सोमनाथ स्वाभिमान पर्व पर नवनीत मिश्र का विशेष आलेख
सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।
उज्जयिन्यां महाकालम्ॐकारममलेश्वरम्॥
द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र का यह उद्घोष केवल बारह तीर्थों की सूची नहीं है, बल्कि भारतीय सभ्यता की आत्मिक दिशा का संकेत है। इस श्लोक में सोमनाथ का प्रथम स्थान यह स्पष्ट करता है कि भारत की आध्यात्मिक चेतना का प्रारंभ जिस बिंदु से होता है, वह प्रभास पाटन की यह पुण्यभूमि है। अरब सागर की लहरों के साथ निरंतर संवाद करता हुआ सोमनाथ मंदिर, सदियों से भारतीय आत्मा का प्रहरी। बनकर खड़ा है।
सोमनाथ केवल पत्थरों से निर्मित एक संरचना नहीं है। यह उस विश्वास का नाम है, जिसने समय की सबसे कठोर चोटों को सहा, पर कभी टूटा नहीं। यह वह स्थल है जहाँ इतिहास और आध्यात्म एक-दूसरे में विलीन होकर सभ्यता का रूप लेते हैं।
जनवरी 1026 में सोमनाथ पर हुआ पहला अभिलिखित आक्रमण भारतीय इतिहास की उन घटनाओं में से है, जिनका उद्देश्य केवल विध्वंस था, आस्था का नहीं। मंदिर को तोड़ा गया, पर विश्वास को नहीं। यही कारण है कि वर्ष 2026 में उस घटना के एक हजार वर्ष पूरे होने पर आयोजित सोमनाथ स्वाभिमान पर्व किसी शोक का अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान और पुनरुत्थान का उत्सव है।
यह पर्व इस सत्य की स्मृति है कि सोमनाथ जितनी बार गिराया गया, उतनी ही बार पहले से अधिक गरिमा के साथ खड़ा हुआ। इस निरंतर पुनर्निर्माण की परंपरा ने सोमनाथ को केवल धार्मिक केंद्र नहीं, बल्कि सभ्यतागत जीवटता का प्रतीक बना दिया।
प्रभास तीर्थ की पौराणिक परंपरा बताती है कि चंद्रदेव ने यहाँ भगवान शिव की आराधना कर अपने श्राप से मुक्ति पाई थी। यहीं से इस क्षेत्र का नाम ‘सोमनाथ’ पड़ा। यह कथा केवल आस्था नहीं, बल्कि भारतीय दृष्टि में करुणा, तप और मोक्ष की अवधारणा को पुष्ट करती है।
आदिनाथेन शर्वेण सर्वप्राणिहिताय वै।
आद्यतत्त्वान्यथानीयं क्षेत्रमेतन्महाप्रभम्।
प्रभासितं महादेवि यत्र सिद्ध्यन्ति मानवाः॥
इस श्लोक में प्रभास क्षेत्र को वह भूमि कहा गया है जहाँ आदिनाथ शिव ने समस्त प्राणियों के कल्याण हेतु अपने शाश्वत सिद्धांतों को मूर्त रूप दिया। यह वही भूमि है जहाँ मानव केवल दर्शन नहीं करता, बल्कि आत्मिक पूर्णता की ओर अग्रसर होता है। इस अर्थ में सोमनाथ केवल पूजा का स्थल नहीं, बल्कि साधना और सिद्धि का केंद्र है।
इतिहास के हर दौर में सोमनाथ की परीक्षा हुई। ग्यारहवीं शताब्दी से लेकर अठारहवीं शताब्दी तक, मंदिर को बार-बार नष्ट किया गया, किंतु हर बार समाज ने उसे पुनः खड़ा किया। यह पुनर्निर्माण किसी एक राजा या शासक का नहीं, बल्कि सामूहिक विश्वास का परिणाम था। यही कारण है कि सोमनाथ विश्व इतिहास में अद्वितीय बन जाता है। जहाँ स्मारक नहीं, बल्कि स्मृति पुनर्जीवित होती है।

स्वतंत्रता के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ के खंडहरों में खड़े होकर जो संकल्प लिया, वह आधुनिक भारत के सांस्कृतिक आत्मविश्वास की नींव बना। 11 मई 1951 को जब पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर भक्तों के लिए खोला गया, तो वह क्षण केवल धार्मिक नहीं था। वह भारत की टूटी हुई सभ्यतागत चेतना के पुनर्जागरण का उद्घोष था।
वर्ष 2026 उस ऐतिहासिक उद्घाटन के 75 वर्ष भी पूरे कर रहा है। यही कारण है कि सोमनाथ स्वाभिमान पर्व दो कालखंडों को जोड़ता है। एक हजार वर्ष का संघर्ष और पचहत्तर वर्ष का पुनर्निर्माण।
आज सोमनाथ अपनी भव्यता के साथ निरंतर जीवंत है। 150 फीट ऊँचा शिखर, स्वर्ण-मंडित कलश, ध्वजाएँ और समुद्र की पृष्ठभूमि, यह सब मिलकर एक ऐसा दृश्य रचते हैं, जो श्रद्धा को सौंदर्य में बदल देता है। यहाँ आने वाले लाखों श्रद्धालु केवल दर्शन नहीं करते, वे इतिहास से संवाद करते हैं।
आधुनिक समय में भी सोमनाथ परंपरा और नवाचार का संगम बन गया है। प्रकाश एवं ध्वनि शो, सांस्कृतिक महोत्सव और आध्यात्मिक विमर्श नई पीढ़ी को इस विरासत से जोड़ रहे हैं। महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण और संवहनीय विकास के प्रयास यह दर्शाते हैं कि सोमनाथ केवल अतीत का स्मारक नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा भी है।

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के दौरान आयोजित अखंड ओंकार जाप, संतों की पदयात्रा और शौर्य यात्रा इस बात का प्रतीक हैं कि भारत अपनी सभ्यता को केवल स्मरण नहीं करता, उसे जीता है।
प्रधानमंत्री की उपस्थिति ने इस पर्व को राष्ट्रीय चेतना से जोड़ दिया है। यह संकेत है कि सोमनाथ केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का उद्घोष है।
अंततः, सोमनाथ हमें यह सिखाता है कि विनाश इतिहास का एक क्षण हो सकता है, पर विश्वास सभ्यता की निरंतर धारा है। जहाँ आक्रमणकारी समय की धूल में विलीन हो जाते हैं, वहीं सोमनाथ आज भी अडिग खड़ा होकर कहता है- सभ्यता टूटती नहीं, वह पुनः खड़ी होती है।
सौराष्ट्र के तट पर खड़ा यह ज्योतिर्लिंग, भारत के गहन विश्वास और सभ्यतागत गौरव की शाश्वत लौ है।
