बलरामपुर की छात्रा की मौत के बाद हाईकोर्ट सख्त 12 अक्टूबर को होगी सुनवाई

लखनऊ, (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। उत्तर प्रदेश के बलरामपुर में कक्षा 2 की छात्रा की मौत से जुड़े घटनाक्रम के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने ध्वनि प्रदूषण के गंभीर मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लिया है। अदालत ने तेज आवाज में लाउडस्पीकर और म्यूजिक सिस्टम के इस्तेमाल तथा उसके बाद बच्ची के कक्षा में गिरने की घटना को गंभीरता से लेते हुए यह जांच शुरू की है कि प्रदेश में Noise Pollution रोकने के लिए जिम्मेदार विभाग और अधिकारी कौन हैं तथा नियमों का प्रभावी ढंग से पालन कैसे कराया जा रहा है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने अभी यह निष्कर्ष नहीं दिया है कि छात्रा की मौत तेज DJ या ध्वनि प्रदूषण के कारण हुई। अदालत ने स्पष्ट किया है कि बच्ची की मौत के वास्तविक कारण को लेकर इस स्तर पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला गया है। कोर्ट की चिंता मुख्य रूप से ध्वनि प्रदूषण से जुड़े कानूनी प्रावधानों के पालन और उनकी निगरानी को लेकर है।
मामला 22 सितंबर 2026 का बताया गया है। बलरामपुर में एक जुलूस के दौरान तेज आवाज में DJ और अन्य म्यूजिक सिस्टम बजने की जानकारी सामने आई थी। इसी दौरान स्कूल में पढ़ रही कक्षा 2 की छात्रा अचानक अपनी कक्षा में गिर पड़ी। उसे तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। घटना के बाद स्कूल प्रबंधन की ओर से प्राथमिकी दर्ज कराए जाने की जानकारी सामने आई। मामले में DJ संचालक और ऑपरेटर की गिरफ्तारी तथा स्थानीय पुलिस चौकी प्रभारी के निलंबन की भी रिपोर्ट है।
इसी घटनाक्रम को गंभीरता से लेते हुए न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति मंजिव शुक्ला की पीठ ने Noise Pollution और उससे जुड़े वैधानिक प्रावधानों के अनुपालन पर अलग स्वतः संज्ञान वाली जनहित याचिका दर्ज करने का निर्देश दिया है। अदालत ने संकेत दिया कि ध्वनि प्रदूषण की समस्या को केवल किसी एक घटना तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता, बल्कि पूरे प्रदेश में नियमों के पालन की स्थिति की समीक्षा जरूरी है।
हाईकोर्ट ने यह जानना चाहा है कि ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी किन विभागों और अधिकारियों की है। साथ ही अदालत यह भी देखेगी कि नियमों के उल्लंघन को रोकने, निगरानी करने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए मौजूदा व्यवस्था कितनी प्रभावी है। कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि केवल नियम बना देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके नियमित अनुपालन की निगरानी और आम लोगों में जागरूकता भी जरूरी है।
मामले में उत्तर प्रदेश के गृह, परिवहन, वन एवं पर्यावरण, आवास एवं शहरी नियोजन तथा नगर विकास विभाग के प्रमुख अधिकारियों को पक्षकार बनाए जाने का निर्देश दिया गया है। इसके साथ ही पुलिस महानिदेशक, संबंधित पुलिस अधिकारी, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, नगर निकायों तथा बलरामपुर के जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक और मुख्य चिकित्सा अधिकारी को भी मामले में शामिल किया गया है।
अदालत ने नई स्वतः संज्ञान वाली जनहित याचिका को 12 अक्टूबर 2026 को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है। स्कूल प्रशासन को भी मामले में पक्षकार बनाने को कहा गया है, ताकि घटना से जुड़ी परिस्थितियों और उपलब्ध तथ्यों को अदालत के सामने रखा जा सके।
हाईकोर्ट ने बच्ची के माता-पिता और स्कूल प्रशासन पर किसी प्रकार का अनावश्यक दबाव नहीं बनाए जाने का भी निर्देश दिया है। अदालत ने स्कूल के कामकाज में किसी व्यक्ति अथवा राज्य की ओर से अनावश्यक हस्तक्षेप से बचने की बात कही है।
अब इस मामले में अदालत की नजर सिर्फ बलरामपुर की घटना पर नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश में Noise Pollution से जुड़े नियमों के व्यापक अनुपालन पर होगी। Environment (Protection) Act, 1986 और Noise Pollution (Regulation and Control) Rules, 2000 के तहत ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के प्रावधान पहले से मौजूद हैं। हाईकोर्ट की आगामी सुनवाई में यह महत्वपूर्ण होगा कि इन नियमों को जमीन पर लागू कराने की जिम्मेदारी किसकी है और उल्लंघन की स्थिति में जवाबदेही कैसे तय की जाती है।