ग्राम हड़ुवा उर्फ औरंगाबाद में लाखों की लागत से बना सामुदायिक शौचालय बना बेकार, बदहाली की कहानी बयां कर रहा ढांचा

सलेमपुर/देवरिया(राष्ट्र की परम्परा)ब्लॉक क्षेत्र के ग्राम हड़ुवा उर्फ औरंगाबाद में स्वच्छ भारत मिशन के तहत लाखों रुपये की लागत से निर्मित सामुदायिक शौचालय आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। सरकार की मंशा खुले में शौच से मुक्ति और स्वच्छता को बढ़ावा देने की थी, लेकिन जमीनी हकीकत इससे कोसों दूर नजर आ रही है।

टूटे फूटे हालत में सामुदायिक शौचालय में लगा सीट

स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, शौचालय का निर्माण हुए कई वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन उसकी स्थिति देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो निर्माण के बाद से आज तक उसका एक बार भी उपयोग नहीं हुआ हो। शौचालय परिसर में उगी झाड़ियां, टूटी-फूटी संरचना और जर्जर हालत इस बात की गवाही दे रही है कि इसकी न तो नियमित सफाई हुई और न ही किसी स्तर पर निगरानी।

सबसे गंभीर बात यह है कि इस सामुदायिक शौचालय का निर्माण ग्राम सभा से काफी दूरी पर, गंडक नदी के किनारे किया गया है। जहां तक पहुंचना ग्रामीणों, महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों के लिए बेहद कठिन है। बरसात के मौसम में नदी के किनारे जाना जोखिम भरा हो जाता है, ऐसे में शौचालय का उपयोग करना तो दूर, वहां तक पहुंचना भी किसी चुनौती से कम नहीं।

ग्रामीणों का कहना है कि शौचालय की लोकेशन चयन में भारी लापरवाही बरती गई है। यदि यह आबादी के पास बनाया जाता तो निश्चित रूप से इसका उपयोग होता और स्वच्छता अभियान को मजबूती मिलती। वर्तमान में यह शौचालय ग्रामीणों के किसी काम का नहीं रह गया है और सरकारी धन के दुरुपयोग का प्रतीक बनता जा रहा है।

स्थानीय लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि निर्माण के बाद से आज तक किसी जिम्मेदार अधिकारी ने इसकी सुध नहीं ली। न तो इसके संचालन के लिए कोई व्यवस्था की गई और न ही देखरेख के लिए किसी की तैनाती। परिणामस्वरूप यह सामुदायिक शौचालय कुछ ही वर्षों में खंडहरनुमा पहाड़ में तब्दील हो चुका है।

ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और संबंधित विभाग से मांग की है कि इस मामले की जांच कराई जाए, दोषियों के खिलाफ कार्रवाई हो तथा या तो शौचालय को आबादी के नजदीक स्थानांतरित किया जाए या फिर इसे दुरुस्त कर नियमित संचालन की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, ताकि सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तव में आम जनता तक पहुंच सके।

यह मामला न केवल योजना के क्रियान्वयन पर सवाल खड़े करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि बिना जमीनी जरूरतों को समझे किए गए निर्माण किस तरह जनता के हितों के विपरीत साबित हो जाते हैं।

rkpnews@desk

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