उल्लास।
रचनाकार : विनय कांत मिश्र
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