Tuesday, April 21, 2026
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अक्षय तृतीया पर जिला कारागार में सजी रचनात्मकता—महिला बंदियों की मेंहदी प्रतियोगिता ने बिखेरा उत्साह

संतकबीरनगर (राष्ट्र की परम्परा)। अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर जिला कारागार में एक अनूठी और प्रेरणादायक पहल देखने को मिली, जब निरुद्ध महिला बंदियों के बीच मेंहदी प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम ने न केवल कारागार के वातावरण को सकारात्मक ऊर्जा से भर दिया, बल्कि बंदियों के भीतर छिपी प्रतिभा और रचनात्मकता को भी एक नया मंच प्रदान किया।
प्रतियोगिता में शामिल महिला बंदियों ने अपने हाथों पर बेहद खूबसूरत और कलात्मक मेंहदी डिजाइनों को उकेरकर अपनी कल्पनाशीलता का परिचय दिया। किसी ने पारंपरिक भारतीय डिजाइनों को जीवंत किया, तो किसी ने आधुनिक पैटर्न के माध्यम से अपनी कला का प्रदर्शन किया। हर प्रतिभागी के चेहरे पर उत्साह और आत्मविश्वास साफ झलक रहा था।
इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य महिला बंदियों को सकारात्मक गतिविधियों से जोड़ना और उनके मानसिक एवं भावनात्मक विकास को बढ़ावा देना था। कारागार प्रशासन का मानना है कि इस तरह की रचनात्मक गतिविधियां बंदियों के जीवन में नई उम्मीद जगाने के साथ-साथ उन्हें समाज की मुख्यधारा में पुनः जुड़ने के लिए प्रेरित करती हैं।

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कार्यक्रम के दौरान कारागार परिसर का माहौल पूरी तरह बदल गया। जहां आम दिनों में सन्नाटा पसरा रहता है, वहीं इस विशेष अवसर पर हंसी, उत्साह और रचनात्मकता का रंग देखने को मिला। महिला बंदियों ने एक-दूसरे की कला की सराहना करते हुए स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का परिचय दिया।
कार्यक्रम के समापन अवसर पर कारागार अधीक्षक कुलदीप सिंह ने सभी प्रतिभागियों को सम्मानित किया। उन्होंने कहा कि “ऐसी गतिविधियां बंदियों के व्यक्तित्व विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यह न केवल उनके आत्मविश्वास को बढ़ाती हैं, बल्कि उन्हें सकारात्मक सोच की ओर भी अग्रसर करती हैं।” उन्होंने आगे कहा कि भविष्य में भी इस तरह के कार्यक्रमों का आयोजन लगातार किया जाएगा, जिससे बंदियों को अपनी प्रतिभा दिखाने के अधिक अवसर मिल सकें।
इस पहल को कारागार प्रशासन के साथ-साथ समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा भी सराहा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि सुधारात्मक गतिविधियों के माध्यम से बंदियों में सकारात्मक परिवर्तन लाना संभव है और यह आयोजन उसी दिशा में एक सार्थक कदम है।
कुल मिलाकर, यह मेंहदी प्रतियोगिता केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि यह एक प्रयास था बंदियों के जीवन में रंग भरने का, उन्हें आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनाने का। ऐसे आयोजन निश्चित रूप से समाज में सुधारात्मक न्याय प्रणाली को मजबूत करने में सहायक सिद्ध होंगे।

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