
जब करोड़पति को भिखारी बनने का शौक चढ़े!
व्यंग्यकार : संजय एम. तराणेकर
वाह रे लोकतंत्र! यहाँ कुछ लोग गरीबों की जिंदगी समझने के लिए गरीब बनते हैं और कुछ गरीब लोग पूरी जिंदगी यही सोचते रह जाते हैं कि आखिर अमीर बनने का अनुभव कैसा होता होगा!
करोड़ों के मालिक विधायक भिखारी बने—यह खबर पढ़कर आश्चर्य होना स्वाभाविक है। गंदे-मैले कपड़े पहनकर सड़क पर घूमना, हाथ में झाड़ू और झोला रखना और खुद को आम आदमी की तरह पेश करना… आखिर इसे क्या कहा जाए?
मेरे हिसाब से इसे साधारण भाषा में ‘राजनीतिक वैराग्य’ कहा जा सकता है।
लगता है विधायक जी ने सोचा होगा—“महल में रहकर गरीबों की जिंदगी पर भाषण तो बहुत दे दिए, अब क्यों न खुद ही गरीब बनकर देखा जाए!”
बस फिर क्या था! कपड़े बदले, हुलिया बदला और निकल पड़े गरीबी के ‘लाइव डेमो’ पर।
गरीब आदमी यह दृश्य देखकर शायद मन ही मन सोच रहा होगा—
“साहब, अभिनय तो आप हमसे भी अच्छा कर लेते हैं, लेकिन एक बात बताइए… ये करोड़ों वाला गरीबी पैकेज हमें भी कब मिलेगा?”
जनाब, सबसे मजेदार बात तो यह है कि गरीब बनने के लिए भी आजकल बहुत अमीर होना पड़ता है!
क्योंकि असली गरीब के पास विकल्प ही नहीं होता। वह मजबूरी में फटे कपड़े पहनता है, जबकि करोड़पति वही कपड़े पहन ले तो उसे ‘अनुभव’ कहा जाता है।
गरीब के हाथ में झोला हो तो चिंता, और करोड़पति के हाथ में झोला हो तो वैराग्य!
गरीब सड़क पर घूमे तो व्यवस्था की विफलता और विधायक सड़क पर घूमे तो जनसेवा का नया प्रयोग!
गरीब मदद मांगे तो उसे दुत्कार दिया जाता है और अमीर मदद करने का अभिनय करे तो कैमरे भी पीछे-पीछे चल पड़ते हैं।
लेकिन असली सवाल तो अब भी वहीं खड़ा है—उन अनगिनत करोड़ों का क्या होगा?
बाबू साहब, अगर सच में वैराग्य प्राप्त हो गया है, अगर सच में गरीबों की जिंदगी का दर्द समझ में आ गया है और अगर सच में समाजसेवा का भाव जाग गया है, तो झोला लेकर घूमने से एक कदम आगे बढ़िए साहब!
अपनी संपत्ति का थोड़ा-सा हिस्सा किसी अच्छे ट्रस्ट, अस्पताल, स्कूल या जनकल्याण के काम में लगा दीजिए। तब समझ में आएगा कि हाँ, भाई विधायक जी ने वास्तव में कुछ किया है।
किसी गरीब बच्चे की पढ़ाई हो जाए, किसी जरूरतमंद का इलाज हो जाए, किसी गांव में पानी पहुंच जाए या किसी पुल-पुलिया का निर्माण हो जाए, तो कीचड़ में पैर सना रहे उन ग्रामीणों का भी भला हो जाएगा।
शायद गरीब को देखकर झाड़ू लगाने से ज्यादा बड़ा पुण्य गरीब की जिंदगी बदलने की कोशिश करने में मिलेगा।
क्योंकि गरीबी पहन लेने से गरीब की जिंदगी नहीं समझ आती, गरीबी हटाने की कोशिश करने से जरूर समझ आती है।
और हाँ, अगर कभी फिर भिखारी बनकर निकलें तो अपने साथ एक कटोरा जरूर रखिएगा…
करोड़ों वाले भिखारी के कटोरे में आखिर जनता कितने पैसे डालती है, यह भी देखने और समझने वाली बात होगी!
आखिर हम प्रयोग की दुनिया में ही तो जी रहे हैं। नए-नए आविष्कार हो रहे हैं और यह प्रयोग भी लोकतंत्र के लिए भविष्य में काफी शिक्षाप्रद साबित हो सकता है!
—संजय एम. तराणेकर
कवि, लेखक व समीक्षक
इंदौर-452011 (मध्य प्रदेश)
