प्रयागराज ( राष्ट्र की परम्परा डेस्क)इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक चौंकाने वाले फैसले में उस व्यक्ति को बरी कर दिया, जिसे 2020 में पॉक्सो एक्ट और बलात्कार के मामले में निचली अदालत ने दोषी ठहराया था। यह मामला व्यक्ति की चचेरी बहन द्वारा यौन शोषण का आरोप लगाए जाने से जुड़ा था। न्यायालय ने इस फैसले के जरिए न सिर्फ आरोपी को राहत दी, बल्कि रिश्तेदारों द्वारा “कानून के दुरुपयोग” पर भी कड़ी टिप्पणी की।
🧾 फैसले की मुख्य बातें:9 साल जेल में बिताने के बाद व्यक्ति को निर्दोष करार दिया गया। न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की एकल पीठ ने यह कहते हुए फैसला सुनाया कि –
“आजकल संपत्ति विवादों में या पारिवारिक झगड़ों के चलते गंभीर आरोप लगाने का चलन आम हो गया है। अदालतें इस सच्चाई से आंखें नहीं मूंद सकतीं।”
कोर्ट का आदेश पुलिस को:
न्यायालय ने पुलिस को स्पष्ट आदेश दिया कि वह बरी हुए व्यक्ति को उसके घर का वैध कब्जा दिलवाए, क्योंकि यह आशंका जताई गई है कि उसे साजिश के तहत जेल भिजवा कर उसकी संपत्ति हड़पने की कोशिश की गई थी।
⚖️ POCSO एक्ट और IPC की धाराएं बनी थीं हथियारयह मामला उन खतरनाक प्रवृत्तियों की ओर इशारा करता है जहां रिश्तेदार आपसी रंजिश में कानून का सहारा लेकर किसी निर्दोष को फँसाने का प्रयास करते हैं। आरोपी पर IPC की धारा 376 (बलात्कार) और POCSO अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज हुआ था।📢 न्यायालय की चेतावनी:न्यायमूर्ति विद्यार्थी ने टिप्पणी की – “ऐसे मामलों में अदालतों को अत्यधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है, ताकि न्याय के नाम पर अन्याय न हो। अगर कानून का इस तरह दुरुपयोग होता रहा, तो यह उन असली पीड़ितों के लिए भी नुकसानदायक होगा, जिनके साथ वाकई अत्याचार हुआ है।”
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